सूचना प्रसारण मंत्रालय ने प्रिंट मीडिया के लिए विज्ञापन दरों में 25 प्रतिशत की वृद्धि की

नयी दिल्ली : केंद्र सरकार ने ब्यूरो आफ आउटरीच एंड कम्यूनिकेशन द्वारा प्रिंट मीडिया को दिए जाने वाले विज्ञापनों की दरों में 25 प्रतिशत की वृद्धि की है। एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि इस फैसले से क्षेत्रीय और भाषायी अखबारों सहित खासकर मझोले और छोटे अखबारों को बड़ा फायदा होगा। कृपया हमें अनुसरण …

भारत के मीडिया घराने अब पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथों में हैं!

योगी आदित्‍यनाथ ने बजरंग बली को लोकदेवता, वनवासी, गिरवासी, दलित और वंचित भी बताया, लेकिन मीडिया को बेचे जाने लायक ‘माल’ केवल ‘दलित’ शब्‍द में नजर आया…. इसके बाद शुरू हो गई पीसीआर से इस खबर और शब्‍द पर ‘खेलने’ की तैयारी… लखनऊ। क्‍या भारत का शीर्ष मीडिया पत्रकारों की बजाय मैनेजरों के हाथ में …

इंदौर वाले हेमंत शर्मा ने तो इतिहास रच दिया! पढ़ें दो अखबारों के एक साथ लांच होने की कहानी

इंदौर वाले हेमंत शर्मा. अपने नए-नवेले दफ्तर में अपने नए-नए लांच हुए दो अखबारों के साथ, भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह से बातचीत के दौरान. हेमंत की यह मुद्रा जैसे बता रही हो- ”जमाने को था या न था, पर हमको यकीं था, सपने अख्तियार करेंगे एक रोज हकीकत के रंग.”. मीडिया में दो हेमंत …

सरकारी दावा और ढिंढोरची अखबार

केंद्र सरकार ने कल (शुक्रवार, 31 अगस्त को) अर्थव्यवस्था से संबंधित आंकड़े जारी किए और इनके आधार पर दावा किया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक विकास की दर, उम्मीद से ज्यादा 8.2 प्रतिशत रही। आज ज्यादातर अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छपी है। इसके साथ खबर यह भी थी कि …

रवीश कुमार को क्यों कहना पड़ा- ‘हिन्दी अख़बार सरकारों का पांव पोछना बन चुके हैं, आप सतर्क रहें’

Ravish Kumar : क्या जीएसटी ने नए नए चोर पैदा किए हैं? फाइनेंशियल एक्सप्रेस के सुमित झा ने लिखा है कि जुलाई से सितंबर के बीच कंपोज़िशन स्कीम के तहत रजिस्टर्ड कंपनियों का टैक्स रिटर्न बताता है कि छोटी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर कर चोरी की है। कंपोज़िशन स्कीम क्या है, इसे ठीक से समझना होगा। अखबार लिखता है कि छोटी कंपनियों के लिए रिटर्न भरना आसान हो इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है। उनकी प्रक्रिया भी सरल है और तीन महीने में एक बार भरना होता है। आज की तारीख़ में कंपोज़िशन स्कीम के तहत दर्ज छोटी कंपनियों की संख्या करीब 15 लाख है। जबकि सितंबर में इनकी संख्या 10 से 11 लाख थी। इनमें से भी मात्र 6 लाख कंपनियों ने ही जुलाई से सितंबर का जीएसटी रिटर्न भरा है।

मालिक के तलुवे चाटने वाले आज के संपादकों को अगर किसी में स्पार्क दिख गया तो वे कसाई हो जायेंगे!

…जब संपादक राजेंद्र माथुर ने ब्यूरो चीफ पद पर तैनाती करते हुए रामशरण जोशी की तनख्वाह अपने से ज्यादा तय कर दी थी!

Raghvendra Dubey : एक स्टेट हेड (राज्य संपादक) की बहुत खिंचाई तो इसलिए नहीं करुंगा क्योंकि उन्होंने मुझे मौका दिया। अपने मन का लिखने-पढ़ने का। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि मैंने उन्हें ‘अकबर’ कहना और प्रचारित करना शुरू किया जो नवरत्न पाल सकता था। उन पर जिल्ले इलाही होने का नशा चढ़ता गया और मैं अपनी वाली करता गया।

(मुगल बादशाहों ने अपने रुतबे के लिये यह संबोधन इज़ाद किया था)

अंग्रेजी अखबार के वो संपादक अपने सामने महिला पत्रकार को बिठाकर देर तक क्लीवेज निहारते थे!

