सरकारी दावा और ढिंढोरची अखबार

केंद्र सरकार ने कल (शुक्रवार, 31 अगस्त को) अर्थव्यवस्था से संबंधित आंकड़े जारी किए और इनके आधार पर दावा किया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक विकास की दर, उम्मीद से ज्यादा 8.2 प्रतिशत रही। आज ज्यादातर अखबारों में यह खबर प्रमुखता से छपी है। इसके साथ खबर यह भी थी कि रुपया और गिरा तथा अब एक डॉलर 71 रुपए के बराबर हो गया है। Continue reading

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रवीश कुमार को क्यों कहना पड़ा- ‘हिन्दी अख़बार सरकारों का पांव पोछना बन चुके हैं, आप सतर्क रहें’

Ravish Kumar : क्या जीएसटी ने नए नए चोर पैदा किए हैं? फाइनेंशियल एक्सप्रेस के सुमित झा ने लिखा है कि जुलाई से सितंबर के बीच कंपोज़िशन स्कीम के तहत रजिस्टर्ड कंपनियों का टैक्स रिटर्न बताता है कि छोटी कंपनियों ने बड़े पैमाने पर कर चोरी की है। कंपोज़िशन स्कीम क्या है, इसे ठीक से समझना होगा। अखबार लिखता है कि छोटी कंपनियों के लिए रिटर्न भरना आसान हो इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है। उनकी प्रक्रिया भी सरल है और तीन महीने में एक बार भरना होता है। आज की तारीख़ में कंपोज़िशन स्कीम के तहत दर्ज छोटी कंपनियों की संख्या करीब 15 लाख है। जबकि सितंबर में इनकी संख्या 10 से 11 लाख थी। इनमें से भी मात्र 6 लाख कंपनियों ने ही जुलाई से सितंबर का जीएसटी रिटर्न भरा है।

क्या आप जानते हैं कि 6 लाख छोटी कंपनियों से कितना टैक्स आया है? मात्र 250 करोड़। सुमित झा ने इन कंपनियों के चेन से जुड़े और कंपनियों के टर्नओवर से एक अनुमान निकाला है। इसका मतलब यह हुआ कि इन कंपनियों का औसत टर्नओवर 2 लाख है। अगर आप पूरे साल का इनका डेटा देखें तो मात्र 8 लाख है। समस्या यह है कि जिन कंपनियों का या फर्म का सालाना 20 लाख से कम का टर्नओवर हो उन्हें जीएसटी रिटर्न भरने की ज़रूरत भी नहीं है। इसका मतलब है कि छोटी कंपनियां अपना टर्नओवर कम बता रही हैं।
आप जानते ही हैं कि दस लाख कंपनियों का आडिट करने में ज़माना गुज़र जाएगा। इस रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि बड़े पैमाने पर कर चोरी की छूट दी जा रही है। बस हो यह रहा है कि कोई आंख बंद कर ले रहा है क्योंकि उसका काम स्लोगन से तो चल ही जा रहा है। आखिर जीएसटी के आने से कर चोरी कहां बंद हुई है? क्या 20 लाख से कम के टर्नओवर पर रिटर्न नहीं भरने की छूट इसलिए दी गई ताकि कंपनियां इसका लाभ उठाकर चोरी कर सकें और उधर नेता जनता के बीच ढोल पीटते रहें कि हमने जीएसटी लाकर चोरी रोक दी है।

क्या आपने किसी हिन्दी अखबार में ऐसी ख़बर पढ़ी? नहीं क्योंकि आपका हिन्दी अख़बार आपको मूर्ख बना रहा है। वह सरकारों का पांव पोछना बन चुका है। आप सतर्क रहें। बहुत जोखिम उठाकर यह बात कह रहा हूं। सुमित झा ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जीएसटी फाइल करने को आसान बनाने के नाम पर राजनेता से लेकर जानकार तक यह सुझाव दे रहे हैं कि कंपोज़िशन स्कीम के तहत कंपोज़िशन स्कीम के तहत डेढ़ करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनियों को भी शामिल किया जाए। यह ज़रूर कुछ ऐसा खेल है जिसे हम आम पाठक नहीं समझते हैं मगर ध्यान से देखेंगे तो इस खेल को समझना इतना भी मुश्किल नहीं है।

सुमित के अनुसार डेटा के विश्लेषण से साफ होता है कि कंपोज़िशन स्कीम के तहत 20 लाख टर्नओवर की सीमा को बढ़ा कर डेढ़ करोड़ करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि टैक्स चोरी रोकने के लिए ज़रूरी है कि 20 लाख से भी कम कर दिया जाए। बिजनेस स्टैंडर्ड में श्रीमि चौधरी की रिपोर्ट पर ग़ौर कीजिए। CBDT ( central board of direct taxex) को दिसंबर की तिमाही का अग्रिम कर वसूली का के आंकड़ो को जुटाने में काफी मुश्किलें आ रही हैं। दिसंबर 15 तक करदाताओं को अग्रिम कर देना होता है। सूत्रों के हवाले से श्रीमि ने लिखा है कि चोटी की 100 कंपनियों ने जो अग्रिम कर जमा किया है और जो टैक्स विभाग ने अनुमान लगाया था, उसमें काफी अंतर है। मिलान करने में देरी के कारण अभी तक यह आंकड़ा सामने नहीं आया है।

राम जाने यह भी कोई बहाना न हो। इस वक्त नवंबर की जीएसटी वसूली काफी घटी है। वित्तीय घाटा बढ़ गया है। सरकार ने 50,000 करोड़ का कर्ज़ लिया है। ऐसे में अग्रिम कर वसूली का आंकड़ा भी कम आएगा तो विज्ञापनबाज़ी का मज़ा ख़राब हो जाएगा। बिजनेस स्टैंडर्ड से बात करते हुए कर अधिकारियों ने कहा है कि हर तिमाही में हमारे आंकलन और वास्तविक अग्रिम कर जमा में 5 से 7 फीसदी का अंतर आ ही जाता है मगर इस बार यह अंतर 15 और 20 फीसदी तक दिख रहा है। इसका कारण क्या है और इस ख़बर का मतलब क्या निकलता है, इसकी बात ख़बर में नहीं थी। कई बार ख़बरें इसी तरह हमें अधर में छोड़ देताी हैं।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत सरकार ने 60 शहरों के लिए 9,860 करोड़ रुपये जारी किए थे। इसका मात्र 7 प्रतिशत ख़र्च हुआ है। करीब 645 करोड़ ही। रांची ने तो मात्र 35 लाख ही ख़र्च किए हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री अखबारों में तो ऐसे विज्ञापन दे रहे हैं जैसे हकीकत किसी को मालूम ही न हो। स्मार्ट सिटी के तहत 90 शहरों का चयन किया गया है। हर शहर को स्मार्ट होने के लिए 500 करोड़ दिए गए हैं। आप थोड़ा सा दिमाग़ लगाएंगे तो समझ सकते हैं कि इस पैसे से क्या हो सकता है। फर्ज़ी दिखावे के लिए दो चार काम हो जाएंगे, कहीं दस पांच डस्टबिन और फ्री वाई फाई लगा दिया जाएगा बस हो गया स्मार्ट सिटी। इसके नाम पर शहरों में रैलियां निकलती हैं, लोग रोते हैं कि हमारे शहर का नाम स्मार्ट सिटी में नहीं आया, नाम आ जाता है, मिठाई बंट जाती है और काम उसी रफ्तार से जिस रफ्तार से होता रहा है।

स्मार्ट सिटी के एलान वाली ख़बर तो पहले पन्ने पर छपती है क्योंकि इससे आपको सपना दिखाया जाता है। सात प्रतिशत ख़र्च का मतलब है कि स्मार्ट सिटी फेल है। इसकी ख़बर पहले पन्ने पर क्यों नहीं छपती है, आखिरी पन्ने पर क्यों छपती है। आप अपने अपने अखबारों में चेक कीजिए कि स्मार्ट सिटी वाली ये ख़बर किस पन्ने पर छपी है। पीटीआई की है तो सबको मिली ही होगी। बाकी सारा काम नारों में हो रहा है। आई टी सेल की धमकियों से हो रहा है और झूठ तंत्र के सहारे हो रहा है। जय हिन्द। यही सबकी बात है। यही मन की बात है।

नोट: अख़बार ख़रीदना अख़बार पढ़ना नहीं होता है। पढ़ने के लिए अख़बार में ख़बर खोजनी पड़ती है। किसी भी सरकार का मूल्यांकन सबसे पहले इस बात से कीजिए कि उसके राज में मीडिया कितना स्वतंत्र था। सूचना ही सही नहीं है तो आपकी समझ कैसे सही हो सकती है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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मालिक के तलुवे चाटने वाले आज के संपादकों को अगर किसी में स्पार्क दिख गया तो वे कसाई हो जायेंगे!

…जब संपादक राजेंद्र माथुर ने ब्यूरो चीफ पद पर तैनाती करते हुए रामशरण जोशी की तनख्वाह अपने से ज्यादा तय कर दी थी!

Raghvendra Dubey : एक स्टेट हेड (राज्य संपादक) की बहुत खिंचाई तो इसलिए नहीं करुंगा क्योंकि उन्होंने मुझे मौका दिया। अपने मन का लिखने-पढ़ने का। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि मैंने उन्हें ‘अकबर’ कहना और प्रचारित करना शुरू किया जो नवरत्न पाल सकता था। उन पर जिल्ले इलाही होने का नशा चढ़ता गया और मैं अपनी वाली करता गया।

(मुगल बादशाहों ने अपने रुतबे के लिये यह संबोधन इज़ाद किया था)

उन्होंने बहुतों को नौकरियां दीं।

लेकिन अपने गृह नगर से ऐसे लोगों को भी संपादकीय टीम में लेते आये जिनमें से एक ऑटो के लिये सवारियां चिल्लाता था— एक सवारी.. एक सवारी…।

एक किसी साईं भरोसे चिट फंड कम्पनी में काम करता था। एक किसी निजी प्राइमरी स्कूल में ठेके पर मास्टर था।

एक को दारोग़ा बनना था। यह उसके जीवन की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा थी। उसके बाप भी दारोगा थे।

एक किसी अखबार में स्ट्रिंगर था और उसके दो सैलून थे।

दोनों उस राज्य संपादक की मेहरबानी से आज संपादक हैं।

दारोग़ा बनने का सपना रखने वाला जो अब संपादक है, सत्य कथाएं पढ़ता है और शहर के एक बुजुर्ग और नामी जेवर व्यवसायी के पैर छूता है। इसलिये कि दीवाली पर उसे चांदी की गिन्नियां मिल जायें। वह हर दीवाली लाखों की गिफ्ट लेकर घर जाता है। कार्यकारी संपादक का बहुत खास है और स्टेट हेड चूंकि रिटायर हो गए, इसलिये उनको कभी फोन तक नहीं करता। तोता चश्म है या फूल सूरजमुखी का, नहीं जानता।

स्टेट हेड के लिये वे दिन, जब वे जिसे चाहें, किसी को सड़क से उठा कर सितारों की पांत में बिठा सकते थे, अब गहन अंधेरे की स्मृतियां हैं। अपनों से मिले घाव अबतक रिसते हैं।
उन्हें सेवा विस्तार न मिल सके, इसकी सुपारी दूसरे कार्यकारी संपादक ने ली। जो मरकजी हुकूमत और संस्थान के बीच अच्छे रिश्तों की सेतु हैं।

एक बिल्डर उनका बड़ा प्रसंशक है।

एक बात याद आती है।

यशस्वी पत्रकार स्व. जयप्रकाश शाही को गोरखपुर में उनके गांव के लोगों ने, तब काबिल पत्रकार माना, जब उनकी बाइलाइन पढ़ी– ‘सुखोई विमान से जयप्रकाश शाही’।
तब मुलायम सिंह यादव जी रक्षा मंत्री थे।

गांव वाले कहते थे– ”बाप रे, जहजिए से खबर लिख दे ता।”

जब मैं लखनऊ में था, देवरिया-गोरखपुर के लोग किसी न किसी काम से आते रहते थे।

–कहां क्वाटर बा?

–अमीनाबाद में लेले बानी एगो कोठरी

–सरकारी रऊवां के ना मिलल?

–अब्बे ना

और मेरे ना कहते ही गांव-जवार में सफल पत्रकार होने की मेरी रेटिंग गिर जाती थी।

अब सफल पत्रकार वह माना जाता है जो अफसरों से अपने घर में एयर कन्डीशन लगवा ले। फ्रीज पा ले।

वो और ज्यादा बड़े पत्रकार हैं जो भूखंड खरीद रहे हैं, मॉल बनवा रहे हैं।

समाज भी खासा बदला है। क्या अपना समाज ही पत्रकारों को करप्ट होने के लिए नहीं विवश कर रहा।

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एक बार, बक्सर (बिहार) में शिवपूजन सहाय स्मृति व्याख्यानमाला में, मैं भी एक प्रमुख वक्ता था। इस तरह की व्याख्यानमाला, संगोष्ठियों और सेमिनार में (पटना, भोपाल, कोलकाता तक) कई यशस्वी लेखकों और पत्रकारों के साथ मंच साझा करने का अवसर मिला है।

बक्सर में मैं, आदरणीय राम शरण जोशी जी के साथ था। शाम को फुर्सत में वह अपनी पत्रकारीय यात्रा बताने लगे।

जंगल-जंगल अपनी फरारी के खासे दिनों बाद, उन्हें राजेन्द्र माथुर जी का संदेश मिला।

तब माथुर जी नई दुनिया के संपादक थे। अब जोशी जी से ही सुनें– …. ब्यूरो चीफ के पद के लिये मेरा इंटरव्यू लेने कुल पांच लोग और सभी दिग्गज, बैठे थे। मलकानी, राहुल वारपुते और खुद माथुर जी। मुझसे दो घण्टे तक तो मेरी राजनीतिक रुझान और वैचारिक प्रतिबद्धता के बारे में जाना गया। यह भी पूछा गया कि मैं कम्युनिस्ट क्यों हूं। घण्टों बातचीत के बाद मेरा चयन हुआ और माथुर जी ने मेरा वेतन, खुद से कुछ ज्यादा निर्धारित कर दिया। अब एक दूसरी बहस शुरू हो गई । ब्यूरो चीफ का वेतन संपादक से ज्यादा कैसे हो सकता है।

माथुर जी ने मुस्कराते हुए कहा था– ”जोशी जी किसी तरह तो अरण्य से लौटे हैं। मैं नहीं चाहता ये फिर वहीं लौट जायें। फिर मैं इन्हें बुर्जुआ बना रहा हूं, इन्हें बांध रहा हूं। मुझे ऐसा कर लेने दीजिये।”

तब बाकी लोग चुप हो गये।

अब न माथुर जी नहीं रहे और रामशरण जोशी जी किसी अखबार में नहीं हैं।

मालिक के तलुवे चाटने वाले आज के संपादकों को अगर किसी में स्पार्क दिख गया तो वे कसाई हो जायेंगे। अव्वलन तो नौकरी नहीं देंगे, और देंगे भी तो ऐसी जगह बिठा देंगे जहां से आप अपना श्रेष्ठ दे ही नहीं सकते। फिर आपको नाकारा घोषित कर देंगे।

संपादक बनने और बनाने की पूरी प्रक्रिया ही उलट चुकी है।

संपादक पद के लिए संपादन, उत्कृष्ट लेखन, अखबार को हर वर्ग आम, बौद्धिक, किसान, मजदूर और ब्यूरोक्रेट के लिए भी जरूरी पठनीय सामग्री से सजा सकने की क्षमता, अब कोई कसौटी नहीं रही।

माने-जाने जन बुद्धिधर्मी अभय कुमार दुबे, आलोक तोमर, यशस्वी पत्रकार स्व. जय प्रकाश शाही का व्यक्तित्व आज के या कभी के किसी समूह संपादक से बहुत बड़ा रहा है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना या श्रीकांत वर्मा भी संपादक नहीं थे।

दिनमान का वह दिन भी याद है जब उसके लिए कालजयी कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु, पटना में बाढ़ की त्रासद कथा लिखते थे।

हिन्दी की आधुनिक पत्रकारिता ने बीते दशकों में जो उर्ध्व यात्रा की, अब ढलान पर है। तेजी से अपने पतन की ओर। और ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर झोंक कर जला देने वाले संपादकों के बूते।

अरे गुंडा हैं तो गैंगवार में उतरें।

पोलैंड में तानाशाही के दिनों में अखबार और दृश्य मीडिया पर सरकार और वर्चस्वशील समूहों का कब्जा हो गया।

टीवी सरकारी भोंपू हो गये। तब लोगों ने टीवी का मुंह अपने घर की खिड़की की ओर कर दिया था। वे टीवी को उधर ही चलने देते और घर छोड़कर सड़क पर आ जाते थे।
भारत में भी ऐसा हो सकता है।

शायद ऐसा न भी हो। क्योंकि सुरेन्द्र प्रताप सिंह के बाद टीवी मीडिया में आम और परेशान लोगों के भरोसे की एक शख्सियत तो है। रवीश कुमार।

थू… गोदी मीडिया पर।

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–किसानी और किसान से कितना पैसा आता है अखबार को?

