पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप

‘पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप’ नाम किताब का है. इसके लेखक हैं नगेन्द्रनाथ गुप्त. इस किताब का अनुवाद और संपादन किया है वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन ने. किताब की विषय सूची में सात अध्याय हैं-

  1. पुरानी किताब का नया सम्पादकीय
  2. बचपन का बिहार
  3. डेढ सौ साल पहले का कोलकता और बंगाल
  4. सिन्ध का जीवन और पत्रकारिता
  5. पंजाब मेँ बीता एक दशक
  6. लौटकर कोलकता में

नीचे पहला चैप्टर ‘पुरानी किताब का नया संपादकीय’ दिया जा रहा है. इसे पढ़कर जाना जा सकता है कि ये किताब मीडिया वालों के लिए, बिहार वालों के लिए, हिंदी पट्टी वालों के लिए, पढ़े-लिखे लोगों के लिए क्यों जरूरी है…

पुराने किताब की नई भूमिका

यह एक अद्भुद किताब है. इतिहास, पत्रकारिता, संस्मरण, महापुरुषोँ के चर्चा, शासन, राजनीति और देश के विभिन्न हिस्सोँ के संस्कृतियोँ का विवरण यानि काफी कुछ. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है इसका कालखंड. पढने की सामग्री के लिहाज से 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद से देश के राजनैतिक क्षितिज पर गान्धी के उदय तक का दौर बहुत कुछ दबा छिपा लगता है. अगर कुछ उपलब्ध है तो उस दौर के कुछ महापुरुषोँ के प्रवचन, उनसे जुडा साहित्य और उनके अपने लेखन का संग्रह. लेकिन उस समय समाज मेँ, खासकर सामाजिक जागृति और आध्यात्मिक विकास के क्षेत्र मेँ काफी कुछ हो रहा था. अंगरेजी शासन स्थिर होकर शासन और समाज मेँ काफी कुछ बदलने मेँ लगा था तो समाज के अन्दर से भी जबाबी शक्ति विकसित हो रही थी जिसका राजनैतिक रूप गान्धी और कांग्रेस के साथ साफ हुआ. यह किताब उसी दौर की आंखोँ देखी और भगीदारी से भरे विवरण देती है. इसीलिए इसे अद्भुद कहना चाहिए. एक साथ तब का इतना कुछ पढने को मिलता नहीँ. कुछ भक्ति भाव की चीजेँ दिखती हैँ तो कुछ सुनी सुनाई. यह किताब इसी मामले मेँ अलग है.

इतिहास की काफी सारी चीजोँ का आंखोँ देखा ब्यौरा, और वह भी तब के एक शीर्षस्थ पत्रकार का हमने नहीँ देखा सुना था. इसमेँ 1857 की क्रांति के किस्से, खासकर कुँअर सिन्ह और उनके भाई अमर सिन्ह के हैँ, लखनऊ ने नबाब वाजिद अली शाह को कलकता की नजरबन्दी के समय देखने का विवरण भी है और उसके बाद की तो लगभग सभी बडी घटनाएँ कवर हुई हैँ. स्वामी रामकृष्ण परमहंस की समाधि का ब्यौरा हो या ब्रह्म समाज के केशव चन्द्र सेन के तूफानी भाषणोँ का, स्वामी विवेकानन्द की यात्रा, भाषण और चमत्कारिक प्रभाव का प्रत्यक्ष ब्यौरा हो या स्वामी दयानन्द के व्यक्तित्व का विवरण. ब्रिटिश महाराजा और राजकुमार के शासकीय दरबारोँ का खुद से देखा ब्यौरा हो या कांग्रेस के गठन से लगातार दसेक अधिवेशनोँ मेँ भागीदारी के साथ का विवरण हर चीज ऐसे लगती है जैसे लेखक कोई पत्रकार न होकर महाभारत का संजय हो. कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के लेखन अध्ययन मेँ प्रत्यक्ष भागीदारी हो या लाला लाजपत राय का शुरुआत करके शहीद होने का विवरण, ब्रह्म समाज का तीन धडोँ का आन्दोलन हो या आर्य समाज का दो धडोँ वाला हर चीज एक काबिल पत्रकार के हिसाब से लिखी और बताई गई है, न ज्यादा लम्बी न ज्यादा छोटी.

