रोडवेज बस के कंडक्टर का हरामीपना… देखें वीडियो

Yashwant Singh :  बीते साल बाइस दिसंबर को आगरा एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए जा रहा था. नोएडा में सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन के पास स्थित रोडवेस बस अड्डे पर बड़ौत डिपो की एक बस पर बैठ गया. यह बस वाया यमुना एक्सप्रेसवे ले जाने वाली थी. बस चल दी और परी चौक से ठीक पहले खराब भी हो गई.

पूरी भरी हुई बस के यात्रियों को नीचे उतार कर कंडक्टर दूसरी बसों को रोक कर बिठाने लगा. एक तो बसें रुकती ही नहीं थीं, दूसरे हम जैसे कई लोग ऐसे थे जो बस की बजाय अब साझे में ओला करके आगरा जाना चाहते थे. सो हम लोगों ने रिफंड मांगना शुरू किया. कंडक्टर रिफंड के नाम पर भड़क जाए और पीछे से आ रही रोडवेज की दूसरी बसों में बैठ जाने की नसीहत दे. अपने एक मित्र रोडवेज अधिकारी से कंडक्टर की बात कराई तो कंडक्टर थोड़े औकात में आया और रिफंड कर दिया.

नोएडा बस अड्डे से परी चौक तक का किराया काटा, तीस रुपये. आगरा तक का कुल किराया लिया था- दो सौ साठ रुपये. तीस काटकर दो सौ तीस रुपये वापस लौटाया. पर बाकी जिन-जिन ने रिफंड लिया, सबको साठ रुपये काटकर लौटाया. हम तीन यात्री मिलकर ओला किए और आगरा चल दिए. लेकिन ओला स्टार्ट होने से ठीक पहले देखते हैं कि जो रोडवेस बस खराब थी, वह चल गई और उसे लेकर ड्राइवर कंडक्टर बैक टू पैवेलियन यानि नोएडा बस अड्डे चले गए. सवाल कई हैं–

-बस खराब थी तो चल कैसे गई… अगर चल सकती थी तो सभी को कम से कम आगे परी चौक तक ले जाना चाहिए था जिससे वहां से सबको कोई न कोई साधन आराम से मिल जाता.

-नोएडा बस अड्डे से परी चौक का किराया तीस रुपये था तो बाकी यात्रियों को रिफंड करने के दौरान साठ साठ रुपये क्यों किराया लिया…

-दर्जनों यात्रियों को जिसमें महिलाएं बच्चे बुजुर्ग तक थे, सड़क पर यूं छोड़ देना और उनके साथ बुरा व्यवहार करना, रिफंड न करना.. यह कहां का शिष्टाचार है…

उम्मीद है यूपी शासन से जुड़े लोग इस पर एक्शन लेंगे. रोडवेज बस और उसके बदमाश कंडक्टर की फोटो शेयर कर रहा हूं. साथ ही एक वीडियो का लिंक भी दे रहा हूं जिसे बस खराबी से लेकर ओला वाली कार पर सवार होकर आगरा जाने के दौरान तैयार किया था. बस खराब होने से हम जो तीन अपरिचित लोग एकजुट हुए, उनमें से एक Guru Sharan भाई तो अपने एफबी मित्र भी बन चुके हैं, दूसरा भाई स्टूडेंट था, उसका नाम याद नहीं आ रहा, हालांकि वह भी एफबी लिस्ट में मेरे कनेक्ट है… हम तीनों ने मिलकर ओला किया, फिर मैंने पूरे घटनाक्रम पर एक बातचीत रिकार्ड की. इस वार्ता में रोडवेज बस के कंडक्टर के हरामीपने की चर्चा है.

वीडियो लिंक ये है… https://youtu.be/_5jaC6VlPx4

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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गंगोत्री और केदारनाथ की यात्रा : एक संस्मरण

रासबिहारी पाण्डेय

बहुत दिनों से उत्तराखंड भ्रमण की इच्छा थी। वैसे तो उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है। यहाँ बहुतेरे तीर्थस्थल और ऐतिहासिक महत्त्व के दर्शनीय स्थल हैं लेकिन उन सबमें यमुनोत्री, गंगोत्री,  केदारनाथ और बदरीनाथ प्रमुख हैं। अक्सर ये यात्राएं लोग समूह में करते हैं, बसों से या छोटी गाड़ियाँ रिजर्व करके। ये बस और छोटी गाड़ियों वाले ड्राइवर यात्रियों को एक निश्चित समय देते हैं जिसके भीतर यात्रियों को लौटकर एक निश्चित स्थान पर आना होता है। मेरे एक मित्र ने बताया कि निश्चित समय होने की वजह से कभी कभी कई लोग बिना दर्शन लाभ लिए बीच रास्ते से ही लौटकर उक्त स्थान पर चले आते हैं ताकि अगली यात्रा के लिए प्रस्थान कर सकें।

इन यात्राओं में केदारनाथ धाम की यात्रा जरा मुश्किल है, संभवतः यहीं के लिए समय कम पड़ता होगा। समूह में यात्रा करने में सैलानीपन का भाव बाधित होता है, इसलिए मैंने निर्णय किया कि मैं अकेले इस यात्रा पर निकलूँगा। मैंने आठ दिन का समय निश्चित किया कि जितना संभव हुआ, घूमकर लौटूँगा। मैंने 6 जून की रात एक बजे  मुंबई के उपनगर वसई से गुजरनेवाली गाड़ी संख्या 19019 देहरादून एक्सप्रेस का रिजर्वेसन करा लिया।

अंग्रेजी तारीख के अनुसार7 जून को चलकर 8 जून को शाम 4 बजे हरिद्वार पहुँचा। यहाँ से मुझे जगजीतपुर स्थित गंगा बचाओ अभियान के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले संत स्वामी शिवानंद जी के आश्रम मातृसदन में पहुँचना था। गंगोत्री से गंगा सागर तक की यात्रा करनेवाले कवि निलय उपाध्याय यहाँ काफी समय रह चुके हैं, उनके ही निर्देशानुसार मैं यहाँ जा रहा था। हरिद्वार रेलवे स्टेशन से शंकर आश्रम और फिर वहाँ से जगजीतपुर के लिए तीन पहिए वाले वाहन चलते रहते हैं। जगजीतपुर बस अड्डे के पास उतरकर थोड़ा पैदल चलकर यहाँ पहुँचना हुआ।

आश्रम के बगल से गंगा की निर्मल धारा बह रही थीं। बड़ा ही मनोहारी वातावरण था। मातृसदन पहुँचकर मैं स्वामी शिवानंद जी के शिष्य स्वामी पूर्णानंद जी से मिला। थोड़ी देर बाद स्वामी शिवानंद जी से भी मुलाकात हुई। मैंने उन्हें अपने द्वारा किया भगवद्गीता का दोहानुवाद भेंट किया। वे काफी प्रसन्न हुए। कई एकड़ में फैले मातृ सदन में सैकड़ो पेड़ लगे हैं। आम, नासपाती, कटहल, लीची, नींबू…..देखते जाइए और पेड़ों की शीतल छाँव का आनंद लेते जाइए…… आश्रम का वातावरण अद्भुत लगा।

गंगा जी के शीतल जल में स्नान करके यात्रा से संतप्त शरीर को बहुत राहत मिली। शाम को हर की पौड़ी के लिए निकला। दक्ष आश्रम से थोड़ा आगे बढ़ा ही था कि रास्ते में  टी.एन.दुबे जी से मुलाकात हो गई। दुबे जी मुंबई में नैसर्गिक विकलांग सेवा संघ नाम की एक संस्था चलाते हैं। वे कुछ विकलांग मित्रों को लेकर बद्रीनाथ के दर्शन के लिए निकले थे। अप्रत्याशित रूप से उनसे मिलकर बड़ा आनंद आया। उनके साथ देर तक बातें होती रहीं, फिर चाट और चाय का आनंद उठाया गया। मुझे याद आया कि हर की पौड़ी पर गंगा आरती में शामिल होना है, इसलिए उनसे आज्ञा लेकर हर की पौड़ी के लिए प्रस्थान किया लेकिन वहाँ पहुँचने तक आरती का समय निकल चुका था। संभवतःसात बजे दस मिनट के लिए आरती का आयोजन होता है।

वैसे मैं वाराणसी में गंगा आरती देख चुका हूँ…इसलिए हर के पौड़ी के उस स्वरूप की कल्पना करके माँ गंगा को नमन करते हुए देर तक घाटों पर भ्रमण करता रहा। यहाँ गंगा की दो धाराएं निकालकर बीच में बहुत बड़ा स्पेस रखा गया है, जहाँ यात्रियों का हुजूम उमड़ा रहता है। यहाँ की चहल पहल और यात्रियों का उत्साह देखते ही बनता है। करीब एक घंटे यहाँ घूमता रहा और मोबाइल से कुछ तस्वीरें लेकर फेसबुक पर पोस्ट किया। फिर मातृ सदन की ओर चल पड़ा। साधु संतों के साथ पंगत में भोजन करके बिस्तर पर लेटा तो यात्रा में थका शरीर सुबह छह बजे के आसपास चेतनावस्था में आया। नित्यक्रिया के पश्चात आश्रम के संतों से बात करने पर पता चला कि गंगोत्री और बद्रीनाथ के लिए डायरेक्ट बसें हैं लेकिन वे सुबह छह बजे ही चली जाती हैं क्योंकि वहाँ पहुँचने में पूरा दिन निकल जाता है और रात में पहाड़ी रास्तों पर बसें नहीं चला करतीं। हरि इच्छा भावी बलवाना…..मुझे हरिद्वार घूमने के लिए एक और दिन मिला। दोपहर के भोजन के पश्चात बस अड्डे की ओर निकल पड़ा। हरिद्वार में गंगा की चार पाँच धाराएँ देखने को मिलीं, पता चला कि सिंचाई के लिए ये धाराएँ निकाली गई हैं। 

मैंने यात्रा से संबंधित जानकारियाँ लेनी शुरू की तो पता चला कि चारों धाम की यात्रा में अमूमन 9 दिन का समय लगता है जिसका यात्रियों से पैकेज डील होता है। यह पैकेज तीन हजार से बीस हजार तक का है जिसमें अलग अलग तरह की सुविधाएं हैं। ऋषिकेश में साफ सुथरी ब्यवस्था है, यहाँ से थोड़ा घालमेल भी है।   उत्तराखंड सरकार की बसें हरिद्वार से गंगोत्री और बद्रीनाथ तक तो जाती हैं लेकिन केदारनाथ और यमुनोत्री के लिए कई टुकड़ों में यात्रा करनी पड़ती है। मैंने निर्णय किया कि कल सुबह की बस से पहले गंगोत्री जाऊँगा फिर आगे देखा जाएगा। यहाँ से मैंने बाबा रामदेव के पतंजलि योगपीठ जाने का निश्चय किया। यह स्थान हरिद्वार से 25 किलोमीटर दूर रुड़की जाने के रास्ते में साहिबाबाद के पास है। बस का किराया 20 रुपये है।

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Cheating and harassment by travel agent in delhi

Dear Sir,

My name is Charanjeet Singh resident of New Delhi. I had applied for Canada Permanent Residency from Aptech Global Immigration Services Pvt Ltd. In New Delhi on 9th May 2016. Aptech Global Immigration Services Pvt Ltd. Address (408, 4th Floor, Westend Mall, Janakpuri West, New Delhi-110058).

Mr. Aman mobile number: 7503832132
Landline: 011-46254693

Aptech Global Marketing executive Miss Palak told me that you need to get necessary technical evaluation else your case can get rejected, so we need to evaluate your case before accepting it. Trusting her words, I Paid Indian Rupees 1145/- as Technical Evaluation Fees to Aptech Global Immigration services Pvt Ltd, New Delhi for Canada P.R.

Paid Indian Rupees 68000/- for case fee for Canada P.R. to start the process. On the very first day, before joining Aptech Global for my Canada Immigration, I informed their sales executive Miss Palak that I had already appeared for IELTS on 20th February 2016 and I got overall band score of 6.5

I clearly informed their marketing executive that I cannot get anything more than 6.5 overall band score, as I attempted IELTS several times before getting band score of 6.5 on 20th February 2016, now that was my last attempt. On this Miss Palak agreed to accept my case and she said that your IELTS score is okey and you can apply. She immediately asked me to deposit Rupees 68,000/- as cash. I did the same based on their words.

Next, Miss Ekashi met me as coordinator in Aptech and she informed that I will handle your case from now onwards since Miss Palak was from our marketing team.

Since 20th January 2016, I am chasing Aptech Global to refund back my money. I met Miss Monika, supervisor in their office, She informed me that your case cannot be accepted and you need to get extra score for IELTS.I asked them that you can say the same thing to me when I paid extra money for technical evaluation which confirms that you can apply for canada and submitted rupees 68000/- as cash to Mr. Aman(Operation Head of Aptech Global). They did not inform me of any such thing while first meeting and even after evaluation.

I also asked them that before 2-3 years there was no process of special technical evaluation, Miss Palak said that this is to ensure your case should have 100% chance of acceptance. Now they are saying that your case cannot be accepted as your ielts score is less, they why they took evaluation. I have receipt for evaluation as well.

I still believed her words and paid for service of Rs. 1145/- to confirm my case and remove any doubt in future of any kind of rejection of my case. Last update from Aptech Global on my case was on 23rd July 2016 from Miss Ekashi. Later it was transferred to Miss Daljeet. Miss Daljeet sent me an email on 27th July confirming she will handle my case, now onwards.

Since 137 days, I did not get any revert from Aptech Global Immigration. It was on 14th December 2017, I personally visited Aptech Global Immigration and told Miss Monika (supervisor) about their poorest services and same was informed to Mr. Aman(Operation head) as well.

On 10th February 2017, I email Aptech Global to refund my money back. Below mentioned is their revert to my email.

Charanjeet Singh
emailcharanjeetsingh@gmail.com

On Friday, February 10, 2017 11:04 AM, Legal – Aptech Global Group <legal@aptechvisa.com> wrote:

Hi Charanjeet Singh,,

As I received mail from your end regarding Voluntary Withdrawal or back out of your process because Now you are not interested in migration  due to IELTS part. As you are unable to provide IELTS documents  or not able to score require bands in IELTS. so that you want refund.

And after discussion with admin team and analysis of your case, and agreement. I came to know  as per agreement clause number  32. (e)  in Voluntary Withdrawal situation, company is not liable any refund  in this case. We would like to advice you continue you services. If Not then you will get Legal notice shortly.

Best Regards
Legal Team
Aptech Global immigration services Pvt Ltd.

Add:- 706,707 8th Floor westend mall Janakpuri
West New Delhi 110058
Email- legal@aptechvisa.com

Aptech Global is now blackmailing me by getting my sign on government agreement and threatening me by showing the clauses. On the clause its written that “I also aware of the required IELTS bands as per review report and it is time to provide report card as well”

They did not done follow up on my case and did cheating with me on the very first day informing me that my designation is in their list and you can easily get Canada Visa. I am getting harassed everyday due to their pathetic service and false promises.

Just to achieve their sales target , Miss Palak trapped me in her words and showed me dreams of reaching Canada.

I can keep quite like other victims of Aptech Global. Being a vigilant citizen, I am raising my voice against cheating and harassment.

They are continuously threatening me that if you want refund you can talk to our high court lawyer sitting in our legal office in a chamber in high court.

I request you to get my refund back of rupees 69,145/- and help me in shutting down this cheating immigration agent from India so that they cannot do cheating and threat other innocent customers.

They also told me that if you pay in cash you 68000/- we will charge you less. That time I did not understand. Later I realized they want to avoid paying tax to the government.

Kindly audit their bank account and statements as well. I belong to a poor family and I am jobless since one year. I am going through mental torture because of their cheating act. I do have the receipts of payment and will be presented to you if required.

Thanking you.

With gratitude

Charanjeet Singh
9560728263

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कनफर्म रेल टिकट अब परिजनों को कर सकते हैं ट्रांसफर

This is regarding transfer of confirmed rail ticket. Very good initiative by Railway Minister Suresh Prabhu.

 1. A confirmed railway ticket can be transferred to your blood relations.

2. If a person is holding a confirmed ticket and is unable to travel, then the ticket can be transferred to his / her family members including father, mother, brother, sister, son, daughter, husband or wife.

3. For transfer of ticket, an application must be submitted atleast 24 hours in advance of the scheduled departure of the train to chief reservation supervisor with ID proof.

4. Government officials can transfer to other govt official.

5. Students can transfer ticket to other students.

Share this. It may help someone. For Details access / visit to: –

http:/www.indianrail.gov.in/change_Name.html 

उपरोक्त खबर पर दो वरिष्ठ पत्रकारों की टिप्पणियां यूं हैं :

Sanjaya Kumar Singh यह सुविधा पहले से है। पर स्टेशन जाकर कराना मुश्किल था और साहब मिलें तो हो, वरना चक्कर लगाते रहिए। ये देखिए 2 अप्रैल 2011 की खबर। वैसे इससे भी पहले है। तब भी कोई आपकी तरह गच्चा खा गया होगा। सच कहिए तो ये सरकार नई बोतल में पुरानी शराब वाली है। देखें टाइम्स आफ इंडिया की ये पुरानी खबर : TOI NEWS

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Vishnu Rajgadia कनफर्म टिकट अपने परिजन को ट्रांसफर करने का नियम 1990 से है। मोदी सरकार बनने के बाद अज्ञानी लोगों को यह कहकर बहलाया जा रहा है कि यह मोदी सरकार ने लागू किया। वैसे भी अभी बजट में इस सुविधा को कोई विस्तार नहीं दिया गया है, इसके दुरूपयोग के एक बिन्दु पर उचित रोक लगी है। एक मामले में किसी ने रियायती टिकट लेकर बाद में ऐसे परिजन को ट्रांसफर कर दी, जो उस रियायत के योग्य नहीं था। लिहाजा, ऐसे दुरूपयोग को रोकने का उपाय अभी निकाला गया है। 3 मार्च 2002 का सर्कुलर है रेलवे का जिसमे ये सारे प्रावधान हैं। इसमें दुरूपयोग के कारण 2011 में हिदायत दी गई। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की न्यूज़ देखिए : TOI NEWS

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नैनीताल बुला रहा आपको, 25 से 31 दिसंबर तक विंटर कार्निवाल में स्वागत है…

नैनीताल : अगर आप मैदानी इलाकों के कोहरे और ठिठुरन भरी ठंड से निजात पाना चाहते हैं तो सरोवर नगरी नैनीताल का रुख कर सकते हैं। अगर आप चाहें नैनीताल में दिसंबर के आखिरी हफ्ते में चुंबन भरी ठंड के बीच गुनगुनी घूप के साथ तमाम सांस्कृतिक, खेलकूद और साहसिक गतिविधियों का भी लुत्फ़ उठा सकते हैं। यहाँ आने वाली 25 से 31 दिसम्बर तक भव्य एवं आकर्षक “नैनीताल विंटर कार्निवाल” का आयोजन होने जा रहा है। नैनीताल विंटर कार्निवाल में सैलानियों की रुचियों के मद्देनजर विभिन्न किस्म के कार्यक्रम निर्धारित किए गए हैं। इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटकों के अलावा माउन्टेन, बाइकिंग, फैन्सी ड्रेस, मैराथन, ट्रैकिंग, ग्राफिक पेटिंग, फोटोग्राफी, फूड फैस्टिबल, थियेटर प्ले, लघु फिल्म, बच्चो की पेंटिंग, फिसिंग, पतंग, बेबी शो, फैन्सी ड्रेस आदि तमाम प्रतियोगिताएं शामिल हैं।

नैनीताल विंटर कार्निवाल का आयोजन जिलाधिकारी दीपक रावत की पहल पर प्रशासन कर रहा है। इसमें सामाजिक ,सांस्कृतिक और खेलकूद से जुडी अनेक संस्थाएं सहयोग कर रही हैं। जिलाधिकारी दीपक रावत के मुताबिक 25 दिसंबर को विंटर कार्निवाल की शुरुआत  भव्य व आकार्षिक झांकी के साथ होगा।  जिसमें उत्तराखंड के साथ समूचे देश की सांस्कृतिक विरासत दिखाई देगी। झांकी में रंग -बिरंगी सांस्कृतिक झांकियां, उत्तराखण्ड के मशहूर छोलिया एवं पाण्डव नृत्य, होली, बग्वाल, हिलजात्रा, नन्दादेवी, नन्दा राजजात के साथ ही स्कूली बच्चे पारंपरिक पोशाकों में नजर आएंगे। पीएसीऔर  आर्मी बैण्ड भी झांकी में शामिल होगें।

जिलाधिकारी के मुताबिक विंटर कार्निवाल में पहली रोज शाम को  6 बजे नैनी झील में दीपदान होगा। इसके बाद मुख्य मंच पर नुपुर पंत, गौरव पाण्डे, माया उपध्याय के गायन और उत्तराखण्ड स्टार नाईट का आयोजन किया जायेगा। 26 दिसम्बर को प्रातः 10 बजे से 02 बजे तक डांस प्रतियोगिता, सुरेश कुशवाह एण्ड पार्टी, उत्तर मध्य सांस्कृतिक कला केन्द्र की प्रस्तुति के साथ ही खुशी जोशी व गोविन्द दिगारी का गायन, दीपा नगरकोटी की प्रस्तुति के बाद शाम  6 बजे से इण्डो-फ्यूजन बैण्ड व उत्तराखण्ड स्टार नाईट में प्रीतम भरतवाण का गायन होगा। 27 दिसम्बर को सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे विभिन्न सांस्कृतिक दलों के कार्यक्रमों के आयोजन के साथ ही शाम 5 बजे से 6 हास्य  कलाकारों की प्रस्तुति और  मैगा स्टार नाईट में पलक मुच्छल का गायन होगा। जिलाधिकारी  दीपक रावतके मुताबिक विंटर  कार्निवाल के दौरान  नैनीताल को बिजली की मालाओं  से सजाया जायेगा। सैलानी अपनी सुविधानुसार दिन में और शाम को भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों  का लुत्फ़ उठा सकेंगे। कार्यक्रम के दौरान यॉट एवं नाव रेस प्रतियोगिताएं होंगी। फोटोग्राफी प्रतियोगिता भी आयोजित की जायेगी।

प्रयाग पाण्डे
नैनीताल

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श्रीलंका से लौटे पत्रकार दयानंद पांडेय का एक अदभुत यात्रा वृत्तांत पढ़िए

दीप्तमान द्वीप में सागर से रोमांस

आज पंद्रह दिन हो गया है श्रीलंका से लौटे हुए लेकिन कोलंबो में सागर की लहरों का सुना हुआ शोर अभी भी मन में शेष है । थमा नहीं है । यह शोर है कि जाता ही नहीं । कान और मन जैसे अभी भी उस शोर में डूबे हुए हैं । उन दूधिया लहरों की उफान भरी उछाल भी लहरों के शोर के साथ आंखों में बसी हुई है । लहरों का चट्टानों से टकराना जैसे मेरे मन से ही टकराना था । दिल से टकराना था । लहरों का यह शोर मेरे मन का ही शोर था । मेरे दिल का शोर था । यह शोर अब संगीत में तब्दील है शायद इसी लिए अभी भी मन में तारी है । स्मृतियों में तैरता हुआ । तो क्या यह वही शोर है , वही दर्प है जो राम को समुद्र पर सेतु बनाने से रोक रहा था ? जिस पर राम  क्रोधित हो गए थे ? तुलसी दास को लिखना पड़ा था :

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥

खैर , श्रीलंका में सागर की लहरों का शोर , वनस्पतियों का वैभव , वहां की हरियाली का मन में बस जाना और वहां के लोगों की आत्मीयता का सरोवर जैसे सर्वदा के लिए मन में स्थिर हो गया है । सर्वदा-सर्वदा के लिए बस गया है । यह सरोवर अब किसी सूरत सूखने वाला नहीं है । नहीं सूखने वाली हैं वहां की मधुर स्मृतियां । वहां की संस्कृति , खुलापन और टटकापन । वहां के राजनेताओं की सादगी भी कैसे भूल सकता हूं । कभी पढ़ा था कि श्रीलंका हिंद महासागर का मोती है । श्रीलंका जा कर पता चला कि सचमुच वह मोती ही है । अनमोल मोती । कभी सीलोन , फिर लंका और अब श्रीलंका । बीते पांच दशक में इस देश का नाम तीन बार बदल चुका है । बचपन में हम फ़िल्मी गाने सुनते ही थे रेडियो सीलोन से । अब हम उसी सीलोन जा रहे थे जिसे अब श्रीलंका कहते हैं । श्रीलंका का संस्कृत में अर्थ है दीप्तमान द्वीप । तो इस दीप्तमान द्वीप से ख़ुशनुमा यादों की बारात ले कर लौटा हूं । इसी दीप्तमान द्वीप में सागर से गहरा रोमांस कर के लौटा हूं ।