–जी ..

–जी क्या ?

–और ये साईंनाथ….?

–जी … ‘द हिन्दू’ के एडिटर रूरल अफेयर …

–कितना बिकता है यह अखबार यहां? हम लार्जेस्ट सरकुलेटेड….

–तुम्हारी तनख्वाह कहां से आती है? पता है?

–उस पूंजी और उसके स्रोत की इज्जत करना सीखो…।

संपादक की मौजूदगी में मालिक / डाइरेक्टर उस विशेष संवाददाता को समझा रहा था जो, राज्य में भूमि सुधार न लागू होने से सामंती क्रूरता के सीधे-सीधे और वीभत्स वर्ग विभाजन पर रिपोर्ट तैयार कर रहा था। कई किस्तों के लिये तैयार इस रिपोर्ट में असल किसानों की जोत घटने और खेती बहुत घाटे का उद्यम होते जाने से पलायन की बात थी।

गुनाह इस रिपोर्टर का यह भी था कि वह पी. साईंनाथ को अपना आदर्श मानता था।

— भैया जो कह रहे हैं समझा करो। तुम्हारे ही भले की बात कह रहे हैं।

(स्थानीय संपादक ने कहा)

मुझे लगता है जिस दिन मुर्गा बनकर, हर उस शख्स ने जिसने कसम ली होगी कि वह आइंदा उस पूंजी का हित पोषण करेगा जिससे उसे तनख्वाह मिलती है, समाचार संपादक के लायक हो गया।

जिसने यह कसम ले ली होगी कि देश और समाज के व्यापक सन्दर्भों से जुड़ने की बैचैनी का वह गला घोंट देगा, संपादकीय प्रभारी होने के अर्ह हो गया।

अब यह न पूछियेगा, तब स्टेट हेड कौन हुआ होगा?

एक संपादक से मैंने कहा भी– बाहर किसी को अपना पद मत बताइयेगा। केवल पत्रकार कहियेगा। वरना जिसे आप अपना पद बताएंगे, वह जान जायेगा कि आपका लिखने-पढ़ने से कोई ताल्लुक नहीं है।

(कुछ अखबारों के संपादकों के बारे में यह सामान्य अवधारणा है। हां एक-दो अपवाद भी हैं। जो सन्दर्भ समृद्ध और पढ़े-लिखे थे। इसीलिये कहीं 10 साल नहीं रह सके। बस दो या तीन साल अधिकतम)

इन अखबारों के संपादक यह जान गए हैं– ”अबे भो… अच्छा-बुरा तय करने वाले हम कौन होते हैं? हम वह हर चीज परोसेंगे जिसकी मार्केट डिमांड है।”

ऐसे ही अखबार में एक बार बड़ा बवाल मचा।

हिन्दी पत्रकारिता के शलाका व्यक्तित्व परम आदरणीय प्रभाष जोशी जी का देहावसान हुआ था।

एक भावुक पत्रकार ने इसपर अच्छी खबर बनाई। तब तक इस अखबार के दिल्ली स्थित मुख्यालय से तत्काल मेल और फोन आया। प्रभाष जी के देहावसान की खबर नहीं जायेगी। अगर जाये भी तो भीतर के पन्नों में कहीं संक्षेप में।

यह खबर सबसे पहले वाले डाक एडिशन में जा चुकी थी। हजार कॉपी छपी थी। मशीन रुकवाई गई।

यह बात दिल्ली तक पहुंच ही गयी।

वहां से बार-बार पूछा जा रहा था– कौन है अपने यहां प्रभाष जोशी का चेला?

स्थानीय संपादक पसीने-पसीने

–नहीं सर, कोई उनका चेला नहीं है। गलती हो गई। दिल्ली का मेल थोड़ी देर से मिला.

यह अखबार प्रभाष जोशी जी के पेड न्यूज के खिलाफ अभियान चलाने से बहुत नाराज था। जोशी जी ने इस अखबार को इंगित भी किया था।

वह रिपोर्टर जिसने उनके देहावसान की खबर लिखी थी, अखबार की कैंटीन में फफक-फफक कर रो रहा था।

मेरी भी आंख डबडबा आयी।

हिन्दी के कई अखबारों में सम्पादक होने की पहली और बुनियादी शर्त अमानवीय होना है।

तभी तो कोई सम्पादक होटल मैनेजर क्या, किसी को झापड़ मार सकता है।

दैनिक जागरण, लखनऊ और पटना में लंबे समय तक सेवारत रहे वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे उर्फ भाऊ की एफबी वॉल से.


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पार्ट वन

पार्ट टू

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अंग्रेजी अखबार के वो संपादक अपने सामने महिला पत्रकार को बिठाकर देर तक क्लीवेज निहारते थे!

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों मरेगी… मोटाएगा मालिक… इसीलिये उसने निष्ठावान, आज्ञाकारी और मूढ़ संपादकों की नियुक्तियां की हैं!

Raghvendra Dubey : अपने नाम के आगे से जाति सूचक शब्द तो उन्होंने हटा लिया लेकिन, मोटी खाल में छिपा जनेऊ, जब-तब सही मौके पर दिख ही जाता है। सांस्कृतिक प्रिवलेज्ड वे, पूंजी के एजेंट हैं और दलाली में माहिर। उनकी जिंदगी का हर क्षण उत्सव है। शाम की तरंगित बैठकों में वे छत की ओर देख कर कहते हैं– …जिंदगी मुझ पर बहुत मेहरबान रही। मुझे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं है।

वह पहले जहां थे, कोई उनसे मिलना चाह रहा था। उसे, उनके पीए ने बताया कि वह फलां तारीख (15 दिन बाद की) को फोन करके पूछ ले कि साहब से कब समय मिल सकता है। बहुत मुश्किल और सामान्य लोगों के लिए तकरीबन असंभव, उनकी उपलब्धता भी दिल्ली में चटख और लंबी कहानी है। जो आतंक, रहस्य और रईसी की छोटी-छोटी अंतरकथाओं से प्रवाह पाती है।

एक साहब किसी अखबार में कार्यकारी संपादक हैं। मालिक संपादक से वार्तालाप के दौरान उनकी रीढ़ में अद्भुत लचक पैदा हो जाती है।

रीजनल या नेशनल मीट के दौरान (जैसा कि देखा गया है) उनकी नजर हर क्षण मालिक की आंख की पुतलियों की ओर होती है। वह हर इशारा समझते हैं। पुतली फिरी नहीं कि वह दौड़कर मालिक की कुर्सी के बगल में कच्च से घुटनों के बल बैठ जाते हैं और अपना कान उनके मुंह से सटा देते हैं। किसी का ‘काम लगवा दें’ जनाब।

एक संपादक ने तो दरअसल मालिक के करतूत की सजा भुगती। जेल गये। एक अखबार समूह में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों में से दो-एक एवज में जेल जाने के लिये ही होते हैं।

याद आ रहा है विभिन्न शहरों में अलग-अलग अखबारों की लांचिंग के समय का मंजर। एक संपादक ने अपने अखबार के नाम का स्टिकर, खुली छाती वाली अपनी कोट के दोनों ओर सामने, पीठ पर, बांहों पर, कलाई पर चिपका रखी है।

सेंटर पर डांसर बुलाई गयी है और कुछ गुंडे भी। प्रतिस्पर्धी अखबार ने भी अपनी सेना जुटा ली।

नगाड़ों और बैंड के कानफाडू शोर के बीच पत्रकार नाम की मजदूर बिरादरी, आमने-सामने की खूखांर और एक-दूसरे के रक्त पिपासु पलटन में बदल जाती है।

लाठियां मंगवा ली गई हैं। दोनों ओर अवैध असलहे भी हैं। धांय …. धांय .. यह लीजिये गोली भी चली।

मालिक जो वस्तुतः एक ही होते हैं, कई मायनों में, अपनी-अपनी सेना के शौर्य प्रदर्शन से खुश हैं। एक आदमी बस इसलिए संपादक बना दिया गया क्योंकि उसने प्रतिस्पर्धी को डराने के लिए धुआंधार फायरिंग कराई। और एक तो बस इसलिए कि वह हाकरों का नेता था।

मीडिया के इस ढांचे में सबसे ज्यादा प्रताड़ित और बेचैन असल पत्रकार हैं। एक हिस्सा चाँदी काट रहा है, दूसरा भूजा फांक रहा है। पता नहीं कैसे मात्र 10-12 साल की ही नौकरी में कोई पत्रकार किसी लीडिंग चैनल में पार्टनर हो जाता है या अपना खुद का चैनल और अखबार ला देता है।

हम असल पत्रकार अपना दुख किसको ई-मेल करें। पूंजी तो मालिक की है क्या फर्क पड़ता है रोशनाई, हमारे खून की हो।

रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ ने ठीक कहा है— हम दोनों ओर से पूरे मनोयोग से लड़ेंगे साथी।

क्यों आलोक जोशी जी, हमारी नियति भी यही है न?

बखूबी जानता हूं, उनके पीछे संस्थान की पूरी ताकत खड़ी है। राजनीति और नेताओं से कुत्सित रिश्ते भी। लेकिन, देवरिया, बलिया, गोरखपुर और बनारस के लोग चोटिया कर लड़ना जानते हैं। फिर 63-64 की उम्र में मेरे पास गंवाने को क्या है? तकरीबन 36 की उम्र में आया पत्रकारिता में। आठ-10 साल पॉलिटिकल एक्टिविज्म, रंगकर्म और शुरूवाती दौर में अच्छी चल निकली 6 साल की वकालत छोड़ कर। उन दिनों देवरिया में एक जज थे, आर. सी. चतुर्वेदी। जिला जज संगम लाल पाण्डेय। चतुर्वेदी जी जैसे कड़क जज, मुझे बेटे का प्यार देते थे। माथुर चौबे (मूलतः मथुरा के चौबे) लेकिन मैनपुरी के रहने वाले थे। तब जागरण गोरखपुर में संपादक थे, यशस्वी पत्रकार डा . सदाशिव द्विवेदी। शब्द वही अर्थ देने लगते थे, जो वह चाहते थे।

सोचता हूं अगर उन्होंने मुझ 36 पार के व्यक्ति को, अपने साथ रखने से इनकार कर दिया होता, तो क्या होता? रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ की जोरदार सिफारिश के बावजूद किसी ने 48 साल की उम्र में मुझे स्टेट ब्यूरो में रखने से इनकार कर दिया होता तो क्या होता? बिहार में मैंने इस छोर से उस छोर तक आम लदी, डोंगी में बैठकर, जिद्दी और करार तोड़ती बेलगाम नदियों से 8-8 किलोमीटर तक की यात्रा की। बाढ़ के साथ जी रहे लोगों को देखने के लिये। जिनका सपना आर्द्र हो चुका था। कांवरियों के साथ 100 किमी. की पैदल यात्रा की। अयोध्या और बाबरी ध्वंस के दौर की ग्राउंड लेवल रिपोर्टिंग के दौरान की ताड़ना-प्रताड़ना कई दफे लिख कह चुका हूं।

उसी कम तनख्वाह में संस्थान की ओर से आयोजित लिट्रेचर फेस्टिवल, फिल्म फेस्टिवल भी मुझ अकेले के ही जिम्मे होता था। ‘गंगा संसद’ भी। वो आंच और जोखिम लेने का हौसला मुझमें आज भी है, लेकिन उस औपनिवेशिक कानून का क्या करूं जो 58 साल के एक सेकेंड पहले तक हमें सक्षम और एक सेकेंड बाद अक्षम मान लेता है।

अब तक के 30 साल के करियर में कितना भूत लेखन किया, संपादक और निदेशक की बात न्यायसंगत या वजनदार बनाने के लिये कितनी रफूगीरी की, नहीं बता सकता। लेकिन, वह पाप मेरे माथे भी है, नाहक। बिना कुछ पाये।

बड़ा नाश किया अनपढ़, गुंडे और मालिक या सरकार का तलवा चाटने वाले कुछ संपादकों ने। हमें या हमारे जैसों को इनके ही बीच रहना है और मुट्ठियां ताने मैदान में भी हैं क्योंकि मालिक ने कहा है- ”अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हुआ है”।

एक कार्यकारी संपादक का सधा वाक्य होता है– ”कुछ समझा भी करो…।”

जो संपादक ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर झोंक कर जला सकते हैं उनकी पसंद देखिये। तब कम्प्यूटर पर खुद ही टाइप कर लेना अभी नहीं शुरू हुआ था। वह लंबा-छरहरा-गोरा लड़का याद है जो समाचार संपादक के कमरे में जाकर अपनी रिवाल्वर लोड और अनलोड करता था। वह संपादक जी की पहली पसंद है। सुना है वह भी किसी यूनिट का संपादक हो गया है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़े और अच्छी समझ के लिए मशहूर एक पत्रकार के भी बारे में लिखूंगा। बता दूं कि वे किसी जाति के हों, जो अपने नाम के आगे जाति सूचक शब्द नहीं लगाते, बड़े जातिवादी हैं। सरनेम हटा लेने से ही वे जाति विघटित नहीं हो जाते। और, दिल्ली तो कुछ ऐसे क्षद्म और अधकचरे बुद्धिजीवियों से आज कल भर गयी है।

ये संपादक अखबारों में नयी संस्कृति (दरअसल कुसंस्कृति) के नये साहूकार हैं। बीते दो दशकों में परवान चढ़ी चलन के ये, या तो डॉन हैं या कामातुर लपकहे। जो किसी को रातों-रात स्टार बना सकते हैं। बाजार की तूती वाले इस दौर में उनकी मर्द दबंगई और बेझिझक हुई है, कभी मालिक यानि निदेशक या वाइस प्रेसिडेंट के लिये और कभी अपने लिये। पहले अपने लिये। पद के लिये ऊपर चढ़ते जाने की यह भी एक सीढ़ी है।

पत्रकारीय कौशल, उसके लिये जरूरी संवेदना या नागरिक – सामाजिक हैसियत से ज्यादा, इनकी निगाह किसी की आंख, देह रचना, खुले रंग और गोगेल्स पर होती है। खास बात यह कि ऐसी चीजें चटख कानाफूसी बनती हैं और अंततः महिला पत्रकार के खिलाफ ही जाती हैं। वे बाद में गड़बड़ औरत करार देकर निकाल भी दी जाती हैं।

–उसमें स्पार्क है, उसकी मदद करो

— डाउन द लाइन कुछ अच्छे लोग तैयार करना तुम्हारी भी की-रोल जिम्मेदारी है। लगता है तुमने कुछ पढ़ना-लिखना कम कर दिया है।

— जी …

और मैं यह कह कर ठंडे कमरे से बाहर चला आया था। उस कमरे की ठंड हालांकि किसी घिन की तरह मेरी देह से बहुत देर तक चिपकी रही।

लखनऊ में एक अंग्रेजी अखबार के संपादक आज तक नहीं भूले हैं। मेरे खासे परिचित हैं। वह जब-तब, एक महिला पत्रकार को बुला कर, उसे सामने बैठने को कह कर वक्ष की घाटी (क्लीवेज) और गोलाईयां देर तक निहारते रहते थे।

उस महिला को भी इसका भान था लेकिन, कई सहूलियतों की वजह से वह यह जस्ट फन, अफोर्ड कर सकती थी। उसमें पेशेवराना दक्षता थी। पत्रकारिता को अब ऐसे ही प्रोफेशनल्स चाहिये।

स्पॉट रिपोर्टिंग के दौरान धधकती धूप में जले और धुरियाये रिपोर्टर की देह से संपादक जी को प्याज और लहसुन की बदबू आती थी।

— जाओ मिश्र जी (चीफ रिपोर्टर या ब्यूरो हेड) को दे दो (खबर या रिपोर्ट की कॉपी)

— जी…

— और सुनो थोड़ा प्रजेन्टेबुल बनो, इस तरह नहीं चलेगा। अखबार का हर कर्मचारी उसका ब्रांड दूत होता है।

— जी…

उस निहायत कम तनख्वाह पाने वाले रिपोर्टर ने सब्जी और नून-तेल से कटौती कर अपने लिए एक ब्रांडेड शर्ट खरीदी।

उस दिन पखवारे वाली मीटिंग के दौरान वह नहा-धोकर, वही शर्ट पहन कर आया।

निदेशक की निगाह बार-बार उसकी ही ओर जाती थी।

”–आजकल मॉडलिंग करने लगे हो क्या? पत्रकारिता करो… वरना लात मार कर निकाल दिये जाओगे। और तुम जानते हो लात कहां पड़ती है।”

संपादक, जी भैया … जी भैया … कह कर बिछा जा रहा था।

इस डाइरेक्टर की पहनी हुई शर्ट संपादकीय बैठक में नीलाम की जाती है और चतुर संपादक कहता है– ”इसकी बोली कौन लगा सकता है? यह अनमोल है।”

वह संपादक आफिस आने और अपनी कैबिन में घुसने के बाद मेज पर रखे शीशे के नीचे भगवानों की फोटो को हाथ से छू-छू कर प्रणाम करता है। शीशे में अपनी मांग सवांरता है। वह राज्य के संपादकों में सबसे ज्यादा समझदार था।

— वे सनकी हैं थोड़ा। दोनों। एक किसानी की बात करता है और उसकी अर्थ व्यवस्था की। दूसरा मार्क्स, सार्त्र, ग्राम्सी और देरिदा की।

वे दोनों 50 के ऊपर हो चले थे। अखबार को जो चाहिए नहीं दे पा रहे थे। सुना है निकाल दिये गए।

चूंकि वे ढाबे के बुझे चूल्हे में फायर नहीं झोंक सकते, इसलिए अब भाड़ झोंक रहे हैं।

असल पत्रकार अब भाड़ ही झोकेंगे।

और मालिक ने कहा- अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला हुआ है। इसलिए मुट्ठियां ताने मैदान में भी होंगे।

पत्रकार और पत्रकारिता दोनों मरेगी। मोटाएगा मालिक। इसीलिये उसने निष्ठावान, आज्ञाकारी मूढ़ संपादकों की नियुक्तियां की हैं।

दैनिक जागरण, लखनऊ और पटना में लंबे समय तक सेवारत रहे वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे उर्फ भाऊ की एफबी वॉल से.