और जितने व्यक्तित्व से सीधे परिचय के ब्यौरे हैँ वह हैरान करने वाला है. जो बडे नाम ऊपर लिए गए हैँ, उनके अलावा कांग्रेस का लगभग पूरा शुरुआती नेतृत्व लेखक के निजी परिचय और घनिष्ठता वाला है. इसमेँ ए.ओ.ह्यूम, डब्लू. सी. बनर्जी, दादा भाई नौरोजी, आर. सी. दत्त, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, जस्टिस रानाडे समेत काफी लोग तो हैँ ही गान्धी के ठीक पहले वाला बडा नेतृत्व भी शुरुआत करता दिखता है. बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, लाला लाजपत राय और पंडित मदनमोहन मालवीय जैसे लोगोँ के सक्रिय होने और उभरने का ब्यौरा सुखद और आश्चर्य वाला लगता है. और पत्रकार होने के चलते लेखक एक पक्ष पर नहीँ रुक सकता था सो अनेक वायसरायोँ और अंगरेज अधिकारियोँ के बारे मेँ भी, अनेक जजोँ और दूसरे पदाधिकारियोँ के बारे मेँ भी व्ब्यौरे हैँ और आश्चर्यजनक ढंग से छोटे छोटे और दिलचस्पी भरे ही हैँ. राष्ट्रगान वाले बंकिम हैँ पर सीधे विवरण मेँ नहीँ हैँ. भगिनी निवेदिता विस्तार से आई हैँ पर श्रद्धांजलि लेख के रूप मेँ.

इनके अलावा पचासोँ और लोग आए हैँ जिनका अलग अलग क्षेत्रोँ मेँ काफी योगदान है. कश्मीर के महाराजा प्रताप सिन्ह हैँ तो दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिन्ह, पंजाब के दिग्गज सरदार दयाल सिन्ह मजीठिया हैँ तो सिन्ध के दयाराम जेठाराम, पारसी उद्यमी मालबारी हैँ तो जमशेदजी टाटा भी हैँ, रतन टाटा भी हैँ. आर्य समाज आन्दोलन को परवान चढाने वाले डीएवी आन्दोलन के लाला हंस राज हैँ तो गुरुकुल कांगडी वाले स्वामी श्रद्धानन्द भी. भारतीय गौरव को साथ लिए काम करने वाले आईसीएस श्रीपाद बाबाजी ठाकुर हैँ तो ज्योतीन्द्रनाथ टैगोर भी और कई अंगरेज अधिकारी भी. बांग्ला साहित्य और पत्रकारिता के काफी लोगोँ का व्यक्तिगत किस्म का जिक्र है तो कई सिर्फ पढने वालोँ और अच्छा गप्प करने वालोँ का किस्सा भी है. ऐसे लोगोँ मेँ रवि बाबू की रचनाओँ का शुरुआती मूल्यांकन और प्रकाशन तक रुकवाने वाले उनके और लेखक के मित्र प्रिय नाथ सेन(जिनका अपना लिखा कुछ भी प्रकाशित नहीँ है और जो किसी पोस्ट पर न थे) की कहानी भी दिलचस्प है. बल्कि जितने अनजान लोगोँ का किस्सा है वह उतना ही दिलचस्प है. इनमेँ छपरा के फकीर और अमृतसर के खराद कारीगर भाई राम सिन्ह का महारानी विक्टोरिया का करीबी बनने का किस्सा भी शामिल है. और लेखक को ज्यादा कुछ इसलिए भी मालूम था क्योंकि वह अनपढ राम सिन्ह की तरफ से महारानी के पत्रोँ का जबाब लिखता था. भागलपुर का गपोड पुलिसिया, उर्दू फारसी के कई गुमनाम शायर, ब्रह्म समाज और आर्य समाज के प्रचारक जैसे कई लोग किताब मेँ आए हैँ.