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों मरेगी… मोटाएगा मालिक… इसीलिये उसने निष्ठावान, आज्ञाकारी और मूढ़ संपादकों की नियुक्तियां की हैं!

Raghvendra Dubey : अपने नाम के आगे से जाति सूचक शब्द तो उन्होंने हटा लिया लेकिन, मोटी खाल में छिपा जनेऊ, जब-तब सही मौके पर दिख ही जाता है। सांस्कृतिक प्रिवलेज्ड वे, पूंजी के एजेंट हैं और दलाली में माहिर। उनकी जिंदगी का हर क्षण उत्सव है। शाम की तरंगित बैठकों में वे छत की ओर देख कर कहते हैं– …जिंदगी मुझ पर बहुत मेहरबान रही। मुझे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है।

मैं संपादक विनोद शुक्ल के लिए थोड़ी बेहतर नस्ल के कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं था : राघवेंद्र दुबे

Raghvendra Dubey : रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ की 10 जून की एक पोस्ट याद आयी। उन्होंने लिखा है– 1) मालिक ने कहा हम पर हमला हुआ है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है। हम मुट्ठियां ताने मैदान में। 2) मालिक ने कहा राष्ट्रविरोधी ताकतें सर उठा रही हैं। हम मुट्ठियां ताने मैदान में।

प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में पिछले 10 वर्षों में 37 फीसदी की वृद्धि

पिछले 10 सालों में प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डिजिटल मीडिया से मिल रही चुनौतियों के बीच प्रिंट लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2006 में प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन 3.91 करोड़ का था, जो 2016 में बढ़कर 6.28 करोड़ हो गया। इस दौरान प्रकाशन केंद्रों की संख्या भी 659 से बढ़कर 910 हो गई है।

अब हमारे जैसे लोगों के लिए मीडिया में कोई जगह नहीं बची है

मीडियाकर्मी इसे अच्छी तरह समझ लें कि उनकी कार्यस्थितियों को नर्क बनाने से लेकर उनका सीआर खराब करने और उसी के आधार पर उन्हें काम से निकालने में मीडिया के मसीहा तबके की शैतानी भूमिका हमेशा निर्णायक होती है। कारपोरेट हितों के मुताबिक अपनी चमड़ी बचाने और जल्दी जल्दी सीढ़ियां छलांगने के लिए यह तबका किसी की भी बलि चढ़ाने से हिचकता नहीं है।

ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

मजीठिया वेज बोर्ड : यशवंत के साथ ना सही, पीछे तो खड़े होने की हिम्मत कीजिए

Rajendra Hada


मंगलवार, 20 जनवरी 2015 की शाम भड़ास देखा तो बड़ी निराशा हुई। सिर्फ 250 पत्रकार मजीठिया की लड़ाई लड़ने के लिए आगे आए? दुर्भाग्य से, जी हां दुर्भाग्य से, मैंने ऐसे दो प्रोफेशन चुने जो बुद्धिजीवियों के प्रतीक-स्तंभ के रूप में पहचाने माने जाने जाते हैं। वकालत और पत्रकारिता। दुर्भाग्य इसलिए कि दुनिया को अन्याय नहीं सहने की सलाह वकील और पत्रकार देते हैं और अन्याय के खिलाफ मुकदमे कर, नोटिस देकर, खबरें छापकर मुहिम चलाते हैं लेकिन अपने मामले में पूरी तरह ‘चिराग तले अंधेरा’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। अपनी निजी भलाई से जुडे़ कानूनों, व्यवस्थाओं के मामले में बुद्धिजीवियों के ये दो वर्ग लापरवाही और अपने ही साथियों पर अविश्वास जताते हैं। यह इनकी निम्नतम सोच का परिचय देने को काफी है।

7 फरवरी के बाद मजीठिया के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकेंगे, भड़ास आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार

जी हां. ये सच है. जो लोग चुप्पी साध कर बैठे हैं वे जान लें कि सात फरवरी के बाद आप मजीठिया के लिए अपने प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाएंगे. सात फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक साल पूरे हो जाएंगे और एक साल के भीतर पीड़ित पक्ष आदेश के अनुपालन को लेकर याचिका दायर कर सकता है. उसके बाद नहीं. इसलिए दोस्तों अब तैयार होइए. भड़ास4मीडिया ने मजीठिया को लेकर आर-पार की लड़ाई के लिए कमर कस ली है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील उमेश शर्मा की सेवाएं भड़ास ने ली है.