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मैं संपादक विनोद शुक्ल के लिए थोड़ी बेहतर नस्ल के कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं था : राघवेंद्र दुबे

Raghvendra Dubey : रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ की 10 जून की एक पोस्ट याद आयी। उन्होंने लिखा है– 1) मालिक ने कहा हम पर हमला हुआ है । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है। हम मुट्ठियां ताने मैदान में। 2) मालिक ने कहा राष्ट्रविरोधी ताकतें सर उठा रही हैं। हम मुट्ठियां ताने मैदान में।

याद आते हैं दैनिक जागरण लखनऊ के दिन .. 1992 से 94 के बीच के। तब आफिस हजरतगंज में हुआ करता था। स्थानीय संपादक विनोद शुक्ल तब मालिकों वाली हैसियत में हुआ करते थे या दिखाते थे। बहुत कम दिनों में ही मैं अपनी ऑफ बीट और मानवीय संस्पर्श की स्टोरीज के लिए खासा चर्चित हो चुका था। कुछ राजनीतिक और नौकरशाह मेरे लिखे की नोटिस लेने लगे थे और स्व. शुक्ल को फोन भी करते थे। यह जानने के लिये कि वह मुझे कहां से उठा लाये?

एक दिन मैं शुक्ल जी के साथ ही आफिस से निकला। दो – तीन उनके मुलाकाती और आ गये। मेरी तारीफ और हौसला आफजाई करने की ही नीयत से (उनका यही तरीका था) उन्होंने सामने वाले से मेरा परिचय कराया। मेरा कंधा थपथपाते कहा– …यह रहा मेरा बुलडॉग… (चेहरे पर हिंसक और आक्रामक भाव लाने के लिए जबड़ों को भींचते हुए)… जिसको कहूं फाड़ डाले। ‘हम सब’ नहीं लिख सकता लेकिन मैं तो उनके लिए थोड़ी बेहतर नस्ल के कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं था। यह भी उनके अच्छे मूड पर निर्भर था। वरना किसी छण वह मुझसे मेरे गले का पट्टा छीनकर, मुझे आवारा कुत्ता भी करार दे सकते थे। आखिर पत्रकार मालिक के हितों की चौकसी न करे, उसके लिए भूंकना और दुम हिलाना छोड़ दे तो करेगा क्या?

सर हम तो बजनियां हैं। जो सुर कहोगे निकाल देंगे।

काका ने अच्छा लिखा है। इसीलिये वह काका हैं। आजकल उनसे बात नहीं हो रही है। पहले बात होती थी इसलिये उन्हें तो पता है कि मैं किस हाल हूं। उनका नहीं पता।

आजकल अखबारों में मालिकों के ठीक बाद, मालिक जैसा व्यवहार करती दूसरी कतार तो और क्रूर है । वह मालिक से वफादारी दिखाने में किसी की गर्दन छपक सकती है। वे इसी और मात्र इसी योग्यता पर संपादक या स्टेट हेड बनाये जाते हैं। इसके बाद वाली कतार की कन्डीशनिंग ही इस तरह की जाती है कि वे मालिक (कम्पनी) के दुश्मन को अपना दुश्मन और उसके हितैषी को अपना हितैषी समझें। वे आज्ञाकारी मूढ़ हों।

कभी-कभी पत्रकारीय उसूलों और एकेडमिक्स पर प्रायोजित चर्चा के लिए भी एक चेहरा रखा जाता है। उसे प्रमोट कभी नहीं किया जाता। उसे अराजक और एंटी सिस्टम माना जाता है। लेकिन कहा जाता है संस्थान की बौद्धिक संपदा। ये खिताब मुझे भी मिला है। विनोद शुक्ल जी से अब तक सलीके में इतना अंतर तो आया है कि अब बुलडॉग को बौद्धिक संपदा कहा जाने लगा। बदले दौर में कुत्ता स्टेट्स सिंबल और प्राइड पजेशन हो गया। कितनी गफलत में है पत्रकार।

उनका दावा था कि वह कौओं को हंस में बदल देते थे। मैं बाद में उनका बुलडॉग, जब गोरखपुर से बुलाया गया था (लखनऊ दैनिक जागरण, 1991 में) शायद कौआ ही था। अब मैं विनोद शुक्ल जी के खांचे और काट में हंस बन रहा था। उन्हें ‘हार्ड टास्क मास्टर’ कहा जाता था और यह भी कि नकेल डाल कर किसी से जो और जैसा वह चाहते थे लिखवा लेने की कला उनमें थी। बाद में हम उनकी इच्छा शक्ति का माध्यम, तोता भी थे। मैं आफिस में कई-कई बार उनके चरण छूता था। उन्हें लोग भैया कहते थे। उस समय भी मुझे अहसास था कि मैं पत्रकार होने के अलावा सब कुछ था। बुलडॉग , कौआ, हंस और तोता।

एक मालिक हैसियत (मालिक नहीं) संपादक विनोद शुक्ल में गजब का जादू था। वह किसी को, जिसमें चाहते, उस जानवर या चिड़िया में ढाल लेते थे। उनकी तारीफ में एक बात और, बहुत दिनों तक कही गयी। वह सच भी थी। कई अखबार अपनी बदहाली के दौर से गुजरने लगे, कुछ बंद भी हुए। इस दौरान कई स्टार रिपोर्टर या काबिल समाचार संपादकों, ने दैनिक जागरण में अपने दिन बिताये। किसी ने कम समय तक किसी ने ज्यादा। वे भी जिनके नैरेशन की तारीफ बाद में महाश्वेता जी तक कर चुकी थीं। वे भी, व्यापार और अर्थ जगत की जिनकी जानकारियों और सन्दर्भों का लोहा माना जाता है। वे भी जो उस समय हमलोगों के आवेश रहे। उनसे शुक्ल जी के चर्चित झगड़े भी हुये। और भी बहुत से लोग।

बाबरी मस्जिद ध्वंस (6 दिसम्बर 1992) के दौरान हमें कारसेवक बनाया जा रहा था, जो संभव नहीं हो सका। यह लिखना बहुत मुनासिब नहीं लगता कि एक उच्च पदस्थ आइपीएस भविष्यवक्ता के कहने पर शुक्ल जी, हनुमान जी को हर शनिवार महावीरी (चमेली का तेल और सिंदूर) चढ़ाने लगे थे। जिमखाना क्लब में देर तक बैठ जाने के कारण, इस काम में किसी-किसी शनिवार व्यतिक्रम भी हो जाता था। योग्य और मानवीय संपादक अनिल भास्कर ने अपनी पोस्ट में लिखा है– ”…. निचले पायदानों से चिपके पत्रकार हवा के विपरीत जाने का दम बस नहीं साध पा रहे।”

अनिल जी, जैसा कि आप ने लिखा भी है, वे बेचारे उन संपादकों से हांके जा रहे हैं, जिनका पैकेज उनके संपादकीय आचरण से बड़ा है। विनोद शुक्ल कोई एक व्यक्ति नहीं संपादक संस्था में क्षरण, प्रबन्धकीय आधिपत्य, आदमीयत और पत्रकारीय मूल्यों के नेपथ्य में ठेल दिये जाने की कुसंस्कृति का नाम है। यही समय देश में आर्थिक पुनरुद्धार और उदारीकरण यानि बाजार वर्चस्व वाली अर्थव्यवस्था की आक्रामक शुरुआत का है। शुक्ल जी की संस्कृति संक्रमित भी हुई। आज के कई संपादक और प्रधान संपादक तक में। एक संपादक रिपोर्टरों को गाली देते हैं। उनकी क़ाबिलियत यह है कि वे ‘गुंडा’ हैं। ढाबे के बुझे चूल्हे को फायर झोंक कर (तड़तड़ गोलियों से) जला सकते हैं।

रामेश्वर पाण्डेय ‘काका’ ने लिखा है– ‘…हम दोनों तरफ से पूरे मनोयोग से लड़ेंगे, लौटेंगे तभी जब मलिकार लोग आपस में सुलह-सफाई कर लेंगे..’. सोच रहा हूं तमाम असल पत्रकारों की सुबह (सूरज) कैसी होगी जिसमें उन्हें मरना ही होगा। तय है मरना। वही कुछ इने-गिने (कथित बड़े नाम संपादक) हमारी इयत्ता के भी सौदागर हैं, जो पूरी पत्रकारिता का भी सौदा कर चुके हैं, दोनों ओर से। हम मुट्ठियां ताने मैदान में हैं। अंधेरगर्दी के तागों से बने नये क्षितिज को देखें। पत्रकारिता के लिये ‘जल्दीबाजी का साहित्य’, ‘रफ ड्राफ्ट ऑफ हिस्ट्री’, नैसर्गिक प्रतिपक्ष आदि शब्द तो कबके बेमतलब हो चुके हैं। वे मालिक के हित में योद्धा हैं। यह उनके जैसे तमाम का सहर्ष स्वीकार या खुद ही ओढ़ लिया गया दायित्व है।

इसीलिये अपने मातहतों की ओर वे निरंकुश राजा की नजर से देखते हैं। मालिक की खुशी के लिए उन्होंने अखबार को प्रतिभा के वध स्थल में बदल दिया है। उनकी दुर्बोध भाषा ने जीवन और आदमीयत के लिये जरूरी सारे शब्द पचा लिये हैं। ‘मेटामोरफेसिस’ के नायक की तरह जो, खुद को कॉकरोच में बदल सकता है, ऐसे ही लोगों पर दुलार का परफ्यूम स्प्रे करते हैं। आखिर उन्हें भी तो मालिक के सामने हमेशा ‘जी हुजूर’ की मुद्रा में खड़ा होना होता है। इस तरह उन्हें भी हाथ-पैर पसारने (दलाली से कमाने) का अवसर मिल जाता है। वह संपादक जो कभी ढाबे के बुझे चूल्हे को फायर झोंक कर जला सकते थे, उनके खनन माफियाओं से मधुर और व्यवसायिक रिश्ते हैं। वे अखबार को फैक्ट्री की तरह चलाते हैं और पत्रकारों को कामगार की तरह हांकते हैं। वह पहले जहां थे वहां कुछ बड़ी जगहों को छोड़, बाकी पदों पर 40 या उससे अधिक की उम्र के लोगों की नियुक्तियों पर पाबंदी लगवा दी। ऐसा इसलिये कि भूल से भी कोई ऐसा न आ जाय जिसके आगे वो फीके पड़ जाएं। शावकों के बीच विद्वान और प्रेरणा पुरुष बने रहना आसान था।

दैनिक जागरण, लखनऊ और पटना में लंबे समय तक सेवारत रहे वरिष्ठ पत्रकार राघवेंद्र दुबे उर्फ भाऊ की एफबी वॉल से.

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प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में पिछले 10 वर्षों में 37 फीसदी की वृद्धि

पिछले 10 सालों में प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डिजिटल मीडिया से मिल रही चुनौतियों के बीच प्रिंट लगातार वृद्धि की ओर अग्रसर है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2006 में प्रिंट मीडिया का सर्कुलेशन 3.91 करोड़ का था, जो 2016 में बढ़कर 6.28 करोड़ हो गया। इस दौरान प्रकाशन केंद्रों की संख्या भी 659 से बढ़कर 910 हो गई है।

जुलाई-दिसंबर, 2016 के दौरान टाइम्स ऑफ इंडिया की 31,84,727 कॉपियां बिकीं। एबीसी ने छोटे शहरों में होने वाली वृद्धि के चलते प्रिंट मीडिया का भविष्य सुरक्षित बताया लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव की गुंजाइश की संभावना से भी इनकार नहीं किया। 2006 से 2016 के बीच हिंदी मीडिया सबसे तेजी से बढ़ा। यह 8.76 प्रतिशत सीएजीआर (कंपाउंड वार्षिक वृद्धि दर) की दर से सबसे आगे रहा। तेलुगू मीडिया दूसरे नंबर पर रहा। अंग्रेजी मीडिया 2.87 सीएजीआर की दर से बढ़ा।

प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री 2021 तक 7.3 प्रतिशत सीएजीआर की दर से वृद्धि के साथ 431 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। तब तक पूरी मीडिया इंडस्ट्री के 2,419 बिलियन तक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही है। विज्ञापन रेवेन्यू भी 2021 तक बढ़कर 296 बिलियन का हो जाएगा, जो पूरे मीडिया के 1096 बिलियन के संभावित रेवेन्यू का 27 प्रतिशत हिस्सा होगा। प्रिंट मीडिया की पिछले कुछ साल में भारत में हुई वृद्धि विश्व के किसी भी अन्य मार्केट की तुलना में अधिक है। 2015 में भारतीय बाजार सर्कुलेशन के लिहाज से 12 प्रतिशत की दर से बढ़ा। वहीं यूके, यूएसए समेत अन्य विदेशी बाजारों में गिरावट देखने को मिली।

दैनिक भास्कर की प्रतियों में 150% का इजाफा

इन दस सालों में दैनिक भास्कर की प्रतियां 150 फीसदी बढ़ी हैं। 2006 में इसका आंकड़ा 15 लाख 27 हजार 551 था, जो 2016 में बढ़कर 38 लाख 13 हजार 271 हो गया। यह जानकारी ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन्स (एबीसी) की रिपोर्ट में सामने आई है। एबीसी एक स्वतंत्र संस्था है जो प्रकाशनों की प्रसार संख्या का हर छह महीने में ऑडिट कर उन्हें प्रमाणित करती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पेड न्यूजपेपर्स की प्रसार संख्या में 2 से 12 फीसदी तक गिरावट का रुख है। अकेले भारत में पेड न्यूजपेपर्स की संख्या 12% की रफ्तार से बढ़ रही है। जापान, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया में जहां पेड न्यूजपेपर्स की संख्या तीन साल से जस की तस बनी हुई है। वहीं भारत में यह लगातार दो अंक में बढ़ रही है। 2013 में यह 5,767 थी जो 2014 में 16.70% बढ़कर 6,730 हो गई। वहीं 2015 में इनकी संख्या में 16.95% का इजाफा हुआ और इनकी संख्या बढ़कर 7,871 हो गई।

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में

अखबारों की बिक्री में सर्वाधिक इजाफा देश के उत्तरी क्षेत्र में दर्ज किया गया है। यह 7.83 फीसद है। जबकि सबसे कम 2.63 फीसद की बढ़त पूर्वी क्षेत्र में देखी गई है। पूरे देश में यह वृद्धि दर 4.87 प्रतिशत की रही। जाहिर है, उत्तर भारत में हिंदी समाचारपत्रों व पत्रिकाओं का ही बोल-बाला है। इसलिए 8.76 फीसद के साथ सर्वाधिक बढ़त भी हिंदी में ही दर्ज की गई है। इसमें भी प्रसार संख्या के अनुसार शीर्ष 10 समाचार पत्रों में चार हिंदी के ही हैं। लंबे समय से तीसरे स्थान पर चल रहे एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक को हटा दिया जाए तो शीर्ष पांच में से चार समाचारपत्र हिंदी के हैं, जिनमें दैनिक जागरण शीर्ष पर है।

डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है

एबीसी मानती है कि डिजिटल मीडिया का दायरा बढ़ रहा है। समाचारपत्रों के इंटरनेट संस्करण भी लोकप्रिय हो रहे हैं। एबीसी के अनुसार, सुबह समाचारपत्रों के जरिये एक बार खबरें परोसने के बाद दिन में ताजी खबरें पाठकों तक पहुंचाने के लिए डिजिटल मीडिया एक अच्छा माध्यम बनकर उभरा है। लेकिन इससे प्रिंट मीडिया के लिए निकट भविष्य में कोई खतरा नजर नहीं आता। एबीसी का मानना है कि डिजिटल मीडिया के क्षेत्रों में काम कर रहे बड़े मीडिया घरानों के साथ-साथ अन्य माध्यमों को नियंत्रित करने के लिए एबीसी की तर्ज पर एक संस्था की जरूरत है। इस बारे में सरकार भी विचार कर रही है और एबीसी भी। दो-तीन माह में इसके परिणाम सामने आ सकते हैं।

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अब हमारे जैसे लोगों के लिए मीडिया में कोई जगह नहीं बची है