पर यह बताने मेँ शर्म है लेकिन हर्ज नहीँ है कि पत्रकारिता के पेशे मेँ अपना पुरखा होने के बावजूद मुझे नगेन्द्रनाथ गुप्त के और उनकी इस किताब के बारे मेँ मालूम न था. उनकी अन्य रचनाओँ के बारे मेँ भी मालूम न था. और जब इस किताब से परिचय बना तो उनकी बांग्ला साहित्यिक रचनाओँ को छोडकर बाकी के बारे मेँ काफी कुछ जान गया. और इस किताब से बनी छवि और गहरी हुई. लेखक की मौत लगभग अस्सी साल की उम्र मेँ 1940 मेँ अर्थात आज से करीब अस्सी साल पहले हुई. इसके अलावा उनका परिचय ज्यादा बताने का कोई खास मामला नहीँ है क्योंकि यह संस्मरणोँ और आत्मकथा जैसी किताब है और जो भी इसे पढेगा उसे नगेन्द्रनाथ गुप्त का परिचय होगा, वह उनसे बन्धा महसूस करेगा. पर स्वामी विवेकानन्द का क्लासमेट होना, रवि बाबू का मित्र होना, केशब चन्द्र सेन से रिश्तेदारी मेँ होना, और इतने महापुरुषोँ के सीधे सम्पर्क मेँ होना एक स्वप्न जैसा जीने का मामला तो है ही. पर इसमेँ अच्छे और प्रतिभावान लोगोँ की पहचान की क्षमता और उनसे मैत्री बरकरार रखने लायक काबलियत रखना तो नगेन्द्रनाथ गुप्त नामक व्यक्ति का ही गुण था, तभी उनसे अनपढ भाई राम सिंह ब्रिटिश महारानी के पास चिट्ठियाँ लिखवाते थे और महारानी विक्टोरिया के निधन समेत अनेक बडे अवसर पर उनसे प्रस्ताव भी लिखवाए गए. और उस जमाने मेँ अगर नगेन्द्र नाथ गुप्त अपने पिता तथा आसपास के लोगोँ की तरह सरकारी नौकरी मेँ न जाकर पत्रकारिता की मुश्किल दुनिया मेँ आते हैँ तो यह उनके व्यक्तित्व की खास बनावट का ही मामला था.

और यह व्यक्तित्व बनाने मेँ उनके बचपन, माता विहीन घर के माहौल, तबादले वाली नौकरी करते जज पिता समेत काफी सारी चीजोँ का हाथ था. मुझे उनकी जिन्दगी और इस किताब मेँ दिलचस्पी उनके पत्रकार होने के अलावा इस बात से भी हुई कि वे मेरे शहर मोतिहारी मेँ पैदा हुए थे और दो दो बार रहे. वे आरा, छपरा, पटना और भागलपुर मेँ भी रहे. जो विवरण उन्होँने दिए हैँ वह मेरे ऐसे लोगोँ के लिए तो विलक्षण हैँ(जैसे यही तथ्य कि मोतिहारी का मौजूदा शहर 1934 के भूकम्प के बाद नए सिरे से बसा है जबकि पुराना मुख्य शहर आज के मोतिहारी के पूरब की तरफ था) लेकिन वे श्री गुप्त के व्यक्तित्व की बनावट के रहस्य भी खोलते हैँ. भागलपुर के बाहर की वीरान गुफा की यात्रा या जंगली सूअर को गोली मारना या बाढ से भरी गंगा मेँ आरा से पार करके छपरा पहुंच जाना बताता है कि वे सामान्य जीवन जीने वाले न थे. 1857 की बगावत का प्रत्यक्षदर्शियोँ से सुने किस्से होँ या लडाई वाली जगहोँ और मकानोँ को खुद जाकर देखने के ब्यौरे, सब पर्याप्त दिलचस्प हैँ और किशोर नगेन्द्रनाथ ने इतनी जानकारियाँ जुटा ली थीँ कि अमर सिन्ह पर पूरा उपन्यास लिख दिया था. इन दिलचस्पियोँ ने भी उनके आगे का रास्ता तय किया. 1870 के दशक के कलकत्ता के विवरण भी कम रोचक नहीँ हैँ.

किताब की रोचकता लेखक के गुजारे जीवन के भूगोल से भी बनती है. वे बंगाली थे, काफी समय और पढाई बंगाल और कोलकता की थी, बाइस तेइस साल की उम्र मेँ सिन्ध पहुंच गए, काफी समय रहे, फिर पंजाब मेँ लम्बा अरसा बिताया, घूमकर कोलकता आए और कुछ समय रहकर मुम्बई रहने लगे और वहीँ दम तोडा. आज हम बान्द्रा को मुम्बई का मुहल्ला न गिनेँ तो बान्द्रा क्या उसके आगे थाणे तक के लोग डन्डा लेकर पीछे पड जाएंगे. लेकिन लेखक ने सदा बान्द्रा को बम्बई से बाहर ही बताया है. और उनके बताए भूगोल से आज के पटना, कराची, हैदराबाद, सिन्ध, कोलकता और मुम्बई को समझना कठिन है. पर यह कठिनाई दिलचस्प है. सडकोँ के नाम, इलाकोँ का पुराना ब्यौरा और रहने वालोँ के किस्से पांच छह पीढियोँ मेँ ऐसे बदले हैँ कि समझने मेँ काफी अक्ल लगाना होता है. ये सब एक पहेली की तरह भी हैँ.