सागर से रोमांस? कृपया मुझे कहने दीजिए कि दुनिया में रोमांस से ज़्यादा रहस्यमय कुछ भी नहीं।

24 अक्टूबर की रात जब मैं भंडारनायके एयरपोर्ट पर उतरा तो वहां की धरती बरसात से भीगी हुई थी । लगा जैसे बरसात अभी-अभी विदा हुई हो । बरसात को हमारे भारत में शुभ ही माना जाता है । मैं भी मानता हूं। मान लिया कि श्रीलंका की धरती ने हमारा स्वागत बरसात से किया है । सारा रनवे बरसात के पानी से तर था । जैसे भीगा-भीगा मन हो । मन भीग गया तब भी वहां जब वहां श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन के कुर्लू कार्यकरवन , उन की पत्नी गीतिका ताल्लुकदार और सुभाषिनी डिसेल्वा ने भाव विभोर हो कर सब का स्वागत किया । कोलंबो के होटल रोड पर ब्रिटिश पीरियड के 1806 में बने होटल माऊंट लेविनिया में हमारे ठहरने का बढ़िया बंदोबस्त था । इस विक्टोरियन होटल में सौभाग्य से हमारा कमरा समुद्र से ठीक सटा हुआ था । रात तो हम खाना कर सो गए । समुद्र का सुख नहीं जान पाए । लेकिन जब सुबह उठा और बालकनी का परदा खोला तो दिल जैसे उछल पड़ा । समुद्र की लहरें उछल-उछल कर जैसे हमारे कमरे के बाहरी किनारे को चूम रही थीं । चट्टान से टकराती इन लहरों के हुस्न का अंदाज़ा तब मिला जब हम ने बालकनी में लगे शीशे के दरवाज़े को अचानक खोल दिया । अब उछलती लहरें थीं , उन का शोर था और मैं था । चट्टान से जैसे लहरें नहीं , मैं टकरा रहा था । बारंबार । समुद्र हमने भारत में भी दो जगह देखा था अब तक । एक तो गंगा सागर में दूसरे , कालीकट में । पर समुद्र का यह हुस्न , यह अदा ,  नाज़-अंदाज़ , ऐसा अविरल सौंदर्य और यह औदार्य नहीं देखा था , जो कोलंबो में अब देख रहा था , महसूस रहा था , आत्मसात कर रहा था , जी रहा था । सुबह सर्वदा ही सुहानी होती है लेकिन यह सुबह तो सुनहरी हो गई थी । एक अर्थ में लवली मॉरनिंग हो गई थी । मैं एक साथ सूर्य और सागर दोनों देवताओं को प्रणाम कर रहा था । प्रणाम कर धन्य हो रहा था । सागर की लहरों का शोर जैसे मेरे मन के शोर से क़दमताल कर रहा था । गोया मन मेरा चट्टान था और मैं उस से टकरा रहा था । टकराता जा रहा था । बहुत देर तक बालकनी में बैठा लहरों के साथ रोमांस के सांस लेता रहा । कामतानाथ का एक उपन्यास है समुद्र तट पर खुलने वाली खिड़की । पर यहां तो पूरी बालकनी ही समुद्र तट से सटी हुई थी , खुली हुई थी। नाश्ते का समय हो गया था । नहा-धो कर , पूजा कर नाश्ते के लिया गया । डायनिंग हाल के बाहर स्विमिंग पुल के पार नीले समुद्र के हुस्न का दीदार और दिलकश था । दिलकश और दिलफ़रेब । सागर की लहरों की उछाल तो वैसी ही थी पर लहरों का शोर यहां मद्धम था । हां , आकाश की अनगूंज भी यहां साथ थी । यह दूरी थी , आकाश का खुलापन था या कोई बैरियर । कहना मुश्किल था तब । तो क्या सागर आकाश से भय खाता है , बच्चों की तरह । कि शोर की सदा थम जाती है । मद्धम पड़ जाती है ।

क्या पता!

कि जैसे समुद्र सेतु बनाते समय राम से उलझा और फिर डर गया।

लेकिन सागर का सौंदर्य जैसे यहां और निखर गया था । उस के हुस्न में जैसे नमक बढ़ गया था । स्विमिंग पुल में टू पीस में नहाती गौरांग स्त्रियों को देखें या सागर के सौंदर्य को देखें , यह तय करना भी उस वक्त मेरे लिए एक परीक्षा थी । अंतत: मैं ने सागर को देखना तय किया । इस लिए भी कि सागर के सौंदर्य में जो कशिश थी , जो बुलावा , मनुहार , निमंत्रण और मस्ती थी , वह स्विमिंग पुल में नहाती स्त्रियों में नदारद थी । हालां कि एक साथी बार-बार कह क्या उकसा ही रहे थे कि स्विमिंग पुल में नहाया जाए । लेकिन इस सब के लिए मेरे पास अवकाश नहीं था । समुद्र का निर्वस्त्र सौंदर्य मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण था । इतना मनोहारी और इतना रोमांचकारी । और फिर जल्दी ही श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन की इकसठवीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में शरीक होने के लिए भी हमें जाना था ।

इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के बीस पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल जब जनरल सेक्रेटरी परमानंद पांडेय के नेतृत्व में कोलंबो के भंडारनायके मेमोरियल हाल में पहुंचा तो वहां भारतीय प्रतिनिधिमंडल का जिस पारंपरिक ढंग से सब को पान दे कर नृत्य और संगीत के साथ स्वागत किया गया वह बहुत ही आत्मीय और भावभीना था । मन हर लेने वाला । श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेन ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया । भारतीय पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल का भी उन्हों ने स्वागत किया और भारतीय पत्रकारों ने उन का अभिनंदन । इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के महासचिव परमानंद पांडेय ने अपने भाषण में श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन को उस की वर्षगांठ पर भावभीनी बधाई दी और राष्ट्रपति का भारत की तरफ से अभिनंदन किया । इस मौके पर श्रीलंका के कई बुजुर्ग पत्रकारों को सम्मानित भी किया गया । कार्यक्रम में श्रीलंका के कई सारे राजनीतिज्ञ , मंत्री , मुख्य मंत्री और नेता प्रतिपक्ष भी उपस्थित थे । किसी भी राजनीतिज्ञ के साथ कोई फौज फाटा नहीं । कोई दिखावा नहीं । सब के साथ सारे राजनीतिज्ञ साधारण जन की तरह मिल रहे थे । सिर्फ़  एक राष्ट्रपति के साथ थोड़ा सा प्रोटोकाल और गिनती के चार-छह सुरक्षाकर्मी दिखे । बाक़ी किसी के साथ नहीं । रास्ते में भी कहीं कोई रोक-टोक नहीं हुई । कि राष्ट्रपति आ रहे हैं । कहीं कोई पेनिक नहीं । सारी जनता आसानी से आ जा रही थी । हमारे लिए यह आश्चर्य का विषय था । आश्चर्य का विषय यह भी था हमारे लिए कि मय राष्ट्रपति के किसी भी को मंच पर नहीं बिठाया गया । मंच पर न कोई कुर्सी , न कोई मेज । बस माइक और उदघोषक । बारी-बारी लोग बुलाए जाते रहे और अपनी-अपनी बात कह कर मंच से उतर कर अपनी-अपनी जगह बैठ जाते रहे । न कोई  वी आई पी , न कोई ख़ुदा । सभी के साथ एक जैसा सुलूक । राष्ट्रपति हों या नेता प्रतिपक्ष , कोई मुख्य मंत्री या मंत्री । या कोई पत्रकार । सब के लिए एक सुलूक ।  बाद के दिनों में भी , श्रीलंका के बाक़ी शहरों में भी सरकारी और ग़ैर सरकारी कार्यक्रमों में भी यही परंपरा तारी थी । कि स्टेज हर किसी आम और ख़ास का था । किसी खुदाई के लिए नहीं । श्रीलंका में प्रोटोकाल की सरलता का अंदाज़ा आप इस एक बात से भी लगा सकते हैं कि जिस भंडारनायके मेमोरियल हाल में श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन की इकसठवीं वर्षगांठ का समारोह मनाया गया और राष्ट्रपति की गरिमामयी उपस्थिति थी उसी भंडारनायके मेमोरियल हाल में उसी समय किसी कालेज या विश्वविद्यालय का भी कार्यक्रम था । और साथ-साथ । हम लोग जब भंडारनायके मेमोरियल हाल से विदा ले रहे थे , तब बच्चे जैसे अपनी डिग्री का जश्न मना रहे थे । श्रीलंका के राष्ट्रपति का उदबोधन भी सरल था । वह भारत के राजनीतिज्ञों की तरह किसी खुदाई में डूब कर नहीं बोल रहे थे । उन के बोलने और मिलने में सदाशयता और विनम्रता दोनों ही दिख रही थी । पत्रकारों को भौतिक चीजों के पीछे बहुत ज़्यादा न भागने की उन की सलाह थी । समाज कल्याण और अध्यात्म पर ज़ोर ज़्यादा था । वैसे भी राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेन एक समय खुद पत्रकार रहे थे ।

कार्यक्रम के बाद शाम को ही सबरगमुवा प्रांत की राजधानी रतनपुर के लिए हम लोग रवाना हो गए । रास्ते भर जगमगाती सड़कें बता रही थीं कि यहां बिजली की स्थिति क्या है । गड्ढामुक्त सड़कें बता रही थीं कि वहां भ्रष्टाचार की स्थिति क्या है । लगभग ढाई-तीन सौ किलोमीटर का रास्ता किसी सुहाने सफ़र की तरह कटा । हिंदी फ़िल्मी गाने सुनते हुए । कोलंबो  से रतनपुर तक न आबादी ख़त्म हुई न रौशनी । न सड़क पर कहीं कोई गड्ढा , न हचका , न ट्रैफिक जाम । अविसावेल , बलांगुड़ और वेलीहललायर जैसे शहर-दर-शहर हम ऐसे पार करते गए गोया हम सड़क से नहीं नदी से गुज़र रहे हों । रतनपुर में रत्नालोक होटल में हम सभी ठहरे । सुबह दस बजे सबरगमुवा प्रांत के मुख्य मंत्री महिपाल हेरा से मिलने का कार्यक्रम था । सबरगमुवा प्रांत के सचिवालय में भी पान भेंट कर संगीतमय स्वागत किया गया । मुख्य मंत्री ने भारतीय पत्रकारों का औपचारिक भी स्वागत किया । कुछ रत्न भेंट किए । स्कूली बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए । बाद में सबरगमुवा प्रांत के मुख्य मंत्री अपने कार्यालय में भी भारतीय पत्रकारों से मिले । जहां जनता भी अपने काम के लिए बैठी हुई थी । जल्दी ही हम लोग वहां से विदा हुए ।

हम लोग अब शमन मंदिर के लिए चले । बताया गया कि अशोक वाटिका जाने के पहले इस मंदिर में आना ज़रुरी है । ऐसे जैसे इजाजत लेनी हो वहां जाने के लिए । शमन का मतलब पूछा तो श्रीलंका प्रेस एसोशियेशन के उपुल जनक जयसिंघे ने बताया कि लक्ष्मण , लक्ष्मण , लक्ष्मण , लक्समन , लक्समन  होते-होते शमन , शमन हो गया । यानी एक तरह से लक्ष्मण का ही रुप । शमन भगवान का वाहन हाथी है । वहां हाथी भी उपस्थित था । वैसे भी दुनिया में सब से ज़्यादा हाथी अगर अभी कहीं हैं तो वह श्रीलंका हैं । बताते हैं कि श्रीलंका में हाथी की लीद से कागज़ भी बनाया जाता है । मंदिर में भगवान शमन की मूर्ति तो थी ही , बड़े-बड़े असली हाथी दांत भी थे ।

कुछ देवियों और बुद्ध की बड़ी सी मूर्ति भी थी । यह मंदिर एक ट्रस्ट के तहत चलता है । इस का परिसर बहुत बड़ा है । बाक़ी सब कुछ भारत जैसा ही है । जैसे भारत में मंदिर के आस-पास फूल , प्रसाद , बच्चों के खिलौने , गृहस्ती के छोटे-मोटे सामान आदि की दुकानें होती हैं , खाने-पीने की दुकानें होती हैं , यहां भी थीं । ढेर सारी । ऐसे ही भारत और श्रीलंका में निन्यानवे प्रतिशत समानताएं मिलीं । हर चीज़ में । यहां तक कि  नाम भी भारतीयों के नाम जैसे । एक सरनेम हटा दीजिए , सारे नाम यही हैं । भाषा और कुछ विधियों का ही फ़र्क है । वहां की भाषा पर भी संस्कृत का बहुत प्रभाव है । वहां बोली जाने वाली , लिखी जाने वाली सिंहली और तमिल की भी संस्कृत जैसे मां है । बहुत सारे शब्द इसी लिए हिंदी जैसे लगते हैं । जैसे जन्मादि शब्द कई बार सुना तो मैं ने पता किया कि इस का अर्थ क्या है । पता चला कि मीडिया । इसी तरह वहां एक शब्द है स्तुति । हर कोई वक्ता अपने संबोधन के बाद स्तुति ज़रुर कहता । हमारे यहां स्तुति प्रार्थना के अर्थ में है । लेकिन वहां स्तुति का अर्थ है धन्यवाद , शुक्रिया । लेकिन सभापति , उप सभापति जैसे शब्दों के अर्थ जो भारत में हैं , वही श्रीलंका में भी । हम लोग सुविधा के तौर पर भले श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन कहते रहे और वह लोग भी लेकिन वह आपसी संबोधन में इसे श्रीलंका पत्र कला परिषद संबोधित करते रहे । करते ही हैं । संबोधन में भी । ऐसे ही तमाम सारे शब्द , वाक्य , वाक्य विन्यास भी हिंदी के बहुत क़रीब दीखते हैं । हिंदी क्या सच कहिए तो संस्कृत । संस्कृत ही उन की भाषाओं की जननी है । वैसे कहा जाता है कि सिंहली भाषा पर गुजराती और सिंधी भाषा का भी बहुत प्रभाव है । तो भारतीय भाषा ही नहीं , भारतीय भोजन , फूल , फल आदि भी । बस उन के भोजन की थाली में रोटी न के बराबर है । चावल बहुत है । वह भी मोटा चावल । पांच सितारा , सात सितारा होटलों में भी इसी मोटे चावल की धमक थी । उस में भी भुजिया चावल ज़्यादा । बस कोलंबो के होटल माउंट लेविनिया में खीर में एक दिन अपेक्षाकृत थोड़ा महीन चावल ज़रुर मिला ।

सबरगमुवा प्रांत की वनस्पतियों के वैभव के क्या कहने । रास्ते भर वहां की वनस्पतियों और उन की हरियाली को हम आंखों ही आंखों बीनते रहे , मन में भरते रहे । वहां के पर्वत जिस तरह हरे-भरे हैं, अपने भारत के पर्वतों से वह हरियाली लगभग ग़ायब हो चली है । बस एक शिमला की ग्रीन वैली में ऐसी हरियाली , ऐसी प्रकृति देखी है मैं ने या फिर शिलांग से चेरापूंजी के रास्ते में । चाय बागान वाले पर्वतों को छोड़ दीजिए तो बाक़ी पर्वत अपनी हरियाली गंवा चुके हैं । ख़ास कर अपने उत्तराखंड के पर्वत तो हरियाली से , वनस्पतियों के वैभव से पूरी तरह विपन्न हो चुके हैं , दरिद्र हो चुके हैं । रास्ते में एक रेस्टोरेंट में लंच के बाद वहां विभिन्न रत्नों की खदानें और एक चाय फैक्ट्री भी हमने देखी । कुछ साथियों ने रत्न और चाय भी ख़रीदे । इस के पहले रतनपुर में रत्नों का संग्रहालय भी हमने देखा ।

26 अक्टूबर की रात हम लोगों को एक गांव सीलगम में रुकना था । इस गांव को सबरगमुवा प्रांत की सरकार ने विलेज टूरिज्म के तौर पर विकसित किया है । इस गांव में पहुंचते-पहुंचते रात घिर आई थी । पहाड़ियों के बीच बसे इस गांव में हम लोग जब पहुंचे तो यहां भी सभी को पान भेंट कर नृत्य और संगीत के साथ स्वागत किया गया । सबरगमुवा प्रांत के पर्यटन मंत्री अतुल कुमार भी उपस्थित थे । लेकिन स्वागत किया गांव के लोगों ने ही । सबरगमुवा यूनिवर्सिटी में टूरिज्म डिपार्टमेंट के सीनियर लेक्चरर डॉक्टर एम एस असलम ने वहां के टूरिज्म के बाबत एक प्रजेंटेशन भी पेश किया । पर्यटन मंत्री ने भी भारतीय पत्रकारों का अभिनंदन किया । अपना पर्यटन साहित्य भेंट किया । और सब से सरलता से मिलते रहे । बाद में गांव के बच्चों और लोगों ने लोक नृत्य और पारंपरिक गीत प्रस्तुत किए । डिनर के बाद गांव के अलग-अलग घरों में भारतीय पत्रकारों को ठहराया गया । किसी घर में एक , किसी घर में दो । सभी पत्रकारों ने अपने घर की तरह इन घरों को समझा । और घर का पूरा आनंद लिया । गांव के लोगों ने भी हर किसी को मेहमान की तरह सिर-माथे पर बिठाया । इस गांव का भोजन और आतिथ्य सत्कार श्रीलंका के किसी सात सितारा होटल से भी ज़्यादा अनन्य था , अतुल्य था । आत्मीयता , सरलता और निजता में भिगो कर भावुक कर देने वाला । देसीपन में ऊभ-चूभ ।

माटी की महक , गमक और सुगंध में डूबा किसी आरती में कपूर की तरह महकता और इतराता हुआ । आत्मीयता और नेह के सागर में छलकता हुआ । सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद बिलकुल सामान्य और साधारणजन की तरह दिखने वाले पर्यटन मंत्री अतुल कुमार से मैं ने पूछा कि आप की इतनी सरलता का राज क्या है ? तो वह शरमाते और सकुचाते हुए बोले , ‘ मैं तो ऐसे ही हूं !’ इस धुर देहात में भी मंत्री के साथ कोई सुरक्षाकर्मी और फौज-फाटा न देख कर उन से पूछा कि आप की सिक्योरिटी के लोग कहां हैं ? आप के स्टाफ़  के लोग कहां हैं ? तो वह फिर सकुचाए और बोले , ‘ सिक्योरिटी हमारे साथ कभी होती नहीं । उस की ज़रुरत भी नहीं । स्टाफ़  के लोगों की यहां ज़रुरत नहीं ।’

तो क्या फिर अकेले ही आए हैं यहां ? वह सकुचाते हुए फिर शरमाए और बोले , ‘ नहीं अकेले नहीं आया हूं । एक सरकारी ड्राइवर है  न ! ‘ अद्भुत था यह भी । यहां भारत में तो एक ग्राम प्रधान या सभासद भी अकेले नहीं चलता । कोई  विधायक भी बिना गनर और फ़ौज फाटे के नहीं चलता । और मंत्री ? वह तो धरती हिलाते हुए , धूम-धड़ाका करते हुए , पूरी ब्रिगेड लिए चलता है । पूरा इलाक़ा जान जाता है कि मंत्री जी आने वाले हैं । सारा सिस्टम नतमस्तक रहता है । थाना , डी एम  , यह और वह कौन नहीं होता ? प्रोटोकाल की जैसे बारिश होती रहती है । पर यहां बरसे कंबल भीजे पानी वाला आलम था ।

ख़ैर भोजन के बाद के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा के घर गया रहने और सोने के लिए । थोड़ी पहाड़ी चढ़ कर । साधारण सा घर । एक छोटे से कमरे में एक डबल बेड और दो सिंगिल बेड । बिलकुल ठसाठस । गृह स्वामी को उम्मीद थी कि चार लोग भी आ सकते हैं । लेकिन पहुंचे हम दो लोग ही । एक मैं और दूसरे चमोली , उत्तराखंड के देवेंद्र सिंह रावत । कमरा तो साधारण था ही , कमरे से थोड़ी  दूर पर बाथरुम और साधारण । बल्कि जुगाड़ तकनीक पर आधारित । ख़ास कर कमोड का फ़्लश । देख कर पहले तो मैं उकताया लेकिन फिर हंस पड़ा । ढक्कन ग़ायब । और फ़्लश के नॉब की जगह एक तार रस्सी जैसा बंधा था । खींचते ही फ़्लश का पानी निकल पड़ता था । खिड़की पर शेविंग वाले रिजेक्टेड ब्लेड से जगह-जगह पैबंद की तरह लटका कर खिड़की को कवर करने का जुगाड़ बनाया गया था । स्पष्ट है कि इस सुदूर देहात में प्लम्बर और बाथरुम से जुड़े सामान का मिलना सुलभ नहीं होगा तो यह जुगाड़ तकनीक खोज ली गई होगी । शावर भी जुगाड़ के दम पर था । ऐसे ही और भी कई सारे जुगाड़ । लेकिन कमरा , बाथरुम भले साधारण था , जुगाड़ तकनीक पर आधारित था लेकिन के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा साधारण लोग नहीं थे । शबरी भाव से भरे हुए थे । आतिथ्य सत्कार में नत । रात का भोजन हम लोग कर चुके थे सो अब सोना ही था । भाषा की समस्या भी थी । वह सिंघली बोलने वाले लोग थे । हम हिंदी और भोजपुरी भाषी । लेकिन गांव वाले हम भी हैं । गांव की संवेदना , गांव का अनुराग और उस का वैभव , उस की संलिप्तता और शुरुर हमारे भीतर भी था ।  उन के भीतर भी । इस दंपति की सत्कार की आतुरता देख कर मुझे अपना बचपन याद आ गया । जब शहर से गांव जाता था तो अम्मा को लगता था कि  क्या बना दे , क्या खिला दे , क्या दे दे । जब टीन एज हुआ तो जब कभी नानी के गांव यानी अपने ननिहाल जाता था और अचानक थोड़ी देर बाद चलने लगता तो वापसी के समय नानी बेचैन हो जातीं । कोई ताख , कोई  बक्सा उलटने-पलटने लगतीं । और कहतीं , नाती बस तनी  एक रुकि जा ! वह बेचैन हो कर रुपया , दो रुपया खोज रही होतीं थीं , कि मिल जाए तो नाती के हाथ में रख दें । मैं कहता भी कि  इस की कोई  ज़रुरत नहीं । लेकिन नानी हाथ पकड़ कर , माथा चूम कर रोक लेतीं । कहतीं , अइसे कइसे छूछे हाथ जाए देईं ? बिना सोलह-बत्तीस आना हाथ पर धरे ? और वह कैसे भी कुछ न कुछ खोज कर दो रुपया , पांच रुपया दे ज़रुर देतीं । साथ में चिवड़ा , मीठा भी बांध देतीं । भर अंकवार भेंट कर , माथा चूम कर , आशीष से लाद  देतीं । अम्मा और नानी का यही भाव इस दंपति के चेहरे पर भी मैं पढ़ रहा था । आत्मीयता में विभोर छटपटाहट की वही रेखाएं देख रहा था । कि हम लोगों को कोई असुविधा न हो । सो असुविधा की सारी इबारतें इस शबरी भाव में बह गईं । और हम उस खुरदुरे बिस्तर पर सो गए । नींद भी अच्छी आई ।

अमूमन मेरी सुबह थोड़ी देर से होती है । मतलब देर तक सोता हूं । लेकिन सबरगमुवा प्रांत के इस सीलगम गांव में मेरी सुबह अपेक्षाकृत ज़रा जल्दी हो गई । खुली खिड़की से आती रौशनी ने जगा दिया ।  श्री के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा पहले ही से जगे हुए थे । ऐसे जैसे हमारे जागने की प्रतीक्षा में ही थे । चाय के लिए पूछा । अपनी टूटी फूटी अंगरेजी में । मैं ने हाथ जोड़ कर उन्हें बताया कि सारी , मैं चाय नहीं पीता । सुन कर वह लोग उदास हो गए । हम उन के घर का छोटा सा बग़ीचा घूमने लगे । किसिम-किसिम के फूल , फल दिखाने लगे दोनों जन । कटहल , केला , आंवला , आम आदि । अजब था किसी पेड़ पर आम के बौर , किसी पेड़ पर टिकोरा तो किसी पेड़ पर पका हुआ या कच्चा आम भी । यह कैसे संभव बन पा रहा है , एक ही मौसम में । यह दंपति हमें भाषा की दिक्कत के चलते समझा नहीं पाए और हम नहीं समझ पाए । जैसे टूटी-फूटी अंगरेजी उन की थी , कुछ वैसी ही टूटी-फूटी अंगरेजी हमारी भी तो थी । और उस घर में ठहरे हमारे साथी देवेंद्र सिंह रावत तो हम सब से आगे की चीज़ थे । अंगरेजी में हेलो , यस-नो और ओ के से आगे उन की कोई दुनिया ही नहीं थी । कोई ज़मीन ही नहीं थी । फिर वह बेधड़क हिंदी पर आ जाते । आप को समझ आए तो समझिए , नहीं आता तो मत समझिए । और आगे बढ़िए । न सिर्फ़ रावत बल्कि कुछ और भारतीय साथियों के साथ भी यह मुसीबत तारी थी । जैसे एक साथी डायनिंग टेबिल पर थे । उन्हें नैपकिन की ज़रुरत थी । हेलो कह कर एक वेटर को उन्हों ने बुलाया । वेटर के आते ही उन्हों ने हाथ के इशारे से हाथ पोंछने का अभिनय किया । वेटर ने फ़ौरन उन्हें नैपकिन ला कर दे दिया । यह और ऐसे तमाम काम कई सारे साथी इशारों से भी संपन्न कर लेते थे बाख़ुशी। इतना कि कई बार नरेश सक्सेना की कविता याद आ जाती थी :

शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है

यह कविता और इस की ध्वनि श्रीलंका में बारंबार मिली । मिलती ही रही । दोनों ही तरफ से । भाषाई तोतलापन कैसे तो अच्छे खासे आदमी को शिशु बना देता है , लाचार बना देता है । यह देखना भी एक निर्मल अनुभव था । जैसे कि एक बार कोलंबो के माउंट लेविनिया होटल में मेरे साथ भी हुआ । इडली के साथ सांभर में अचानक मिर्च इतनी ज़्यादा मिली कि मैं जैसे छटपटा पड़ा । सिर हिलाने के साथ ही पैर पटकने लगा । कि तभी एक वेटर पानी लिए दौड़ आया । पानी दे कर वह पलटा । अब की उस के हाथ में रसमलाई की प्लेट थी । पानी पी कर , रसमलाई खा कर जान में जान आई । उस ने शब्दों में मुझ से कुछ नहीं कहा । न ही मैं ने कुछ कहा । लेकिन मेरी आंखों में उस के लिए कृतज्ञता थी । और मैं ने प्लेट मेज़ पर रखा फिर उस से हाथ मिलाया । वह सिर झुका कर कृतज्ञ भाव में हंसते हुए चला गया । ऐसे जैसे मैं ने उसे क्या दे दिया था । ऐसे ही साझा कृतज्ञ भाव में डूबे हुए थे हम और के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा दंपति । वह चाय के लिए फिर-फिर पूछ रहे थे । और मैं उन्हें हाथ जोड़ कर विनय पूर्वक मना करता रहा । वह चाहते थे कि कुछ तो मैं ले लूं । मैं ने उन्हें बताया कि बिना नहाए-धोए , पूजा किए मैं कुछ भी नहीं खाता-पीता । वह मान गए । नहा कर मैं ने पूजा के लिए पूछा कि  कोई ऐतराज तो नहीं । वह मुझे अपने घर में रखी कुछ फोटुओं के पास ले गए । वहां बुद्ध की छोटी सी मूर्ति के साथ-साथ दुर्गा और अन्य देवियों की फोटो भी लगी थी । उन्हों ने मुझे अगरबत्ती का पैकेट और दियासलाई भी दी । मेरे साथ उन्हों ने भी हाथ जोड़ कर शीश नवाया ।  वह अपने पूजा स्थल पर दो मिनट मेरे पूजा कर लेने से हर्ष विभोर थे । मैं कमरे में आ कर बैठा ही था कि वह मेरे लिए आंवला का जूस ले कर आए । रावत जी ने चाय पी और मैं ने आंवला का जूस । हम ने एक दूसरे के परिवार के बारे में , काम धाम के बारे में बात की । बच्चों के बारे में बात की । इस दंपति के चार बच्चे हैं । दो बेटा , दो बेटी । सब की शादी हो गई । सब बच्चे शहरों में सेटिल्ड हो गए हैं । अच्छी नौकरियों में हैं । कोई कैंडी में है , कोई कोलंबो में । अब गांव में यह दंपति अकेले रह गए हैं । कभी-कभी बच्चे आ जाते हैं गांव । तो कभी यह लोग बच्चों के पास चले जाते हैं । फ़ोन पर बात होती रहती है । हालचाल मिलता रहता है । मुझे अपने अम्मा , पिता जी की याद आ गई । वह लोग भी गोरखपुर के अपने गांव में रहते हैं । कभी हम चले जाते हैं , कभी वह लोग आ जाते हैं । फ़ोन पर बातचीत होती रहती है । हालचाल मिलता रहता है । स्थितियां लगभग एक सी हैं । अम्मा-पिता जी गांव किसी क़ीमत छोड़ना नहीं चाहते , इस दंपति का भी यही क़िस्सा है । अपनी माटी से मोह का मोल यही है । अनमोल रिश्ता यही है । जिसे कोई सुविधा , कोई सौगात समूची दुनिया में छीन नहीं सकती । हां , हमारे अम्मा-पिता जी के साथ एक सौभाग्य यह है कि वह अकेले नहीं रहते । एक छोटे भाई की पत्नी और छोटे बच्चे उन के साथ रहते हैं । ताकि उन्हें भोजन बनाने आदि अन्य काम में दिक्कत न हो । अकेलेपन का भान न हो । इस दंपति के साथ यह सौभाग्य नहीं है । बात अब बच्चों से हारी-बीमारी और सुख-दुःख पर आ गई है । श्रीमान के वी जयसेकर तो इकसठ-बासठ वर्ष के हो कर भी स्वस्थ हैं । ठीक मेरे बयासी वर्षीय पिता जी की तरह । लेकिन श्रीमती बद्रा के साथ बीमारियों का डेरा है । शुगर तो है ही , उन के घुटने की कटोरी घिस गई है । यह बात उन्हें मुझे समझाने और मुझे इसे समझने में बहुत समय लग गया । और अंततः नरेश सक्सेना की कविता की शरण में जा कर यानी इशारों-इशारों में समझना पड़ा । और जब मैं समझ गया तो श्री जयसेकर के चेहरे पर किसी बच्चे की सी चमक आ गई । मैं ने कहा कि इस का ऑपरेशन करवा कर कटोरी रिप्लेस करवा लें । उन्हों ने माना तो कि यही एक उपाय है । भारत के पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के घुटने के रिप्लेस के बारे में भी उन्हों ने पढ़ रखा है लेकिन सब कुछ के बावजूद श्रीमती बद्रा इस के लिए मानसिक रुप से तैयार नहीं हैं । जाने पैसे की दिक़्क़त है या कुछ और जानना मुश्किल था । बहरहाल एक नोटबुक ला कर श्री जयसेकर ने हमारे सामने रख दी । कि उस पर कोई कमेंट अंगरेजी में लिख दूं । ताकि सनद रहे और वक़्त ज़रुरत काम आए ।  उन्हों ने यह भी बताया कि आप लोग पहले टूरिस्ट हैं जो हमारे घर ठहरने आए । गांव में और लोगों के घर तो टूरिस्ट आते रहे हैं पर उन के घर हम पहले टूरिस्ट थे । हमने तो काम चलाऊ अंगरेजी में एक छोटा सा नोट लिख दिया । पर अपने रावत जी को जब लिखने को कहा गया तो उन्हों ने बेधड़क पन्ना पलटा और हिंदी में चार लाइन लिख कर नोट बुक फट से बंद कर के खड़े हो गए । अब  के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा के घर से विदा लेने का समय आ गया था । यह दंपति अनुनय-विनय कर रहे थे , कह रहे थे कि आप फिर कभी सपरिवार आइए न यहां और हमारे ही घर ठहरिए । हम यस-यस और श्योर-श्योर कहते रहे । शायद झूठ ही । अपने झूठ पर शर्म भी आ रही थी । लेकिन कहते भी तो उन से क्या कहते भला ? एक घर में प्रतिनिधिमंडल के सभी लोगों के एक साथ ब्रेक फास्ट की व्यवस्था थी । वहीं जहां हम लोगों  ने रात में डिनर लिया था । हम लोगों ने विदा के पूर्व अपने-अपने मोबाइल से एक दूसरे के साथ फ़ोटो  खिंचवाई । गले मिले । चलते समय श्रीमती बद्रा अचानक झुकीं और मेरे पांव पर अपना माथा रख कर प्रणाम की मुद्रा में आ गईं । पीछे हटते हुए मैं लज्जित हो गया । मैं ने उन्हें ऐसा करने से मना किया और हाथ जोड़ लिया । वह फिर गले लग गईं ।

हम लोग ब्रेकफास्ट की जगह पहुंचे । इस बहाने गांव और उस की प्रकृति भी देखी । रात आए थे तब अंधेरा था । जहां-जहां बिजली की रौशनी थी वही जगह दिखी । पर कोई गांव भी भला बिजली की रौशनी में देखा जाता है ? या दीखता है भला ? अब चटक सुबह थी और चलते-फिरते हम लोग थे । पहाड़ी के बीच बसा यह गांव था । चढ़ाई-उतराई थी । नहर में बहता पानी था , धान के खेत थे । बींस और तमाम सब्जियों से भरे खेत थे । फलों से लदे वृक्ष और तमाम वनस्पतियां थीं । आम , कटहल , केला आदि के वृक्ष फलों से लदे पड़े थे। बस नहीं था तो गांव में तरुणाई नहीं थी । जैसे वृद्धों का गांव था यह । हमारे भारतीय गांवों की तरह । तरुणाई यहां भी शहरों की तरफ कूच कर गई थी । जैसे पूरी दुनिया का यही हाल है । ग्लोबलाईजेशन की कीमत है यह । इक्का-दुक्का युवा । मुंह तंबाकू से लाल और हरे-भरे । पर्यटन विभाग इन परिवारों को प्रति व्यक्ति , प्रति दिन के हिसाब से साढ़े सात सौ रुपए रहने के लिए देता है । यह वृद्धों का गांव इस को भी अपना रोजगार और सौभाग्य मान लेता है ।

ब्रेकफास्ट की जगह जैसे सारा गांव हम लोगों को विदा करने के लिए इकट्ठा हो गया है । स्त्री-पुरुष , छिटपुट बच्चे भी । ब्रेकफास्ट के बाद हम लोग चले । चले क्या विदा हुए । जैसे कोई मेहमान विदा हो । जैसे घर से कोई बेटी विदा हो । रात आए थे हम लोग तो अंधेरा मिश्रित बिजली की रौशनी में भी गांव चहक रहा था । स्वागत में चहक रहा था । अब चटक सुबह में भी उदास था । कोई नृत्य , कोई गायन , कोई संगीत , कोई पान नहीं था । विदा की थकन और गहरी उदासी तारी थी सभी ग्रामवासियों के चेहरे पर । बच्चन जी की मधुशाला की एक रुबाई याद आ रही थी :

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करूं, पी लूं हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया ‘जानेवाला’,
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।

तो अब इस गांव की यात्रा अब समाप्ति पर थी । हमारे क्षणिक लेकिन अनमोल संबंधों की मधुशाला बंद हो रही थी । हम फिर गले मिल रहे थे , विदा हो रहे थे । अब हमें सेंट्रल प्राविंस के नुवारा एलिया ज़िले के लिए प्रस्थान करना था । वहां जहां कहा जाता है कि सीता के अपहरण के बाद रावण ने सीता को रखा था । यह मंदोदरी के मायके का इलाक़ा था । यानी रावण की ससुराल थी । हम लोग जिसे अशोक वाटिका के रुप में रामायण में पढ़ते हैं । नुवारा एलिया को श्रीलंका के स्वीटजरलैंड के रुप में भी जाना जाता है । श्रीलंका के पहाड़ी रास्ते भी बहुत मनमोहक हैं । ख़ूबसूरत मोड़ और हरियाली से संपन्न। नुवारा एलिया हम लोग पहुंचे । रास्ते में अशोक वाटिका भी पड़ी । श्रीरामजयम नाम से मंदिर है । जिसे प्रणाम करते हुए हम गुज़रे । तय हुआ कि लंच कर के यहां लौटेंगे । फिर आराम से मंदिर देखेंगे । नुवारा एलिया के स्थानीय पत्रकारों ने एक कार्यक्रम भी रखा था । हम लंच कर और उस कार्यक्रम को अटेंड कर लौटे भी । श्रीरामजयम मंदिर । शहर से थोड़ी दूरी पर बना यह मंदिर है हालां कि प्रतीकात्मक ही । यह तथ्य वहां स्पष्ट रुप से लिखा भी है एक पत्थर पर । फिर भी आस्था , विश्वास और मन का भाव ही असल होता है । इस छोटे से मंदिर में पहुंच कर हम ने शीश नवाया और सीता के दुःख में डूब गए । उन की यातना और तकलीफ की खोह में समा गए । कि कैसे एक अकेली स्त्री , अपहरित स्त्री इस वियाबान में , पर्वतीय वन में रही होगी । अब तो यहां कोई अशोक का वृक्ष भी नहीं है जो मेरे शोक को हरता । पर हमारे मन में सीता हरण के वह त्रासद क्षण और कष्ट दर्ज थे । मंदिर में भीतर तो राम , लक्ष्मण और सीता की मूर्तियां हैं । अलग से हनुमान का मंदिर भी है । लेकिन बाहर पहाड़ी नदी किनारे खुले में सीता से भेंट करते हुए हनुमान की मूर्ति है । साथ में एक हिरन है । हनुमान के पद-चिन्ह हैं । मूर्ति का यह खंड विचलित करता है । पास ही एक ऊंची पर्वत माला है । जहां कहा जाता है कि सीता को अशोक वाटिका में क़ैद करने के बाद अपना महल छोड़ कर अस्थाई रुप से रावण यहीं ऊंची पहाड़ी पर रहने लगा था । भारत को श्रीलंका का बड़ा भाई मानने वाले यहां के लोग सीता , राम या हनुमान का निरादर तो नहीं करते , आदर के साथ ही उन का नाम लेते हैं लेकिन इस सब के बावजूद रावण को वह अपना हीरो मानते हैं । रावण के खिलाफ कुछ सुनना नहीं चाहते । इस तरह की बहुत सारी बातें हैं , बहुत सारी कथाएं हैं । वाचिक भी , लिखित भी । बहरहाल जैसा कि तुलसीदास ने सुंदर कांड में लिखा है कि जब अशोक वाटिका में हनुमान ने सीता को देखा तो :

देखि मनहि महुं कीन्ह प्रनामा।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदय रघुपति गुन श्रेनी॥

मैं ने भी सीता जी को , उन की व्यथा को मन ही मन ही नहीं हाथ जोड़ कर भी प्रणाम किया । और उन की उन की मूर्ति के पास जा कर बैठ गया । उन के दुःख को भीतर से महसूस किया । तुलसीदास लिख ही गए हैं :

निज पद नयन दिए मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥

अब यह कथा , कथा का दुःख सभी को मालूम है । हम ने भी तुलसीदास के लिखे के भाव में शीश नवाए , रस्सी से बंधा घंटा बजाया , फ़ोटो खिंचवाया और चले आए :

बार बार नाएसि पद सीसा।
बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउ मैं माता।
आसिष तव अमोघ बिख्याता॥

नुवारा एलिया में एक सुंदर झील है । झील किनारे मादक हरियाली है । अपने भारतीय झीलों की तरह उन के किनारे होटलों और दुकानों की भीड़ नहीं है । हां , रेसकोर्स है । झील में बोट हैं , बोटिंग के लिए । तैरता हुआ बड़ा सा हाऊस बोट भी है । इसी हाऊस बोट पर नुवारा एलिया के स्थानीय पत्रकारों ने रात में कॉकटेल पार्टी आयोजित की थी भारतीय पत्रकारों के लिए । शाम को ठंड बढ़ गई थी । शिमला की तरह । हम सब ने हलके गरम कपड़े पहने । इस पार्टी में हिंदी गानों की बहार थी । वहां के स्थानीय लोगों ने आर्केस्ट्रा का भी बंदोबस्त भी किया था । इस सुरमई शाम को और दिलकश किया गीतांजलि ताल्लुकदार और उत्कर्ष सिनहा ने अपने गाए हिंदी फ़िल्मी डुवेट गानों से । गीतांजलि भारत में गौहाटी की हैं , भारत की बेटी हैं लेकिन अब श्रीलंका की बहू हैं । उत्कर्ष सिनहा गोरखपुर के हैं , अब लखनऊ में रहते हैं । पर बिना किसी रिहर्सल के गीतांजलि और उत्कर्ष ने डुएट गीतों की जो दरिया बहाई वह अनन्य थी । कॉकटेल की बहार थी ही , इस बहार की बयार में हम जैसे लोग झूम कर नाचने भी लगे । इस के एक दिन पहले भी रास्ते में गीतांजलि ने अपने मधुर कंठ से रास्ते में हिंदी फ़िल्मी गाने सुनाए थे । ये शमां , शमां है सुहाना और अजीब दास्तां है ये , न तुम समझ सके न हम ! जैसे गाने सुनाए थे । उत्कर्ष भी लगातार रास्ते में अपने मोबाइल से एक से एक सजीले और दुर्लभ गीत – ग़ज़ल सुनवाते रहे थे पर वह ख़ुद भी इतने सुरीले हैं , अच्छा गाते हैं यह इस कॉकटेल पार्टी में ही पता चला । इस मौके पर मैं ने उन के चेहरे को अपनी हथेली में भर कर उन्हें विश भी किया ।

दूसरी सुबह हम लोगों को कैंडी के लिए निकलना था । कैंडी होते हुए कोलंबो पहुंचना था । सुबह चले भी हम कैंडी के लिए । लेकिन शाम को फेयरवेल पार्टी भी थी । लगा कि कोलंबो पहुंचने में बहुत देर हो जाएगी । सो बीच रास्ते में कैंडी जाना कैंसिल हो गया और हम कोलंबो के रास्ते पर चल पड़े । भारत में ही दोस्तों ने कहा था कि कैंडी ज़रुर जाइएगा । श्रीलंका की सब से खूबसूरत जगह है । अफ़सोस बहुत हुआ कैंडी न जा पाने पर । पर करते भी तो क्या करते । खैर , केजल्ल  मावलेन , रामबड़  , वेलिमा ,  , पुसलेवान , गाम पोवर , पेरादेनिया और खड़गन्नाव जैसे शहरों से गुज़रते हुए रास्ते भर चाय बागानों का हुस्न , उन की मादक हरियाली मन में उफान भरती रही । हम ने दार्जिलिंग , गैंगटोक और गौहाटी के चाय बागान भी देखे हैं , उन का हुस्न और अंदाज़ भी जाना है लेकिन श्रीलंका के चाय बागानों के हुस्न के क्या कहने । रास्ते भर हम हरियाली पीते रहे और मन जुड़ाता रहा । इतना कि अपनी ही एक ग़ज़ल के मतले का शेर याद आ गया :

कभी जीप तो कभी हाथी पर बैठ कर जंगल-जंगल फ़ोटो खींच रहा हूं
अपने भीतर तुम को चीन्ह रहा हूं मैं तो हर पल हरियाली बीन रहा हूं

हम ने इस रास्ते में सिर्फ़ चाय बागान ही नहीं देखे बल्कि चाय के कुछ पेड़ भी देखे । हमारी दुभाषिया सुभाषिनी जी इन सारे विवरणों से हमें निरंतर परिचित और समृद्ध करवाती रहीं । सुभाषिनी श्रीलंका की ही हैं । लेकिन सिंहली , और हिंदी पर पूरा अधिकार रखती हैं । इस भाषा से उस भाषा में बात को चुटकी बजाते ही बता देना , रख देना सुभाषिनी के लिए जैसे बच्चों का खेल था । एक राष्ट्रपति वाले कार्यक्रम में हमें एक हियर रिंग दिया गया था जिस से सिंहली का अनुवाद फौरन हिंदी में मिल जाता था । चाहे जिस भी किसी का संबोधन हो । लेकिन बाक़ी जगहों पर सुभाषिनी ही हम लोगों को हिंदी और स्थानीय लोगों को सिंहली में हमारी बात बताती रहीं । चाहे भाषण हो या बातचीत । सुभाषिनी हर कहीं किसी पुष्प की सुगंध की तरह अपनी पूरी सरलता के साथ उपस्थित रहतीं । कोई रास्ता हो , कार्यक्रम हो हर कहीं सुभाषिनी अपने सुभाषित के साथ उपस्थित । सुभाषिनी श्रीलंका रेडियो में तो काम कर ही चुकी हैं , लखनऊ के भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय में संगीत की शिक्षा भी ले चुकी हैं । लखनऊ आ कर ही उन्हों ने हिंदी सीखी थी । इस हरे-भरे मदमाते रास्ते में अंबे पुस रेस्टोरेंट में हम लोगों ने लंच लिया । इस रेस्टोरेंट में भी हिंदी फ़िल्मी गाने सुनाने वाले लोग मिले । एक से एक गाने । परदेस में संगीतमय लंच की ऐसी यादें मन की अलमारी में सर्वदा अपने टटकेपन के साथ उपस्थित रहती हैं । इस बात को शायद इस रेस्टोरेंट के प्रबंधन के लोग बेहतर जानते हैं । श्रीलंका के शहर दर शहर घूमते हुए , वहां की समृद्धि को देखते हुए यह विश्वास नहीं होता कि कोई बारह बरस पहले 2004 में आई सुनामी से यह देश बुरी तरह बरबाद हो गया था । विनाश का एक भी निशान नहीं । यह आसान नहीं है । बहुत बड़ी बात है ।

हम लोग सांझ घिरते-घिरते कोलंबो आ गए । उसी पुराने होटल माउंट लेवेनिया में ठहरे जहां भारत से आ कर पहली रात ठहरे थे । हम तो चाहते थे कि हमें फिर से वही हमारा पुराना कमरा मिल जाए । सागर के सौंदर्य और उस के शोर का वही नज़ारा मिल जाए । लेकिन नहीं  मिला । कमरा दूसरा मिला पर यह कमरा भी समुद्र की लहरों की लज्ज़त लिए हुए था । तासीर वह  नहीं थी , नज़दीकी भी वह नहीं थी पर लहरों की सरग़ोशी और सौंदर्य तो वही था । लहरों का शोर और उस की उछाल वही थी । लेकिन वह पहले सी मुहब्बत नहीं थी । फैज़ ने लिखा ही है:

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग

मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था, मैने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

यही हुआ मेरे साथ भी । पर जो भी होता है , अच्छा ही होता है । यह कमरा भी अच्छा था । उस कमरे का हुस्न जुदा था तो इस कमरे का अपना हुस्न था । मुझे तो बस सागर और उस के सौंदर्य से आशिक़ी करनी थी , उसी से मतलब था । और आशिक़ी जैसे भी हो निभा लेने में ही सुख है । आकाश और धरती उस में आड़े नहीं आते । मैं ने निभाया । सागर की लहरों का शोर और दूधिया लहरों की उछाल ऐसी थी गोया आप की माशूक़ा आप के ऊपर अनायास ही , अचानक ही सवार हो जाए । और आप हकबक रह जाएं । मारे प्यार के । प्यार का बुखार होता ही ऐसा है । रोमांस का ज्वार जैसे मुझ पर ही नहीं सागर पर भी सवार था । दोनों ही सुर्खुरु थे । रात में हम लोग फेयरवेल पार्टी में पहुंचे । आत्मीयता और मेहमाननवाज़ी की नदी यहां भी बहती मिली ।  आज इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट की 67 वीं वर्षगांठ भी थी । जिसे केक काट कर उपाध्यक्ष हेमंत तिवारी के नेतृत्व में मनाई गई । जनरल सेक्रेटरी परमानंद पांडेय दो दिन पहले ही भारत जा चुके थे । हेमंत  तिवारी ने अध्यक्ष मल्लिकार्जुनैया की उपस्थिति में बहुत भावुक कर देने वाला भाषण भी इस मौक़े पर दिया । श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन के साथियों ने भी भाव-विभोर किया अपने उदबोधन में । हम लोगों की पूरी यात्रा पहले 30 अक्टूबर तक की तय थी । पर 30 अक्टूबर को दीपावली पड़ जाने के कारण कार्यक्रम तितर-बितर हुआ । दो दिन पहले ही सब कुछ समेटना पड़ा । 29 अक्टूबर को दिन में कुछ साथी भारत के लिए चले गए । लेकिन हमारी फ्लाइट 30 अक्टूबर की सुबह की थी । हम 29 अक्टूबर को भी रहे । कुछ और साथी भी । कर्नाटक , उड़ीसा और उत्तराखंड के साथी भी रहे ।

29 अक्टूबर की सुबह जब डाइनिंग हाल में हम ब्रेकफास्ट के लिए पहुंचे तो दीपावली का सा नज़ारा था । रंगोली सजी हुई थी । दिये जल रहे थे । भारतीय मिठाइयां सजी हुई थीं । जलेबी , रसमलाई , चावल की खीर , बादाम की खीर । होटल स्टाफ़ हैपी दीपावली बोल रहा था । हम चकित थे । शाम को भी इंडियन कल्चर सेंटर में दीपावली का आयोजन था । सुश्री शिरीन कुरेशी ने मुझे इस दीपावली कार्यक्रम में पहले ही से आमंत्रित कर रखा था । सुश्री शिरीन कुरेशी भारत की ही हैं । इंदौर की रहने वाली हैं । कोलंबो में दो साल से हैं । उन के पिता मोहम्मद नवाब हसन कुरेशी भी साथ रहते हैं । शेरो शायरी और फ़िल्मी गानों के बेहद शौक़ीन ।