मीडियाकर्मी इसे अच्छी तरह समझ लें कि उनकी कार्यस्थितियों को नर्क बनाने से लेकर उनका सीआर खराब करने और उसी के आधार पर उन्हें काम से निकालने में मीडिया के मसीहा तबके की शैतानी भूमिका हमेशा निर्णायक होती है। कारपोरेट हितों के मुताबिक अपनी चमड़ी बचाने और जल्दी जल्दी सीढ़ियां छलांगने के लिए यह तबका किसी की भी बलि चढ़ाने से हिचकता नहीं है।

1991 से मीडिया में गैरपत्रकारों की छंटनी का विरोध पत्रकारों ने कभी नहीं किया है और यूनियनों के नेतृत्व में रहे पत्रकारों ने सबसे पहले गैरपत्रकारों की कुर्बानी देकर आटोमेशन तेज किया है। यह भोगा हुआ यथार्थ है कि यूनियनें मालिकान की पहल पर चुनिंदा पत्रकारों की अगुवनाई में ही बनीं, जिसने पत्रकारों और गैरपत्रकारों की बलि चढ़ाकर अपनाकैरियर सवांरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज के हालात के लिये यह क्रांतिकारी मसीहा तबका मालिकानव से ज्यादा जिम्मेदार हैं। आगे मीडियाकर्मी ऐसी गलती न दुहरायें तो बेहतर।

इसी आटोमेशन के खिलाफ आवाज उठाने में मेरा अपने सीनियर साथियों से दुश्मनी भी मोल लेनी पड़ी है। लेकिन हम अपने साथियों को बचाने में नाकाम रहे हैं। अब हम अनेक संपादकों और अपने पुराने सीनियर जूनियर साथियों के क्रांतिकारी तेवर से ज्यादा चकित हैं, जिन्होंने पेशेवर जिंदगी में हमेशा कारपोरेट हितों के मुताबिक बाजार के व्याकरण के मुताबिक पत्रकारिता की है और नौकरी में रहते हुए कारपोरेट लूट खसोट और जल जंगल जमीन के हकहकूक की आवाज उठाते जनपदों और जनसमूहों के उत्पीड़न सैन्य दमन से लेकर मेहनतकश तबकों के आंदोलन और बहुजनों पर सामंती अत्याचारों के खिलाफ बाकी मीडियाकर्मियों की तुलना में नीतिगत फैसलों की बेहतर स्थिति के बावजूद पिछले छब्बीस सालों में एक पंक्ति भी नहीं लिखी है और न अपने साथियों के हकहकूक के लिए कभी जुबान खोली है।

मीडिया का यह पाखंडी मसीहा तबका, सत्तावर्ग ही बाकी मीडियाकर्मियों के सबसे बड़े दुश्मन हैं क्योंकि वे बाकायदा मीडिया प्रबंधन के हिस्सा बने रहे हैं। इन लोगों से सावधान रहने की जरुरत है। कारपोरेट हितों के लिए वे हमेशा पेरोल पर हैं।

हमने अपनी पेशेवर पत्रकारिता के 36 सालों में अपने साथियों को बचाने की हर संभव कोशिशें की हैं। जरुरत पड़ी तो किसी किसी पर हाथ भी उठाया है,लेकिन ऐन मौके पर उनकी गलतियों की जिम्मेदारी लेकर सजा भुगतने में और अपने कैरियर का बंटाधार करने में भी हिचकने की जरुरत महसूस नहीं की है।

हमने किसी की शिकायत करने के बजाये हमेशा खुद हालात से निबटने की कोशिशें की हैं और जाहिर है कि मैनेजमेंट की आंखों में किरकिरी बने रहने में या उसे डराने में मुझे मजा आता रहा है। हस्तक्षेप पर अरविंद घोष की रपट से सदमा जरुर लगा है, लेकिन हमारे लिए यह कोई अचरज की बात नहीं है। मीडिया में पेशेवर नौकरी में रहते हुए हमें बहुत कुछ झेलना पड़ा है।

एबीपी समूह शुरु से ही मुक्तबाजार व्यवस्था का सबसे मुखर प्रवक्ता रहा है और इस मायने में टाइम्स समूह उसका देश एकमात्र प्रतिद्वंद्वी है। दुनियाभर में ट्रंप समर्थक अमेरिकी फाक्स न्यूज के साथ उसकी तुलना की जा सकती है जो वर्चस्ववादी नस्ली रंगभेद के सत्तावर्ग की संस्कृति का प्रचार प्रसार करता है।

टीवी 18 समूह और हिंदुस्तान समूह के रिलायंस के हवाले हो जाने के बाद मीडिया कर्मियों के लिए एबीपी समूह में व्यापक छंटनी  भयंकर दुःसमय की सबसे बड़ी चेतावनी है। अरविंद ने लिखा हैः

”Strongly condemn the retrenchment on 7th February, 2017 with only 2 hours notice, of about 750 workers, journalists and reporters of Ananda Bazar Patrika group of  newspapers of Kolkata. Express solidarity with the retrenched workers and journalists and their affected families.”

यह हालत अचानक नहीं बनी है।

मीडियाकर्मियों के जनपक्षधर चरित्र के लगातार हो रहे स्खलन और उनके आत्मघाती तरीके से मार्केटिंग और सत्ता की पैदल सेना बन जाने से समूचा मीडिया इस वक्त बारुदी सुंरगों से भरी मौत की घाटी में तब्दील है। गैरपत्रकार तबकों की छंटनी का कभी विरोध न करने वाले पत्रकार अब मीडिया में गैरपत्रकारों के सारे काम मसलन कंपोजिंग, प्रूफ रीडिंग, लेआउट, फोटोशाप, पेजमेकिंग से लेकर विज्ञापन लगाकर सीधे मशीन तक अखबार छापने के लिए तैयार करने का काम करते थे,जहां 1991 से पहले इन सारे कामों के लिए अलग अलग विभाग गैरपत्रकारों के थे। आटोमेशन मुहिम के चलते एक एक करके वे सारे विभाग बंद होते चले गये। अखबारों में अब दो ही सेक्शन हैं, संपादकीय और प्रिंटिंग मशीन।

संपादकीय विभाग का काम भी मूल सेंटर के अलावा बाकी सैटेलाइट संस्करणों में इलेक्ट्रानिक इंजीनियर कर देते हैं। इसके खातिर पत्रकारों की संख्या बहुत तेजी से घटी है। प्रिंटिंग सेक्शन में भी बचे खुचे कर्मियों को अपने संस्थान के अखबारों के अलावा एक साध दर्जन भर से ज्यादा अखबारों का काम संस्था के जाब वर्क बतौर काम के घंटों के अंदर अपने वेतनमान के अलावा बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के करना होता है।

मीडिया संस्थानों में स्थाई नौकरी वाले पत्रकार गैर पत्रकार विलुप्त प्राय हैं। जो हैं वे रिटायर करने वाले ही हैं।उन्हें आगे एक्सटेंशन मिलने की कोई संभावना नहीं है। अगले पांच सालों में मीडिया में सारे कर्मचारी ठेके की नौकरी पर होंगे। आटोमेशन के सौजन्य से किसीकी खास काबिलियत का कोई मूल्य नहीं है। इसलिए बाजार के मुताबिक छंटनी का यह सिलसिला चलने वाला है।

वेज बोर्ड से बचने के लिए देशभर में असंख्य संस्करण आटोमेशन के जरिये छापते रहने की वजह से मीडिया में कोई पत्रकार या गैरपत्रकार, चाहे उनकी काबिलियत या हैसियत कुछ भी हो, अपरिहार्य नहीं हैं, जैसे हम लोग 1991 से पहले हुआ करते थे। सिर्फ अपने काम और अपनी दक्षता के लिए उन दिनों पत्रकारों के सात खून माफ थे।

मीडिया ने मुझ जैसे बदतमीज पत्रकार को भी 36 साल तक झेल लिया और आजादी का चस्का लग जाने से मैंने भी 36 साल तक मीडिया को झेला। अब हमारे जैसे लोगों के लिए मीडिया में कोई जगह नहीं बची है। इसलिए मीडिया में हर छोटे बड़े पत्रकार गैरपत्रकार के सर पर छंटनी की तलवार लटकी हुई है। आंखें बंद करके कारपोरेट या मार्केट के हित में कमा करते रहने की वफादारी से भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है, जब प्रेतात्माओं से मीडिया का काम चल सकता है, तो मनुष्यों को मीडिया की कोई जरुरत नहीं है।

हम जब दैनिक जागरण में मुख्य उपसंपादक बतौर काम कर रहे थे,1984 और 1989 के दौरान, तब माननीय नरेंद्र मोहन समूह के प्रधान संपादक थे। संपादकीय विभाग के कामकाज में वे हस्तक्षेप नहीं करते थे। संस्करण मैं ही निकालता था। ऐसा वक्त भी आया कि रातोंरात सारे पत्रकार भाग निकले और डेस्क के सामने सबएडीटर की कुर्सी पर सिर्फ नरेंद्रमोहन जी अकेले थे। उस वक्त नये पत्रकारों की भरती का विज्ञापन सबसे पहले तैयार करना होता था और आवेदन मिलते न मिलते उन्हें नियुक्ति देकर ट्रेनी पत्रकार बतौर उन्हें काम के लायक बनाना होता था। विज्ञापन छापने से लेकर भर्ती और प्रशिक्षण मेरठ में मेरी जिम्मेदारी थी तो कानपुर में आदरणीय बीके शर्मा की और समूह के समाचार संपादक तब हरिनारायण निगम थे।

मुश्किल यह था कि छह सौ रुपल्ली से ज्यादा छात्रवृत्ति किसी को दी नहीं जाती थी। यह मेरठ की पगार थी। लखनऊ में तीन सौ रुपये की छात्रवृत्ति थी। खुराफात की वजह से जब उन्हीं तीनसौ रुपये की पगार पर उन्हें मेरठ स्थानांतरित कर दिया जाता था, हमारे लिए मानवीय संकट खड़ा हो जाता था।

सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि नरेंद्र मोहन जी का आदेश था कि स्टिक बाई स्टिक मापकर पांच कालम का अनुवाद और पांच कालम के संपादन का काम सबसे लेना हो चाहे अखबार में कुल दस कालम की भी जगह न बची हो।

हम लगातार प्रशिक्षुओं को स्थाई बनाने पर जोर देते रहते थे और अक्सर ऐसा नहीं हो पाता था। काम सीखते ही एक साथ भर्ती तमाम प्रशिक्षु झुंड बनाकर कहीं भी किसी भी अखबार में भाग निकलते थे क्योंकि तब जागरण ट्रेनिंग सेंटर से निकले पत्रकारों की बाजार में भारी मांग होती थी। स्थाई पत्रकार भी वेतन सात सौ आठ सौ रुपये से ज्यादा न होने की हालत में अक्सर निकल भागते थे।

फिर नये सिरे से भर्ती और प्रशिक्षण की कवायद। आदरणीय बीके शर्मा के बाद शायद मैने ही सबसे ज्यादा पत्रकारों को जागरण में नियुक्ति दी है और प्रशिक्षित किया है। इसलिए साथी पत्रकारों की नौकरी के आखिरी दिनों में भी मुझे बेहद परवाह होती थी।

प्रभात खबर, जागरण और अमर उजाला में हम कंप्यूटर पर बैठते नहीं थे। कंपोजीटर, प्रूफरीडर, पेजमेकर अलग थे। कैमरा और प्रोसिंसग के विभाग अलग थे। कोलकाता में आये तो लेआउट आर्टिस्टभी दर्जनभर से ज्यादा थे।

बीके पाल एवेन्यू में दोनों अखबारों में सौ से ज्यादा पत्रकार थे और लगभग सभी स्थाई थे। इनके अलावा जनसत्ता के करीब डेढ़ सौ स्ट्रींगर थे।दस साल पहले भी ग्रांट लेन के आफिस में इंडियन एक्सपेर्स की शुरुआत पर सौ से ज्यादा पत्रकार थे। फाइनेंशियल एक्सप्रेस का आटोमेशन सबसे पहले हुआ। फिर जनसत्ता का। आटोमेशन ने सारी भीड़ छांट दी।

अब जनसत्ता कोलकाता में मेरे और शैलेंद्र के रिटायर होने के बाद स्थाई पत्रकार सिर्फ दो डा. मांधाता सिंह और जयनारायण प्रसाद रह गये तो एकमात्र स्टाफ रिपोर्टर प्रभाकरमणि तिवारी। बाकी दो अखबारों में एक भी स्थाई पत्रकार नहीं हैं। आफिस और मार्केटिंग में सारे के सारे मैनेजर भी ठेके पर हैं। दो आर्टिस्ट सुमित गुहा और विमान बचे हैं स्थाई। कंपोजिग के पुराने साथियों में प्रमोद कुमार और संपादकीय सहयोगी महेंद्र राय स्थाई हैं जो मार्केटिंग के लिए काम करते हैं। मशीन में पुराने कुछ लोगों के अलावा बाकी सारे ठेके पर हैं।

यह किस्सा हकीकत की जमीन पर कयामती फिजां की तस्वीर है।

एबीपी भाषाई अखबार समूह है, जहां आटोमेशन शायद सबसे पहले शुरू हुआ। लेकिन बांग्ला में इंटरनेट से हिंदी और अंग्रेजी की तरह सारा कांटेट रेडीमेड लेने की स्थिति न होने और करीब पंद्रह करोड़ बांग्ला पाठकों की वजह से उन्हीं मौलिक कांटेंट की जरुरत पड़ती है। इसलिए आटोमेशन और ठेके की नौकरी के बावजूद वहां पत्रकारों गैरपत्रकारों की फौज बनी हुई थी। यानी बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं के  मीडिया में भी  हिंदी और अंग्रेजी की तरह प्रेतात्माओं से अब काम लिया जाना है।

प्रेतात्माओं का वर्चस्व मनुष्यों के वजूद को खत्म करने वाला है। इंसानियत का जज्बा खतम है तो जाहिर है कि अब सिर्फ मसीने बोलेंगी। अभी रोबाट आया नहीं है और यह हाल है, आगे क्या होगा, मीडियाकर्मी सोच समझ लें तो बेहतर।

जाहिर है कि आटोमेशन, मशीनीकरण, आधुनिकीकरण, उपभोक्ता वाद और मुकतबाजार का पत्रकारों ने जिस अंधेपन से समर्थन किया है, उससे सत्तावर्ग और मुक्तबाजारी राजनीति के नरसंहारी अश्वमेधी अभियान में चुनिंदा मौकापरस्त पत्रकारों के राजनीति, सत्ता और यहां तक कि पूंजीवादी तबक में एडजस्ट होने की कीमत अब मीडियाकर्मियों को हर हालत में चुकानी होगी।

साथियों की निरंतर छंटनी का प्रतिरोध पत्रकार जमात ने चूंकि कभी नहीं किया है और छंटनी का सिलसिला पत्रकारों के सहयोग से निर्विरोध जारी रहने की वजह से यूनियन बनाकर लड़ने की संख्या और ताकत भी उनके पास नहीं है। दूसरी तरफ श्रम कानून सिरे से खत्म हो जाने पर ऐसी लड़ाई से भी अब पायदा नहीं है। वेज बोर्ड का किस्सा काफी है प्रेस और मीडिया में कानून के राज का सच बताने के लिए।

हाल में भड़ास के मजीठिया मंच से कानूनी लड़ाई का एकमोर्चा जरुर खुला है लेकिन मीडिया में इस वक्त संपूर्ण आटोमेशन होने की वजह से वेतनमान की लड़ाई भले आप लड़ लें,तेज होती छंटनी रोकने का आसार बेहद कम है।

अब मीडियाकर्मियों को फर्जी मसीहा वर्ग की प्रेतात्माओं के शिकंजे से बाहर निकालकर अपनी जनमुखी भूमिका में वापस आने का सही वक्त है क्योंकि अब खोने का कुछ भी नहीं है। हमने यह फैसला 1991 में ही कर लिया था। सिर्फ तरक्की और प्रोमोशन के मौके के अलावा मैंने कुछ नहीं खोया है। अब रिटायर होने के बाद भी बाकायदा जिंदा हूं और अपने मोर्चे पर अडिग हूं।

जीवित मृत मसीहा संप्रदाय से मैरी स्थिति बेहतर है क्योंकि मैंने पाखंड जिया नहीं है और आम जनता के साथ सड़क पर खड़े होने में मुझे कोई शर्म नहीं है। मेरी नियति तो अपने पुरखों की तरह अपने गांव खेत खलिहान में किसी आपदा में मर जाने की थी। पढ़ लिखकर मैं अपने लोगों के साथ मजबूती के साथ खड़े होने की हिम्मत जुटा सका और पत्रकरिता को उनके हक हकूक की लड़ाई के हथियार बतौर इस्तेमाल करने की हमेशा कोशिश की, मरते वक्त कम स कम मुझे मामूली पत्रकार होने का अफसोस नहीं होगा।चाहे हासिल कुछ नहीं हुआ हो।

मेरे पत्रकार मित्रों, पानी सर से ऊपर है और पांव तले जमीन भी खिसक रही है।बतौर पत्रकार जनता के साथ खड़े होने का इससे बेहतर मौका नहीं है।

लेखक पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय तक जनसत्ता, कोलकाता में कार्यरत रहे. रिटायर होने के बाद सोशल मीडिया और वेब मीडिया के माध्यम से जनसरोकारी पत्रकारिता की अलख जगाए हुए हैं.