जैसे मुझे ही अपने शहर मोतिहारी की पुरानी बनावट का अन्दाजा लगते ही सिर्फ नगेन्द्रनाथ गुप्त और उनके जज पिता मथुरानाथ गुप्त का आवास वाला इलाका समझ आते ही प्रसिद्ध अंगरेजी लेखक जार्ज आरवेल की जन्म स्थली का भी अन्दाजा हो गया श्री गुप्त के मोतिहारी छोडने के बाद उसी शहर के उसी इलाके मेँ जन्मे थे. उनके पिता भी मोतिहारी मेँ तैनात थे. लेकिन उसके बाद आए 1934 के भूकम्प ने शहर को मटियामेट कर दिया था. सो उसके बाद के हमारे जैसे लोगोँ के लिए पुराना शहर समझना आसान हुआ. सो जो कार्नवालिस रोड, टाउन हाल, मैदान, आर्य समाज भवन जैसे लोकेशन और नाम को आधुनिक हिसाब से समझ जाएगा उसे अतिरिक्त आनन्द आएगा. इसीलिए कितब मेँ आए नाम को उसकी आगे की वंशावली से और जगह को नए नामोँ से आज की स्थिति मेँ लाने का प्रयास नहीँ किया गया है, वह बहुत कुछ हमारे जैसे डेढ पौने दो सौ साल बाद के शहरोँ को जानने वाले लोगोँ के वश का है भी नहीँ.

पर पूरब, पश्चिम और उत्तर भारत के प्रमुख शहरोँ, व्यक्तियोँ, घटनाओँ, आन्दोलनोँ, भाषा और रीति रिवाजोँ के वर्णन वाली यह किताब बहुत खास बन जाती है. वे दक्षिण मेँ नहीँ रहे पर कांग्रेस के अधिवेशनोँ के ब्यौरे के क्रम मेँ दक्षिण के प्रमुख लोगोँ का ठीक ठाक जिक्र हुआ है. अपनी पत्नी द्वारा सिन्धी सीख लेने और सिन्धी की बारीकियोँ का विवरण भले कई बार पराया लगता है लेकिन सिन्ध और सिन्धी अब भी हमारे जीवन का हिस्सा हैँ. सिन्धी रीति रिवाजोँ, संस्थाओँ के विकास और प्रमुख व्यक्तियोँ की ज्यादा ही खास विवरण पुस्तक मेँ हैँ. और नगेन्द्रनाथ गुप्त तो उस दौर का आंखोँ देखा और खुद का भोगा विवरण देते जब कराची, हैदराबाद, शिकारपुर और दूसरे शहर पढाई, कारोबार और राष्ट्रीय चेतना का विकास करने की शुरुआत ही कर रहे थे. कई बार व्यापार और वकालत या सरकारी अफसरी करने वाले जिस व्यक्ति की चर्चा है उसकी पांच छह पीढी के नीचे/आगे आज कौन है, कितना बडा कारोबार है यह भी जानना मजेदार है. पर स्थानोँ और सडकोँ के नाम की तरह यह भी हमारे वश की चीज नहीँ है. हम तो अपने मित्र विश्राम वाचस्पति के पुरखे स्वामी श्रद्धानन्द के लाला मुंशीराम वाला ब्यौरा पढकर ही निहाल हैँ.

तब के ऐसे महापुरुषोँ के सारे ब्यौरे और उनके नाम पर सडक, भवन, मुहल्ले का नाम, संस्थाओँ का नाम जैसे हजारोँ बडॆ बदलाव हुए हैँ. न सबको गिनवाना सम्भव है न जरूरी. पर रुस्तमजी और टाटा परिवार के तब के ब्यौरे मजेदार है. यह जानना और दिलचस्प है कि रतन टाटा बम्बई छोडकर कराची पढने आए थे और जिस शिक्षक के साथ रहकर पढे वे बाद मेँ टाटा संस के डायरेक्टर हो गए. उन्होँने बंगाल का, बंगाली परम्परा और पोशाक का, पढाई लिखाई और सांस्कृतिक गतिविधियोँ का, तब की पत्रकारिता के प्रसंगोँ का भरपूर विवरण दिया है तो सिन्ध और पंजाब का भी उस दौर का कुछ नहीँ छूटा है. और जब मैँ बार बार भरपूर और काफी सारी बातोँ का जिक्र कर रहा हूँ तो उसका कारण सिर्फ इतना है कि ज्यादातर ब्यौरे नए हैँ और महापुरुषोँ से जुडे ऐसे ब्यौरे बाहर ज्ञात नहीँ हैँ. रामकृष्ण का प्रसंग भी अगर है तो आंखोँ देखा, वाजिद अली शाह को देखने का किस्सा है तो दिलचस्प.