होटल माऊंट लेवेनिया जहां हम ठहरे हुए थे इंडियन कल्चर सेंटर के अब्दुल गफूर मुझे लेने आए । साथ में चमोली के देवेंद्र सिंह रावत ने भी चलने की इच्छा जताई तो मैं ने कहा चलिए । हम लोग जब इंडियन कल्चर सेंटर पहुंचे तो वहां तो भारी भीड़ थी । मुझे लगा था कि कोई औपचारिक सा सरकारी कार्यक्रम होगा । संक्षिप्त सा । लेकिन शिरीन जी ने तो न सिर्फ़ लोगों को इकट्ठा कर रखा था बल्कि दीपावली की पूजा , दिया , संगीत , मिठाई और पटाखे का दिलकश बंदोबस्त भी कर रखा था । इस में भारतीय लोग भी थे और श्रीलंका के स्थानीय लोग भी । बल्कि स्थानीय लोग ज़्यादा थे । और अच्छी – खासी हिंदी बोलते और फ़िल्मी गाने गाते हुए ।  मैं ने वहां दीप जलाया , पूजन किया । श्रीमती अंजली मिश्रा ने इस में मेरी मदद की । आरती गाई। श्रीमती अंजलि मिश्र हैं तो मध्य प्रदेश की लेकिन उन का ननिहाल बनारस में है । सो वह भोजपुरी भी बढ़िया जानती थीं । उन से भोजपुरी में भी बात हुई । भारत की बेटी अंजलि मिश्र भी अब श्रीलंका की बहू हैं । लेकिन अपनी परंपराओं को जीती हुई । यहां वह यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं । इस दीपावली के मौके पर अपनी एक ग़ज़ल यह मन के दीप जलने का समय है तुम कहां हो भी सुनाई मैं ने । जिसे भाव-विभोर हो कर सुना भी लोगों ने ।

यह मन के दीप जलने का समय है तुम कहां हो
प्राण में पुलकित नदी की धार मेरी तुम कहां हो

रंगोली के रंगों में बैठी हो तुम , दिये करते हैं इंकार जलने से
लौट आओ वर्जना के द्वार सारे तोड़ कर परवाज़ मेरी तुम कहां हो

लौट आओ कि दीप सारे पुकारते हैं तुम्हें साथ मेरे
रौशनी की इस प्रीति सभा में प्राण मेरी तुम कहां हो

देहरी के दीप नवाते हैं बारंबार शीश तुम को
सांझ की इस मनुहार में आवाज़ मेरी तुम कहां हो

न आज चांद दिखेगा , न तारे , तुम तो दिख जाओ
सांझ की सिहरन सुलगती है , जान मेरी तुम कहां हो

हर कहीं तेरी महक है , तेल में , दिये में और बाती में
माटी की खुशबू में तुम चहकती,  शान मेरी तुम कहां हो

घर का हर हिस्सा धड़कता है तुम्हारी निरुपम मुस्कान में
दिल की बाती जल गई दिये के तेल में , आग मेरी तुम कहां हो

सांस क्षण-क्षण दहकती है तुम्हारी याद में , विरह की आग में तेरी
अंधेरे भी उजाला मांगते हैं तुम से  , अरमान मेरी तुम कहां हो

यह घर के दीप हैं , दीवार और खिड़की , रंगोली है , मन के पुष्प भी
तुम्हारे इस्तकबाल ख़ातिर सब खड़े हैं , सौभाग्य मेरी तुम कहां हो

फिर हिंदी फ़िल्मों के गाने गाए गए । मिठाई खाई गई और पटाखे छोड़े गए । इस कार्यक्रम में भारतीय मूल के लोग भी थे लेकिन श्रीलंका मूल के लोग ज़्यादा थे । ख़ास कर हिंदी बोलते और हिंदी गाने गाते बच्चे । भारत में हिंदी भले उपेक्षित हो रही हो लेकिन श्रीलंका में हिंदी गर्व का विषय है। हिंदी गाने गाने वाले लोग श्रीलंका मूल के ही लोग थे । श्रीलंका मूल की स्नेहा मिलीं । धाराप्रवाह हिंदी बोलती हुई । अभी पढ़ती हैं । पांच मिनट की बातचीत में स्नेहा  मेरी बेटी बन गईं । मैं ने उन्हें बताया कि बेटियां तो साझी होती हैं । चाहे वह कहीं की भी हों । तो वह और खुश हो गईं । इंडियन कल्चर सेंटर से अब्दुल गफूर फिर हमें होटल तक छोड़ गए । अब्दुल गफूर भी इंडियन कल्चर सेंटर में हैं और भारत में गुजरात के रहने वाले हैं । सपरिवार रहते हैं श्रीलंका में बीते कई बरस से । बच्चे बड़े हो गए हैं । बच्चे कारोबारी हैं । अपना-अपना व्यवसाय करते हैं । कोलंबो में ही । कोलंबो की सड़कों पर जैसे भारतीय बाज़ार ही सजा दीखता है । हच और एयरटेल  की मोबाईल सर्विस एयरपोर्ट से ही दिखने लगती है । पूरे श्रीलंका में दिखती है । नैनो की टैक्सियां भी बहुतेरी । अशोक लेलैंड की बसें । बजाज की थ्री ह्वीलर । एशियन पेंट्स और बाटा की दुकानें वहां आम हैं । चाइनीज सामानों से यहां के बाज़ार भी अटे पड़े हैं । वैसे ही बढ़ते हुए माल , वैसे ही दुकानें । मोल-तोल करते लोग । वैसे ही रेस्टोरेंट , वैसे ही लोग । जैसे भारतीय । खैर , हम लौटे इंडियन कल्चर सेंटर से । पैराडाइज बीच पर गए । अंधेरे में भी समुद्र की लहरों का रोमांस जिया । लहरों के साथ टहले । बीच पर ही एक रेस्टोरेंट में कैंडिल लाईट डिनर किया । समुद्र की लहरों को चूमते हुए टहलते रहे । फिर समुद्र देवता को प्रणाम किया और होटल लौटे ।

अब हम फिर भंडारनायके एयरपोर्ट पर थे । ऊंघते हुए एयरपोर्ट पर भी हिंदी फ़िल्मी गाने बज रहे थे । इंस्ट्रूमेंटल म्यूजिक में । बहुत प्यार करते हैं तुम को सनम । सुन कर हम भी गाना चाहते हैं बहुत प्यार करते हैं श्रीलंका को हम ।  पासपोर्ट पर वापसी के लिए इमिग्रेशन की मुहर लग चुकी है । हम जहाज में हैं और जहाज रनवे पर ।  एयरपोर्ट भी समुद्र किनारे ही है । उड़ान भरते ही नीचे समुद्र दीखता है । लहराता हुआ । कोलंबो शहर छूट रहा है । श्रीलंका छूट रहा है । एक ही द्वीप में बसा हिंद महासागर का यह मोती छूट रहा है । अपनी ख़ूबसूरत पहाड़ियों में धड़कते हुए , कुछ सोए , कुछ जगे समुद्र किनारे बसे इस देश को छोड़ आया हूं। फिर-फिर जाने की ललक और कशिश लिए हुए ।  नीचे छलकता समुद्र है ऊपर आकाश में लालिमा छाई हुई है । आसमान में छाई लालिमा जैसे दिया बन कर जल रही है और दीवाली मना रही है । जगर-मगर दीवाली । यह तीस अक्टूबर , 2016 की अल्लसुबह है । प्रणाम इस सुबह को । प्रणाम श्रीलंका की धरती को । श्रीलंका के राष्ट्र गान में श्रीलंका को आनंद और विजय की भूमि कहा गया है । इस आनंद और विजय की भूमि को हम राम के विजयधाम के रुप में भी जानते हैं । इस लिए भी प्रणाम । प्रणाम अभी , बस अभी आने वाली अपनी धरती को । स्तुति श्रीलंका !

श्रीलंका के कोलंबो में स्थित इंडियन कल्चरल सेंटर में ग़ज़ल गायन करते पत्रकार दयानंद पांडेय.

इस यात्रा वृत्तांत के लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. विविध विषयों और भावों पर दयानंद के लेखन / रचना को पढ़ने के लिए उनके ब्लाग सरोकारनामा पर जा सकते हैं.

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रेल में हवाई यात्रा के सुख बनाम भारतीय रेल

कल 08792 निजामुद्दीन-दुर्ग एसी सुपरफास्ट स्पेशल से वास्ता पड़ा। निजामुद्दीन से चलने का ट्रेन का निश्चित समय सवेरे 830 बजे है सुबह सात बजे नेशनल ट्रेन एनक्वायरी सिस्टम पर चेक किया तो पता चला ट्रेन राइट टाइम जाएगी। यहीं से चलती है इसलिए कोई बड़ी बात नहीं थी। स्टेशन पहुंचा तो बताया गया प्लैटफॉर्म नंबर चार से जाएगी। प्लैटफॉर्म पर पहुंच गया तो घोषणा हुई (संयोग से सुनाई पड़ गया वरना देश भर में कई स्टैशनों के कई प्लैटफॉर्म पर घोषणा सुनाई नहीं पड़ती है और हम कुछ कर नहीं सकते) कि ट्रेन एक घंटे लेट है। परेशान होने के सिवा कुछ कर नहीं सकता था।

ट्रेन नए निर्धारित समय से खुली और कोई 23 मिनट मेकअप करती हुई 37 मिनट लेट ग्वालियर से रवाना हुई। फिर भारतीय रेल के रूप में आ गई और लेट होते हुए सुबह एक घंटा 40 मिनट देर से दुर्ग पहुंच गई। वैसे तो भारतीय रेल अपनी बीमारियों से 67 साल जूझती रही है और किसी को कोई उम्मीद पहले भी नहीं थी पर नरेन्द्र मोदी सरकार बनने के बाद चार्टर्ड अकाउंटैंट रेल मंत्री ने यात्रियों की जेब काटने के ढेरों बंदोबस्त किए हैं और उसमें एसी सुपरफास्ट स्पेशल जैसी ट्रेन चलाई है जिसमें एक दिन पहले भी बगैर किसी तत्काल, वीआईपी या फ्लेक्सी फेयर के नीचे के दो बर्थ आमने-सामने मिल जाते हैं। और लगभग खाली ट्रेन बुजुर्ग यात्रियों को बगैर वरिष्ठ नागरिकों वाली छूट के देर से ही सही, आराम से गंतव्य तक पहुंचा देती है।

इस तरह बुजुर्गों के पास बच्चों का कमाया पैसा है तो उन्हें आराम भी मिल ही रहा है। पर रेलयात्रा को किराये से लेकर अन्य तरह से भी हवाई यात्रा बनाने की कोशिशों को पूरा होने में अभी बहुत देर है और उसमें सबसे बड़ी बाधा है ट्रेन का लेट चलना। बाकी स्टेशन पर लिफ्ट, एसक्लेटर न होना, बैठने के लिए बेंच से लेकर पंखों तक का अकाल और कुलियों की लूट-मनमानी के तो कहने ही क्या हैं। लेकिन वो सब कोई मुद्दा नहीं है। जनता के पैसे से चलने वाली ट्रेन का उद्देश्य जनता को लूट कर मुनाफा कमाना हो गया है यह समझने की भी जरूरत नहीं है।

अब रेल यात्रा को हवाई यात्रा बनाने की बात चली ही है तो यह भी बता दूं कि कल निजामुद्दीन स्टेशन पर शताब्दी जैसी एक ट्रेन आकर लगी तो माथा ठनका। निजामुद्दीन से कौन सी शताब्दी? याद आया, थोड़ी देर पहले विमान परिचारिका जैसी यूनिफॉर्म में कुछ सुंदर स्मार्ट लड़कियां खड़ी थीं, अब नजर नहीं आ रही हैं। ट्रेन से ये विमान परिचारिकाएं कहां जा रही हैं? दिमाग चला और समझ में आ गया कि ये गतिमान एक्सप्रेस है और परिचारिकाएं विमान की नहीं, गतिमान एक्सप्रेस की थीं। इस पर याद आया कि जब गतिमान एक्सप्रेस चलने की घोषणा हुई थी तो भक्तों ने उसका कितना शानदार प्रचार किया था।

विदेशी ट्रेन से लेकर बड़े-बड़े विमानों के अंदर के दृश्यों की फोटो चिपकाकर उन्हें गतिमान एक्सप्रेस बताया था। कुछ अखबारों और मीडिया चैनलों के वेब पन्नों ने भी यह करामात “चित्र : सिर्फ समझने के लिए” जैसे जुमलों के साथ किया था। बाद में हुई निराशा का अंदाजा इस बात से लगता है कि ट्रेन चलनी शुरू हुई तो किसी भक्त यात्री ने उस पर कुछ नहीं लिखा। दरअसल भक्त सिर्फ तारीफ करते हैं. निन्दा नहीं। निन्दा की अपेक्षा वे हमसे करते हैं पर सरकार की नहीं, विरोधी दलों की।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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दो दिनी अलीगढ़ यात्रा : जिया, मनोज, प्रतीक जैसे दोस्तों से मुलाकात और विनय ओसवाल के घर हर्ष देव जी का साक्षात्कार

पिछले दिनों अलीगढ़ जाना हुआ. वहां के छात्रनेता और पत्रकार ज़ियाउर्रहमान ने अपनी पत्रिका ‘व्यवस्था दर्पण’ के एक साल पूरे होने पर आईटीएम कालेज में मीडिया की दशा दिशा पर एक सेमिनार रखा था. सेमिनार में सैकड़ों इंजीनियरिंग और एमबीए छात्रों समेत शहर के विशिष्ट जन मौजूद थे. आयोजन में शिरकत कर और युवाओं से बातचीत कर समझ में आया कि आज का युवा देश और मीडिया की वर्तमान हालत से खुश नहीं है. हर तरफ जो स्वार्थ और पैसे का खेल चल रहा है, वह सबके लिए दुखदायी है. इससे आम जन की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. सेमिनार में मैंने खासतौर पर मीडिया में आए भयंकर पतन और न्यू मीडिया के चलते आ रहे सकारात्मक बदलावों पर चर्चा की. बड़े मीडिया घरानों के कारपोरेटीकरण, मीडिया में काले धन, मीडिया में करप्शन जैसे कई मामलों का जिक्र उदाहरण सहित किया. 

अलीगढ़ शहर में पहली बार गया था. वहां शहर में सेंट्रल प्वाइंट स्थित मीनार होटल में मुझे ठहराया गया था. प्रोग्राम के बाद अलीगढ़ के जाने माने फोटो जर्नलिस्ट मनोज अलीगढ़ी के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) देखने के लिए निकला. मनोज ने एक बेहतरीन गाइड की तरह अपनी कार में बिठाकर न सिर्फ एएमयू घुमाया बल्कि शहर के चर्चित स्थलों, इमारतों, सड़कों आदि से भी परिचय कराया. मनोज अलीगढ़ी इन दिनों आगरा के ऐतिहासिक स्थलों पर काम कर रहे हैं और उनकी फोटो स्टोरी अमर उजाला में प्रकाशित हो रही है. साथ ही उनके चर्चित फोटो अन्य दूसरे बड़े स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों में छपते रहते हैं. मनोज अलीगढी का फोटोग्राफी के प्रति जुनून देखने लायक था. वे हर पल कुछ नया करने, कुछ नया क्लिक करने, कुछ नया रचने के बारे में सोचते रहते हैं.

जिस युवा और उत्साही पत्रकार ज़ियाउर्रहमान उर्फ ज़िया ने मीडिया पर केंद्रित सेमिनार का आयोजन किया था, वे खुद अपने आप में एक संस्थान की तरह दिखे. छोटी उम्र में उन्होंने छात्र राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र में जिस सक्रिय नेतृत्वकारी भूमिका में काम किया, वह सराहनीय है. बेहद कम उम्र से ही वह अपने आसपास के अंतरविरोधों और उलटबांसियों से दो-दो हाथ करते हुए आज अनुभवों का पिटारा अपने पास रखे हैं. इस आयोजन में उन्होंने बहुत सारे बड़े लोगों, नेताओं, मंत्रियों, अफसरों आदि को बुलाया था लेकिन उनमें से कोई नहीं आया. ज़ियाउर्रहमान ने मंच से कहा कि इस आयोजन ने उनको बहुत सारे सबक दिए हैं. जिया की सक्रियता के कारण उनके ढेर सारे विरोधी भी अलीगढ़ में पैदा हो गए हैं जिनने कार्यक्रम असफल करने की पूरी कोशिश की लेकिन हुआ उल्टा. प्रोग्राम जबरदस्त रूप से सफल रहा. हां, जिन जिन ने आने का वादा किया था और उनके नाम होर्डिंग्स बैनर पर छापे गए थे, उनके न आने से जिया को थोड़ा झटका तो जरूर लगा दिख रहा था. पर वह इस अनुभव का इस्तेमाल आगे के जीवन, आयोजन में करने को तत्पर दिख रहे थे. वो कहते हैं न कि कोई भी युवा अपने जोश जज्बे के कारण समय के साथ व्यावहारिक पहलुओं-अनुभवों से वाकिफ होता जाता है और इस प्रकार पहले से ज्यादा मेच्योर होता जाता है.

बुके देकर सम्मानित करते सीनियर फोटो जर्नलिस्ट मनोज अलीगढ़ी

तस्वीर में सबसे बाएं सोशल मीडिया के चर्चित चेहरे वसीम अकरम त्यागी दिख रहे हैं और कार्यक्रम के आयोजक जियाउर्रहमान खड़े होकर श्रोताओं की तरफ जाने को उन्मुख दिख रहे हैं.

तस्वीर में खचाखच भरा हाल दिख रहा है और कार्यक्रम आयोजक जियाउर्रहमान खड़े कुछ चिंतन मनन करते दिख रहे हैं. 

सबसे दाएं गोरखपुर से आए पत्रकार साथी राशिद और बाएं से दूसरे एडवोकेट प्रतीक चौधरी संग कार्यक्रम की याद सहेजने के वास्ते फोटोग्राफी. 

जिया के एक साथी हैं एडवोकेट प्रतीक चौधरी. वकालत के क्षेत्र में प्रतीक ने अपने जन सरोकारी रवैये के कारण कम समय में अच्छा खासा नाम कमाया है. उन्होंने गरीबों को न्याय दिलाने के वास्ते तरह तरह से लड़ाई छेड़ रखी है और उनके साथ बहुत सारे लोग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं. प्रतीक ने अलीगढ़ शहर में प्रदूषण से लेकर पुलिस उत्पीड़न तक के मामलों में लंबी लड़ाई लड़ी और उद्यमियों, अफसरों, नेताओं को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.

कार्यक्रम के अगले दिन अलीगढ़ निवासी वरिष्ठ पत्रकार विनय ओसवाल जी के घर दोपहर के खाने पर जाने का कार्यक्रम बना. मैं, जिया और प्रतीक एक एक कर विनय ओसवाल जी के घर पहुंचने लगे. विनय ओसवाल जी नवभारत टाइम्स में लंबे समय तक हाथरस के संवाददाता रहे. उन्होंने पत्रकारिता को कभी कमाई का जरिया नहीं बनाया. पैसे कमाने के लिए उन्होंने बतौर उद्यमी कई काम शुरू किए और आज वह अपनी फैक्ट्रीज का संचालन करके पूरे परिवार को सम्मानजनक जीवन दे सके हैं. वे अब फिर पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं. ब्लाग, वेब, सोशल मीडिया के माध्यम से वह खरी खरी बात कहने लिखने लगे हैं.

विनय ओसवाल जी ने बताया कि उनके घर पर थोड़ी ही देर में नवभारत टाइम्स दिल्ली में कई दशक तक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत रहे हर्षदेव जी आने वाले हैं. हर्षदेव जी का नाम तो मैंने सुन रखा था लेकिन उनसे मुलाकात नहीं हुई थी. जब वो आए तो तुरंत उनका एक वीडियो इंटरव्यू किया, जिसे आप इस लिंक https://www.youtube.com/watch?v=LGArckWHAIU पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं.

विनय ओसवाल जी (दाएं) के अलीगढ़ स्थित आवास पर वरिष्ठ पत्रकार हर्ष देव (बीच में) के साथ दोपहर का भोजन.

विनय ओसवाल ने सभी लोगों को दोपहर के भोजन में उत्तर और दक्षिण भारतीय व्यंजन परोसकर दिल जीत लिया. सबने तबीयत से खाया और विनय ओसवाल जी की सेवा भावना और आतिथ्य की सराहना की. मेरे लिए अलीगढ़ की दो दिन की यात्रा यादगार रही. कई नए साथी मिले. कई नए किस्म के अनुभव हुए. लगा कि दुनिया में अच्छे लोग हैं, बस वे बिखरे हैं, उनकी अखिल भारतीय या प्रादेशिक स्तर पर कोई यूनिटी नहीं है. यह भी समझ आया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अगले पांच दस सालों में बड़े बदलाव से गुजरेगी क्योंकि युवाओं के बीच से ऐसे ऐसे लोग सामने आ रहे हैं जो बिना भय खौफ सच कहने और सच को जीने का साहस रखते हैं. थैंक्यू दोस्तों, दो दिन की अलीगढ़ यात्रा के दौरान आप सबने मेरा दिल जीत लिया.

एएमयू के मुख्य द्वार पर यशवंत. तस्वीर : मनोज अलीगढ़ी

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.


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पत्रकार बिनोद रिंगानिया की नौ दिनी यूरोप यात्रा : चोर का उदाहरण देने के लिए नीग्रो की तस्वीर लगाई!