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ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वो ‘मीडिया को ही विपक्ष’ बना लेंगे. डोनल्ड ट्रंप कई बार मीडिया संस्थानों के लिए भद्दी भाषा का प्रयोग कर चुके हैं और कई स्थापित चैनलों को फ़र्ज़ी तक कह चुके हैं. ऐसा करके वो अपने एक ख़ास समर्थक वर्ग को ख़ुश भी कर देते हैं.

दुनिया में नया ऑर्डर स्थापित हो रहा है. इसमें पत्रकारों को भी अपनी नई भूमिका तय करनी होगी. जब अपनी बात पहुँचाने के लिए नेताओं के पास ‘सोशल मीडिया’ है तो वो ‘स्थापित मीडिया’ से दूरी बनाने में परहेज़ क्यों करेंगे?

मुझे लगता है कि ऐसे बदलते परिवेश में वो ही पत्रकार कामयाब होंगे और पहचान पाएंगे जो संस्थानों के समकक्ष स्वयं को स्थापित कर लेंगे. ‘बाइट-जर्नलिस्टों’ की जगह ‘विषय विशेषज्ञों’ की पूछ होगी.

जिस दौर में स्थापित मीडिया को विलेन बनाया जा रहा है उस दौर में पत्रकारों के पास ज़मीनी रिपोर्टिंग करके ‘हीरो’ बनने का मौक़ा भी है.

पत्रकार दिलनवाज पाशा की एफबी वॉल से.

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मजीठिया वेज बोर्ड : यशवंत के साथ ना सही, पीछे तो खड़े होने की हिम्मत कीजिए

Rajendra Hada


मंगलवार, 20 जनवरी 2015 की शाम भड़ास देखा तो बड़ी निराशा हुई। सिर्फ 250 पत्रकार मजीठिया की लड़ाई लड़ने के लिए आगे आए? दुर्भाग्य से, जी हां दुर्भाग्य से, मैंने ऐसे दो प्रोफेशन चुने जो बुद्धिजीवियों के प्रतीक-स्तंभ के रूप में पहचाने माने जाने जाते हैं। वकालत और पत्रकारिता। दुर्भाग्य इसलिए कि दुनिया को अन्याय नहीं सहने की सलाह वकील और पत्रकार देते हैं और अन्याय के खिलाफ मुकदमे कर, नोटिस देकर, खबरें छापकर मुहिम चलाते हैं लेकिन अपने मामले में पूरी तरह ‘चिराग तले अंधेरा’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं। अपनी निजी भलाई से जुडे़ कानूनों, व्यवस्थाओं के मामले में बुद्धिजीवियों के ये दो वर्ग लापरवाही और अपने ही साथियों पर अविश्वास जताते हैं। यह इनकी निम्नतम सोच का परिचय देने को काफी है।

दस साल तक दैनिक नवज्योति अखबार और उसके बाद दस साल तक दैनिक भास्कर अखबार में रहते हुए साथियों के अनुभव से मैंने यही जाना कि सेठ यानि मालिक सिर्फ मालिक होता है और आप सिर्फ नौकर। आप मालिक के साथ कितनी भी भलाई करें, मालिक अगर आपको दूध में मक्खी की तरह निकालना होगा तो, निकालकर ही मानेगा। मेरे साथ गनीमत रही कि जहां भी रहे, अपनी योग्यता के बल पर टिके रहे। पार्ट-टाइम रहते हुए भी जब जी चाहा तब तक नौकरी की और इच्छा होने पर बाकायदा एक महीने का नोटिस दिया। नोटिस में दी तारीख से अखबार के दफ्तर जाना छोड़ दिया। मालिक या संपादक के फैसले का इंतजार नहीं किया। इसीलिए नोटिस और इस्तीफे आज तक संभाल कर मेरे पास रखे हुए हैं।

हां, तो मैं बात कर रहा था साथियों की। मजेदार बात यह है कि मालिक के मुहंलगे, हां में हां मिलाने वाले, चमचागिरी कर यसमैन बने पत्रकार भी जरूरत पड़ने पर ऐसे आंखे फेर लेते हैं जैसे साथियों को जानते तक नहीं। हालात ऐसे होते हैं कि कई बार तो वह मालिक तो क्या शहर के एमएलए और अफसरों के तलुए चाटते दिखते हैं लेकिन अपने साथियों को इस कदर उपेक्षित करते हैं कि वे सोचने को मजबूर हो जाते हैं। यह और बात है कि वक्त बदलते देर नहीं लगती और जो अन्याय खुद अपने साथियों के साथ करते हैं, कुछ समय बाद उनके साथ वैसा तो क्या उससे बुरा भी होता है। भले ही वह झूठी शान में मरे जाते हैं परंतु उनकी हकीकत किसी से छिप नहीं पाती। ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं, भगवान ने चाहा तो बहुत जल्द बाकायदा नाम सहित आपके सामने वे नंगे खड़े होंगे। कुछ ऐसा ही हाल वकालत में है परंतु वह फिर कभी।

अभी तो जमाना यह है कि आप बेइमान को बेइमान, घोटालेबाज को घोटालेबाज और चोर को चोर भी कह नहीं सकते। ऐसा कहते ही वे आपसे बात करना छोड़ देते हैं। आपको देखते ही मुंह फेर लेते हैं। उन्हें लगता है जैसे आंख बंद कर ली है तो अंधेरा हो गया है। उनके घर में एक पैसे की मेहनत की कमाई नहीं होती परंतु करोड़ों के मकान में रहते हैं, बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं। कुर्सी पर जब भी ये लोग जमे तो फर्जीवाड़े ऐसे-ऐसे किए कि आज तक हाथ पैर चलाए बिना उन बेनामी ट्रांजेंक्शंस की फसले काट रहे हैं। तुर्रा यह कि बनते ऐसे ईमानदार हैं कि दुनिया में राजा हरीशचंद्र के बाद पैदा ही वे हुए हैं। कई संस्थाओं में पैसा लगा हुआ है। नरेंद्र मोदी की नकल में ना खाउंगा ना खाने दूंगा जैसे नारे लगा रहे हैं।

आप सोच रहे होंगे आखिर कहना क्या चाह रहा हूं। दोस्तों यह भड़ास ही है जिस पर आपके सामने इन बेइमानों, घोटालेबाजों, चोरों के गिरोह के सभी लोगों को नंगा करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा कहने की हिम्मत भी इसलिए है कि यह यशवंत और उनका भड़ास ही है कि कई मुद्दे इस पर उठाए जा चुके हैं और उठाए जाएंगे। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और इनके पैरोकारों में तो वह ताकत रही नहीं कि कुछ लिखा जाए। वे खुद तो इतने पंगु है कि गलत होते हुए भी उसे गलत कहने का साहस नहीं रखते, अगर आप उस बारे में कुछ लिख देते हैं तो उसे छापने की हिम्मत भी नहीं रखते। अगर वह हिम्मत रखते हैं तो उनका सेठ इसकी इजाजत नहीं देता। परंतु वे कुर्सी पर जमे रहते हैं।

यशवंत से अपनी रूबरू मुलाकात सिर्फ दो दफा, और फोन व भड़ास के माध्यम से कई दफा की है। यशवंत को इतना विश्वास है कि अपन कभी गलत खबर नहीं भेजते और ना भेज सकते हैं। इसी कारण उन्होंने आज तक कोई इंक्वायरी नहीं की कि खबर क्यों छापी जाए। जो भेजा वह छापा। आप लड़ते हैं, यशवंत आपका साथ देते हैं। अजमेर से सवा तीन सौ किलोमीटर दूर बैठे और शायद आठ सौ किलोमीटर दूर के मूल बाशिंदे पर इतना विश्वास सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि यशवंत आपके लिए लड़ते हैं। जब मामला आपका निजी हो तो भी वे जी जान लगा देते हैं और आप हैं कि खुद ही पीछे हट जाते हैं। जैसे कि इस बार मजीठिया के मामले में कर रहे हैं।

मजीठिया मिलने और सुप्रीम कोर्ट जाने से यशवंत को कुछ नहीं मिलने वाला। वे आपके लिए लड़ रहे हैं। ऐसे में आप उनके साथ ना सही, पीछे तो खड़े होने का साहस कीजिए। आप खुशनसीब हैं कि आपको यशवंत के रूप में आपका कोई हमदम, कोई दोस्त है। उस दोस्त की कद्र कीजिए। उस पर विश्वास कीजिए। दोस्तों जिंदगी में अवसर कभी कभार दस्तक देता है। इस अवसर को मत चूकिए। मजीठिया की लड़ाई लड़ने की पहल यशवंत ने की है। आप कम से कम साथ तो दीजिए। साथ ना सही पीछे तो खड़े होने की हिम्मत कीजिए। 

राजेंद्र हाड़ा
वरिष्ठ पत्रकार और वकील
अजमेर
राजस्थान
संपर्क : 09829270160, 09549155160
rajendara_hada@yahoo.co.in


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भड़ास संग बोर्ड लड़ाई को 250 मीडियाकर्मी तैयार, 25 जनवरी तक कर सकते हैं आवेदन

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7 फरवरी के बाद मजीठिया के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं जा सकेंगे, भड़ास आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार

जी हां. ये सच है. जो लोग चुप्पी साध कर बैठे हैं वे जान लें कि सात फरवरी के बाद आप मजीठिया के लिए अपने प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं जा पाएंगे. सात फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के एक साल पूरे हो जाएंगे और एक साल के भीतर पीड़ित पक्ष आदेश के अनुपालन को लेकर याचिका दायर कर सकता है. उसके बाद नहीं. इसलिए दोस्तों अब तैयार होइए. भड़ास4मीडिया ने मजीठिया को लेकर आर-पार की लड़ाई के लिए कमर कस ली है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील उमेश शर्मा की सेवाएं भड़ास ने ली है.

( File Photo Umesh Sharma Advocate )

इस अदभुत आर-पार की लड़ाई में मीडियाकर्मी अपनी पहचान छुपाकर और नौकरी करते हुए शामिल हो सकते हैं व मजीठिया का लाभ पा सकते हैं. बस उन्हें करना इतना होगा कि एक अथारिटी लेटर, जिसे भड़ास शीघ्र जारी करने वाला है, पर साइन करके भड़ास के पास भेज देना है. ये अथारिटी लेटर न तो सुप्रीम कोर्ट में जमा होगा और न ही कहीं बाहर किसी को दिया या दिखाया जाएगा. यह भड़ास के वकील उमेश शर्मा के पास गोपनीय रूप से सुरक्षित रहेगा. इस अथारिटी लेटर से होगा यह कि भड़ास के यशवंत सिंह आपके बिहाफ पर आपकी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ सकेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में आपका नाम कहीं न खुलेगा न कोई जान सकेगा. दूसरी बात. जो लोग अपने नाम पहचान के साथ लड़ना चाहते हैं, उससे अच्छा कोई विकल्प नहीं है. उनका तहे दिल से स्वागत है. ऐसे ही मजबूत इरादे वाले साथियों के साथ मिलकर भड़ास मजीठिया की आखिरी और निर्णायक जंग सुप्रीम कोर्ट में मीडिया हाउसों से लड़ेगा.

बतौर फीस, हर एक को सिर्फ छह हजार रुपये शुरुआती फीस के रूप में वकील उमेश शर्मा के एकाउंट में जमा कराने होंगे. बाकी पैसे जंग जीतने के बाद आपकी इच्छा पर निर्भर होगा कि आप चाहें भड़ास को डोनेशन के रूप में दें या न दें और वकील को उनकी शेष बकाया फीस के रूप में दें या न दें. यह वैकल्पिक होगा. लेकिन शुरुआती छह हजार रुपये इसलिए अनिवार्य है कि सुप्रीम कोर्ट में कोई लड़ाई लड़ने के लिए लाखों रुपये लगते हैं, लेकिन एक सामूहिक लड़ाई के लिए मात्र छह छह हजार रुपये लिए जा रहे हैं और छह हजार रुपये के अतिरिक्त कोई पैसा कभी नहीं मांगा जाएगा. हां, जीत जाने पर आप जो चाहें दे सकते हैं, यह आप पर निर्भर है. बाकी बातें शीघ्र लिखी जाएगी.

आपको अभी बस इतना करना है कि अपना नाम, अपना पद, अपने अखबार का नाम, अपना एड्रेस, अपना मोबाइल नंबर और लड़ाई का फार्मेट (नाम पहचान के साथ खुलकर लड़ेंगे या नाम पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ेंगे) लिखकर मेरे निजी मेल आईडी yashwant@bhadas4media.com पर भेज दें ताकि यह पता लग सके कि कुल कितने लोग लड़ना चाहते हैं. यह काम 15 जनवरी तक होगा. पंद्रह जनवरी के बाद आए मेल पर विचार नहीं किया जाएगा. इसके बाद सभी से अथारिटी लेटर मंगाया जाएगा. जो लोग पहचान छिपाकर गोपनीय रहकर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर भेजना पड़ेगा. जो लोग पहचान उजागर कर लड़ना चाहेंगे उन्हें अथारिटी लेटर देने की जरूरत नहीं है. उन्हें केवल याचिका फाइल करते समय उस पर हस्ताक्षर करने आना होगा.

हम लोगों की कोशिश है कि 15 जनवरी को संबंधित संस्थानों के प्रबंधन को सुप्रीम कोर्ट के वकील उमेश शर्मा की तरफ से लीगल नोटिस भेजा जाए कि आपके संस्थान के ढेर सारे लोगों (किसी का भी नाम नहीं दिया जाएगा) को मजीठिया नहीं मिला है और उन लोगों ने संपर्क किया है सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए. हफ्ते भर में जिन-जिन लोगों को मजीठिया नहीं मिला है, उन्हें मजीठिया के हिसाब से वेतनमान देने की सूचना दें अन्यथा वे सब लोग सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करने को मजबूर होंगे.

हफ्ते भर बाद यानि एक या दो फरवरी को उन संस्थानों के खिलाफ याचिका दायर कर दी जाएगी, सुप्रीम कोर्ट से इस अनुरोध के साथ कि संबंधित संस्थानों को लीगल नोटिस भेजकर मजीठिया देने को कहा गया लेकिन उन्होंने नहीं दिया इसलिए मजबूरन कोर्ट की शरण में उसके आदेश का पालन न हो पाने के चलते आना पड़ा है.

और, फिर ये लड़ाई चल पड़ेगी. चूंकि कई साथी लोग सुप्रीम कोर्ट में जाकर जीत चुके हैं, इसलिए इस लड़ाई में हारने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

मुझसे निजी तौर पर दर्जनों पत्रकारों, गैर-पत्रकारों ने मजीठिया की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में लड़ने के तरीके के बारे में पूछा. इतने सारे सवालों, जिज्ञासाओं, उत्सुकताओं के कारण मुझे मजबूरन सीनियर एडवोकेट उमेश शर्मा जी से मिलना पड़ा और लड़ाई के एक सामूहिक तरीके के बारे में सोचना पड़ा. अंततः लंबे विचार विमर्श के बाद ये रास्ता निकला है, जिसमें आपको न अपना शहर छोड़ना पड़ेगा और न आपको कोई वकील करना होगा, और न ही आपको वकील के फीस के रूप में लाखों रुपये देना पड़ेगा. सारा काम आपके घर बैठे बैठे सिर्फ छह हजार रुपये में हो जाएगा, वह भी पहचान छिपाकर, अगर आप चाहेंगे तो.

दोस्तों, मैं कतई नहीं कहूंगा कि भड़ास पर यकीन करिए. हम लोगों ने जेल जाकर और मुकदमे झेलकर भी भड़ास चलाते रहने की जिद पालकर यह साबित कर दिया है कि भड़ास टूट सकता है, झुक नहीं सकता है. ऐसा कोई प्रबंधन नहीं है जिसके खिलाफ खबर होने पर हम लोगों ने भड़ास पर प्रकाशित न किया हो. ऐसे दौर में जब ट्रेड यूनियन और मीडिया संगठन दलाली के औजार बन चुके हों, भड़ास को मजबूर पत्रकारों के वेतनमान की आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए एक सरल फार्मेट लेकर सामने आना पड़ा है. आप लोग एडवोकेट उमेश शर्मा पर आंख बंद कर भरोसा करिए. उमेश शर्मा जांचे परखे वकील हैं और बेहद भरोसेमंद हैं. मीडिया और ट्रेड यूनियन के दर्जनों मामले लड़ चुके हैं और जीत चुके हैं.

दुनिया की हर बड़ी लड़ाई भरोसे पर लड़ी गई है. ये लड़ाई भी भड़ास के तेवर और आपके भरोसे की अग्निपरीक्षा है. हम जीतेंगे, हमें ये यकीन है.

आप के सवालों और सुझावों का स्वागत है.

