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पुरुषोत्तम अग्रवाल को नामवर सिंह सम्मान से नवाजा गया

सुमन केशरी-

बेगूसराय, बिहार में, विप्लवी पुस्तकालय द्वारा पुरुषोत्तम अग्रवाल को नामवर सिंह सम्मान दिया जा रहा है।

यह सम्मान हमारे लिए यानी कि सम्मान पाने वाले पुरुषोत्तम और मेरे लिए बहुत महत्त्व की बात है, क्योंकि नामवर सिंह न केवल हमारे गुरु रहे, बल्कि हिंदी आलोचना व संपूर्ण भारतीय साहित्य, विशेषकर हिंदी साहित्य में उनके योगदान को नकारना असंभव है। उन्होंने साहित्य व संस्कृति को पढ़ने समझने की दृष्टि दी। वे सही मायनों में गुरु हैं। उनके नाम से जुड़ना हमारे लिए गौरव की बात है। उन्हें प्रणाम!

यह सम्मान पुरुषोत्तम को दिया जाना भी बेहद महत्त्वपूर्ण है और वे इसके सर्वथा योग्य हैं। इसलिए नहीं कि वे मेरे हमसफ़र व मित्र हैं, बल्कि इसलिए कि पुरुषोत्तम बहुत निष्ठावान जिज्ञासु व विद्वान हैं। वे बहुत ईमानदारी से पढ़ते-गुनते और लिखते हैं। साहित्य अकादमी का भाषा सम्मान देते हुए, कवि व अध्यक्ष, साहित्य अकादमी, डॉ. माधव कौशिक ने उन्हें ऋषि कहा था और यह भी कि भाषा सम्मान दरअसल ऋषिऋण चुकाना है। यह सुनते हुए मेरी आँखें शब्दशः भर आई थीं। अगर पीठ पीछे से तस्वीर ले पाने का कोई तकनीकी उपाय हासिल होता तो फोटोग्राफ़र प्रेरणा जैन ने मेरी उन पनीली कृतज्ञ आँखों की तस्वीर उतार ली होती! माधव जी, भारतीय परंपरा व संस्कृति में रचे-बसे विद्वान हैं, उन्होंने बहुत विचारपूर्वक इन शब्दों – ऋषि व ऋषिऋण का प्रयोग किया था। उन्हें एक बार फिर धन्यवाद!

क्या है पुरुषोत्तम अग्रवाल में, कि उन्हें इस तरह से सम्मानित किया जाना चाहिए।

पुरुषोत्तम अग्रवाल शब्द के सही अर्थों में विद्वान व बहुत प्रभावी वक्ता-लेखक हैं, यह बात उनके घोर से घोर विरोधी भी कहते हैं और जो नहीं कहते, वे भी मन ही मन यह बखूबी जानते हैं। वे जानते हैं कि किसी विषय पर इस व्यक्ति से उलझने का मतलब है, खुद विषय की गहरी जानकारी रखना, क्योंकि जब यह कोई बात कहेगा या लिखेगा, तो मतलब है वह सौ टके सही है। एकदम टकसाली!

वे यह भी जानते हैं कि पुरुषोत्तम ऋषि दत्तात्रेय की तरह हैं और वे विनयपूर्वक कहीं भी किसी के पास भी सीखने के लिए जा सकते हैं।

मैं पिछले 48 वर्षों से पुरुषोत्तम अग्रवाल नामक इस व्यक्ति को बहुत करीब से जानती हूँ, कई बार तो उतना, जितना यह व्यक्ति स्वयं को भी नहीं जानता! यह जानना जितना सुखद है उतना ही कष्टदायी भी। यह अपनी ही आँख को, बिना शीशे के देखने जैसा काम है। दुरूह साधना।

तो चलते हैं पुरुषोत्तम के लेखन व आलोचना कर्म की ओर, जिसके लिए उन्हें इस सम्मान के लिए चुना गया।