पोट्सडम की धूप में इतिहास की झलक

यूरोपीय शहरों में सैलानी के तौर पर घूमने वाले यूरोपीय या अमरीकी नागरिकों के लिए आकर्षण का केंद्र वहां के दर्शनीय केंद्र होते हैं, जैसे म्यूजियम और पुराने ऐतिहासिक स्थल। लेकिन जहां तक मुझ जैसे भारतीय पर्यटकों का सवाल है तो सच्चाई यह है कि उनके लिए तो वहां की ट्रैफिक व्यवस्था, समाज व्यवस्था, वहां का आम वास्तुशिल्प, वहां का शिष्टाचार, वहां की ट्रेनें और बसें – ये सब अधिक आकर्षण का केंद्र होते हैं। अपनी नौ दिन की यूरोपीय यात्रा के दौरान वहां के तीन देशों के चार शहर मेरे लिए नमूने के तौर पर थे और इन शहरों के माध्यम से मैंने यूरोप का अधिक से अधिक अपने अंदर सोखने की कोशिश की।

हर महीने यूरोप-अमरीका की यात्रा पर जाने वालों को यह परम स्वाभाविक लगता होगा कि वहां सड़कों पर आदमी बिल्कुल दिखाई नहीं देते। लेकिन पहली बार पश्चिम जाने वाले के लिए यह किसी सांस्कृतिक धक्के से कम नहीं होता। सड़कों पर इतने कम लोग कि किसी से कुछ पूछना हो तो आप पूछ ही नहीं सकते। सड़कों पर लोगों की तादाद दिन के तापमान पर काफी हद तक निर्भर करती है। यदि ठंड कम हो तो आपको काफी लोग बाहर मिल जाएंगे वरना ठंड के कारण लोग अंदर रहना ही पसंद करते हैं।

मौसम यूरोप में बातचीत का एक अहम मुद्दा होता है और अक्सर बातचीत शुरू करने का एक बहाना। हमारे यहां भी मौसम पर काफी बात होती है। लेकिन दोनों में एक फर्क है। हमारे यहां लगभग हमेशा यह कहा जाता है कि ओह, इतनी अधिक गर्मी इससे पहले नहीं पड़ी, या फिर पूर्वोत्तर के राज्यों में यह कहा जाता है इतनी अधिक बारिश पहले कभी नहीं हुई। लेकिन हमारे यहां तापमान हमारी उम्मीद के अनुसार ही ऊपर-नीचे होता है। जबकि पश्चिमी मौसम का मिजाज पहचानना काफी मुश्किल होता है। आप कहीं दूसरे शहर में दो-तीन दिनों के लिए जाते हैं स्वेटर, जैकेट आदि लेकर और देखते हैं कि वहां तुषारपात यानी स्नोफाल शुरू हो गया। ऐसे में आपकी स्थिति काफी विकट हो जाती है। मेरी यात्रा का महीना अप्रैल था और दिन के तापमान को 10 – 12 डिग्री के आसपास होना था। लेकिन वापसी के दिन तापमान तेजी के साथ गिरना शुरू हो गया। और वापस आने के बाद मित्रों ने मेल पर बताया कि तापमान काफी नीचे गिर गया और तुषारपात भी हुआ।

धूप को पश्चिम में प्रकृति के तोहफे के तौर पर लिया जाता है। अब समझ में आया कि क्यों पश्चिमी साहित्य में अक्सर ब्राइट सनी डे के बखान के साथ कोई बात शुरू की जाती है। धूप हमारे यहां की तरह वहां साल के बारहों महीने और रोजाना नहीं निकलती। इसलिए धूप निकलने पर उसका आनंद लेने का भी पश्चिम में रिवाज है। बर्लिन के पास पुराने प्रुशिया साम्राज्य की राजधानी पोट्सडम में जब मैं किराए की साइकिल से आसापास के इलाके की सैर करने निकला तो उस दिन सौभाग्य से अच्छी धूप निकली थी। पोट्सडम में देखा कि एक ग्रामीण सी दिखती नदी के किनारे लोग एक रेस्तरां के पास आरामकुर्सियों पर लेटे हुए धूप का आनंद ले रहे हैं। वहीं एक बीयर गार्टन में लोग बीयर की चुस्कियां लेकर समय बिता रहे हैं। जबकि यह कोई सप्ताहांत नहीं था। जर्मनी में बियर गार्टन की बड़ी महिमा है। चेस्टनट के पेड़ के नीचे घंटों तक बीयर की चुस्कियां लेते लोग आपको किसी भी धूप वाले दिन दिखाई दे जाएंगे।

पोट्सडम का नाम इतिहास में इसलिए भी दर्ज है कि वहीं द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त करने वाली संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। विश्व के सभी बड़े राजनीतिक नेता वहां जमा हुए थे। स्टालिन भी आया था। पोट्सडम की किसी ग्रामीण-सी सड़क किनारे बने इन खूबसूरत (आम तौर पर दोमंजिला) भवनों में इन दिनों फिल्म स्टार रहते हैं। कहने का मतलब कि जिनके पास बहुत अधिक पैसा है वैसे लोग। जिस मकान में स्टालिन ठहरा था मैंने उसके सामने जाकर फोटो खिंचवाई। उस निर्जन सी सड़क का नाम कार्ल मार्क्स स्ट्रीट रख दिया गया है। पूर्वी जर्मनी के जमाने में यह नाम रखा गया था और दोनों जर्मनी एक होने के बाद भी नाम बदले नहीं गए। बार-बार नाम बदलना कोई अच्छी बात नहीं है। आखिर नाम के माध्यम से भी तो इतिहास का पता चलता है।

पोट्सडम के एक ओर पूर्वी जर्मनी पड़ता है और दूसरी ओर पश्चिमी जर्मनी। लेकिन नदी के पार भी कुछ हिस्सा एक-दूसरे के हिस्से का है। नदी पर जो पुल बने हुए हैं उसका भी आधा-आधा हिस्सा बंटा हुआ था। पुल पर किए गए हरे रंग के फर्क को साफ देखा जा सकता है। आधे पुल पर घटिया किस्म का रंग किया हुआ दिखाई देता है वह कम्यूनिस्ट पूर्वी जर्मनी की तरफ का हिस्सा था और दूसरे हिस्सा का रंग ज्यादा चमकदार है। मेरा मित्र माइक मुझे बताते चलता है कि यह देखो यहां-यहां दीवार थी। दीवार कहां-कहां थी उसके चिह्नों को सुरक्षित रखा गया है।

बर्लिन में दीवार की चर्चा के बिना कोई बात पूरी नहीं होती। एक ही शहर, एक ही जाति, एक ही भाषा बोलने वाले लोगों को सिर्फ राजनीति की वजह से अचानक दो भागों में बांट दिया जाता है। इस त्रासदी को हम भारतीय ठीक से नहीं समझ सकते। क्योंकि यहां भारत और पाकिस्तान के बंटवारे में दोनों तरफ की आबादी में सांस्कृतिक भेद था। कोई कुछ भी कहे लेकिन अविभाजित भारत के दोनों हिस्सों में ऐसे लोग बहुतायत में थे जो चाहते थे कि बंटवारा हो जाए और आबादी भी अदल-बदल हो जाए। जबकि जर्मनी का बंटवारा बिल्लियों को मूर्ख बनाने वाली बंदरबांट जैसी थी। इसलिए जर्मनी (या बर्लिन) के बंटवारे और भारत के बंटवारे में समानता नहीं खोजी जा सकती। जो भी हो, जर्मन लोगों ने इस कटु स्मृति को संजोकर रखा है ताकि आने वाली पीढ़ियां ऐसी त्रासदी को टालने के लिए तैयार रहें।

बंटवारे में मेट्रो ट्रेन (वहां बाह्न कहा जाता है) वहां पूर्वी जर्मनी के हिस्से में आई थी। वह शहर के हिस्से तक जाती और पूर्वी से पश्चिमी बर्लिन जाने वालों को जांच से गुजरना पड़ता। बहुत कम ही लोगों को पूर्वी से पश्चिमी बर्लिन जाने की इजाजत थी। जिस स्टेशन पर यह गाड़ियों की बदली होती थी उसे अब हाउस ऑफ टियर्स कहा जाता है, क्योंकि लोग अपने रिश्तेदारों को यहां आंसुओं के साथ विदा करते थे। अब इसे म्यूजियम बना दिया गया है। एक गाइड आपके पास आता है और कहेगा कि सबकुछ मुफ्त है लेकिन आप इतने यूरो दें और आपको और भी अधिक विस्तार से बताया जाएगा। आखिर बिजनेस कहां नहीं है।

बर्लिनः दीवार को भूल नहीं पाएगी एक पीढ़ी

जर्मनी की राजधानी बर्लिन में उतरकर वैसा कोई कल्चर शॉक नहीं लगा जैसा कहते हैं पश्चिमी लोगों को एशियाई शहरों, खासकर भारत, में आते ही लगता है। खासकर भारत में आते ही यहां की आबादी उन्हें चौंका देती है। उन्हें सपने में भी यह आभास नहीं होता कि एक देश में इतने लोग हो सकते हैं। हर कहीं कतारें और लाइनें। आपाधापी। यूरोप में ऐसा कुछ नहीं होता। जर्मनी में भी नहीं था। इसका हमें पहले से अहसास था। शायद इसीलिए कल्चर शॉक से बच गए। हमारे यहां की तरह आपाधापी नहीं होने के कारण लगता है सबकुछ ठहरा हुआ है। हमारे यहां किसी छुट्टी या हड़ताल के दिन ही इतनी शांति होती है (या उस दिन भी नहीं होती), इसलिए दिमाग में यह बस गया है कि शांति यानी सबकुछ ठहरा हुआ। आपाधापी, धक्कामुक्की, चिल्लपों – यानी सबकुछ तेज गति से चल रहा है। तेज प्रगति।

30 लाख की आबादी वाले बर्लिन में साइकिल वालों की अच्छी खासी तादाद है।  साइकिल चलाने के लिए सड़कों के किनारे ही कॉरीडोर बने हुए हैं। ये सड़क से थोड़ा ऊंचे होते हैं, ताकि गाड़ी उस पर न चढ़ पाए, लेकिन इतने भी ऊंचे भी नहीं कि साइकिल से आसानी से सड़क पर नहीं उतरा जा सके। पहली बार पश्चिम जाने वाले किसी भारतीय के लिए हैरत में डाल देने वाली पहली चीज होती है वहां की यातायात व्यवस्था। सबकुछ इतना व्यवस्थित कि आप दो-तीन घंटे में ही किसी को भी पूछे बिना वहां अकेले घूमने-फिरने लायक हो जाते हैं। एक ही टिकट से आप मेट्रो, बस और ट्राम में यात्रा कर सकते हैं। मेट्रो से उतरकर बस में चढ़ जाएं, आगे बस नहीं जाती हो तो ट्राम में चढ़ जाएं। बार-बार टिकट कटवाने का झंझट नहीं। पूरे दिन का टिकट कटा लें तो फिर दोनों तरफ जितनी इच्छा यात्रा करें। इसी पैटर्न पर सिंगापुर की यातायात व्यवस्था है। इसीलिए उसे पूरब का यूरोपीय शहर कहते हैं। शहर में यातायात के लिए दिन भर के टिकट का 7 यूरो लगता है जबकि महीने भर के पास की कीमत लगभग 80 यूरो है।

भारतीय रुपए में बदलें तो यह 6000 रुपए होता है जोकि हमारे लिए बहुत अधिक है। लेकिन यदि कीमतों का अंतर समझना है तो एक यूरो को 20 से गुणा करना चाहिए, क्योंकि 20 रुपए में हम जितनी सामग्री खरीद पाते हैं उतनी सामग्री की कीमत वहां लगभग 1 यूरो है। इसे परचेजिंग पॉवर पैरिटी कहते हैं। यह किसी शहर में महंगाई के स्तर को जानने के लिए आसान तरीका है। इस तरह शहर में ट्राम-बस-मेट्रो का संयुक्त मासिक टिकट करीब 1600 रूपयों का हुआ। हालांकि पति और पत्नी एक ही पास का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन फिर भी यह हमारे यहां के लिए बहुत ज्यादा है। क्या इसीलिए हमारे यहां शहरी यातायात व्यवस्था इतने खस्ताहाल में है? क्योंकि व्यवस्था पर जितना खर्च होता है उतना सेवा लेने वालों से वापस नहीं मिलता। अंततः घाटे की भरपाई के लिए सरकार पर निर्भर होना पड़ता है। लेकिन सेवा देने वाली एजेंसी के पक्ष में एक चीज जाती है कि हमारे यहां मेट्रो, बस या ट्रेन किसी भी समय खाली नहीं जाती। इसलिए एजेंसी को लागत की पूरी कीमत वापस मिल जाती है। और खड़े होकर, लटक कर यात्रा करने वाले यात्रियों से मिलने वाले पैसे को अतिरिक्त आय समझ लीजिए। वहां कभी भी किसी ट्राम, बस या मेट्रो में मैंने आधी से ज्यादा सीटें भरी हुई नहीं देखी। ट्रेन का टिकट कटवाते समय आपसे पूछा जाएगा कि क्या आप रिजर्वेशन चाहते हैं। यानी ज्यादातर लोगों को रिजर्वेशन की जरूरत नहीं होती।

मुझे लगा कि आप बर्लिन में आंख मूंदकर भी सड़क पर चल सकते हैं। बस सामने ट्रैफिक की हरी और लाल बत्तियों को देखकर चलते रहिए। किसी भारतीय को शुरू शुरू में अजीब लग सकता है कि दूर-दूर तक कोई गाड़ी नहीं होने के बावजूद पैदल लोग बत्ती के हरी होने का इंतजार करते हैं। बत्ती लाल से हरी होने के बाद ही सड़क पार करते हैं।

म्यूजियमों से भरे बर्लिन में एक म्यूजियम ट्रैफिक की बत्तियों का भी है। ट्रैफिक के सिपाही को वहां एम्पलमैन कहा जाता है। इसलिए इस म्यूजियम का नाम एम्पलमैन्स म्यूजियम है। यहां ट्रैफिक की पुरानी डिजाइन की बत्तियों के अलावा यादगार के लिए संग्रहणीय विभिन्न तरह की सामग्रियों – जैसे कलम, ग्रीटिंग कार्ड, बटुआ, तस्वीरें, टोपियां – को ट्रैफिक की बत्तियों की थीम पर बनाया गया है। सैलानियों के संग्रह के लिए अच्छी चीज है।

एक म्यूजियम का नाम है स्पाई म्यूजियम है। हिटलर और बाद में पूर्वी जर्मनी के कम्यूनिस्ट शासन में चले अत्याचार में खुफिया पुलिस की खास भूमिका रही थी। दरअसल तानाशाही और खुफिया पुलिस का चोली-दामन का साथ है। जहां भी तानाशाही है, राज्यसत्ता का अत्याचार है वहां खुफिया पुलिस की महत्वपूर्ण भूमिका है। दरअसल बर्लिन में घूमते हुए आप तीन चीजों को नहीं भूल सकते। हिटलर के समय यहूदियों पर हुआ अत्याचार, 1989 तक जारी रहा जर्मनी और बर्लिन का विभाजन तथा जर्मनी का लोकतंत्र।

हेकेशर मार्केट में पहले के पूर्वी जर्मनी की साफ छाप दिखाई देती है। यहूदियों पर हुए अत्याचार की याद दिलाने वाला एक म्यूजियम है ओटो वाइट्ज का अंधों का कारखाना वाला म्यूजियम। ओटो वाइट्ज नामक जर्मन ने जूतों के ब्रश बनाने का एक कारखाना खोलकर उसमें अंधे यहूदियों को नियुक्त किया था ताकि उनकी जान बच जाए। हालांकि बाद में सभी यहूदी पकड़ लिए गए और उन्हें मार डाला गया। इस स्थान को एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है ताकि उस कहानी की यादगार सुरक्षित रहे। ओटो वाइट्ज स्पीलबर्ग की मशहूर फिल्म शिंडलर्स लिस्ट के शिंडलर का ही लघु संस्करण था। शिंडलर ने कोई दो-ढाई सौ यहूदियों की जान बचाई थी, जबकि ओटो वाइट्ज के कारखाने में करीब दो दर्जन कारीगर ही थे। म्यूजियम में ओटो के साथ सभी कामगारों की तस्वीर भी है। कारखाने के एक कोने में एक कमरा है जिसमें कोई खिड़की या रोशनदान नहीं है। इसमें जाने का दरवाजा एक कपड़ों की आलमारी के पीछे खुलता था। इसमें एक यहूदी परिवार को छुपाकर रखा गया था। हालांकि वह भी अंत में पकड़ा गया था।

इस तरह की मन को द्रवित कर देने वाली कहानियां बर्लिन में बिखरी पड़ी हैं या कहें कि जर्मनों ने उन्हें संजोकर रखा है। कोई अपने इतिहास के कलंकित पन्नों को भी किस तरह संजोकर (लेकिन उन्हें महिमामंडित करके नहीं) रख सकता है इसे जर्मनी से सीखा जा सकता है। बर्लिन की दीवार की याद को ताजा रखने के लिए कहीं-कहीं इस दीवार का एक हिस्सा बिना तोड़े सुरक्षित रख दिया गया है। कहीं-कहीं बीच रास्ते पर कंकड़ों से चिह्न बने हुए दिखाई दे जाएंगे जो यह बताते हैं कि यहां पहले दीवार थी। पेवमेंट पर चलते-चलते मेरा मित्र माइक मुझे अचानक नीचे एक छोटी-सी प्लेट दिखाता है। उस पर जर्मन भाषा में उस यहूदी परिवार का नाम लिखा है जो उस स्थान पर पहले रहा करता था। अब उस परिवार के सदस्यों ने इस्राइल से आकर उस स्थान को खोजा और वहां नीचे पटरी पर ही पुलिस के बिल्ले जितनी बड़ी वह प्लेट फिट कर दी। पता नहीं लोगों की ठोकरें खाकर वह प्लेट कब तक बची रहेगी।

शरणार्थी, भिखारी और हीनता ग्रंथि

जर्मनी में इस समय विमर्श का केंद्र सीरिया का युद्ध है। सीरिया युद्ध इसलिए क्योंकि इसी के कारण वहां से बड़ी संख्या में यूरोप में शरणार्थियों के रेले आने शुरू हो गए हैं। आम बातचीत में शरणार्थी का मुद्दा निकल ही आता है जो यह दर्शाता है यूरोपवासी शरणार्थियों के प्रति अपनी सरकारों की नीति से काफी खफा हैं। एक बातचीत के दौरान जब मैंने कहा कि पासपोर्ट की जांच करने के दौरान अधिकारी ने मुझसे वापसी का टिकट भी मांगा था तो मेरे मित्र ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदि तुम कहते कि मेरा नाम अली है और मैं सीरिया से आया हूं तो फिर किसी भी चीज की जरूरत नहीं पड़ती। पासपोर्ट भी न होने से चल जाता।

जर्मन सरकार ने तुर्की से समझौता किया है कि यदि वह एक शरणार्थी को लेता है तो उसके बदले बाकी यूरोप भी एक शरणार्थी को लेगा। मित्रों ने बताया कि यूरोप का असली मतलब है जर्मनी। यानी ये शरणार्थी जर्मनी छोड़कर और कहीं नहीं जाएंगे। जर्मनी में शरणार्थियों के विरुद्ध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। बर्लिन में इसका कोई प्रभाव दिखाई नहीं दिया। मेरा सैक्सनी राज्य की राजधानी ड्रेसडन जाने का इरादा था लेकिन मित्रों ने बताया कि वहां नहीं जाना ही बेहतर होगा क्योंकि वहां शरणार्थियों के विरुद्ध काफी आक्रोश है और ऐसा न हो कि गोरी चमड़ी को न होने के कारण कहीं मैं भी इसका शिकार हो जाऊं। विदेश में सावधानी बरतना ही ठीक है। मैंने ड्रेसडन न जाकर न्यूरमबर्ग जाने का कार्यक्रम बना लिया।

बर्लिन में शरणार्थी कहीं दिखाई नहीं दिए। किसी-किसी सबवे या फ्लाईओवर पर पूरा का पूरा परिवार बैठा दिखाई दिया। पता नहीं ये लोग कौन थे। भीख के लिए कागज का गिलास का इस्तेमाल करते हैं। लगभग हर परिवार के साथ उनका कुत्ता भी साथ में दिखा। इसी से मैंने अंदाज लगाया कि ये शरणार्थी भी हो सकते हैं। वैसे बर्लिन में जिप्सी भी मेट्रो में भीख मांगते हैं। लेकिन इससे यह छवि नहीं बना लेनी चाहिए कि भारत की तरह वहां बड़ी संख्या में भिखारी हैं। बस थोड़े से भिखारी हैं। स्थानीय यात्री इनसे बचकर रहते हैं क्योंकि पॉकेटमारी जैसे अपराधों के लिए इन्हीं पर संदेह किया जाता है। कोई जिप्सी ट्रेन स्टेशन के बाहर कोई वाद्य यंत्र लेकर बजाता दिखा जाएगा। ट्रेन में भी वाद्य यंत्र बजाकर भीख मांगते हैं। सीधे-सीधे नहीं।

वियेना में वहां का मुख्य महल शोनब्रून स्लॉस देखने के बाद मैं सुहानी धूप में टहलते हुए पैदल ही फुटपाथ पर चल रहा था कि एक चौराहे पर एक भारतीय युवती दिखाई पड़ गई। स्मार्ट-सी चाल से चौराहे ही तरफ आ रही थी, जैसे कहीं जाना है। लगभग ठीकठाक पोशाक में। पैरों में जूते, जैकेट और कंधे पर एक थैला या बैग। मैंने सोचा इनसे बात की जाए क्या, कि यहां क्या काम करती हैं। तब तक चौराहे पर लाल बत्ती हो गई थी। गाड़ियां रुक गईं और मेरे लिए आगे बढ़ने का हरा संकेत आ गया। तब तक मैंने देखा कि वह युवती रुकी हुई कारों से भीख मांगने लगी। हाथ से इशारा करती कि भूख लगी है कुछ खाने के लिए पैसे चाहिए। बस एक दो तीन सेकंड के लिए इंतजार करती फिर अगली गाड़ी की ओर बढ़ जाती। यह युवती कैसे वियेना आई और क्या भीख मांगना ही इसका एकमात्र पेशा है, इन सवालों से ज्यादा यह सवाल मुझे परेशान करने लगा कि इससे हम भारतीयों की इन देशों में क्या छवि बनती होगी। वियेना में दूसरे दिन भी एक चौराहे पर एक दाढ़ी वाला व्यक्ति उसी तरीके से चौराहे पर गाड़ी के चालकों से भीख मांगता दिखा। शरीर से वह भी उस युवती की तरह चुस्त दिखा। पैरों में जूते पहनना वहां के मौसम की मजबूरी है।

जर्मनी से लौटे हमारे एक मित्र ने बताया था कि वहां हम भारतीयों को उतनी अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता। हालांकि मुझे प्रत्यक्ष रूप से कहीं भी रंगभेद का आभास नहीं हुआ। जर्मनी और आस्ट्रिया दोनों ही गैर-अंग्रेजी भाषी देश होने के कारण सार्वजनिक स्थानों पर लिखी हर बात को समझना संभव नहीं होता था और हमें किसी अनजान व्यक्ति की मदद लेनी ही पड़ती थी। ऐसे समय सभी का व्यवहार नम्र और भद्रोचित होता था। उन देशों में ज्यादा समय तक रहने पर क्या मेरी यही धारणा बनी रहती इस प्रश्न का जवाब वहां ज्यादा समय रहकर ही पाया जा सकता था। हो सकता है भारतीयों के कुछ जातीय गुणों के कारण उन्हें संदेह का पात्र बनना पड़ता होगा। एक बार एक एयरपोर्ट में एक पुस्तकों की दुकान पर एक कागज चिपका देखा जिस पर लिखा था कि आप पर कैमरे की नजर है, चोरी करने की कोशिश की तो पकड़े जाएंगे। इस बात के साथ उस पर एक चित्र लगा था जिसमें एक नीग्रो को पुस्तक चोरी करते दिखाया गया था। चोर का उदाहरण देने की जरूरत पड़ते ही उस नोटिस बनाने वाले के दिमाग में नीग्रो की तस्वीर देने का खयाल क्यों आया होगा। सोचने वाली बात है। बर्लिन के एक स्टेशन पर देखा कि टिकट इंस्पेक्टर एक भारतीय के साथ बहस कर रहा था। जल्दी-जल्दी में मैंने जो अंदाज लगाया वह यह था कि भारतीय बिना टिकट के पकड़ा गया है और जुर्माना देने के पहले बहस कर रहा है। मेरे लिए यह उत्सुकता का विषय बन गया था। इसलिए अपनी ट्रेन की ओर दौड़ते-दौड़ते भी मैं उस पर नजर डालते रहा और देखा कि भारतीय पुलिस का नाम सुनने के बाद जुर्माना देने के लिए अपना बटुआ निकाल रहा है।

पता नहीं कैसे गोरों के देश में घूमते-घूमते अनजाने की एक हीनता ग्रंथि धीरे-धीरे किसी अनजाने रास्ते से होकर मेरे अंदर घुस जाती है। तब किसी अजनबी का व्यवहार सामान्य होने पर भी मुझे लगता है यह कहीं मुझे हिकारत की नजर से तो नहीं देख रहा है। किसलिए? हो सकता है मेरी चमड़ी के रंग के कारण। लेकिन चमड़ी के रंग से क्या होता है। देखो ढेर सारे जापानी, कोरियाई, विएतनामी और चीनी लोगों की चमड़ी का रंग भी मेरे ही जैसा है। वे किस तरह सामान्य ढंग से गर्व से मुंह उठाकर चल रहे हैं। मुझे भी दबने की क्या जरूरत है। लेकिन किसी जापानी, कोरियाई, विएतनामी या चीनी को चौराहे पर भीख मांगते तो नहीं देखा। और किसी को बिना टिकट यात्रा कर पकड़े जाते भी नहीं।

प्राहा – ओल्ड इज गोल्ड

अभी-अभी चेक गणराज्य की राजधानी प्राग या प्राहा में उतरा हूं। बस, जिसमें कि किसी विमान से ज्यादा ही सुविधाएं थीं, 3.18 की जगह 3.05 पर ही अपने गंतव्य पर पहुंच गई। उतरते ही एक दलाल आया और मुद्रा बदलने के लिए कान में कह गया। पता लगा कि चेक गणराज्य में क्राउन चलता है। एक यूरो 25 क्राउन के बराबर होता है। जो भी हो, बस अड्डा सूनसान लगा, किसी चर्च जैसा स्थापत्य था। टैक्सी की खोज में चर्च के अंदर गया और सीढ़ियों से नीचे उतरा तो नीचे पूरा एक मार्केट था। दरअसल यह बस अड्डा नहीं रेलवे स्टेशन था। यूरोप में मैंने बस अड्डा कहीं नहीं देखा। बसें रेलवे के साथ तालमेल रखकर चलती हैं। टिकट भी स्टेशन पर मिलता है। टैक्सी वाले ने लिस्ट देखकर कहा 28 यूरो लगेंगे। मैंने कहा क्यों भई पिछली बार तो कम लिए थे। एक दूसरे ड्राइवर ने जो ज्यादा अच्छी अंग्रेजी जानता था कहा नहीं फिक्स रेट है। मैं मान गया तो एक टैक्सी वाले ने बैग अपनी टैक्सी में डाल ली। बैठने पर कहा 28 यूरो। मैंने कहा ठीक है। उसने कहा निकालो। मैंने कहा एडवांस।..हां। …ठीक है ले लो। जो भी हो होटल पहुंच गया। होटल में भी एडवांस पेमेंट का रिवाज है।