यशवंत सिंह
एडिटर
भड़ास4मीडिया
+91 9999330099
+91 9999966466
yashwant@bhadas4media.com


मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा द्वारा लिखित और भड़ास पर प्रकाशित एक पुराना आर्टकिल यूं है…

Majithia Wage Board Recommendations : legal issues and remedies

 

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पत्रकारिता के लिए साल का आखिरी दिन चेतावनी भरा रहा, आप लोगों के मरने पर अखबारों में एक लाइन की भी खबर न छपे

: मीडिया को पुनर्जीवित करने का अभियान : मीडिया में अब मामला पेड न्यूज भर का नहीं रहा है। कई अखबार तो खबरें भी उन्हीं की छापते हैं, जो पैसा देते हैं। पूरे के पूरे अख़बार, सप्लीमेंट्स ही पेड हो गए हैं। छोटे- बड़े , कई – कई यही काम कर रहे हैं। चैनलों के ब्यूरो के ब्यूरो खुले आम नीलाम हो रहे हैं। पैसा लाओ , जो छापना है छापो; जो दिखाना है दिखाओ। राजनीतिक दल और सरकारें भी मीडिया को गुलाम बनाने पर तुली हैं। नाहक नहीं है कि प्रेस कौंसिल के चेयरमैन कह रहे हैं कि मीडिया आम अवाम की आवाज दबाने की साज़िश का हिस्सा हो गया है। इस सन्दर्भ में एक रपट…

आवाज न उठी तो फिर फिरौती, डकैती, लूट और पक्षधरता ही पत्रकारिता के मूल्य और मानक होंगे

बुधवार को श्री एन.के सिंह ने देश के सारे संपादकों और वरिष्ठ पत्रकारों को एक बहुत नाराजगी भरा एसएमएस भेजा। उन्होंने कहा कि हमारी पत्रकारिता को क्या हो गया है कि श्री बी.जी. वर्गीज जैसे बड़े संपादक का निधन होता है, और सारी खबर बहुत सरसरे ढंग से चंद लाइनों में निबटा दी जाती है। वे इतने गुस्से में थे कि उन्होंने कहा कि ऐसे ही हालात रहे तो शायद आप लोगों के मरने पर अखबारों में एक लाइन की भी खबर न छपे। पत्रकारिता के लिए साल का आखिरी दिन बहुत चेतावनी भरा रहा।

श्री एन.के. सिंह मेरी और मुझसे बड़ी पीढ़ी के देश के सबसे सशक्त पत्रकार हैं। उन्होंने नई दुनिया से पत्रिकारिता शुरू की। इंडियन एक्सप्रेस में रहे, इंडिया टुडे में रहे, दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान टाइम्स में संपादक रहे और ऐसे पत्रकार हैं, जिनके चरित्र, जिनके स्वभाव और जिनकी मानवीय संवेदना को मानक माना जाता है। वे ओल्ड स्कूल के पत्रकार हैं, लेकिन आधुनिक जरूरतों और तकाजों से भी खूब वाकिफ हैं। उनकी गुरुता और गंभीरता अद्भुत है। मुझे भी 2000 से 2003 तक दैनिक भास्कर, भोपाल में उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला। ऐसी सादगी, ऐसा संयम, ऐसी जानकारी और पत्रकारिता के मूल्यों के प्रति उनके जैसी निष्ठा, सजगता और तत्परता बहुत कम देखने को मिलती है। पत्रकारिता का बहुत संयमित और मर्यादित ढांचा बनाने और उसे चलाने में उनका जवाब नहीं।

परसों सुबह उनसे बात हुई। गुस्सा थोड़ा कम हुआ था, उसकी जगह चिंता ने ले ली थी। श्री वर्गीज के निधन की खबर को समुचित महत्व न मिला तो उसका एक बड़ा कारण तो डेस्क पर बैठे पत्रकारों की ना जानकारी भी हो सकता है। ध्यान बदल गया है, पत्रकार छोटे-बड़े नेताओं और सतही विषयों की चर्चा में मशगूल हैं, और इसी को पत्रकारिता मान बैठे हैं; तो उन महामना लोगों पर उनका ध्यान कैसे जाये, जिन्होंने पत्रकारिता को सींचा है, और सींचते चले जा रहे हैं। उन पर ध्यान जाने की भी बात तो तब होती जब पत्रकारिता के मूल्यों और मानकों पर चलना होता। इसलिए अंगे्रजी में न सही, हिंदी में बहुतों को पता भी न हो कि श्री बी.जी वर्गीज कौन, तो यह भी कोई अचरज की बात नहीं। और यह प्रवृत्ति और आगे बढ़ती जाये, इसमें भी कोई अनहोनी नहीं होगी। एक संकट और है। मराठी के एक पत्रकार से बात की तो उन्होंने कहा, श्री बर्गीज तो अंग्रेजी के पत्रकार थे, मराठी के होते तो हम महत्व देते।

मीडिया जिस शेप में है, और होता जा रहा है, उसके बुनियादी कारण हैं। पे्रस काउंसिल पूरी तरह डिफंक्ट हो गयी है,और सरकारों के सूचना विभाग पत्रकारिता को संजोने के बदले, पत्रकारिता को बिगाड़ने का काम ज्यादा कर रहे हैं। कौन निकाल रहा है अखबार, उसकी बुनियादी योग्यता क्या है,किस कारण निकाल रहा है, उस बारे में न तो रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स के यहां कोई सोच है और न ही सूचना विभागों के पास। सरकारी विज्ञापनों को हासिल करने का एक खेल हो गया है। इसी तरह अनेक चैनल और अखबार वसूली के लिए निकाले जा रहे हैं, उनमें से कई शुद्ध-शुद्ध अपराध कर रहे हैं; और इन पर निगरानी रखने की कोई संस्था नहीं। फिरौती, डकैती, वसूली सब पत्रकारिता के धंधे हो गये हैं; और पत्रकारों की जो पौध आ रही है, उसे भी नौकरी के नाम पर इस काम में उतार दिया जा रहा है। नौकरी चाहिए, तो यह सब करने के सिवा उनके पास और कोई चारा नहीं है। और ऐसे ही ह्यसिद्धह्ण लोग बड़े पैसेवाले और प्रभाव वाले बनकर घूम रहे हैं; तो, तो मानक का असल संकट तो खड़ा है। और सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो वसूली और बेईमानी, लूट और डकैती ही मानक बनने जा रहे हैं। श्री एन.के. सिंह जी ने बहुत सही वक्त पर आवाज उठायी है। लेकिन करना क्या चाहिए, इस पर बाद में। पहले श्री बी.जी. वर्गीज की बात –

श्री बीजी वर्गीज हमारे समय के प्रखरतम पत्रकारों में से एक रहे हैं। बहुत ही निष्ठावान, और बहुत ही चरित्रवान। बहुत ही सजग और तत्पर। बहुत ही विनम्र। पूरे तौर पर सिद्धांतवादी। वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पढ़कर आये थे, और टाइम्स ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की शुरुआत की। 1966-69 तक वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार रहे। 1969 में वे हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक बने, और आपातकाल लगने तक उसके संपादक रहे। आपातकाल का बहुत सारे पत्रकारों ने विरोध किया था। नई दुनिया जैसे अखबारों ने संपादकीय खाली छोड़ दिया था। श्रीमती इंदिरा गांधी से रिश्तों के बावजूद श्री वर्गीज ने आपातकाल का खुलकर विरोध किया। नौकरी भी छोड़नी पड़ी। लेकिन वे झुके नहीं। विरोध को आगे बढ़ाते हुए 1977 में उन्होंने लोकसभा चुनाव तक लड़ा। नागरिक अधिकारों के वे प्रखर प्रवक्ता थे, और विकास की पत्रकारिता करने में उनकी लगन थी। ऐसे ही उत्कृष्ट लेखन और सिद्धांतप्रियता के लिए उन्हें 1975 में रमन मैगसेसे सम्मान मिला। 1982-86 तक वे इंडियन एक्सप्रेस में भी संपादक रहे। बाद के दिनों में वे सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च से जुड़े रहे। एडिटर्स गिल्ड के सदस्य के रूप में उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों की भी जांच की।

डेवलपमेंट ईशूज पर उन्होंने खूब लिखा। वॉटर्स ऑफ होप (1990), विनिंग द फ्यूचर (1994) में उन्होंने हिमालय क्षेत्र में पानी की व्यवस्था के बारे में लिखा। नार्थ ईस्ट को लेकर भी उनकी किताब ह्यइंडियाज नॉर्थ इस्ट रिसर्जेंटह्ण खूब चर्चित रही। 2010 में उनकी जीवनी भी आयी – ह्यफर्स्ट ड्रॉफ्ट : विटनेस टू मेकिंग ऑफ मार्डन इंडियाह्ण। उनकी यह जीवनी अद्भुत है। इसमें उन्होंने इंदिरा जी के और राजीव गांधी के जमाने में लोकतांत्रिक संस्थाओं को जो नुकसान पहुंचा उसके बारे में बहुत विस्तार से लिखा है। नागरिक अधिकारों के वे इतने प्रबल समर्थक थे, कि उनकी जरा भी अवमानना बर्दाश्त नहीं कर पाते थे।

श्री बीजी वर्गीज से मेरा परिचय श्री प्रभाष जोशी के कारण हुआ। प्रभाष जी जनसत्ता के संपादक। और पत्रकारिता के मूल्यों के प्रति निरंतर सजग रहने वाले। अभियान चलाने और कुर्बानी देने दोनों के लिए तैयार रहने वाले। उनकी श्री वर्गीज से खूब निकटता थी। बरसों से पत्रकारिता में दो भारी खलल चलते रहे हैं। एक तो, सरकारों की मंशा मीडिया पर कब्जा करने की रहती है। इसके लिए तरह-तरह के हथकंडे भी अपनाये जाते हैं। पीवी नरसिम्हाराव सरकार के आखिरी दिनों में कुछ मंत्री यत्र-तत्र मीडिया पर दबाव बनाने में लगे थे। तब तक संपादकों के बदले विज्ञापनकर्मियों को महत्व देने के परिणाम भी उभर आये थे। संपादकीय संस्थान जगह-जगह दरकिनार हो रहे थे।

दूसरे, मीडिया पर कब्जा करने की भाजपा की मंशा बहुत पुरानी रही है। जनता सरकार में श्री लालकृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री बने तब पार्टी कार्यकर्ताओं को जगह-जगह घुसाने की कोशिशें हुईं। इसके बाद यह काम पूरे योजनाबद्ध ढंग से होने लगा। जहां भी जैसे भी मौका मिले, कार्यकर्ता घुसाओ। ये कार्यकर्ता आम तौर पर तो पत्रकार बने रहते, लेकिन जरूरत के वक्त पार्टी कार्यकर्ता हो जाते। 94-95 तक उन्होंने पूरी मीडिया को घेर लिया। तब अखबार निकालने की ताकत उनके लोगों में नहीं थी। बाद में ताकत आयी तो अब तो प्रतिष्ठान के प्रतिष्ठान उनके लोगों के मालिकाने के हैं। सेंध लगाने से लेकर पत्रकारिता हथियाने तक की यह कहानी बहुत विस्तार से लिखने की मांग करती है। उसका विवरण फिर कभी।

1995-96 में जनसत्ता के कई लोगों को लगा कि इन मुद्दों पर बोलना जरूरी है। प्रभाष जोशी की प्रेरणा बनी हुई थी। हमने कांस्टीट्यूशन क्लब के मावलंकर सभागार में इस विषय पर विचार करने के लिए सभा बुलायी। हाल खचाखच भरा। प्रभाष जी थे ही, मृणाल पांडे, कुलदीप नैय्यर, बीजी वर्गीज, जसवंत सिंह यादव, न्यायमूर्ति सावंत – दिल्ली का कोई सुधी पत्रकार ऐसा नहीं था, जो नहीं आया, और जिसने साथ चलने का संकल्प नहीं लिया। संयोजन का जिम्मा मेरे ऊपर आया। अभियान का नाम बना – पत्रकारिता को पुनर्जीवित करने का अभियान। अभियान लोगों से अपील करता कि मीडिया पर आंख मूंदकर भरोसा मत कीजिए। सूचनाएं प्रदूषित हो गयी हैं। उन्हें जान-समझ कर ग्रहण कीजिए। मुंबई में कार्यक्रम हुआ। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालयों के छात्र संघ ने अभियान में शिरकत की। बीएचयू में तो सात घंटे तक बैठक चलती रही। कुलपति महोदय ने कहा कि 17 साल बाद मालवीय सभागार में ऐसी कोई सभा हुई है। यही हाल इलाहाबाद के छात्र संघ भवन का था। भोपाल, जयपुर, लखनऊ – हर जगह अभियान को समर्थन मिला। अनेक जगहों पर चर्चा हुई कि देश में अपने किस्म का यह अलग आंदोलन खड़ा हो रहा है।

बाद में हम लोग ही कुछ अनमने हुए और आंदोलन रुका। लेकिन उस वक्त उसने अनेक कारगुजारियों को रोका,और इस संभावना को ख़ड़ा किया कि मीडिया के लोग संगठित होकर मूल्यों और मानकों के मुद्दे पर आम जनता को भी सहभागी बना सकते हैं। श्री बीजी वर्गीज को उस दौर में ही थोड़ा जाना। एक-एक समस्या को ठीक से समझने वाले। एक-एक घटना के परिणाम को ठीक से समझने वाले। हमारे समय के एक अच्छे ऋषि। वे नहीं रहे, उन्हें बहुत-बहुत नमन।

आगे की बात के पहले एक बार फिर श्री प्रभाष जोशी की बात। सूचना का अधिकार दिलाने में उनकी और जनसत्ता की बड़ी भूमिका रही है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद वे अकेले पत्रकार रहे, जिन्होंने बिना रुके लगातार संघ और उसकी मंशा का विरोध किया। इसी तरह विदेशी निवेश और विदेशी मालिकाने के सवाल पर भी वे कभी नहीं झुके। डंकल ड्राफ्ट के खिलाफ श्री रामबहादुर राय के साथ मैंने, इरा झा और अनंत मित्तल ने राष्ट्रपति तक जाकर जो प्रतिरोध दर्ज करवाया, उसमें दिल्ली से 900 से ज्यादा पत्रकारों की आवाज थी। सुबह गिरफ्तारी के समय हम 25-30 लोग ही इकट्ठा हुए। राय साहब कहते रहे- हम और आप हैं न । आंदोलन पूरा मानिए। वहीं शाम को सैकड़ों लोग जुटे। पेड न्यूज के खिलाफ श्री प्रभाष जोशी अंत तक लड़ते रहे। यह अफसोस है कि उनकी बात जनसत्ता के हम लोगों ने ही जल्द बिसार दिया। उनकी पुण्यतिथि पर या उनके जन्मदिन पर इन बातों की हम लोग भले चर्चा करते हों, लेकिन हकीकत यह है कि व्यवहार में कुछ नहीं करते।

जानने की बात है कि श्री एन.के. सिंह श्री प्रभाष जोशी के सबसे प्रिय लोगों में से एक हैं। वे पत्रकारों के अधिकारों के लिए भी निरंतर लड़ते रहे हैं। उन्होंने, श्री शलभ भदौरिया ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पत्रकारों के हित की कई जानी-मानी लड़ाइयां लड़ी हैं। उनके चलते कई संस्थानों में पत्रकारों और पत्रकारिता के हित की बातें हुई हैं। श्री शलभ भदौरिया का संगठन मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ मध्यभारत में सर्वत्र फैला हुआ है। वह एक बड़ी ताकत है। उसी तरह पत्रकारिता के क्षेत्र में श्री एन.के. सिंह की साख और विश्ववसनीयता बड़ी और मानी हुई है।

पत्रकारिता में आज जो जंगल राज हो गया है, एक बहुत विश्वसनीय आवाज ही वॉर्निंग सिग्नल का काम कर सकती है। श्री एन के सिंह बहुत सहज रूप से वैसी ही एक धुरी बन सकते हैं, जैसे कि श्री प्रभाष जोशी थे। मेरे जैसे अनेक पत्रकार उनके पीछे चलने में गौरव महसूस करेंगे। और पत्रकारिता की भी यह सच्ची सेवा होगी। जैसे पत्रकारिता श्री प्रभाष जोशी से अपेक्षा करती थी,वैसे ही पत्रकारिता श्री एन.के. सिंह जी से भी अपने मूल्यों और मानकों को सुरक्षित रखने के काम को आगे बढ़ाने की अपेक्षा करती है।

कृपया इस निमंत्रण को स्वीकार करें। देश में एक मंच तो हो, जहां से पत्रकारिता की यथास्थिति पर बात तो हो। जो कुछ हो रहा है, अवाम भी उसे जानता चले। ऐसा न हुआ तो होगा खबरों को बेचने का धंधा; लेकिन फिरौती, छिनैती,लूट और डकैती ही मानक न बन जाएं, इसकी जद्दोजहद तो हमें करनी होगी। अंकुश लगानेवाली संस्थाओं को भी निगहबानी पर लगाया जा सके तो प्राथमिक काम हो जायेगा। होगा उसी तरीके से, श्री राम बहादुर राय के हवाले से जिसका मैंने उल्लेख किया –

हम दो हैं, तीन हैं, पांच हैं, सात हैं, दस हैं – हम हैं, यही दुनिया को दस्तूर पर लाने के लिए काफी होगा। वाणी मिथ्या नहीं जाती। यदि विश्वास से बोली गई हो तो। डंकल ड्रॉफ्ट के मौके पर तत्कालीन राष्ट्रपति श्री शंकर दयाल शर्मा ने प्रधानमंत्री को लिखा – दिल्ली के एक हजार पत्रकार बोल रहे हैं। इनकी चिंताएं हैं। सरकार सारे मामले पर फिर एक बार विचार करे। – इसके पहले राय साहब और मैंने बात रखी। राष्ट्रपति महोदय ने केवल एक शब्द पूछा – आप दोनों लोग कहां के हैं। बताया, राय साहब गाजीपुर के। मैं आजमगढ़ का। जाने के लिए उठ खड़े हुए राष्ट्रपति बैठ गए। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा- ओह, आपके इलाके ने आजादी की लड़ाई के लिए बहुत संघर्ष किया है। उस इलाके के लोगों का दर्द मैं समझता हूं। उनकी चिंताएं कभी वृथा नहीं हो सकतीं।

और मावलंकर सभागार में श्री कुलदीप नैयर बोल कर आए थे कि केवल पांच मिनट रुकेंगे। फिर आए तो पूरे समय बैठे। बोले, भरोसा नहीं था कि सारी बिरादरी यहां बैठी होगी, इसलिए जल्दी जाने को बोला था।

मान्यवरो! निवेदन सुनें, अभ्यर्थना सुनें।

मीडिया को पुनर्जीवित करने के अभियान की खासियतें थीं –

-जनसता, इंडियन एक्सप्रेस और फाइनेंसियल एक्सप्रेस के साथियों के 100-100 रुपये के चंदे से ही कार्यक्रमों की शुरुआती व्यवस्था हो जाती थी।

-कार्यक्रम के सभागार के बाहर चद्दर बिछा दी जाती थी, और हर कोई कुछ न कुछ आर्थिक योगदान देता ही था।

-विश्वविद्यालय छात्र संगठन और समाजसेवी संस्थाएं खुद आगे बढ़कर साथ खड़ी होती थीं।

-कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं हुआ, जिसमें उस शहर के तमाम बुद्धिजीवियों, समासेवियों, साहित्यकारों और सुधी लोगों ने शिरकत न की हो।

-कोई कार्यक्रम ऐसा नहीं हुआ, जिसमें उस शहर के सारे के सारे सुधी पत्रकार न आएं हों और उन्होंने मंच की बात लोगों तक न पहुंचायी हो।

लेखक ओम प्रकाश सिंह एब्सल्यूट इंडिया अखबार, मुंबई के संपादक हैं. उनसे संपर्क omprakash@absoluteindianews.com के जरिए किया जा सकता है.


