पूर्वोत्तर यात्रा-5 : बिहु और झूमर का नशा

आज गुवाहाटी से काजीरंगा नेशनल पार्क के लिए रवाना होना था। सुबह 7 बजे सारे पत्रकार साथी तैयार हो चुके थे। राजभवन से नाश्ता कर प्रस्थान करना था। हम दो दिनों से असम के राजभवन में रुके थे पर अब तक राज्यपाल पद्मनाभन आचार्य जी से हमारी मुलाकात नहीं हो पाई थी। दरअसल आचार्य जी के पास असम के साथ साथ नागालैंड के राज्यपाल का भी प्रभार है। इन दिनों वे नागालैंड की राजधानी कोहिमा स्थित राजभवन में थे। वहाँ उनसे हमारी मुलाकात होने वाली थी। सुबह 7 बजे हम 4 घंटे की यात्रा पर काजीरंगा के लिए रवाना हुए। बस आगे बढ़ी तो समय बिताने के लिए फिर से गीत संगीत की महफ़िल जमी।

सिद्धू जी ने जमकर ठुमके लगाये तो और साथियों ने भी उनका साथ दिया। काजीरंगा के बाहर स्थित डीआरडीओ के गेस्ट हाउस में हमारे रहने के व्यवस्था की गई थी। दोपहर 2.30 बजे हम गेस्ट हाउस पहुच गए। स्थानीय अधिकारी इमरान ने बताया की आप लोग जल्द चाय पी कर तैयार हो जाये। क्योंकि जीप से जंगल सफारी के लिए चलना है। काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान मध्‍य असम में 430 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला है। इस उद्यान में भारतीय एक सींग वाले गैंडे (राइनोसेरोस, यूनीकोर्निस) का निवास है। काजीरंगा को वर्ष 1905 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। सर्दियों में यहाँ साइबेरिया से कई मेहमान पक्षी भी आते हैं, हालाँकि इस दलदली भूमि का धीरे-धीरे ख़त्म होते जाना एक गंभीर समस्या है। काजीरंगा में विभिन्न प्रजातियों के बाज, विभिन्न प्रजातियों की चीलें और तोते आदि भी पाये जाते हैं।

शाम करीब 4 बजे हम खुली जीप में सवार हो कर जंगल भ्रमण के लिए निकले। सौभाग्य से चार गैंडो के दर्शन हुए पर मन में एक कशक बाकी रही की करीब से उनके दीदार नहीं हुए। पर सुबह हाथी पर सवार होकर एलिफेंट सफारी के लिए एक बार फिर जंगल जाना था। इस लिए अभी एक उम्मीद बंधी थी कि सुबह समीप से गैंडो को देखने का मौका मिलेगा। जंगल से निकलते निकलते अँधेरा छाने लगा था। इस बीच बने काका और दीपक जी ने अपने कैमरों से खुब तस्वीरें खिंची। उन तस्वीरों में हम थे और वन्यजीव भी।

हम गेस्ट हाउस पहुच चुके थे। बताया गया की सामने ही सांस्कृतिक प्रोग्राम का भी आयोजन है। यहाँ पर पर्यटको के मनोरंजन के लिए असम के पारंपरिक लोकनृत्य पेश किये जाते हैं। मुझे असम का लोकनृत्य बिहु बेहद पसंद है। उसके शब्द समझ नहीं आते पर इस लोकनृत्य  का संगीत और कलाकारों की भावभंगिमा खुब भाति है। जब से असम यात्रा की योजना बनी थी।  बिहु देखने की तमन्ना थी। पहली बार बिहु मुंबई विश्वविद्यालय में नेहरू युवा केंद्र की तरफ से आयोजित युवा महोत्सव के दौरान देखा था। तभी से इस लोकनृत्य का कायल हो चुका था। अब तक हम सब के मित्र बन चुके असम के श्रम सचिव नितिन खाडे जी जब इस इलाके के जिलाधिकारी थे, उस दौरान उन्होंने काजीरंगा आने वाले पर्यटकों के मनोरंजन और स्थानीय कलाकारों की आर्थिक मदद के लिए यह सांस्कृतिक आयोजन शुरू किया था।

रात 8 बजे से सांस्कृतिक आयोजन शुरू हुआ। मैं तो बिहु देखने आया था पर शुरुआत असम के एक और लोकनृत्य झूमर से हुआ। इसमें चार पुरुष कलाकार ढोल, तास और बाँसुरी बजाते है जबकि 10 महिला कलाकार एक दूसरे के बाहों में बाह डालकर नाचती हैं। झूमर देखा तो बिहु भूल गया। क्योंकि झूमर तो बिहु से ज्यादा खूबसूरत लोकनृत्य लगा। झूमर के बाद बिहु भी देखने को मिला पर अब मैं झूमर नृत्य का प्रशंसक बन चुका था। इस बीच मंच से मुंबई से आये पत्रकारों का स्वागत भी किया गया। नृत्य मंडली के सबसे वरिष्ठ कलाकार ने हमें मंच पर आकर साथ में नाचने का निवेदन किया। इसके बाद तो साथी पत्रकारो ने मंच पर धमाल मचा दिया। ओपी जी ने ढोल और दीपक जी ने झांझ संभाल लिया। सिद्धू, मुर्तज़ा, विवेक बाबू जमकर नाचे। 2 घंटे कब बीत गए, पता नहीं चला। हमने इस लोकनृत्य के वीडियो बनाये।

पूर्वोत्तर से लौटने के बाद लगभग हर दिन मैं मोबाइल पर झूमर डांस की वह वीडियो रिकार्डिंग देखता हु। आयोजको ने हमसे टिकट के पैसे नहीं लिए थे। पर हमने अपनी तरफ से कलाकारों को 2 हजार रुपये बतौर पुरस्कार दिए और उन्हें अलविदा कहा। अगली सुबह एलिफेंट सफारी के लिए हमें गेस्ट हाउस से 30 किलोमीटर दूर जंगल के दूसरे छोर पर जाना था। टीम लीडर किरण तारे जी ने चेता दिया था, जो समय से बस में सवार नहीं हुआ वह एलिफेंट सफारी के लिए न जा सकेगा।

लेखक विजय सिंह कौशिक दैनिक भास्कर, मुंबई में प्रमुख संवाददाता हैं. इनसे संपर्क 09821562156 के जरिए किया जा सकता है.

इसके पहले की कथा पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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