लेकिन इतने प्रसंगोँ, व्यक्तियोँ, आन्दोलनोँ, जगहोँ और संस्थाओँ का विवरण एक अपेक्षाकृत छोटी किताब मेँ जुटाना लेखक के बडा पत्रकार होने का भी प्रमाण है. कब, कहाँ, किससे, क्योँ मिलना है, क्योँ वहाँ पहुंचना है, रोचकता बनाए रखने के लिए क्या विवरण देना है और कब आम आदमी की खबर लेनी है कब खास की, यह सबसे अच्छे पत्रकार की निशानी है और नगेन्दनाथ गुप्त ने इस किताब के जरिए यही साबित किया है. उनको मालूम है कि भागलपुर मेँ घूमते रहने वाले जर्मन भिखमंगे की कहानी लाखोँ हिन्दुस्तानी भिखमंगोँ से अलग और खास होगी, एक फकीर द्वारा खुद को अपमानित किये जाने पर बदतमीज अंगरेज अधिकारी के दांत तोडना एक सामान्य दिलचस्पी का किस्सा है. किसी बदतमीज अंगरेज अधिकारी को मजिस्ट्रेट द्वारा भरी अदालत मेँ सार्वजनिक रूप से शर्मिन्दा करा देना ही बडी खबर है. और जिन चीजोँ की पुष्टि न हो या जिम्मा लेकर कहना उचित न हो पर कहानी के हिसाब से वह जरूरी हो तो उस तथ्य और बात को कैसे प्रस्तुत करेँ यह अगर किसी को जानना हो तो कश्मीर के महाराजा प्रताप सिन्ह वाले प्रसंग जैसे कितने ही प्रसंग किताब मेँ हैँ.

एक विवरण कुछ ज्यादा विस्तार से आया है, मैथिली कवि विद्यापति की कविताओँ और गीतोँ का संग्रह करने का. छह साल लगाकर नगेन्द्रनाथ गुप्त ने इस काम को पूरा किया जबकि पहली डेढ सौ कविताओँ की हस्तलिखित पांडुलिपि महाराज दरभंगा ने उपलब्ध कराई, कविवर चन्दा झा का सहयोग उपलब्ध कराया और बंगीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष ने अपने पैसे से पुस्तक का प्रकाशन कराया. असल मेँ यह सामान्य काम नहीँ था. इसमेँ बांग्ला मैथिली सम्बन्धोँ को निभाना और स्पष्ट करना था, कविताओँ मेँ आई अशुद्धता को दूर करना था और आधुनिक प्रकाशन मेँ विद्यापति को पहली बार प्रस्तुत करना था. इस काम के महत्वपूर्ण ब्यौरोँ के साथ यह भी साफ करते हैँ कि अगर बंगाल के लोग विद्यापति को जमाने से अपना कवि मानते थे, उनकी भाषा को बांग्ला की एक बोली ‘ब्रजबोली’ बताते थे तो यह विद्यापति को हडपने का षडयंत्र न होकर एक भ्रम और स्नेह का मामला था और इसमेँ सदियोँ से मिथिला जाकर संस्कृत शिक्षा लेकर लौटे बंगाली विद्वानोँ का विद्यापति(और गोविन्द दास झा) की कविताओँ और गीतोँ पर लट्टू होकर घर लाने का प्रेममय सम्बन्ध था. और यह घनिष्ठता इतनी थी कि श्री गुप्त को ब्रह्मपुर जैसे ठिकानोँ पर भी विद्यापति के कई गीत और कविताएँ मिलीँ जो मिथिला मेँ उपलब्ध न थी. नगेंद्रनाथ गुप्त का यह काम एक महान कवि की रचनाओँ का संग्रह और सम्पादन तो करता है एक इतिहास को स्पष्ट करता है, एक विवाद को विद्वतापूर्ण ढंग से सुलझाता है.