( File Photo Umesh Sharma Advocate )

पत्रकारिता के लिए साल का आखिरी दिन चेतावनी भरा रहा, आप लोगों के मरने पर अखबारों में एक लाइन की भी खबर न छपे

: मीडिया को पुनर्जीवित करने का अभियान : मीडिया में अब मामला पेड न्यूज भर का नहीं रहा है। कई अखबार तो खबरें भी उन्हीं की छापते हैं, जो पैसा देते हैं। पूरे के पूरे अख़बार, सप्लीमेंट्स ही पेड हो गए हैं। छोटे- बड़े , कई – कई यही काम कर रहे हैं। चैनलों के ब्यूरो के ब्यूरो खुले आम नीलाम हो रहे हैं। पैसा लाओ , जो छापना है छापो; जो दिखाना है दिखाओ। राजनीतिक दल और सरकारें भी मीडिया को गुलाम बनाने पर तुली हैं। नाहक नहीं है कि प्रेस कौंसिल के चेयरमैन कह रहे हैं कि मीडिया आम अवाम की आवाज दबाने की साज़िश का हिस्सा हो गया है। इस सन्दर्भ में एक रपट…

मीडिया में एक बड़े आंदोलन की जरूरत : अब न्यूज ही पेड नहीं हैं, अखबार और चैनल भी पेड हैं

ओम प्रकाश सिंह


मीडिया जिस मुकाम पर है, उसमें अब धमचक भी है, और आंतरिक विस्फोट भी जल्द होने वाले हैं। एक बड़े आंदोलन की जरूरत उठ खड़ी हुई है। जनसत्ता में पत्रकार रहे और अब एक बड़े लेखक श्री दयानंद पांडेय कहते हैं – मीडिया को कारपोरेट स्वार्थों, और भांड़ों और भड़ैतों ने घेर लिया है। जी हां, केवल भांड़ों और भड़ैतों ने ही नहीं, मिरासियों और बाई जी लोगों ने भी। जैसे नृत्य, संगीत आदि एक निश्चित किस्म के लोगों से घिर गये थे, वैसी ही हालत मीडिया की भी हो रही है।

New law needed to govern salary in print media : Ravindra Kumar

New Delhi: Outgoing president of Indian Newspaper Society (INS) Ravindra Kumar today (Friday) said a new law is required to govern salary and other issues relating to print media and called the wage boards “life-threatening disease” as their recommendations have put a “crippling burden” on the industry. In his Presidential address at the 75th annual general meeting of INS, Kumar said implementation of recommendations of the Majithia Wage Board has badly hit all newspaper establishments and urged the government to do away with them.

डीआई पीआर में 4 पेज के अखबार को राज्यस्तरीय बनाने वाला कौन है?

: राजस्थान के डीआई पीआर में अखबारों की मान्यता का फर्जीवाड़ा : 4 पेज के अखबार को राज्यस्तरीय दर्जा, लाखों का चूना : जोधपुर। राजस्थान के सूचना एवं जन सम्पर्क निदेशालय के आला अधिकारी अखबारों की मान्यता की कार्यवाही मे बड़े स्तर पर घपला कर सरकार को चूना लगा रहे हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है जोधपुर में फर्जी प्रिंट लाईन से छप रहे 4 पेज के अखबार दैनिक प्रतिनिधि का। दैनिक प्रतिनिधि का मालिक खुद को राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी का रिश्तेदार बताता है। उक्त समाचार पत्र का एक ही संस्करण जोधपुर में छप  रहा है। इस चार पेज के अखबार के पीछे  प्रिन्ट लाईन में नियम तोड़ कर प्रिन्टिंग प्रेस के पते की सूचना तक दर्ज नहीं की जा रही हैं जबकि प्रेस एक्ट में मुद्रणालय के पूरे पते की सूचना आवश्यक रूप से दी जाती है। जिस भण्डारी ऑफसेट से यह अखबार छपना बताया जा रहा है इस नाम की कोई प्रिंन्टिंग प्रेस अस्तित्व में नही है।

पैसे कमाने की होड़ में विज्ञापनों का धंधा करने वालों के साथ इंडियन एक्सप्रेस भी जुड़ गया है

Sanjaya Kumar Singh : पत्नी बीमार हैं और दो महीने में तीसरी बार अस्पताल में हैं। तीमारदारी करते हुए अस्पताल में समय काटने के लिए नकद देकर अखबार खरीदता और पढ़ता हूं। इसी क्रम में पिछले दिनों ‘द हिन्दू’ खरीदा तो पता चला कि आजकल आठ रुपए का आ रहा है। आपमें से बहुतों को पता नहीं होगा कि रोज घर आने वाला अखबार कितने का होता है। महीने भर का बिल देने वालों के लिए यह कोई खास बात नहीं है।