चेक लोग ऊंची कदकाठी के होते हैं। काफी लंबे। समझ लीजिए गोरे पठान। हमारी फिल्मों में किसी गोरे कप्तान या अफसर का रोल करने के लिए यहां से से किसी ड्राइवर को ले जाना बुरा खय़ाल नहीं होगा। होटल अच्छा है, लेकिन यहां वैसे नहीं है कि कोई बेयरा आपका सामान लेकर आपके कमरे में पहुंचा देगा। इतने लोग नहीं हैं इनके पास।

जर्मनी में मुख्य स्टेशन को हाफ्टबानहॉफ कहते हैं, चेक भाषा में भी एक नाम है अभी याद नहीं आ रहा। चेक भाषा में क्या कहते हैं याद रखना पड़ता है क्योंकि तभी आप उस ट्राम स्टॉप पर उतर पाएंगे जहां रेल स्टेशन है। ट्राम में सिर्फ चेक भाषा में सभी नाम आते हैं और घोषणाएं आती हैं। यूरोप में भाषाओं का बड़ा गड़बड़झाला है। स्टेशन पर चेक और जर्मन भाषा तो काफी है लेकिन अंग्रेजी बस कहीं-कहीं। जर्मनी में काम चलाने के लिए सीखा कि प्लेटफॉर्म को क्या कहते हैं, ट्रेन नेम को क्या कहते हैं यहां चेक गणराज्य में अब फिर से सीखना पड़ रहा है। अंत में इन्फॉर्मेशन में जाकर पुष्टि भी कर ली कि मैंने ठीक ही समझा है न। उन्होंने बताया कि 20 मिनट पहले प्लेटफॉर्म की घोषणा होगी। स्टेशन कम से कम चार मंजिलों वाला है। सभी मंजिलें नीचे की ओर है। बर्लिन में भी ऐसा था। किसी एयरपोर्ट से भी बढ़कर।

प्राहा में अंग्रेजी बोलने वाले युवा बड़ी संख्या में दिखाई पड़े। आसपास के लोग तो जर्मन बोल लेते हैं और शायद बाकी के बाहर के लोगों को अंग्रेजी में ही बात करनी पड़ती होगी। जर्मनी में ऐसा नहीं था। हालांकि यहां और वहां लगभग सभी लोग अंग्रेजी बोल और समझ लेते हैं।

किसी ने ठीक ही कहा था कि यूरोप में हम भारतीयों के लिए लघुशंका बड़ी समस्या हो जाती है। यहां कहीं भी आलिंगनबद्ध, चुंबन लेते हुए जोड़े दिख जाएंगे लेकिन लघुशंका के लिए पेशाबघऱ या उसका संकेत नहीं दिखाई देता। हैं भी बहुत कम। होटल में पानी पीते समय ही सोचा था कि आगे मुश्किल होगी। हुई भी। स्टेशन की चार मंजिलों पर बहुत खोजने के बाद एक आलीशान यूरीनल दिखाई दिया। वहां ऑटोमेटिक मशीन में एक यूरो का सिक्का डालने पर आगे जाने का रास्ता खुलता है। अमूमन जर्मनी और प्राहा में पचास सेंट लगते हैं। यहां सार्वजनिक स्थानों पर जीवित व्यक्ति का मूर्ति की तरह बनकर खड़ा होना या बैठना एक आर्ट है। मैंने ऐसी ही एक मूर्ति के साथ फोटो खिंचवाई।

चेक गणराज्य में कम्युनिस्ट शासन की छाप तीन चीजों में आज भी दिखाई देती है – एक, ट्राम के किराए में तरह-तरह की छूट में। जैसे गर्भवती महिला के लिए या बुजुर्गों के लिए किराया कम है। इसी तरह छूट की कई श्रेणियां हैं। जर्मनी में ऐसा कुछ नहीं था। इससे ऑटोमैटिक टिकट मशीन पर लिखावट काफी उलझाव वाली हो जाती है क्योंकि बटन के पास छोटे से स्थान पर कई तरह का किराया जैसे-तैसे ठूस-ठास कर लिखा रहता है। दो, वहां मुख्य चौराहे का नाम अब भी रिवोल्यूशनस्का नामेस्ती है। नामेस्ती चेक भाषा में चौराहे को कहते हैं। नए प्रशासन की तारीफ की जानी चाहिए कि उसने इस चौराहे का नाम बदलने के बारे में नहीं सोचा। तीन, कहीं-कहीं अब भी रूसी भाषा में लिखावट दिखाई दे जाती है। उसे बदला नहीं गया है। कम्युनिस्ट शासन के खात्मे के बाद रूसी यहां से चले गए थे। लेकिन करीब दो दशकों बाद वे फिर से प्राग और चेक गणराज्य में अच्छे अवसरों की तलाश में आने लगे हैं। प्राग और इसके आसपास रूसी स्कूल, अखबार और व्यापार फल-फूल रहे हैं। दरअसल रूसियों की संख्या सिर्फ चेक गणराज्य में ही नहीं पूर्वी यूरोप के बलगारिया, स्लोवाकिया, लाटविया, एस्टोनिया जैसे देशों में दिन पर दिन बढ़ रही है। प्राग में पढ़ने वाली वलेरिया नाम की उस होटल प्रबंधन की छात्रा के वाकये में रूस की सच्चाई साफ झलकती है। हमारे यहां से जब कोई बाहर पढ़ने जाता है तो माता-पिता कहते हैं बेटा जल्दी वापस आ जाना। लेकिन जब वलेरिया रूस के साइबेरिया से प्राग के लिए रवाना हो रही थी तो उसके माता-पिता ने उससे कहा था – बेटी वापस मत लौटना। यूरोपियन संघ का सदस्य होने के कारण चेक गणराज्य में एक तरह की गतिशीलता तो है ही।

प्राग यूरोप का काफी पुराना शहर है। इसके दो भाग हैं एक पुराना शहर और दूसरा नया शहर। मजेदार बात यह है कि जो नया शहर है वह भी 14वीं शताब्दी का बना हुआ है। पुराना शहर इससे और एक सदी पुराना है। जब गाइड कहती है कि यह पब है जो डेढ़ सौ साल पुराना है और प्राग के सभी कलाकार यहां बीयर पीने आया करते थे और आज भी आते हैं तो प्राग की ऐतिहासिकता हमारी आंखों को चकाचौंध कर देती है। लेकिन पुराना कहते ही पुरानी दिल्ली की तस्वीर मन में लाने की जरूरत नहीं जहां पुरानी हवेलियां टूट रही हैं और गलियां संकरी हैं। निःसंदेह प्राग में सड़कें आज के शहरों जैसी चौड़ी नहीं हैं लेकिन फिर भी उन्हें गली नहीं कहा जा सकता। चेक लोगों ने अपने शहर को संजोकर रखा है।

चार घंटे यूरोपीय ट्रेन में

ट्रेन छूटने के समय से पांच मिनट पहले आई और समय पर छूट गई। आने और जाने के समय कोई ईंजन की सीटी की आवाज नहीं। पश्चिम में आवाज से काफी परहेज किया जाता है। इस ट्रेन को दो कंपनियां सीडी (चेस्के ड्राही) और ओबीबी (यह विएना की है) मिलकर चलाती हैं। ट्रेन अपने नंबर से जानी जाती है। इस ट्रेन का नाम 75 है। कौन सा फर्स्ट क्लास, कौन सा सेकेंड क्लास और कौन सा रेस्तरां सब पहले से फिक्स है। मेरी सीट के ऊपर नंबर के साथ स्क्रीन पर लिखा है यह प्राग से विएना के लिए है। दूसरे यात्रियों की तरह मैंने भी अपनी जैकेट उतारकर खूंटी पर टांग दी। सीट के नीचे ही छोटा कूड़ा गिराने का स्थान है। पैर से उसे खोलना पड़ता है। बड़ा कूड़ा टॉयलेट के पास के कूड़ेदान में गिराया जा सकता है। आधी सीटें खाली हैं। परसों जिस बस में न्यूरमबर्ग से प्राहा या प्राग आया था उसमें लगभग 100 की क्षमता थी लेकिन यात्री दस ही थे।

डर था कि शायद कंडक्टर क्रेडिट कार्ड मांगेगी जो कि बर्लिन में खो गया। लेकिन उसने केवल पासपोर्ट मांगा। इस ट्रेन में क्रेडिट कार्ड की जरूरत नहीं होती। बर्लिन से न्यूरमबर्ग आते समय क्रेडिट कार्ड मांगा था (वह जर्मनी की राजकीय कंपनी डीबी थी)। वे लोग पासपोर्ट को नहीं मानते। यह उनका नियम है। ऑनलाइन टिकट पर ही साफ लिखा था। मैंने कहा कि मुझे पता है, लेकिन अब खो गया तो क्या करेंगे, मैं तो आपके इनफॉर्मेशन पर पूछकर चढ़ा हूं। कंडक्टर समझी नहीं। पास बैठी युवती ने जर्मन में बताया तो समझी और मान गई। बर्लिन से न्यूरेमबर्ग के बीच तीन कंडक्टरों ने टिकट चेक किया था। सभी किसी एयरहोस्टेस की तरह नम्र व्यवहार वाली थीं। हाथ में पकड़ी मशीन से टिकट का बारकोड स्कैन कर लेती थीं, लेकिन बार-बार नहीं।

यह फर्स्ट क्लास है। फर्स्ट क्लास में आधे लीटर की पानी की बोतल और अखबार फ्री मिलता है। अंग्रेजी अखबार इनके पास नहीं है। वाई-फाई भी नहीं है हालांकि दूसरी ट्रेनों में है। कहते हैं इसमें भी हो जाएगा। कुछ सीटें उन यात्रियों के लिए हैं जो 10 साल से नीचे के बच्चों के साथ यात्रा कर रहे होते हैं। ये सीटें हमेशा के लिए निश्चित हैं। वहां उनके खेलने के लिए एक गेम दिया जाता है और साथ में खेल के नियम भी। बच्चों के लिए सिनेमा का प्रावधान भी है। अक्षम यात्रियों के लिए व्हीलचेयर ले जाने लायक अलग से सीट बना दी जाती है। फर्स्ट क्लास में एक बिजनेस क्लास भी है जिसमें एक पेय और पचास क्राउन (2 यूरो) का कूपन दिया जाता है, जो इच्छा हो मंगा लो। पांव के लिए ज्यादा स्पेस। ट्रेन 155 की गति से चल रही है। सामने स्क्रीन पर सबकुछ आता रहता है, आप किस ट्रेन में किस वैगन में बैठे हैं, ट्रेन की गति, आने वाले स्टेशन (स्टेशनों) का समय और नाम। बाहर आज धूप निकली है। शायद फोटोग्राफी अच्छी कर पाना संभव हो। आप ट्रेन में साइकिल भी ले जा सकते हैं। साइकिल और प्राम रखने के लिए प्रावधान हैं।

रेस्तरां के स्टाफ आर्डर लेने आते हैं और आप खाने के सामान का मेनू देखकर आर्डर दे सकते हैं। यानी हवाई यात्रा की तरह। ट्रेन में एक-दो डिब्बे शांत डिब्बे होते हैं उसमें बैठने वालों को अपने मोबाइल को स्विच ऑफ करना पड़ता है, फोन करने या रिसीव करने से परहेज करना पड़ता है, म्यूजिक नहीं बजा सकते हेड फोन लगाकर भी और बातें धीमी आवाज में करनी होती है। वैसे भी यहां हर कोई धीमी आवाज में ही बातें करता है।

बाहर सरसों के खेत हैं और फूल खिले हुए हैं। क्रिसमस ट्री बहुतायत में उगे हुए हैं जिन्हें हमारे यहां काफी प्रीमियम दिया जाता है। कहीं भी मनुष्य या अन्य कोई भी जीव जंतु दिखाई नहीं देता। पास बैठी कैलिफोर्निया की महिला ने कहा कि उसे यात्रा में दिक्कत होती है, कोई खाली सीट हो तो बताना। वह शायद सोएगी। होस्ट (वेटर) ने कहा कि मैं देखकर बताता हूं। थोड़ी देर बाद महिला अपने पति के साथ दूसरी किसी सीट पर चली गई।

11.47 बज गए और पहला स्टेशन पार्डुबाइस आ गया। यह कोई औद्योगिक शहर लगता है। छोटा-सा। प्राग की आबादी 12 लाख है। अभी चेक गणराज्य ही चल रहा है। क्योंकि स्टेशन के लिए हालविना नाडराजी लिखा हुआ आ रहा है।

गार्ड ने हल्की सी सीटी बजाई, ऑटोमैटिक दरवाजे बंद होने का पीं-पीं  पीं-पीं संकेत हुआ और गाड़ी 11.49 पर चल पड़ी। प्लेटफॉर्म खाली पड़े हैं। बाहर धूप निकल आई है। अगला स्टेशन 12.22 पर सेस्का ट्रेबोवा है। बाहर का दृश्य उबाने वाला है। खेत दिख रहे हैं लेकिन खेतिहर कहीं नहीं। गति वही 160। रास्ते के स्टेशनों पर कोई झंडी दिखाने वाला नहीं खड़ा रहता। दरअसल कोई नहीं रहता, न स्टाफ, न यात्री। हरियाली लगभग आ गई है। लेकिन कहीं भी फूल वाले वृक्ष नहीं हैं। हां कुछ छोटे वृक्ष हैं सफेद फूलों वाले। वनस्पति की विभिन्नता हमारे यहां की तरह नहीं दिखाई देती। असम में तो इस समय लाल गुलमोहर और बैंगनी रंग के एजार फूल, और पीले अमलतास के फूल खिल गए होंगे। यहां लाल रंग को मिस कर रहा हूं। कुछ दिन रहना पड़ जाए तो नजारा काफी उबाऊ हो जाएगा। कुछ खेत जुते हुए हैं, बुवाई के लिए तैयार। कुछ में छोटी पौध उग आई है।

यहां शहर के पार्कों में भी छोटी दूब या घास के बीच सुंदर पीले-पीले फूल उगे हुए होते हैं। कोई घास पर नहीं चलता इसलिए वे बने रहते हैं। …वाह, अब तक की यात्रा में जंतु के नाम पर अभी-अभी कुछ बकरियां चरती हुई दिखाई दीं। लेकिन चार-पांच ही। यह किसी गांव या कस्बे को पार कर रहे हैं लेकिन कहीं इंसान नाम का जीव दिखाई नहीं दिया। पहली बार एक रेलवे फाटक दिखाई दिया जो ट्रेन के आने से पहले अपने-आप बंद हो जाता है। छोटे से गांव के सर्विस रोड के लिए यह काफी है।

रेलवे ट्रैक थोड़ी देर के लिए एक छोटी-सी नदी के साथ-साथ गुजर रही है। एक और चीज यहां आपको नहीं मिलेगी वह है बिखरा हुआ प्लास्टिक। शहरों में सिगरेट के टुकड़े हर कहीं बिखरे मिल जाते हैं, क्योंकि सिगरेट पीने के बाद कूड़ेदान में गिराना मना है। कोई नहीं गिराता। कल रास्ते किनारे की एक दुकान में बर्गर खाने के बाद एक अन्य व्यक्ति (शायद अरब या तुर्क) ने बड़ी तत्परता से कहा यहां – यहां। यानी इस कूड़ेदान में कागज गिरा दें। क्या मेरे भारतीय होने के कारण उसे डर था कि मैं नीचे ही गिरा दूंगा। उसने मुझे न-मस्ते भी कहा। मैंने कुछ नहीं कहा था, शायद किसी शो का दलाल होगा। हमारे यहां हम किसी अनजान व्यक्ति के साथ ज्यादा बात नहीं करते। यहां किसी अनजान व्यक्ति से आंखें मिलाते ही – जैसे होटल की रिसेप्शनिस्ट, या लिफ्ट में पहले से आ रहा कोई व्यक्ति, या रेस्तरां में आपकी मेज पर पहले से बैठा हुआ कोई ग्राहक – गर्मजोशी के साथ मुस्कुराकर हलो कहते हैं। ऐसा नहीं करना अच्छा नहीं माना जाता।

एक स्टेशन पार हुआ है, दूर स्टेशन के पास तीन चार लोग दिखाई दिए और एक महिला प्राम पर अपने बच्चे को ले जा रही है।

हमारे लोगों को आश्चर्य होगा कि आदमी कहां छिपे रहते हैं। न्यूरमबर्ग के उपनगर न्यूरमबर्ग स्टाइन, जहां मैं ठहरा था, में जब रात आठ-नौ बजे बाहर का नजारा लेने के लिए निकला तो सचमुच एक भी आदमी दिखाई नहीं दिया। मैं एक तरह से घबराकर वापस अपने फ्लैट में लौट आया। उपनगर में एक इटालवी रेस्तरां ला कुलटुरा दिखाई दिया था, जिसके बारे में मेरी होस्ट ने बता दिया था कि वह महंगा होगा। ठंड में अकेले घूमना और रास्ता भटक जाएं तो पूछने के लिए कोई नहीं, सचमुच घबराहट होती है। लो 12.23 हो गए और चेस्का ट्रेबोवा आ गया। गाड़ी एक मिनट विलंब से आई है। और 12.24 पर चल पड़ी। अगला स्टेशन ब्रनो 1.22 पर है। बाहर प्लास्टिक का कूड़ा गिराने की जगह दिखाई दी है। तीन-चार मशीनें उस पर काम कर रही हैं। पता नहीं क्या काम।

यह कोई अच्छा-खासा शहर पार हो रहा है। एक हाइपरमार्केट पार हुआ है। शहर के बाहर गांव शुरू होता है। खेतीबाड़ी की मशीनें हर घर के बाहर पड़ी दिखाई दे रही हैं। हर घर के साथ छोटी-सी बगीची है जिसमें शायद सब्जी उगाते होंगे। सर्दी से बचाने के लिए और एक खास तापमान पर रखने के लिए ग्रीन हाउस जैसा बनाया रहता है। जैसे हमारे यहां ठंडक बनाए रखने के लिए कोई-कोई ऐसा करता है। पटरी के साथ-साथ एक मानव निर्मित छोटी सी नहर चल रही है।

अच्छी धूप निकल आई है। मैंने थोड़ी फोटोग्राफी कर ली।

एक और रेलवे फाटक पार हुआ। छोटे से शहर के बीच। यानी यहां भी रेलवे फाटक हैं। मेरे एक मित्र ने बताया था कि यहां रेलवे फाटक नहीं होते। हालांकि सभी स्वचालित हैं। अरे हां, पार हो रहे स्टेशन के बाहर लाल टोपी पहने स्टेशन का कर्मचारी दिखाई दिया है। उसने शायद सबकुछ ठीक होने का सिगनल दिया होगा। लेकिन हाथ में झंडी-वंडी नहीं थी। हमारी बोगी अंतिम है इसलिए दिखाई नहीं देता कि वह क्या करता है। वह बस वापस अंदर जाता हुआ दिखाई देता है।

ब्रनो भी आखिर 1.23 पर आ ही गया। यह स्टेशन काफी पुराना और साधारण है। कम से कम बाहर से तो हमारे यहां के जैसा ही। स्टेशन का मकान भी जराजीर्ण है। बाहर शहर में नई शैली की बहुमंजिला इमारते हैं। पारंपरिक शैली की टेराकोटा टाइल्स की तिकोनी छत वाले मकान यहां गायब हो गए।

सबलोग शांत बैठे हैं। पास वाले दंपति धीमी आवाज में बात कर रहे हैं और पुस्तक पढ़ रहे हैं। आगे की सीट पर कोरियाई बच्चे कलम कागज से पहेली पूरी करने में व्यस्त हैं। एक बच्ची डायरी लिख रही है। बाहर कोई दिलचस्प दृश्य दिखाई नहीं दे रहा। न ही कोई आदमी। यदि कॉफी का ऑर्डर देता हूं तो तीन-चार यूरो खर्च हो जाएंगे। विएना आने में पूरे दो घंटे बाकी हैं। इससे अच्छा है मैं भी थोड़ा सो लेता हूं।

संगीत का शहर विएना

हर यूरोपीय शहर की तरह विएना में भी ट्राम और ट्रेन का जाल बिछा है। दूसरे शहरों की तरह यहां भी एक ही टिकट से आप ट्राम, ट्रेन, सबवे और बस में यात्रा कर सकते हैं। शोनब्रुन पैलेस ही यहां देखने लायक है, जैसे दिल्ली में लाल किला। यह भी हैब्सबर्ग साम्राज्य के सम्राटों की आरामगाह था। यहां यह रिवाज है कि आरामगाह के तौर पर जो महल बनवाए जाते थे उनमें एक गार्डेन और यह चिड़ियाखाना (टियरगार्टन) भी होता था। शूनब्रुन में भी चिड़ियाखाना है जिसे देखने के लिए टिकट है।

विएना खुला-खुला है। प्राग ही तरह बंद-बंद नहीं। वैसे भी धूप निकलने के कारण सबकुछ ज्यादा अच्छा लग रहा है। पता नहीं क्यों यहां जापानी सैलानियों की भरमार है।

बिग बस के बारे में पहले नहीं सुना था। यह कई पर्यटन के लिए प्रसिद्ध शहरों में चलती है। इसमें आप जहां चाहे उतर जाएं और फिर घूमघाम कर अगली बिग बस  में चढ़ जाएं। साथ में कई भाषाओं (हिंदी सहित) वाला ऑडियो गाइड दिया जाता है जिसे कान से लगाने पर आपको सारा विवरण मिलता रहता है।

विएना कला का शहर है। संगीत सम्राट बीथोवन और मोजार्ट यहीं के थे। मनोविज्ञान को अपने सिद्धांतों से उलट-पलट कर देने वाले फ्रायड भी वियेना के ही थे। शहर म्यूजियमों से भरा है। सड़कों पर निश्चित स्थान पर पोस्टर लगे हैं, ऑपेरा और थियेटर के होने वाले शो के। पैलेस में भी एक थियेटर है जिसमें शाम को शो होने वाला है। गार्डेन में कला के अनुपम नमूनों के रूप में मूर्तियां भरी पड़ी हैं। ये मूर्तियां ग्रीक मिथक, इतिहास और संस्कृति पर आधारित हैं। इनमें होमर के महाकाव्य इलियाड, ओडिसी आदि की कहानियां शामिल हैं। ब्रुटस की भी एक मूर्ति लगी है जिसमें एक हाथ में वह लुक्रेशिया को थामे हुए है। शेक्सपीयर की रचना रेप आफ लुक्रेश में यह प्रकरण आता है। ईशा से 500 साल पहले की इस कहानी में प्रकरण है कि लुक्रेशिया का रोम के राजा के पुत्र सेक्सटस ने बलात्कार कर लिया था। लुक्रेशिया ने इसके बारे में अपने पति को बताकर छूरे से आत्महत्या कर ली। बाद में इसी घटना को केंद्रित करते हुए राजा के विरुद्ध विद्रोह हुआ और तख्तापलट हो गया। एक मूर्ति कृषि, विवाह और मृत्यु की देवी सेरिस की है। यह पुनरुत्पादन या उपजाऊपन का प्रतिनिधित्व करती है। पुनरुत्पादन की पूजा करने का हमारी संस्कृति में भी रिवाज है। कुल मिलाकर इस बगीचे में आप एक-एक मूर्ति के पीछे के इतिहास में जाएं तो यूनानी सभ्यता, संस्कृति और परंपरा के बारे में आपको अच्छी जानकारी हो जाएगी।

सड़कों के किनारे भी सुंदर लाल और पीले ट्यूलिप खिले हुए हैं। इन्हें देखकर हमारे यहां के एक सज्जन की याद आती है जो सुबह-सुबह उचक-उचक कर फूल तोड़ते हैं और इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि अंतिम फूल भी तोड़ लिया जाए। पता नहीं फूल का जन्म पूजा में चढ़ने के लिए हुआ है या भंवरों को आकर्षित करने के लिए।

गुवाहाटी के पत्रकार Binod Ringania से संपर्क +919864072186 या bringania@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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गाजीपुर से दिल्ली के लिए नई ट्रेन ‘राजा सुहेल देव राजभर एक्सप्रेस’ 13 अप्रैल से, हफ्ते में तीन दिन चलेगी

गाजीपुर के सांसद और रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा की पहल पर पूर्वी यूपी के गाजीपुर जिले से दिल्ली के लिए ट्रेन शुरू हो रही है। ट्रेन को मनोज सिन्हा 13 अप्रैल की शाम पांच बजे गाजीपुर सिटी स्टेशन से हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। यह ट्रेन सप्ताह में तीन दिन चलेगी। बुधवार-शुक्रवार तथा रविवार की शाम साढ़े पांच बजे गाजीपुर सिटी स्टेशन से खुलेगी और सुबह साढ़े सात बजे दिल्ली के आनंद बिहार स्टेशन पहुंचेगी।

आनंद बिहार से यह ट्रेन मंगलवार, गुरुवार तथा शनिवार की शाम साढ़े सात बजे रवाना होगी और गाजीपुर सिटी स्टेशन पर सुबह साढ़े नौ बजे आएगी। इसका रूट गाजीपुर सिटी से औड़िहार, जौनपुर, जफराबाद, सुल्तानपुर, लखनऊ, बरेली, मुरादाबाद, गाजियाबाद से आनंदबिहार तय हुआ है। ट्रेन का नाम ‘राजा सुहेल देव राजभर एक्सप्रेस’ रखा गया है। ट्रेन का अप में 22419 और डाउन का नंबर 22420 होगा। रेलवे के कंप्यूटर में इस ट्रेन के लिए आरक्षित टिकट बुकिंग का काम 11 अप्रैल से शुरू होगा।

ट्रेन अभी चली नहीं, विवाद शुरू… इसे भी पढ़ें…

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अगर आप दिल्ली में हैं या दिल्ली गए हुए हैं तो हौज खास विलेज में ये मकबरे वाली जगह घूम आइए (देखें वीडियो)

Yashawnt Singh : दिल्ली में हौज खास विलेज नामक जगह है. कभी यह दिल्ली के दूसरे शहर सीरी में हुआ करता था, ऐसा हौज खास जाने पर बाहर लगी पट्टिका को पढ़ने से पता चलता है. आज हौज खास दिल्ली का हिस्सा बन चुका है. यहां लगी पट्टिका पर लिखा है-

 

हौज-ए-अलाई
(हौज-खास)
दिल्ली के दूसरे शहर सीरी में निर्मित हौज-ए-अलाई का निर्माण अलाउद्दीन खलजी (सन 1296-1316) ने करवाया।
Hauz-I-Alai
(Hauz-Khas)
Hauz-I-Alai was constructed in Siri, The Second City of Delhi By Alaud-Din-Khalji (A.D. 1296-1316)”.