लेकिन पत्रकार की सबसे बडी परीक्षा पक्षधरता से होती है, निष्पक्षता और अपनी पक्षधरता के बीच के संतुलन से होती है. श्री गुप्त कहीँ असत्य और बेइमानी या अंगरेजी अत्याचार के साथ नहीँ होते और हर उपयुक्त मौके पर गलती या असत्य को रेखांकित करने के साथ सत्य के पक्ष मेँ खडा रहने का साहस दिखाते हैँ. ऐसे अनेक प्रसंग किताब मेँ है. बल्कि अपने अखबारोँ ‘फीनिक्स’ और ‘ट्रिब्यून’ वगैरह के साथ कई बार किसी प्रसंग मेँ अभियान चलाकर सत्य का साथ देने के विवरण भी हैँ. कई बार अंगरेज अधिकारियोँ की घेरेबन्दी करके उनके खिलाफ कार्रवाई कराने या सरकार के फैसले बदलवाने के प्रसंग हैँ. फिर तथ्योँ को उठाते हुए कितनी और कैसी सावधानियाँ रखनी होती हैँ इसके कई प्रसंग उन्होँने अपने जीवन से दिये हैँ. संवाददाता को अपनी खबर के लिए कैसे खबर वाले बडे लोगोँ से नजदीकी रखनी पडती है और टिप्पणी करने वालोँ को दूरी बनाकर रखना होता है यह प्रकरण भी है, व्यक्तिगत उदाहरण वाले. और जिस दौर के पत्रकार नगेन्द्रनाथ गुप्त हैँ उसमेँ नीडरता शायद सबसे बडा गुण थी जो उनमेँ कूट कूट कर भरी लगती है.

वीडियो और फोटो के जमाने वाली पत्रकारिता से काफी पहले के पत्रकार श्री गुप्त ने हर किसी का परिचय देते हुए जरूर उसके डील डौल, मुखाकृति और रंग रूप की चर्चा की है. इसमेँ हर बार इलाका, जाति और मजहब के साथ की पहचान भी रेखांकित करने की कोशिश हुई है. कई बार यह थोडा अटपटा लगता है. पर एक तो तब फोटो का चलन भी नहीँ था और दूसरा समाज मेँ परिचय का ये सब आधार थे. इसके आधार पर हम आज भी किसी को पहली बार मिलते हुए जांचते हैँ. लेखक ने सम्भवत: आकृति विज्ञान भी पढा था या रवि बाबू के भाई ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर से सीखा था. उनके इस रूप की चर्चा भी लेखक ने बहुत सम्मान के साथ किया है. पर आज यह नहीँ चलेगा कि आप चमडी के रंग और चेहरे की नस्लीय आकृति को आधार बनाकर किसी को पहचानने या उसकी पहचान बताने की कोशिश करेँ.

यह किताब नगेन्द्रनाथ गुप्त के दौर के ही एक अन्य पत्रकार अब्दुल हलीम शरर की किताब ‘गुजिश्ता लखनऊ’ (पुराना लखनऊ) की याद दिलाता है. लखनऊ के जीवन और संस्कृति पर शरर साहब के अखबारी कालम को किताब का रूप देकर उसे तैयार किया गया है तो इस किताब को भी श्री गुप्त द्वारा 1926 से 1931 के बीच प्रसिद्ध पत्रिका ‘माडर्न रिव्यू’, इंडियन नेशन, पटना और हिन्दुस्तान रिव्यू के लेखोँ\संस्मरणोँ के आधार पर बनी है. जब दैनिक अखबार निकालने की जिम्मेवारी और एक अलग किस्म की सक्रिय पत्रकारिता से वे मुक्त हुए तो अपने मित्र सच्चिदानन्द सिन्हा(संविधान सभा के पहले अध्यक्ष) और माडर्न रिव्यू के सम्पादक रामानन्द चटर्जी के कहने से उन्होँने संस्मरण और पत्रकारिता के आत्मकथात्मक प्रसंगोँ को लिखा. बल्कि एक दौर मेँ माडर्न रिव्यू का कोई अंक नहीँ मिलता जिसमेँ उनका लिखा कुछ न कुछ न हो. इनको किताब का रूप सच्चिदा बाबू ने ही दिया. और यह किताब कितना महत्वपूर्ण होती जाएगी इसका अन्दाज उन्हीँ जैसे कुछेक लोगोँ को होगा. अगर पुराना लखनऊ एक क्लासिक है तो यह किताब भी उससे कम नहीँ है. उम्मीद है कि हिन्दी के पाठक इसका स्वागत जोरदार ढंग से करेंगे.

अरविन्द मोहन

बुद्ध पूर्णिमा,

7 मई, 2020

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