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मीडिया में एक बड़े आंदोलन की जरूरत : अब न्यूज ही पेड नहीं हैं, अखबार और चैनल भी पेड हैं

ओम प्रकाश सिंह


मीडिया जिस मुकाम पर है, उसमें अब धमचक भी है, और आंतरिक विस्फोट भी जल्द होने वाले हैं। एक बड़े आंदोलन की जरूरत उठ खड़ी हुई है। जनसत्ता में पत्रकार रहे और अब एक बड़े लेखक श्री दयानंद पांडेय कहते हैं – मीडिया को कारपोरेट स्वार्थों, और भांड़ों और भड़ैतों ने घेर लिया है। जी हां, केवल भांड़ों और भड़ैतों ने ही नहीं, मिरासियों और बाई जी लोगों ने भी। जैसे नृत्य, संगीत आदि एक निश्चित किस्म के लोगों से घिर गये थे, वैसी ही हालत मीडिया की भी हो रही है।

राजस्थान पत्रिका के संपादक श्री गुलाब कोठारी ने दो साल पहले राजस्थान पत्रिका में प्रथम पृष्ठ पर एक संपादकीय लिखा – भ्रष्ट भी धृष्ट भी। उन्होंने कहा कि सरकारी सुविधाओं को लूटकर कुछ पत्रकार मनमानेपन और आवारागर्दी पर उतारू हैं; और सरकारें भी ऐसे ही पालतू साड़ों को पाल रही हैं। राजस्थान पत्रिका के खिलाफ कुछ पहलवानों ने धरने-प्रदर्शन भी किये। पर अब प्रेस काउंसिल के चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने भी चेतावनी जारी की है कि किस तरह उत्पाद बेचे जा रहे हैं, और पब्लिक को बरगलाया जा रहा है, उस पर हमारी खूब नजर है। फिल्म छाप रहे हैं, खेल छाप रहे हैं, और गैर-मुद्दों को मुद्दा बना रहे हैं, जाति और संप्रदाय की नफरत फैला रहे हैं, लूट और ब्लैकमेल कर रहे हैं। अवाम सचेत न हो, वह अपने हित-अनहित न सोचने लगे, इसलिए लोगों को भरमाया जा रहा है। हम बोलेंगे बच्चू लोगों, सब देख रहे हैं।

और, श्री बी.जी. वर्गीज के स्मरण से पत्रकारिता के तकाजे पर बात लेख पर भी खूब प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। मुंबई से युवा पत्रकार श्री फहीम अब्बाद फराही ने लिखा है – आज पत्रकारिता को ऐसी जिंदगी चाहिए, जो पूंजीपति वर्ग के हस्तक्षेप से मुक्त हो। इसके बगैर पत्रकारिता लगभग एक तरह की गुलामी है।

और, मुंबई के एक और बहुत सुधी युवा पत्रकार मेरे इन बॉक्स में लिखते हैं – रास्ता क्या है? जो अच्छा लिखने-पढ़ने वाले हैं, वे मीडिया में दरकिनार हैं। इसके बदले मालिकान उन्हें प्रोमोट करते हैं, जो विज्ञापन या जिस किसी और तरीके से संभव हो, पैसे लाकर कंपनी के खाते में जमा कराते हैं। मालिकों के बिजनेस इंटरेस्ट को प्रोमोट करते हैं। आप सोच सकते हैं कि आम पत्रकार किस परिस्थिति और किस मानसिकता में जी रहा है। इन भांड़ और भड़ैतों से छुट्टी कैसे मिले? इन युवा पत्रकार का नाम मैं जान-बूझकर नहीं दे रहा हूं,ताकि ये किसी घेरेबंदी में न फंसें। लेकिन शुद्ध कीचड़ के भीतर से उन्होंने ऐसी आवाज उठायी है, इसके लिए समूचे अंतर्मन से उनकी अभ्यर्थना कर रहा हूं।

निर्भय पथिक के संपादक श्री अश्विनी मिश्र ने कहा है – बाजार और बाजारीकरण हाबी हो गया है। इसलिए बाजारू पत्रकार भी हाबी हो गये हैं। यह देखने की कोई व्यवस्था ही नहीं है कि जो अखबार निकाल रहा है, वह किस इरादे से निकाल रहा है। पैसा कमाना है इसलिए हर हथकंडे इस्तेमाल किये जा रहे हैं। कई आम पत्रकार भी इसी में अपना कैरियर तलाश रहे हैं। और ज्यादातर लोगों के पास ऐसे लोगों की गुलामी करने के सिवा चारा ही क्या है? सबको घर-परिवार चलाना है। जीना है।

और दक्षिण मुंबई के संपादक श्री सुमंत मिश्र कहते हैं -पत्रकारों में आपसी संवाद नहीं है, एकता नहीं है, इसलिए मीडिया दुर्दशा की शिकार है।

जनसत्ता की टीम तो ऐसे किसी आंदोलन से जुड़ती ही है। श्री अंबरीश कुमार इस आलेख को अपनी वेबसाइट जनादेश डॉट कॉम पर डाल रहे हैं। इंदौर से रुपेंद्र सिंह और भोपाल से राजेंद्र सिंह जादौन भी ऐसा ही कर रहे हैं। बहुत सुधी पत्रकार सुधीर सक्सेना ने अपनी पत्रिका इन दिनों में छापने के लिए मांगा है। और फहीम अब्बाद फराही ने तो अपने सेकुलर संदेश के लिए इसे पहले ही चुन लिया है। जनसत्ता के बहुत सुधी पत्रकार संजय कुमार सिंह ने लिखा है –

मीडिया में श्री वर्गीज के निधन को महत्व ना मिलने का एक कारण आपने यह भी बताया है कि डेस्क पर बैठे (कनिष्ठ, नवसिखुए) पत्रकारों को शायद श्री वर्गीज के बारे में जानकारी ना हो – इससे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है पर कनिष्ठों के माथे ठीकरा फोड़ने भर से काम नहीं चलेगा। मुझे याद है प्रभाष जोशी ऐसे मौकों पर दफ्तर में (अपने कमरे में नहीं, डेस्क पर हम लोगों के बीच होते) थे और उनका दुख, उनकी चिंता साफ झलक रही होती थी। वो लोगों से चर्चा करते थे और खुद जरूर कुछ ना कुछ लिखते थे। आज के संपादकों में कितने लोग जॉर्ज वर्गीज के बारे में लिख सकते हैं, लिखने को कुछ होता तो लिखे ही होते। बाकी विज्ञापन बटोरने और दारू पीने से फुरसत मिले तो सेटिंग गेटिंग के बाद समय कहां मिलता है। जूनियर को सिखाना होता है जो लगभग बंद सा है। इसका असर धीरे-धीरे दीखने लगा है। जो नुकसान वर्षों में हुआ है उसकी भरपाई मुझे नहीं लगता कि सिर्फ चिंता करने से दूर होगी।

और श्री दयानंद पांडेय के दो कहे को और देख लीजिए – ”चौथा खंभा तो बस एक कल्पना भर है। और सच्चाई यह है कि प्रेस हमारे यहां चौथा खंभा के नाम पर पहले भी पूंजीपतियों का खंभा था और आज भी पूंजीपतियों का ही खंभा है। हां, पहले कम से कम यह जरूर था कि जैसे आज प्रेस के नाम पर अखबार या चैनल दुकान बन गए हैं, कारपोरेट हाऊस या उसके प्रवक्ता बन गए हैं, यह पहले के दिनों में नहीं था। पहले भी अखबार पूंजीपति ही निकालते थे पर कुछ सरोकार, कुछ नैतिकता आदि के पाठ हाथी के दांत के तौर पर ही सही थे। पहले भी पूंजीपति अखबार को अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए ही निकालते थे, धर्मखाते में नहीं। पर आज? आज तो हालत यह है कि एक से एक लुच्चे, गिरहकट, माफिया आदि भी अखबार निकाल रहे हैं, चैनल चला रहे हैं और एक से एक मेधावी पत्रकार वहां कहांरों की तरह पानी भर रहे हैं या उन के लायजनिंग की डोली उठा रहे हैं। और सेबी से लगायत, चुनाव आयोग और प्रेस कौंसिल तक पेड न्यूज की बरसात पर नख-दंत-विहीन चिंता की झड़ी लगा चुके हैं। पर हालात मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की सरीखी हो गई है। नौबत यह आ गई है कि अखबार या चैनल अब काला धन को सफेद करने के सब से बड़े औज़ार के रूप में हमारे समाज में उपस्थित हुए हैं। और इन काले धन के सौदागरों के सामने पत्रकार कहे जाने वाले पालतू बन गए हैं। पालतू बन कर कुत्तों की वफादारी को भी मात दिए हुए हैं यह पत्रकार कहे जाने वाले लोग। संपादक नाम की संस्था समाप्त हो चुकी है। सब से बुरी स्थिति तो पत्रकारिता पढ़ रहे विद्यार्थियों की है। पाठ्यक्रम में उन्हें गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी, पराडकर, रघुवीर सहाय, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर आदि सरीखों की बात पढ़ाई जाती है और जब वे पत्रकारिता करने आते हैं तो गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी या पराडकर, जोशी या माथुर जैसों की जगह रजत शर्मा, बरखा दत्त, प्रभु चावला आदि जैसों से मुलाकात होती है और उनके जैसे बनने की तमन्ना दिल में जागने लगती है। अंतत: ज़्यादातर फ्रस्ट्रेशन के शिकार होते हैं। बिलकुल फिल्मों की तरह। कि बनने जाते हैं हीरो और एक्स्ट्रा बन कर रह जाते हैं। सो इन में भी ज्यादातर पत्रकारिता छोड़ कर किसी और रोजगार में जाने को विवश हो जाते हैं। ”

श्री दयानंद पांडेय का ही दूसरा कहा देखिए –

”अब तो हालत यहां तक आ गई है कि अखबार मालिक और उस का सो काल्ड प्रबंधन संपादकों और संवाददाताओं से खबर नहीं बिजनेस डिसकस करते हैं। सब को बिजनेस टारगेट देते हैं। मतलब विज्ञापन का टारगेट। अजीब गोरखधंधा है। विज्ञापन के नाम पर सरकारी खजाना लूट लेने की जैसे होड़ मची हुई है अखबारों और चैनलों के बीच। अखबार अब चुनावों में ही नहीं बाकी दिनों में भी खबरों का रेट कार्ड छाप कर पैसा वसूल रहे हैं। बदनाम बेचारे छोटे-मोटे संवाददाता हो रहे हैं। चैनलों तक में यही हाल है। ब्यूरो नीलाम हो रहे हैं। वेतन तो नहीं ही मिलता सेक्यूरिटी मनी लाखों में जमा होती है। तब परिचय पत्र जारी होता है। मौखिक संदेश होता है कि खुद भी खाओ और हमें भी खिलाओ। और खा पी कर मूस की तरह मुटा कर ये अखबार या चैनल कब फरार हो जाएं कोई नहीं जानता। तो पत्रकारिता ऐसे हो रही है। संवाद सूत्रों की हालत और पतली है। दलितों और बंधुआ मजदूरों से भी ज्यादा शोषण इन का इतनी तरह से होता है कि बयान करना मुश्किल है। ये सिक्योरिटी मनी भी जमा करने की हैसियत में नहीं होते तो इन्हें परिचय-पत्र भी नहीं मिलता। कोई विवादास्पद स्थिति आ जाती है तो संबंधित संस्थान पल्ला झाड़ लेता है और बता देता है कि उस से उस का कोई मतलब नहीं है। और वह फर्जी पत्रकार घोषित हो जाता है। अगर हाथ पांव मजबूत नहीं हैं तो हवालात और जेल भी हो जाती है। इन दिनों ऐसी खबरों की भरमार है समूचे देश में। राजेश विद्रोही का एक शेर है कि, ‘बहुत महीन है अखबार का मुलाजिम भी/ खुद खबर है पर दूसरों की लिखता है।’ दरअसल पत्रकारिता के प्रोडक्ट में तब्दील होते जाने की यह यातना है। यह सब जो जल्दी नहीं रोका गया तो जानिए कि पानी नहीं मिलेगा। इस पतन को पाताल का पता भी नहीं मिलेगा।”

— तो समाधान क्या है? रास्ता क्या है? उपाय क्या है? परिदृश्य तो ये है। आम जन के मुद्दे भी मीडिया से गायब हैं। उसके बदले अवाम को अफीम परसी जा रही है, या बेईमानी दिखाई जा रही है। जन विश्वास का भ्रष्ट से भ्रष्ट दुरुपयोग किया जा रहा है।

पहले एक उल्हासनगर फिनामिनन था – हर कोई, एैरा-गैरा सरकारी तंत्र से अपना काम करवाने के लिए चार पन्ने का एक साप्ताहिक,पाक्षिक या मासिक पत्रिका निकाल लेता था। सरकारी अधिकारियों तक दांत निपोरने तक की पहुंच भी बनती थी, और अधिकारी भी संबंधित व्यक्ति की किसी नंगई-लुच्चई से डरते थे। लेकिन अब वह माजरा बड़े पैमाने पर है। जानिए – एक बड़े अखबार समूह को, जिसके पास चैनल भी है, कॉमनवेल्थ गेम्स में पब्लिसिटी का ठेका चाहिए था। सुरेश कलमाड़ी ने ना-नुकर की और पैसा चाहा। नतीजे में उस समूह ने कलमाड़ी के खिलाफ अभियान छेड़ा। उन्हें जेल तक पहुंचाया। और सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे हरेक को बताया कि बात न मानने पर यह होगा। यह समूह देश के सबसे बड़े पत्रकारिता समूहों में से एक है। उसी तरह आदर्श घोटाला उजागर करने की भी बोली लगी थी। श्री अशोक चव्हाण को मुख्यमंत्री पद से हटवाना था। वह सुपारी भी इसी अखबार समूह ने ली। – यह माजरा ऊपर का – और नीचे – चार पन्ने का एक अखबार खबर छापकर खड़ा होता है कि आपने अपनी झोपड़ी दो फुट ऊपर उठा ली है। इसकी शिकायत कर रहा हूं। अब इस चार पन्ने के अखबार मालिक से समझौते पर बैठिए। – नीचे से ऊपर तक मीडिया के नाम पर आम तौर पर इन दिनों यही चलन खड़ा हो गया है। – याद है नीरा राडिया टेप- बरखा दत्त केंद्रीय काबीना में मंत्री बनवा रही थीं, विभागों का बंटवारा करा रही थीं। – और इन लोगों में ऐसी मुकम्मिल गठजोड़ है कि किसी भी बड़े अखबार या चैनल ने टेप्स को नहीं छापे या दिखाये-सुनाये। सुधीर चौधरी का प्रकरण सभी को याद है। वे सीईओ के सीईओ बने हुए हैं। कई चैनलों से कामकाज करने वाली लड़कियों के शोषण की भी खबरें आती रहती हैं, जो दबी की दबी रहती हैं। मीडिया में कहीं भी किसी की भी नौकरी का तो कोई भरोसा ही नहीं। हकीकत यह है कि मालिक जब चाहे निकाल दे। ऐसे-ऐसे कांट्रैक्ट बनाये जाते हैं, जो सिरे से ही अपराध साबित हों। लेकिन पत्रकार नौकरी की चाहत में उन पर दस्तखत करने को मजबूर होते हैं। मीडिया का ताम-झाम एक ओर तो उत्पाद बनकर रह गया है। और उन्हें चलाने वाले, मालिक, संपादक सभी सेल्समैन। दूसरी ओर, उसे बनाना, चलाना निहित स्वार्थों के भी हवाले हो गया है। चौथा खंभा एक बड़ा धोखा बनकर रह गया है। आम और ईमानदार पत्रकार इसमें बुरी तरह पिस रहा है।

1995-96 में पत्रकारिता को पुनर्जीवित करने का अभियान के दौरान अनेक सुधी लोगों ने इस सवाल पर बार-बार विचार किया था। और श्री रामबहादुर राय का एक प्रस्ताव प्रशंसित भी हुआ था – कि पत्रकार मिलकर एक विश्वसनीय मीडिया खड़ा करें। काम सरल और सहज है; 1997 में मैंने स्वयं मुंबई में इसका एक प्रयोग भी किया। पर खर्च की वजह से असफल रहा। अब जब सोशल और डिजीटल मीडिया भी सामने हैं, तो ऐसे प्रयोग कम खर्च पर किये जा सकते हैं; और बहुत आसानी से सफल होंगे। भड़ास डॉट कॉम जैसे उदाहरण दिए जा सकते हैं; लेकिन यह बात बड़ी- उससे भी सरल उपाय हैं –

1. असल पत्रकार अपने अखबारों, चैनलों में वास्तविक खबरों को तरजीह दें। उन्हें मेहनत भी करनी होगी। और कई बार जिल्लत भी उठानी पड़ेगी। लेकिन कुछ अंशों में वास्तविक पत्रकारिता की कमी दूर होगी।

2. यक्ष ने युधिष्ठिर से एक प्रश्न जरूर पूछा होगा। यह कि ब्राह्मण मरा क्यों?