इसी में फिरोज शाह का मकबरा है. Feroz Shah’s Tomb. इस बारे में लगी पट्टिका से पता चलता है कि–

”फिरोज शाह ने अपने मरने से पहले अपना मकबरा और इससे सटा मदरसा बनवा दिया था. पट्टिका के मुताबिक फिरोज शाह की मृत्यु 1388 ईस्वी में हुई. उन्होंने अपना मकबरा और मदरसा 1350 के दशक में लगभग एक ही समय में बनवाया था. इस वर्गाकार मकबरे की माप 13.5 मीटर है और यह वहां स्थित है जहां मदरसे के दोनों हिस्सों का संगम होता है. इस मकबरे के गंबुद का शीर्ष पूरे परिसर में सबसे उंचा है. दक्षिणी प्रवेश द्वार के उपर अंकित लेख से यह जानकारी मिलती है कि इस इमारत की मरम्त सन 1508 ईस्वी में बादशाह सिकंदर लोदी के आदेशानुसार करवाई गई थी. कक्ष के बीचोंबीच बनी कब्र फिरोज शाह की है जबकि संगमरमर की अन्य कब्रें संभवत: उनके पुत्र और पोते की रही होगी.” 

ये तो हुई अतीत की बात. आज ये जगह दिल्ली के नौजवान दिलवालों के लिए आरक्षित सी लगती है. हर तरफ प्रेमी युगल यहां विराजमान है. ठसाठस भरी और चिल्ली-पों मचाती दिल्ली में यह जगह थोड़ी रुमानियत से तो भर ही देती है इसलिए यहां एक बार जाना और देखना बनता है. नीचे झील और उसका किनारा भी जाने देखने का प्रबल आकर्षण है. यहां एंट्री फ्री है.

इस जगह पर आप नहीं गए हैं तो कोई बात नहीं. जब समय मिले तब जाइए लेकिन फिलहाल मैं दो वीडियो वहां से लाइव तैयार कर लाया हूं. इसके जरिए हौज खास को काफी कुछ आप देख समझ सकते हैं.

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

(1) Hauz-Khas and Feroz Shah’s Tomb दिल्ली में हौज खास और इसमें फिरोज शाह का मकबरा देखिए https://www.youtube.com/watch?v=04n8f3LSp6w
(2) Hauz-Khas and Feroz Shah’s Tomb दिल्ली में हौज खास और इसमें फिरोज शाह का मकबरा देखिए https://www.youtube.com/watch?v=ybwoS04OtK8

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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पूर्वोत्तर यात्रा-6 : नदी के बीच दुनिया के सबसे बड़े टापू की सैर

वह 28 नवम्बर 2015 की सर्द सुबह थी। सुबह 6 बजे तक एलिफेंट सफारी के लिए काजीरंगा अभ्यारण्य के दूसरे छोर तक पहुचना था। टीम लीडर किरण जी कि हिदायत के मुताबिक सभी पत्रकार साथी सुबह 5.30 बजे तक बस में सवार हो चुके थे। हमें 30 किलोमीटर की दूरी तय कर एलिफेंट सफारी स्टेशन पहुँचना था। तय समय से हम पहुँच गए पर जंगल की सैर कराने वाले हाथी और महावत अभी नहीं पहुचे थे। आधे घंटे के इंतज़ार के बाद दो हाथी सामने से आते हुए दिखाई दिए। बताया गया कि एक बार में 6 से 7 लोग ही एलिफेंट सफारी के लिए जा सकेंगे। इस दिए हमने दो टीम बनाई। हाथी पर सवार हो कर 1 घंटे तक जंगल में घूमने की फ़ीस 800 रूपये प्रति व्यक्ति थी। मुझे लगता है अपने देश में पर्यटको से सुविधाओं के लिए भारी कीमत वसूली जाती है। खैर पहली और शायद आखिरी बार यहाँ तक आये थे लिए जंगल घूमने के लिए हाथी पर सवार हो गए। पहली खेप में मेरा भी नंबर लग गया। मैं सुरेंद्र जी हथियारबंद गार्ड के साथ हाथी पर सवार हो कर जंगल भ्रमण के लिए रवाना हो गए।

जीप से आप जंगल के बीच बने रास्तो से ही गुजर सकते हैं पर हाथी हमें जंगल के बीच लेकर जा रहा था। जंगल झाड़ियो के बीच से होकर गुजरना अच्छा लग रहा था। पर आधा घंटा बीतने के बाद भी अब तक हमें गैंडे के दर्शन नहीं हुए थे। इस बीच जंगली सूअर, हिरन जैसे छोटे मोटे जानवर ही दिखाई दिए। अब धीरे धीरे एक घंटे का सफ़र समाप्त होने को था। हाथी हमें लेकर वापस लौटने लगा। तभी झाड़ियो के बीच एक गैंडा दिखाई दिया। सिर्फ उसका थोडा सा सिर हमें दिखाई दे रहा था। उसे झाड़ियों से बाहर लाने के लिए महावत ने उस पर गुलेल चलाई पर यह दाव उल्टा पड़ गया, वह और घने जंगल में छिप गया। हमारी एलिफेंट सफारी पूरी हो चुकी थी। दुसरे बैच के हमारे साथी हाथी पर सवार होने के लिए तैयार खड़े थे। हमें एक घंटे तक उनके लौटने का इंतज़ार करना था। वरिष्ठ फोटोग्राफर मोहन बने जी हमारे साथ ही एलिफेंट सफारी कर आये थे। इसलिए अपने दूसरे बैच वाले साथियों के इंतज़ार के लिए बने काका भी मेरे साथ थे। इंडियन एक्सप्रेस से स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले बने काका ने आयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने की वह मशहूर तस्वीर खिंची थी, जो दुनियाभर के पत्र पत्रिकाओं में छपी और आज भी छपती रहती है।

मैंने बने काका से आग्रह किया की वे बताये कि कैसे उस दिन उन्होंने वह ऐतिहासिक फ़ोटो खिंची थी। बने काका ने बताया कि किस तरह वे आयोध्या में कारसेवा को कवर करने के लिए कई दिनों पहले फैज़ाबाद पहुँच गए थे। कैसे वह फ़ोटो निकालने में कामयाब रहे और उसे मुंबई ऑफिस पहुचाने के लिए लखनऊ जाना पड़ा। क्योकि उस वक्त इंटरनेट नहीं था। फ़ोटो को लैब में डेवलप करने के बाद फ़ोटो वाले फैक्स मशीन से भेजना पड़ता था। उस वक्त केवल ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटो बन पाते थे। 6 दिसम्बर की घटना और इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका जी की चर्चा में एक घंटे का समय आराम से कट गया। दूसरे बैच में गए चंद्रकांत शिंदे जी ने बताया कि हमें तो बिल्कुल पास से गैंडा दिखाई दिया। मुझे लगा कि चंदू जी हमें चिढ़ाने के लिए शेखी बघार रहे।

मुझे विश्वास दिलाने के लिए उन्होंने मोबाइल से निकाली गई तस्वीरे दिखाई तब मुझे मानना पड़ा की दूसरी बैच वाले हमसे ज्यादा किस्मत वाले निकले। खैर गेस्ट हाउस पहुँच कर हमें अपनी अगली मंजिल माजुली के लिए निकलना था। इस लिए सब जल्दी से बस में सवार हो गए। आसाम गए और वहाँ के चाय बागानों में फ़ोटो नहीं खिंचाई तो पूर्वोत्तर यात्रा अधूरी रह जायेगी। रास्ते में हम चाय बागान के किनारे एक चाय स्टोर पर रुके। यहाँ तरह तरह की चाय पत्ती बिक्री के लिए उपलब्ध थी। सबने चाय की खरीदारी की। काजीरंगा के आसपास के इलाके में आप को हर जगह लकड़ी के गैंडे का मॉडल बिकते हुए दिखाई देगा। स्टोर के सामने भी एक सज्जन ने ऐसी दुकान सजा रखी थी। मोलभाव की ज्यादा गुंजाइस नहीं दिखी तो 250 रुपये में मैंने एक गैंडा खरीद लिया। पत्रकार साथियों के साथ मैने भी थोड़ी चाय  खरीदी और पास में स्थित चाय बागान में जाकर फ़ोटो निकला।

सिकुड़ रहा माजुली द्वीप

दोपहर को हमें माजुली के लिए रवाना होना था। इसके लिए बस सहित बोट पर सवार होना था। वाहनों सहित यात्रियों को इस पार से उस पार पहुचाने वाली बड़ी-बड़ी नावे ब्रम्हपुत्र नदी में चलती हैं। हमें जिस बोट से जाना था, उसके लिए तय समय पर ब्रम्हपुत्र के घाट पर पहुचना था। इस लिए गेस्ट हाउस पहुँच कर अपना अपना सामान उठाये और चल दिए नदी के बीच स्थित दुनिया के सबसे बड़े द्वीप पर रात बिताने। दुनियाभर में समुंद्र के बीच सैकड़ो टापू है, जिन पर  पूरे के पूरे देश बसे हैं पर असम के जोरहाट जिले में ब्रह्मपुत्र नदी के बीच बना यह टापू दुनिया में नदी के बीच बना सबसे बड़ा टापू है। पर यह टापू भी संकट में है। कभी 1278 वर्ग किलोमीटर में फैला यह टापू अब सिकुड़ कर 557 वर्ग किलोमीटर का रह गया है। इस द्वीप पर बसे 23 गांवो में करीब 2 लाख लोग रहते हैं।
अपनी विशेषताओं के चलते दुनिया भर में मशहूर माजुली का अस्तित्व अब साल दर साल आने वाली बाढ़ और भूमिकटाव के चलते खतरे में पड़ रहा है। विश्व धरोहरों की सूची में इसे शामिल कराने के तमाम प्रयास भी अब तक बेनतीजा रहे हैं। राज्य सरकार ने इस द्वीप को बचाने की पहल के तहत कुछ साल पहले माजुली कल्चरल लैंडस्केप मैनेजमेंट अथारिटी का गठन किया।

बरसात के चार महीनों के दौरान बाहरी दुनिया से इस द्वीप का संपर्क कट जाता है। इस द्वीप की अस्सी फीसदी आबादी रोजी-रोटी के लिए खेती पर निर्भर है। माजुली के रोहित बरूआ कहते हैं कि माजुली के लोग अपना पेट पालने के लिए खेती पर निर्भर हैं। लेकिन हमारे ज्यादातर खेत पानी में डूब गए हैं। यह द्वीप अपने वैष्णव सत्रों (मठ) के अलावा रास उत्सव, टेराकोटा और नदी पर्यटन के लिए मशहूर है. मिसिंग, देउरी, सोनोवाल, कोच, कलिता, नाथ, अहोम,नेराली और अन्य जातियों की मिली-जुली आबादी वाले माजुली को मिनी असम और सत्रों की धरती भी कहा जाता है। असम में फैले लगभग 600 सत्रों में 65 माजुली में ही हैं। यहाँ वैष्णव पूजास्थलों को सत्र कहा जाता है।

माजुली के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यह है कि यहां जितनी नावें हैं उतनी शायद इटली के वेनिस में भी नहीं हैं। द्वीप का कोई भी घर ऐसा नहीं है जहां नाव नहीं हो। यहां नावें लोगों के जीवन का अभिन्न अंग हैं। लोग कार, टेलीविजन और आधुनिक सुख-सुविधा की दूसरी चीजों के बिना तो रह सकते हैं लेकिन नावों के बिना नहीं। हर साल आने वाली बाढ़ पूरे द्वीप को डुबो देती है. इस दौरान अमीर-गरीब और जाति का भेद खत्म हो जाता है। महीनों तक नावें ही लोगों का घर बन जाती हैं. उस समय माजुली में आवाजाही का एकमात्र साधन भी लकड़ी की बनी यह नौकाएं ही होती हैं। अगर इस द्वीप को बचाने के लिए जल्दी ही ठोस कदम उठाये जाने की जरुरत है।

हम घाट पर पहुचे तो पता चला कि बोट आने में 15 मिनट का समय लगेगा। चाय पीकर हमने यह समय काटा। तब तक हमारी बोट किनारे पर लग चुकी थी। हमने पहले अपनी मिनी बस को बोट पर सवार किया और फिर हम भी दो मंजिल नाव पर सवार हो गए। गए। चाय- नाश्ता कर हमने यह समय काटा। तब तक हमारी बोट किनारे पर लग चुकी थी। हमने पहले अपनी मिनी बस को बोट पर सवार किया और फिर हम भी दो मंजिला नाव पर सवार हो गए। मैंने अपने कुछ साथियों के साथ नाव की छत पर आसन जमाया। नदी में हमें इस पार से उस पार की यात्रा नहीं करनी थी। बल्कि बीच नदी में स्थित इस द्वीप पर पहुचाने के लिए हमारी नाव नदी के बीचो बिच चल रही थी। अथाह जल के बीच बोट की छत पर यह जल यात्रा मन को सकून देने वाली थी। इस दौरान सारे साथियों ने जमकर फोटोग्राफी की। एक घंटे की जल यात्रा के बाद हम माजुली पहुच गए थे। यहाँ के एक धर्मशाला में हमारे रहने की व्यवस्था थी। बोट किनारे लगी और हम फिर से बस में सवार हो गए। कुछ मिनटों की सड़क यात्रा के बाद हम धर्मशाला पहुच चुके थे।

लेखक विजय सिंह ‘कौशिक’ दैनिक भास्कर (मुंबई) के प्रमुख संवाददाता हैं. इनसे ईमेल Vijaysinghnews10@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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पूर्वोत्तर यात्रा-5 : बिहु और झूमर का नशा

आज गुवाहाटी से काजीरंगा नेशनल पार्क के लिए रवाना होना था। सुबह 7 बजे सारे पत्रकार साथी तैयार हो चुके थे। राजभवन से नाश्ता कर प्रस्थान करना था। हम दो दिनों से असम के राजभवन में रुके थे पर अब तक राज्यपाल पद्मनाभन आचार्य जी से हमारी मुलाकात नहीं हो पाई थी। दरअसल आचार्य जी के पास असम के साथ साथ नागालैंड के राज्यपाल का भी प्रभार है। इन दिनों वे नागालैंड की राजधानी कोहिमा स्थित राजभवन में थे। वहाँ उनसे हमारी मुलाकात होने वाली थी। सुबह 7 बजे हम 4 घंटे की यात्रा पर काजीरंगा के लिए रवाना हुए। बस आगे बढ़ी तो समय बिताने के लिए फिर से गीत संगीत की महफ़िल जमी।

सिद्धू जी ने जमकर ठुमके लगाये तो और साथियों ने भी उनका साथ दिया। काजीरंगा के बाहर स्थित डीआरडीओ के गेस्ट हाउस में हमारे रहने के व्यवस्था की गई थी। दोपहर 2.30 बजे हम गेस्ट हाउस पहुच गए। स्थानीय अधिकारी इमरान ने बताया की आप लोग जल्द चाय पी कर तैयार हो जाये। क्योंकि जीप से जंगल सफारी के लिए चलना है। काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान मध्‍य असम में 430 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला है। इस उद्यान में भारतीय एक सींग वाले गैंडे (राइनोसेरोस, यूनीकोर्निस) का निवास है। काजीरंगा को वर्ष 1905 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। सर्दियों में यहाँ साइबेरिया से कई मेहमान पक्षी भी आते हैं, हालाँकि इस दलदली भूमि का धीरे-धीरे ख़त्म होते जाना एक गंभीर समस्या है। काजीरंगा में विभिन्न प्रजातियों के बाज, विभिन्न प्रजातियों की चीलें और तोते आदि भी पाये जाते हैं।

शाम करीब 4 बजे हम खुली जीप में सवार हो कर जंगल भ्रमण के लिए निकले। सौभाग्य से चार गैंडो के दर्शन हुए पर मन में एक कशक बाकी रही की करीब से उनके दीदार नहीं हुए। पर सुबह हाथी पर सवार होकर एलिफेंट सफारी के लिए एक बार फिर जंगल जाना था। इस लिए अभी एक उम्मीद बंधी थी कि सुबह समीप से गैंडो को देखने का मौका मिलेगा। जंगल से निकलते निकलते अँधेरा छाने लगा था। इस बीच बने काका और दीपक जी ने अपने कैमरों से खुब तस्वीरें खिंची। उन तस्वीरों में हम थे और वन्यजीव भी।

हम गेस्ट हाउस पहुच चुके थे। बताया गया की सामने ही सांस्कृतिक प्रोग्राम का भी आयोजन है। यहाँ पर पर्यटको के मनोरंजन के लिए असम के पारंपरिक लोकनृत्य पेश किये जाते हैं। मुझे असम का लोकनृत्य बिहु बेहद पसंद है। उसके शब्द समझ नहीं आते पर इस लोकनृत्य  का संगीत और कलाकारों की भावभंगिमा खुब भाति है। जब से असम यात्रा की योजना बनी थी।  बिहु देखने की तमन्ना थी। पहली बार बिहु मुंबई विश्वविद्यालय में नेहरू युवा केंद्र की तरफ से आयोजित युवा महोत्सव के दौरान देखा था। तभी से इस लोकनृत्य का कायल हो चुका था। अब तक हम सब के मित्र बन चुके असम के श्रम सचिव नितिन खाडे जी जब इस इलाके के जिलाधिकारी थे, उस दौरान उन्होंने काजीरंगा आने वाले पर्यटकों के मनोरंजन और स्थानीय कलाकारों की आर्थिक मदद के लिए यह सांस्कृतिक आयोजन शुरू किया था।

रात 8 बजे से सांस्कृतिक आयोजन शुरू हुआ। मैं तो बिहु देखने आया था पर शुरुआत असम के एक और लोकनृत्य झूमर से हुआ। इसमें चार पुरुष कलाकार ढोल, तास और बाँसुरी बजाते है जबकि 10 महिला कलाकार एक दूसरे के बाहों में बाह डालकर नाचती हैं। झूमर देखा तो बिहु भूल गया। क्योंकि झूमर तो बिहु से ज्यादा खूबसूरत लोकनृत्य लगा। झूमर के बाद बिहु भी देखने को मिला पर अब मैं झूमर नृत्य का प्रशंसक बन चुका था। इस बीच मंच से मुंबई से आये पत्रकारों का स्वागत भी किया गया। नृत्य मंडली के सबसे वरिष्ठ कलाकार ने हमें मंच पर आकर साथ में नाचने का निवेदन किया। इसके बाद तो साथी पत्रकारो ने मंच पर धमाल मचा दिया। ओपी जी ने ढोल और दीपक जी ने झांझ संभाल लिया। सिद्धू, मुर्तज़ा, विवेक बाबू जमकर नाचे। 2 घंटे कब बीत गए, पता नहीं चला। हमने इस लोकनृत्य के वीडियो बनाये।

पूर्वोत्तर से लौटने के बाद लगभग हर दिन मैं मोबाइल पर झूमर डांस की वह वीडियो रिकार्डिंग देखता हु। आयोजको ने हमसे टिकट के पैसे नहीं लिए थे। पर हमने अपनी तरफ से कलाकारों को 2 हजार रुपये बतौर पुरस्कार दिए और उन्हें अलविदा कहा। अगली सुबह एलिफेंट सफारी के लिए हमें गेस्ट हाउस से 30 किलोमीटर दूर जंगल के दूसरे छोर पर जाना था। टीम लीडर किरण तारे जी ने चेता दिया था, जो समय से बस में सवार नहीं हुआ वह एलिफेंट सफारी के लिए न जा सकेगा।

लेखक विजय सिंह कौशिक दैनिक भास्कर, मुंबई में प्रमुख संवाददाता हैं. इनसे संपर्क 09821562156 के जरिए किया जा सकता है.

इसके पहले की कथा पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

पूर्वोत्तर यात्रा-1 : शिलांग में पश्चिम का राजस्थान

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पूर्वोत्तर यात्रा-2 : चौदह पेज का अखबार आठ रुपए में

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पूर्वोत्तर यात्रा-3 : मेघालय में सपने दिखा कर जीवन बदल रहे हरदोई के मिश्राजी

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पूर्वोत्तर यात्रा-4 : मेघालय में लड़की शादी के बाद लड़के को अपने घर लाती है

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पूरे एक साल बिना एक पैसा खर्च किए जिंदगी जीकर देखेगी यह महिला फ्रीलांस जर्नलिस्ट

जर्मनी की ग्रेटा टाउबेर्ट ने कसम खाई है कि वो एक साल बिना पैसा खर्च किए जिंदगी गुजारेंगी. टाउबेर्ट जानना चाहती है कि क्या पैसे के बिना वाकई जिंदगी चल सकती है. वह अपने अनुभव दुनिया से बांटेंगी. जर्मन शहर लाइपजिश में रहने वाली 30 साल की ग्रेटा टाउबेर्ट बढ़ते उपभोक्तावाद से परेशान हैं. इसीलिए उन्होंने तय किया है कि साल भर तक वो खाने पीने के समान, टूथपेस्ट, साबुन, क्रीम, पाउडर और कपड़ों पर एक भी सेंट खर्च नहीं करेंगी.

अभियान शुरू हो चुका है. लेकिन ये आसान नहीं. 12 महीने बाद जब टाउबेर्ट अपनी कसम पूरी करेंगी तो वह सबसे पहले क्या खरीदेंगी. हंसते हुए वो इसका जबाव देती हैं, “मुझे अंडरवीयर की जरूरत है.”

पैसे वाले सिस्टम से दूर होने पर हुए शुरुआती अनुभव का जिक्र करते हुए लंबे सुनहरे बालों वाली टाउबेर्ट कहती हैं, “मैंने अपना शैम्पू खुद बना लिया है लेकिन मेरे दोस्त कह रहे हैं कि मैं आदिमानव जैसी लग रही हूं. वो कह रहे हैं कि मैं ज्यादा दूर जा रही हूं.”

टाउबेर्ट फ्रीलांस पत्रकार हैं. लेकिन फिलहाल उनका काफी वक्त पुराने कपड़ों को सिलने और बागवानी में लग रहा है. सामुदायिक बगीचे में उन्होंने गोभी और आलू उगाए हैं. इस दौरान वो एक बार फ्री में छुट्टियां भी बिता चुकी हैं. छुट्टियों के लिए वो अपने शहर लाइपजिष से 1,700 किलोमीटर दूर बार्सिलोना गईं. इतना लंबा सफर उन्होंने रास्ते भर लिफ्ट मांग मांग कर पूरा किया. इस अनुभव पर टाउबेर्ट ने “एपोकैलीप्स नाव” नाम की किताब भी लिखी है.

किताब में टाउबेर्ट बताती हैं कि आधुनिक उपभोक्तावादी समाज कितना कचरा फैलाता है, “ज्यादा, ज्यादा और ज्यादा की रट.”

बिना पैसा खर्च किए एक साल बिताने का विचार उन्हें एक रविवार अपनी दादी के बगीचे में आया. वो दादी के साथ नाश्ता कर रही थी. मेज पर मांस, चीज, एप्पल पाई, चीज केक, क्रीम पाई, वनीला बिस्किट और कॉफी रखी थी. टाउबेर्ट कहती हैं, “तभी मैंने कहा कि मुझे थोड़ा दूध चाहिए. मेरी दादी ने मेज पर चॉकलेट, वनीला, केला और स्ट्रॉबेरी फ्लेवर वाले पाउडर भी रख दिए. तभी मुझे लगा कि हमारा आर्थिक तंत्र अनंत विकास का नारा देता है जबकि हमारा जैविक संसार सीमित है. ज्यादा, ज्यादा और ज्यादा की रट हमें बहुत दूर नहीं ले जाएगी.”