सबसे पहली बात तो यह कि किसी भी विषय पर कुछ बोलने या लिखने से पहले पुरुषोत्तम उस विषय पर अधिक से अधिक जानकारी अनेकानेक स्रोतों से बिना किसी पूर्वग्रह के लेने की कोशिश करते हैं। रामानंद व कबीर के संबंध पर लिखने से पहले उन्होंने कई लोगों से बात की, कई पुस्तकालय खंगाल डाले। अगस्त्य पुराण के कई पाठ हासिल किए। यहाँ तक कि बांग्ला में लिखे पुराण की हस्तलिखित कॉपी करवाई। इनके कई मित्रों व विद्यार्थियों ने सामग्री उपलब्ध करवाने में इनकी मदद की। जब सब पढ़-गुन लिया तो सकल प्रमाण सहित इन्होंने अपना निबंध लिखा, जिसे पढ़कर भक्ति व सूर विशेषज्ञ प्रो. जॉन स्ट्राटन हॉली ने कहा कि ‘जब तक कोई नया शोध सामने नहीं आता, रामानंद-कबीर संबंधों पर पुरुषोत्तम द्वारा कहा गया निर्विवाद रूप से सही है!’

एक शोधकर्ता के रूप में पुरुषोत्तम का काम अत्यंत सराहनीय है। यह बात मैंने आध्यात्म व काव्य के संबंध वाले निबंध से लेकर गांधी नेहरू, देशज आधुनिकता, स्वतंत्रता आंदोलन, इस देश को समझने के लिए भारतीय भाषाओं के साहित्य आदि को गहराई से पढ़ना-बूझना आवश्यक है वाले तमाम निबंधों व भाषणों में देखे। वे कई सालों से हिंदू धर्म व महाभारत पर किताब लिखने की कोशिश में हैं, दर्जनों कॉपियों में नोट्स ले लिए गए हैं, आदि-आदि। मैं भी जब तब उन्हें न केवल याद दिलाती हूँ बल्कि डांटती भी हूँ कि लिख डालो वरना साथ ही चला जाएगा सोचा-विचारा। पर वे अभी तक अपने तर्कों से पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।

एक विद्वान को निरंतर अपनी शोध सामग्री, विचार प्रक्रिया व तर्कों को जांचते, शोधित-संशोधित करते रहना होता है, यह मैंने इस व्यक्ति के साहचर्य में सीखा। ये “प्रदत्त” को बिना परखे, स्वीकार ही नहीं पाते और इसीलिए इन्हें लिखने में बहुत समय लगता है। उसके साथ यह भी कि यह संशोधन करते रहते हैं। जड़ की तरह एक जगह जम नहीं जाते। जब अभय दुबे यह कहते हैं कि पुरुषोत्तम अपने समय से बहुत आगे का काम करते हैं, तो मन गर्वित भी होता है और किंचित आशंकित भी। यह बात उन्होंने विचार का अनंत व संस्कृति, वर्चस्व व प्रतिरोध में दिए विचारबिंदुओं के संदर्भ में कही थी। अब पूछिए आशंकित क्यों? तो इसलिए कि अब महाभारत और हिंदुइज़्म वाली किताब आने में और वक्त लग जाएगा। ये जनाब और जाने क्या-क्या पढ़ते रहेंगे, जाने किन-किन इमारतों के स्थापत्य में क्या-क्या तो देखते रहेंगे।

आसपास गुजरने वालों की बातों को सुनते हुए मेरी कही बातों को सुन ही नहीं पाएँगे। हर गांव में घुसते हुए ग्राम-देवताओं, उनकी पूजन विधि की जानकारियाँ लेते हुए क्या क्या तो नोट करते रहेंगे और प्रह्लादसिंह टिपाणिया के गाए कबीर भजन- मंगता बन कर मांगन लागा देने वाला तू का तू- सुनते हुए आंसुओं में डूब जाएँगे।

यानी पुरुषोत्तम अपने वैचारिक निष्कर्षों तक विभिन्न स्रोतों से प्राप्त तथ्यों व तर्कों के आधार पर पहुँचते हैं, केवल इल्हाम अथवा सुनी सुनाई बातों के आधार पर नहीं। वे एक वैज्ञानिक की तरह, भांति-भांति के प्रयोग करते हुए और कभी कभी बिल्कुल विपरीत ध्रुवों से एक बात पर सोचते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। और इसीलिए इतनी निडरता और बेबाकी से अपनी बात रख पाते हैं। वे आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी की इस बात को मानते हुए कहते हैं कि सत्य के लिए किसी से न डरना न गुरु से न मंत्र से न लोक से न वेद से…