युधिष्ठिर ने जवाब दिया होगा – इसलिए कि उसे गंदगी से घेर दिया गया था। और वह उसे हटा न पाया।

तो, चाहे कैसी भी गंदगी से घिरे हों हम, उसे हटाना होगा। हो सकता है कि प्रतिष्ठानों के भीतर हम ठठाकर न हंस पायें। लेकिन प्रतिष्ठानों के बाहर तो हम स्वतंत्र हैं। जब भी कोई बुरा पत्रकार सामने हो, आप उसे इग्नोर तो कर सकते हैं। दरअसल इन सबकी महत्ता इसलिए कायम हो गयी है कि अच्छे लोगों ने उनके सामने सिर झुका लिया है। अच्छे लोग केवल माथा उठा लें – और पूरे ईमान से बुरे को बुरा कहें तो गंदगी दूर हो जाएगी। याद रखें, चोर और गुनहगार के पास पैसे हो सकते हैं, साधन हो सकते हैं, कलेजा नहीं होता।

3. माथे उठे हुए लोग माथे उठे हुए लोगों को जोड़ें। दुर्भाग्य है कि बुरे लोगों के गिरोह बन गये हैं। और अच्छे लोग अपने-अपने भीतर कैद हैं। यह इकट्ठा होना जरूरी है।

4. जो अच्छे रहे हैं, और चुप हैं; उन्हें बोलने के लिए कोंचें। बातचीत करें। गोष्ठियां करें, सबको बुलायें। अच्छाई को बचाने के लिए अच्छाई को चर्चा में बनाये रखना भी जरूरी है। साल में एक संवाद कर लें, बहुत लोग न जुटें, केवल न्यौता ही बांट दें – तो भी बहुत सारी बुराई कमजोर हो जायेगी। समाज ही खुलकर अच्छा-बुरा कहने लगेगा।

5. सत्ता प्रतिष्ठान में भी कुछ ही लोग होते हैं,जो बुरे लोगों को प्रोमोट करते हैं। इन लोगांे से भी चंद अच्छे लोग कभी-कभी संवाद कर लें कि आप जो कर रहे हैं, उस पर हमारी भी निगाह है। अधिकांश लोग बुरा इसलिए कर पा रहे हैं, क्योंकि अच्छे लोग चुप हैं।

अच्छे पत्रकारों की सभा बनाइए। अच्छी पत्रकारिता को फिजां में फैलाइए। जो सक्रिय पत्रकारिता में न हों, किन्ही दबावों में न हों, वे तो यह काम आसानी से कर सकते हैं।

उपाय और भी हैं –

1. पूरी जानकारी हो तो प्रेस काउंसिल को सूचना दीजिए। खुद न कर सकें तो किसी माध्यम को तलाशें।

2. पुलिस को भी सूचना दी जा सकती है।

3. चुनाव आयोग को सूचना दी जा सकती है।

4. मुख्यमंत्री, सूचना प्रसारण मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक बोलना शुरू तो कीजिए – बोलें तो- परिणाम आयेंगे ही।

5. सरकारों से कहें कि पत्रकारों और अखबार मालिकों को मिलनेवाली सुविधाएं बंद की जायें। अब उनकी भूमिका दूसरी है तो सरकार उन पर पब्लिक फंड क्यों लुटाये?

6. इन सब बोलने का नतीजा यह होगा कि लोग भी आपके साथ चलेंगे।

जान लीजिए, अब मामला पेड न्यूज भर का नहीं रहा है। कई अखबार तो खबरें भी उन्हीं की छापते हैं, जो पैसा देते हैं। यानी अखबार ही पेड अखबार हो गये हैं। इसलिए प्रिय पाठकों बोलना तो होगा – इंतजार कीजिए, बोलना शुरू हो।

संकेत शुभ हैं। श्री एन.के. सिंह भी मामले पर विचार कर रहे हैं। शलभ भदौरिया जी का भी संदेश आया है। जनसत्ता के तमाम साथियों को मैं खुद संदेश भेज रहा हूं। नहीं होगा तो पत्रकारिता को पुनर्जीवित करने का अभियान का एक शुरुआती सम्मेलन मुंबई में ही हो जायेगा। जाति, संप्रदाय, भ्रष्टता और अफीमवाली बाजारू पत्रकारिता के खिलाफ बात तो करनी होगी।

जनसत्ता के संजय कुमार सिंह कहते हैं : ”मालिक की तो छोड़िए, एक समय टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक गिरिलाल जैन कहा करते थे कि प्रधानमंत्री के बाद उनका पद सबसे महत्वपूर्ण है। और प्रधानमंत्री का चुनाव तो देश की सवा सौ करोड़ जनता करती है (चलिए मान लेते हैं जो वोटर हैं वहीं) पर टाइम्स ऑफ इंडिया का संपादक तो लाला चाहे किसी को भी बना सकता है। और यही करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक का ये हाल हुआ कि कौन है – किसी को पता नहीं होता। मालिकानों की ताकत भी इसी हिसाब से कम हुई है। कोई माने या ना माने लालाजी को जरूर अहसास होगा भले तिजोरी भर रही है इसलिए मगन हों।”

लेखक ओम प्रकाश सिंह एब्सल्यूट इंडिया अखबार, मुंबई के संपादक हैं. उनसे संपर्क omprakash@absoluteindianews.com के जरिए किया जा सकता है.

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New law needed to govern salary in print media : Ravindra Kumar

New Delhi: Outgoing president of Indian Newspaper Society (INS) Ravindra Kumar today (Friday) said a new law is required to govern salary and other issues relating to print media and called the wage boards “life-threatening disease” as their recommendations have put a “crippling burden” on the industry. In his Presidential address at the 75th annual general meeting of INS, Kumar said implementation of recommendations of the Majithia Wage Board has badly hit all newspaper establishments and urged the government to do away with them.

“The wage board has already placed a crippling burden on all newspaper establishments, and its weight will affect us more with each passing year,” he said.

Demanding immediate scrapping of the “wholly one sided” Working Journalists and Other Newspaper Employees Act, he said a new law should be enacted taking on board views of all stakeholders. INS was founded in 1939 and it comprises the owners, proprietors and publishers of print media. Kumar said it was time to press for a new law when the NDA government was revisiting “all institutional frameworks including erstwhile holy cows such as Planning Commission”.

Kumar said the INS has long maintained that government must do away with Wage Boards because they are “anachronistic, unrealistic and wholly arbitrary in their scope and ambit”.

“The time to resist the infliction of Wage Board is now, not once they are announced because then a fait accompli will be presented to us,” he said. Kumar also expressed concern over “paid news” and said the situation must change if press is to remain “vibrant, free and relevant”.

“It is time to accept that a practice as reprehensible as ‘paid news’ — an oxymoron foisted upon Indian society by the greed of some of us — is the inevitable consequence of a situation where the reader pays a fraction of the cost of a newspaper,” he said.

The outgoing INS president also called upon the members to deal with policy decisions concerning newsprint, wages and taxation in a “united fashion”. Referring to revenue collection, he said some state governments have been playing “ducks and drakes” with newspapers withholding advertisements to some and stopping payments to others.

He also slammed West Bengal Government for “obdurate position” taken by it in settling newspaper bills, particularly for refusing to settle bills of the previous regime. Kumar also delved on issues concerning newsprint imports and DAVP tariffs. Kiran B Vadodaria of Gujarati newspaper Sambhaav Metro was today elected as the new President of the INS for 2014-15, succeeding Kumar.

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डीआई पीआर में 4 पेज के अखबार को राज्यस्तरीय बनाने वाला कौन है?

: राजस्थान के डीआई पीआर में अखबारों की मान्यता का फर्जीवाड़ा : 4 पेज के अखबार को राज्यस्तरीय दर्जा, लाखों का चूना : जोधपुर। राजस्थान के सूचना एवं जन सम्पर्क निदेशालय के आला अधिकारी अखबारों की मान्यता की कार्यवाही मे बड़े स्तर पर घपला कर सरकार को चूना लगा रहे हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है जोधपुर में फर्जी प्रिंट लाईन से छप रहे 4 पेज के अखबार दैनिक प्रतिनिधि का। दैनिक प्रतिनिधि का मालिक खुद को राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी का रिश्तेदार बताता है। उक्त समाचार पत्र का एक ही संस्करण जोधपुर में छप  रहा है। इस चार पेज के अखबार के पीछे  प्रिन्ट लाईन में नियम तोड़ कर प्रिन्टिंग प्रेस के पते की सूचना तक दर्ज नहीं की जा रही हैं जबकि प्रेस एक्ट में मुद्रणालय के पूरे पते की सूचना आवश्यक रूप से दी जाती है। जिस भण्डारी ऑफसेट से यह अखबार छपना बताया जा रहा है इस नाम की कोई प्रिंन्टिंग प्रेस अस्तित्व में नही है।

उक्त समाचार पत्र को डीआई पीआर के अधिकारियों ने कभी जिला स्तर तो कभी संभाग व राज्य तो वापस जिला स्तर का समाचार पत्र मानते हुए वर्गीकृत किया। जब जब भी मेहरबानी की उस समय वर्गीकरण की प्रक्रिया बदल दी गई। अंत में गई कांग्रेस सरकार ने फिर संभाग जोधपुर के लिए राज्यस्तरीय अखबार बना लिया। जबकि संभाग स्तर पर अलग से राज्यस्तरीय मान्यता देने का प्रावधान राजस्थान विज्ञापन नियम 2001 में कहीं भी नहीं है।

राज्य सरकार के विज्ञापन नियम में जयपुर सहित राज्य के दो स्थानों से प्रकाशित होने वाले 10 पेज के अखबार को ही राज्यस्तरीय मान्यता विभिन्न पात्रताएं पूरी करने पर देने का प्रावधान है। यह अखबार तो सिर्फ 4 पेज का और वह भी सिर्फ जोधपुर से प्रकाशित होने वाला है। अब तक डीआई पीआर से राज्यस्तर के नाम पर लाखों का चूना लगा चुका है। जोधपुर विकास प्राधिकरण भी इस अखबार को राज्यस्तरीय मानते हुए वाणिज्यिक दरों पर भुगतान की कार्यवाही कर जेडीए को 25 लाख से अधिक का चूना लगाने की प्रक्रिया को अंतिम रूप में चला रहा है।

डीआई पीआर में आखिर 4 पेज के अखबार को राज्यस्तरीय बनाने वाला कौन है? इसकी जांच करवाई जाये तो कईं ऐसे मामले सामने आ सकते हैं। बेचारे कई अखबार जो 10 पेज के निकलते हैं कईं जगहों से प्रकाशित होते हैं उन पर डीआई पीआर मेहरबानी नहीं कर रहा है। इस चार पेज के अखबार को राज्यस्तरीय बनाने में किसने क्या व कितने लिये, यह दावा तो नहीं कर सकते लेकिन इस दाल को बनाने मे काले रंग का इस्तेमाल जरूर हुआ है वरना नौकरी बेच कर ऐसे काम कौन करता?

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पैसे कमाने की होड़ में विज्ञापनों का धंधा करने वालों के साथ इंडियन एक्सप्रेस भी जुड़ गया है

Sanjaya Kumar Singh : पत्नी बीमार हैं और दो महीने में तीसरी बार अस्पताल में हैं। तीमारदारी करते हुए अस्पताल में समय काटने के लिए नकद देकर अखबार खरीदता और पढ़ता हूं। इसी क्रम में पिछले दिनों ‘द हिन्दू’ खरीदा तो पता चला कि आजकल आठ रुपए का आ रहा है। आपमें से बहुतों को पता नहीं होगा कि रोज घर आने वाला अखबार कितने का होता है। महीने भर का बिल देने वालों के लिए यह कोई खास बात नहीं है।

इसी क्रम में आज (इतवार) को मैंने एक स्टॉल वाले से कहा कि एक-एक इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स दे दो। उसने अखबार पकड़ाए और कहा 10 रुपए। मैंने कहा किसके कितने। उसने कहा हिन्दुस्तान टाइम्स तो साब पांच रुपए का है। ये भी (इंडियन एक्सप्रेस) पांच रुपए का है। मैंने कहा, कहां लिखा है दिखाओ। वह ढूंढ़ने लगा और 5 अक्तूबर दिखाकर कहा ये देखो साब। मैंने कहा ये तो आज की तारीख लिखी है। अब वह बेचारा और परेशान उसके साथ मैं भी। असल में आज इतवार को दोनों अखबारों में पहला पन्ना विज्ञापन का था और विज्ञापन के साथ बने मास्ट हेड में तारीख आदि तो हैं पर अखबार की कीमत नहीं लिखी है, न जाने क्यों। जब हॉकर को नहीं मिला तो मैंने उसकी सहायता के लिए अंदर के (जो असल में पहला था) पन्ने पर कीमत ढूंढ़ना शुरू किया और ढूंढ़ निकाला।

हॉकर सही था, मैंने 10 रुपए दिए और अखबार लेकर आगे बढ़ा तो अफसोस कर रहा था कि मैंने बेकार बेचारे कम पढ़े-लिखे अखबार विक्रेता को परेशान किया। पर साथ ही यह ख्याल भी आया कि अखबार वाले हम पाठकों का तो ख्याल नहीं ही रखते हैं, अपने विक्रेताओं की भी चिन्ता उन्हें नहीं है। एक समय था जब पहले पन्ने पर एक ही विज्ञापन होता था। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती गई और अब अखबार वाले अपना पूरा पहला पन्ना बेच दे रहे हैं और पाठकों को पहले पन्ने की खबरें अंदर पढ़ा रहे हैं। पाठकों की परवाह तो अखबार वालों को नहीं है। उन्हें चिन्ता विज्ञापन देने वालों की है और उनकी सेवा वे अच्छी तरह कर भी रहे हैं पर बेचारे गरीब, कम पढ़े-लिखे विक्रेताओं का ख्याल तो रखो। पैसे कमाने की इस होड़ में विज्ञापनों का धंधा करने वालों के साथ इंडियन एक्सप्रेस भी जुड़ गया है, यह जानकर आज थोड़ा अफसोस हुआ।

दूसरी ओर, अखबार में विज्ञापन देने और छापने वालों को बता दूं – मैंने नहीं देखा कि विज्ञापन किसी चीज का था। शाम को बच्चों ने बताया कि आमिर खान का प्रोग्राम आज शुरू हो गया तब समझ में आया कि हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पेज के विज्ञापन में खबरें क्यों छपीं थीं और उनपर विज्ञापन क्यों लिखा था। अब याद नहीं आ रहा है कि इंडियन एक्सप्रेस में पहले पेज पर क्या विज्ञापन था (हालांकि था हिन्दुस्तान टाइम्स से अलग)। देखते हैं अखबार वाले इस तरह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए कब तक धंधा कर पाते हैं। हमारी तो जो मजबूरी है सो हइये है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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