पर एक डर वे सदा बनाए रखते हैं कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज को कभी न मारें। वही सच्ची मार्गदर्शक है।

कविता पढ़ने या इतिहास के अनुसंधान के वक्त उनके निकष केवल प्राचीन काव्य शास्त्र या पश्चिमी सौन्दर्य चिंतन, आर्कियोलॉजी, साहित्य अथवा दर्शन आदि से नहीं आते। वे मार्क्सवादी पद्धति को मानते हुए कविता-साहित्य या किसी भी रचना अथवा घटना के बारे में जानने के लिए तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक आर्थिक व सांस्कृतिक स्थितियों, सोचों पर निगाह रखते हुए रचना अथवा घटना या व्यक्ति की स्वायत्तता पर भी पूरी निगाह रखते हैं। और इन सबके बीच के संबंधों पर भी विचार करते हुए अपनी बात कहते हैं।

इतिहास व देशकाल के बाहर कोई चीज नहीं होती, किंतु सभी सभ्यताओं की एक सुदीर्घ परंपरा है, जो बहुत कुछ दूसरी सभ्यताओं से आदान-प्रदान व संश्लेषण-विश्लेषण से बनी है। ऐसे मामलों में वे आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि कोई भी परंपरा शुद्ध नहीं होती.. हमारे सामने समाज का आज जो रूप है, वह जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है. देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बात की बात है. सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है. शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा….’

ग्रहण और त्याग इस बात पर पुरुषोत्तम का बहुत बल है।

पुरुषोत्तम के लिए प्रेम का अर्थ है, समाज व व्यक्ति के हित में सोचते हुए काम करना। इसीलिए वे कबीर के प्रेम के प्रशंसक हैं। उनका प्रेम संसार से विमुख, अपने में सिमटा हुआ, स्वार्थी प्रेम नहीं है, खुला व उदार प्रेम है। उनके लिए कवि के श्रेष्ठ होने का एक निकष यह भी है कि उसने मृत्यु व प्रेम पर क्या और कैसा लिखा!

पुरुषोत्तम की अपनी परिकल्पना रैनेसा इंटेलेक्चुअल बनने की है। इसी कारण वे साहित्य, इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति, दर्शन, विज्ञान, ज्योतिष से लेकर सिनेमा, नाटक और सेशल-पॉलिटिकल एक्टिविज़म, सबमें रुचि लेते हैं, बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। वे सच्चे अर्थ में इंटरडिसिप्लीनरी विद्वान हैं। पर अगर कोई उनसे किसी ऐसी बात पर टिप्पणी करने को कहे, जिसकी गहरी जानकारी उनके पास न हो तो वे विनयपूर्वक मना कर देंगे।उनको किसी ने खेल, विज्ञान और अर्थशास्त्र पर टिप्पणी करते न सुना होगा। अगर कोई बात कही भी होगी तो किसी घटना के समाज या देश पर पड़े प्रभाव को लेकर।

जो बात उन्हें एक बेहतरीन चिंतक बनाती है, वह है उनकी बार बार कही-

स्मृति एक नैतिक जिम्मेदारी है..क्या याद करें, किसे भूल जाएँ, इस पर गहराई से विचार करना चाहिए, तभी कोई समाज समरसता की ओर बढ़ सकता है, विद्वेष व घृणा से, सतत क्रोध से मुक्त हो सकता है।

स्मृति-संपन्न होना मनुष्य की सबसे बड़ी नेमत है, इसीलिए किसी भी व्यक्ति को, समाज को बार-बार सोचना चाहिए कि वह क्या याद रखे, कैसे याद रखे और क्यों याद रखे…सार्वभौम नैतिकता का यह मापदंड युक्लिड की सरल रेखा की परिभाषा की तरह है, जिसे पाने का सतत प्रयास करना चाहिए।

हमारे पुरुषोत्तम यही तो करते हैं।

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