2012 में जर्मनी में करीब 70 लाख टन खाना बर्बाद हुआ. औसत निकाला जाए तो हर व्यक्ति ने 81.6 किलो खाना बर्बाद किया. इससे निराश टाउबेर्ट कहती हैं कि आर्थिक मंदी ने यूरोप को मौका दिया है कि वो मौजूदा तंत्र को बेहतर बनाए. (साभार- डायचे वेले)

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मस्ती की एक रात इस Osho पंथी संत ने यशवंत को दीक्षित कर नाम दे दिया स्वामी प्रेम संतति!

Yashwant Singh : तंत्र साधना को जानने की इच्छा के तहत काफी समय से बहुत कुछ पढ़, देख, सुन, खोज रहा हूं. इसी दरम्यान चंद रोज पहले लखनऊ में एक ओशो पंथी संन्यासी मिल गए, स्वामी आनंद भारती. उनसे तंत्र को लेकर त्रिपक्षीय वार्ता हुई. एक कोने पर Kumar Sauvir जी थे. दूसरे कोने पर खुद स्वामी आनंद भारती और तीसरे कोने पर मैं, श्रोता व वीडियो रिकार्डर के रूप में. ये 25 मिनट का वीडियो आपको बहुत कुछ बताएगा.

सबसे खास बात है कि ये जो स्वामी आनंद भारती हैं, वे दरअसल भानु प्रताप द्विवेदी हैं, जो बेहद सामान्य से आम नागरिक हैं. संपादन, प्रूफ, वकालत आदि के जरिए वह जीवन यापन का खर्च जुटाते हैं. व्यवहार इतना सहज कि पूछो मत.

‘जीवन कैसे जिया जाए’ के सवाल पर वे हमेशा एक बात कहते हैं- ”सहज रहो, मस्त रहो, जो अच्छा लगे करो, लेकिन हर वक्त चैतन्य रूप में, बिना होश खोए. पियो इसलिए नहीं कि होश खोना है, इसलिए पियो कि होश का विस्तार करना है”

मैं तो स्वामी जी का इतना मुरीद हुआ कि आनंद की महाअवस्था में उनको गुरु मान खुद को उनका शिष्य घोषित करा बैठा और उनने उसी रौ में कर दिया दीक्षित, मध्य रात्रि के वक्त मेरा नामकरण किया- स्वामी प्रेम संतति!

पूरी रात सोते वक्त सपने देखता रहा कि मैं यानि स्वामी प्रेम संतति, सतत प्रेम करते हुए दुनिया के कई देशों को दुखों से मुक्त कर मस्ती के धागे में पिरो रहा हूं.

समझ ये आया कि संन्यासी या संत या स्वामी बनने की क्रिया तो बेहद निजी होती है लेकिन जब आप बन जाते हैं तो फिर सार्वजनिक यानि सबके सुख के लिए समर्पित हो जाते हैं. अत्यंत अंतर्मुखी से उदात्त बहिर्मुखी.

क्या ऐसा है?

बस यूं ही एक विचार आया, और एक विचार के एक ही डायमेंशन होगा, इसलिए यह कंप्लीट नहीं हो सकता क्योंकि यह ब्रह्मांड थ्री डी, फोर डी, सेवेन डी तो छोड़िए अनंत डी से निर्मित है, इसलिए विचार, जो कि वन डी होते हैं, कभी कंप्लीट नहीं हो सकते.

हर विचार इसीलिए अभिव्यक्त के योग्य होता है क्योंकि उसमें अथाह अधूरापन सन्निहित होता है. पूर्ण विचार अव्यक्त होते हैं.

ऐसा क्या?

हां जी.

जय हो.

वीडियो नीचे है, क्लिक करें>

 

 

https://www.youtube.com/watch?v=-OlZbU_4CM0

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मांस मदिरा से मोक्ष तक की बात करने वाला एक बुजुर्ग OSHO पंथी संन्यासी (देखें वीडियोज)

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यशवंत यात्रा संस्मरण : एलीफैंटा द्वीप पर बुद्ध को किसने पीटा? देखें वीडियो

Yashwant Singh : एलीफैंटा द्वीप पर जो गुफाएं हैं, उसमें दीवारों पर चारों तरफ बुद्ध की मूर्तियां हैं. किसी में बुद्ध के पैर कटे हैं, किसी में मुंह टूटा है, किसी में हाथ गायब हैं. शांति के प्रतीक बुद्ध के साथ ये हिंसा कब और किसने की होगी. वीडियो बनाते हुए ये सवाल दिल दिमाग में चलता रहा. क्या वाकई हिंसा, डेस्ट्रक्शन ही मुख्य धारा है और शांति करुणा अहिंसा आदि चीजें रिएक्शन में पैदा हुईं, साइड इफेक्ट के चलते उपजी हुई बाते हैं? क्या प्रकृति की मोबोलिटि के लिए वायलेंस अनिवार्य है? शांति और अहिंसा से क्या प्रकृति को खुद के लिए खतरा पैदा होता है? या फिर ऐसा कि प्रकृति हर दौर के अपने नायक चुनती है और जब बुद्ध का दौर खत्म हुआ तो उनसे बड़ा कोई नायक पैदा नहीं हुआ लेकिन नित नए नए आयाम छूती गई? उदास मन और कई प्रश्नो को लेकर लौटा. आप भी देखिए और थोड़ा मुझे समझाइए.

हालांकि यह सब लिखते हुए कल ओशो को पढ़ते वक्त दिमाग में अंटकी एक फकीर की कहानी याद आ रही है. राजा को जब असली फकीर मिला तो उसकी कुटिया में घुसा और बोला- चल मेरे साथ वरना इस तलवार से तेरा सिर धड़ से अलग कर दूंगा. फकीर बोला- बिलकुल न जाउंगा, तेरे कहने से तो जाने से रहा. हां, तू सर काट, तेरे साथ मैं भी देखूंगा कि ये सिर धड़ से कैसे अलग हो रहा है. कहानी का आशय ये था कि जो द्रष्टा हो जाता है, जो निर्विचार हो जाता है, जो निर्वाण को प्राप्त हो जाता है, उसके लिए देह के कोई मायने नहीं रह जाते. वह देह में होते हुए भी देह से अलग होता है इसलिए उसकी देह के साथ जो करो, उसे कोई फरक नहीं पड़ता. तो, जिन लोगों ने बुद्ध की मूर्तियों को खंडित किया, उनके मन में अंतिम बात देह को खत्म करना ही था,लेकिन बुद्ध कोई देह तो नहीं. वो तो एक अवस्था है जिसमें देह दिमाग मूर्ति हिंसा के कोई मायने नहीं रह जाते.

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मुंबई में गेटवे आफ इंडिया से बोट मिलती है एलीफैंटा आइलैंड जाने के लिए. करीब घंटे भर में यह बोट ले जाती है. द्वीप पर जाने के बाद लगता है जैसे आप किसी दूसरी दुनिया में आ गए. यहां जो गुफाएं हैं उसमें बुद्ध की टूटी फूटी मूर्तियां हैं. द्वीप के शिखर पर दो विशालकाय तोप हैं.

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आज नया जिया
समुद्र में दौड़ा
द्वीप पर लोटा
आज नया देखा
तोप पर सेल्फी
बन्दर को पेप्सी
आज नया सोचा
बुद्ध से तोड़फोड़
युद्ध से गठजोड़
आज नया गाया
बीयर के साथ में
अजनबी से प्यार में
आज नया दिया
समुद्र को सबका प्यार
पक्षियों को सारा संसार।

देखें संबंधित वीडियो….

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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त्रयंबकेश्वर मंदिर : 200 रुपये डोनेशन देकर वीआईपी दर्शन करने की बात लिखा देख मन बिदक गया

Yashwant Singh : आजकल नासिक में डेरा है. यहां चाचाजी की ओपन हॉर्ट सर्जरी हुई है. सब कुछ सकुशल रहा. वे अपने सुपुत्र और मेरे छोटे भाई Rudra Singh के यहां रहकर स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं. चाचाजी के कहने पर आज नासिक से कुछ दूर स्थित त्रयंबकेश्वर मंदिर गया, जिसकी हिंदू धर्म में बहुत महिमा है. पर मंदिर के गेट पर 200 रुपये डोनेशन देकर वीआईपी दर्शन करने की बात लिखा देख मन बिदक गया. भीतर नहीं गया. पूछा तो पता चला कि आम जनता लंबी लाइन लगाकर काफी समय गुजारने के बाद दर्शन लाभ पाती है लेकिन जो दो सौ रुपये दे देते हैं उन्हें तुरंत डायरेक्ट दर्शन करा दिया जाता है.

 

मैं वैसे भी कर्मकांड और दुनियावी किस्म के पूजापाठ को लेकर बेहद अधार्मिक रहा हूं, सो यहां इस भेदभाव पूर्ण पद्धति से दर्शन करने का मतलब ही नहीं. बाकी जिन मंदिरों वगैरह में जाता हूं वहां दर्शन भाव से कम, उत्सुकता भाव से ज्यादा जाता हूं कि आखिर वो मूर्ति पत्थर जगह स्थल पीठ क्या कैसी है, जिसके लिए इतने लोग आते हैं और जिसकी इतनी मान्यता है, इसी टाइप की फील ज्यादा खींच ले जाती है. त्रयंबकेश्वर मंदिर के आसपास के इलाके में घूमा. पहाड़ से घिरा यह स्थान उस समय कितना अदभुत रहा होगा जब यहां इतनी भीड़भाड़ व बसावट न रही होगी. तब सच में यहां उर्जा पुंज चारों तरफ रहा होगा, वाइब्रेशन फील होती रही होगी. लेकिन अब तक इतने मकान, इतनी दुकान और इतने सारे लोग हैं कि भगवान खुद भी चले आएं तो अफना के कुछ देर या कुछ दिनों में भाग जाएं.

उपर एक तस्वीर में देख सकते हैं डोनेशन वाली बात कितनी साफ साफ ढंग से मंदिर के मुख्य गेट पर दर्ज है.
एक तस्वीर में मेरे अनुज रुद्र और मैं लैपटाप पर काम करते और टीवी पर डिस्कवरी साइंस चैनल देखते नजर आ रहे हैं.
एक तस्वीर में पहाड़ कुंड और प्रकृति का नजारा है.
एक तस्वीर में दूर से दिख रहे त्रयंबकेश्वर मंदिर की प्रतिलिपि पानी में दिख रही है.

आप लोग भी यहीं से दर्शन कर लें. आने की जरूरत नहीं है. मन चंगा तो कठौती में गंगा.

मुंबई से नासिक की कार यात्रा के दौरान सोचता रहा कि कितना हरा भरा ये इलाका है. उत्तर भारत वाली चेंचें कोंकों पोंपों वाली चिरकुटई पूरी यात्रा में कहीं न दिखी. सब कुछ मानों किसी चित्रकार ने बेहद कुशलता से संयोजित कर रखा हो. बेहद उदात्त और अनुशासित सा सब कुछ. बेहद हरा भरा और चटक सा सब कुछ.

दूसरा पहलू ये कि पानी बिना ये पूरा इलाका मरणासन्न होने की ओर बढ़ रहा है. विदर्भ के संकट की एक झलक यहां यूं दिखी कि पीने के पानी का काफी रायता फैला हुआ है. कोई कह रहा था कि अगर वाटर लेवल ठीक करने की बड़ी कोशिशें न की गईं तो सौ पचास साल में यहां मरघट हो जाएगा और सारे लोग उन इलाकों की तरफ विस्थापित हो जाएंगे जहां पीने का पानी जमीन में ठीक मात्रा में उपलब्ध है.

नाशिक में बरसाती पानी को रोककर उसी पानी को साल भर घरों में सप्लाई किया जाता है. लोग इसे पीते नहीं. पीने का पानी बाहर से मंगाते हैं. यानि यहां पानी का कारोबार खूब है. वैसे, यहां पेड़ पौधे पहाड़ियां व हरियाली खूब है लेकिन यह सब कितने दिनों तक रहेगा जब हर साल बारिश कम से कमतर होती जा रही है और वाटर लेवल का कहीं अता पता नहीं है. इन दिनों जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंढी पड़ रही है तो नाशिक में हम लोग पंखा चलाकर सो रहे हैं. जैकेट पहनकर बाहर निकलने की भूल कर गया मैं तो इसका पश्चाताप पूरे रास्ते रहा कि हाय इस भार को क्यों डाल लिया शरीर पर.

सोचिए, जब कड़ाके की ठंढ में इधर ये हाल है तो गर्मी में ये पूरा इलाका कैसा होता होगा. हालांकि समुद्र किनारे वाले शहरों में ठंढी गर्मी दोनों कम पड़ती है लेकिन इतनी भी कम सर्दी नहीं पड़ती जैसी नाशिक में पड़ रही. बेहद खतरनाक बात तो बारिश का न्यूनतम होते जाना है.

कोढ़ में खाज सरकार की नीतियां हैं. पूरा इलाका अब मकान फ्लैट बनाने के लिए लगातार उलीच कर समतल किया जा रहा है. पहाड़ काट डाले गए. पेड़ काटे डाले गए. पानी लील लिया गया. तालाब नाले पोखरे पाट डाले गए. हर तरफ बड़े बड़े मकान दुकान रंगरोगन से सजे ईंट पत्थरों के आलीशान मानवी ठिकाने उग चुके हैं. इस तरह के विकास का नतीजा यही दिख रहा है कि यहां आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर लोग ही रह पाएंगे. गरीब या तो विस्थापित होगा या आत्महत्या करेगा, जिसका ट्रेंड विदर्भ के जरिए हम लोगों को बखूबी इंडिकेट कर रहा है.

महाराष्ट्र में हरित आंदोलन या यूं कहिए प्रकृति आंदोलन चलाने की जरूरत है. रीयल इस्टेट माफियाओं पर लगाम कसने के लिए सरकारी नीति बदलने को लेकर पढ़े लिखे संवेदनशील तबके को चौतरफा दबाव बनाने बनवाने की जरूरत है. अगर आज हमारी पीढ़ी के लोगों ने यह सब नहीं किया तो भविष्य के नौनिहालों के लिए महाराष्ट्र किसी मौत के राष्ट्र सरीखा होगा.

मराठी मानुष की राजनीति करने वाली पार्टियां अगर वाकई क्षेत्रीय विशिष्टता और क्षेत्रीय ताकत को बढ़ावा देने के लिए चिंता करें तो उन्हें सबसे पहले पानी-प्रकृति बचाने बढ़ाने का महाअभियान शुरू करना चाहिए. लेकिन हमको मालूम है इनकी नीयत ठीक नहीं. इसलिए ये शार्टकट वाली राजनीति करने पर आमादा रहेंगे, मराठी – गैर मराठी टाइप की लड़ाई बार बार नए नए तरीके से छेड़कर. पर क्या अब ऐसे जांबाज मराठे नहीं जो अपनी पार्टियों को आइना दिखाएं या फिर नई पार्टी बनाकर वाकई महाराष्ट्र बचाने की मुहिम को आगे बढ़ाएं.

जैजै.

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नाशिक रेलवे स्टेशन पर एक अंधे लेकिन हस्ट-पुष्ट भिखारी को एक साहब टाइप सज्जन ने पैसे देने के बदले रोटी सब्ज़ी ऑफर किया तो उसने तुरंत मान लिया और उन्हीं के सामने लाठी बिछा धरती पर पालथी मार बैठ गया। उनने अपने बैग से खाना निकाला और सम्मान के साथ दे दिया। टांय टांय बोलने वाला अँधा भिखारी जब दो तीन कौर खा गया तो साहब बोले- ये सब्ज़ी आंवले की है, इससे डायबटीज़ की बीमारी नहीं होगी।

भिखारी खाना मुंह में कूँचते चबाते बोला- साहब, डायबटीज़ की बीमारी चोरों झुट्ठों को होती है। मुंझे काहें को होगी।

बेचारे साहब। उनका मुंह देखने लायक था। सामने मैं बैठा था। वे मुझे देखने लगे तो मैं ठठा के हंस पड़ा। वो बहुत झेंप गए। वो अँधा भिखारी भी देख रहा था साहब के चेहरे पर डायबटीज़ का उभर आना। खाना ख़त्म कर भिखारी ने मिनरल वाटर की बोतल झोले से निकाल गड़गड़ा कर पिया और लाठी ठोंकते टांय टांय बोलते-मांगते आगे बढ गया।

लर्निंग- भिखारी का पेट भरने के दौरान डायबटीज़ और डेमोक्रेसी बतियाएंगे तो लात खाएंगे ही 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मेरठ, मोदी, मनुष्य और मस्ती : कहीं आप रोबो मशीन तो नहीं!

Yashwant Singh :  मेरठ आया हुआ हूं. कल जब बस से उतरा तो पुरानी यादों के सहारे शार्टकट मार दिया. वो मटन कोरमा और काली मिर्च चिकन की खुश्बू को दिलों में उतारते, उस दुकान के सामने खड़े होकर कुछ वक्त उसे निहारते. फिर एक तंग गली में चल पड़ा. रिक्शों, आटो वालों को मना करते हुए कि मुझे पैदल ही जाना है. चलता रहा. कई दिन से दाढ़ी बढ़ी हुई थी. दाएं बाएं देखता रहा और वर्षों पुरानी मेरठ की यादों को ताजा करते हुए पैदल चलता रहा.

एक दुकान दिख गई. अंदर घुसा तो कई मेरठिए गपिया रहे थे, हजामत वाली सीटों पर बैठकर. मैं थोड़ा सहमा. बाहर से शीशा ब्लैक था दुकान का सो अंदर धड़ से घुस गया लेकिन जब वहां का हाल देखा तो लगा कि राजनीतिक चर्चाओं का तापमान तेज है, दाढ़ी बाल बनाने जैसा कोई माहौल नहीं है. पर जब घुस गया और दस बीस आंखों पूछने लगी, मौन में, कि तुम कौन? तो मुझे बोलना पड़ा- शेविंग कराने आया था. क्या यहां होता है?

इतना सुनते ही बिलकुल पीछे और कोने में बैठा एक मरिहल शख्स बोल पड़ा- यस सर यस सर. जी आइए बैठिए होता है. मैं सोचने लगा बैठू कहां. यहां तो कब्जा इन तमाम लोगों ने कर रखा है. अंतत: एक सज्जन उठे. सीट खाली हुई. मैं वहां बिराजा. बैग पीछे रख कर. तब एक बुजुर्ग से सज्जन जो सीट खाली करके उठे थे, बोले कि हे इस्लाम, तुम इसका दाढ़ी बनाओ, तब तक कुछ काम निपटा के आता हूं. इस्लाम जी बोले- जी दुरुस्त है.

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तो मैं बता रहा था कि जब मेरठ बस अड्डे से उतरा और शेविंग के लिए एक दुकान में घुसा. अब उसके आगे बताते हैं… इस्लाम भाई गाल पर क्रीम वगैरह पोतने लगे… बाकी जो दो चार मेरठी बहसबाज दुकान में थे, वो रुकावट के लिए खेद के बाद फिर से शुरू हो गए. मुद्दा मोदी केजरीवाल आदि थे. सुनिए कुछ बातचीत के अंश…

-बड़ा वाला कमीना निकला मोदी. दाल सब्जी समेत हर चीज के दाम आसामन पर.
-खुद विदेश भागा रहता है. न कुछ करता है और न दूसरों को करने देता है.
-देखो केजरीवाल को. वह कर रहा है काम तो मोदी उसे परेशान किए रहता है.
-सम विषम वाला काम ठीक किया केजरीवाल ने.
-पाकिस्तान को दुरुस्त कर रहा था. देखो. कहां सुधरा पाकिस्तान. फिर अटैक हो गया है.
-अबकी इनसे सबसे ज्यादा नाराज व्यापारी वर्ग है. यह वर्ग भाजपा का कट्टर समर्थक रहा है. लेकिन इस व्यापारी वर्ग का सबसे ज्यादा नुकसान मोदी ने किया है.
-हर तरफ मंदी और पस्ती है. न बाजार में रौनक है और न घरों में.
-चैनल अखबार वाले भी मोदी की ही गुणगान करते हैं.
-देखो रामदेव के आइटम में डिफेक्ट निकला था तो किसी ने नहीं छापा. मैगी पर सबने हाय हाय किया था. रामदेव के आइटम में डिफेक्ट वाली खबर एक चैनल पर सिर्फ चली थी. तब पता चला.
-पेट्रोल का दाम दुनिया में कितना कम हो गया. हमारे यहां मोदी जी बढ़ाए जा रहे हैं. पता नहीं किस सोच का आदमी है.
-अरे मोदी ठीक कर रहा है. जैसे मनमोहन ने कांग्रेस की जड़ खोद दी, वैसे मोदी भाजपा की जड़ खोद देगा. अब कोई दूसरा भाजपाई कभी पीएम न बन पावेगा.
-असल में भाजपा के पीएम के साथ एक दिक्कत रही है. ये लोग पत्नी वाले नहीं रहे. वाजपेयी जी भी अकेले थे. मोदी जी भी अकेले हैं. अइसे लोगों से कैसे देश चलेगा जो घर परिवार का भुक्तभोगी न हो. कम से कम घरवाली होती तो बताती तो देश जनता का मूड क्या है. ये अकेले अकेले सांड़ जो सोच लें, वही सही. इन्हें दीन दुनिया के बारे में क्या पता…

बहसबाजी में कभी गंभीरता तो कभी मस्ती तो कभी हंसी तो कभी उदासी के सुर आते जाते रहे और सारी बातचीत से मैं जाने कैसे अपनी थकान खत्म पाने लगा…मैं चुपचाप शेविंग करवाता रहा. रेडियो पर आ रहे गाने सुनता रहा. इन लोगों की बहसबाजी का आनंद लेता रहा. इस्लाम भाई ने जब सफाचट कर दिया तो पूछने लगे कि फेस मसाज कर दे.

हमने कभी नाइ भाइयों को किसी काम के लिए मना नहीं किया. चूंकि घर पर कभी शेविंग किया नहीं इसलिए हफ्ते महीने में जब दुकान पर जाकर शेविंग कराता हूं तो नाई भाई जो जो कहते हैं सब करा लेता हूं, हेड मसाज, फेस मसाज जाने क्या क्या.

इस्लाम भाई चालू हो गए. बहस भी आगे बढ़ती गई… राजनीति के बाद बहस लोकल मुद्दों पर आ गई. मैं फेस व हेड मसाज के दौरान आंख बंद कर ध्यान में उतरने लगा. रेडियो के गीत, बहसबाजों की बातें, इस्लाम भाई का सक्रिय हाथ…. सड़क की चिल्ल पों… सब मिलाकर एक लय में सुरबद्ध हो गए और मैं इस सपोर्टिंग म्यूजिक के सहारे गोता लगाने लगा…

नाई की दुकान मेरे लिए जाने क्यों सबसे पवित्र और आरामदायक जगह लगती है… यहां मैं सच में कुछ ज्यादा आध्यात्मिक और कुछ ज्यादा मस्त हो जाता हूं… कभी कभी लगता है कि जब मुझे ज्ञान प्राप्त होगा तो उसके पहले कोई शख्स मेरे सिर की मालिश कर गया होगा… शरीर के हर हिस्से कितने संवेदनशील और कितने आरामतलब होते हैं, इसका अंदाजा मसाज के दौरान होता है.

जीवन को जो लोग कुछ तर्कों कुछ सिद्धांतों कुछ विचारों के सहारे परिभाषित कर लेना चाहते हैं दरअसल उन्हें नहीं पता कि जीवन उसी तरह असीम है जैसे ये गैलेक्सी, जैसे ये ब्रह्मांड, जैसे मल्टीवर्स… थाह लगाने के दावे इतने छोटे हैं और अज्ञात इतना बड़ा है कि उस पर शोध करते उसका आनंद लेते जीवन खर्च हो जावेगा…

ऐसी ही आनंद की मन:स्थिति में मैं सौ रुपये इस्लाम भाई को पकड़ाकर मंजिल की तरफ रवाना हो गया… मेरे ये सब लिखने का आशय इतना था कि जीवन में जिया जा रहा हर पल महसूस किया जाना चाहिए.. गहरे तक.. वरना आप मंथली सेलरी उपजा पाने वाले या हर साल बढ़ा हुआ टर्नओवर अपनी कंपनी के खाते में देख पाने वाली रोबो मशीन से ज्यादा कुछ नहीं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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पूर्वोत्तर यात्रा-1 : शिलांग में पश्चिम का राजस्थान

शिलांग में राजस्थानी समाज द्वारा 1959 में बनाया गया राजस्थान विश्राम भवन।

जिंदगी यादों का कारवाँ है। हम भी अपने इस यादों के कारवे में आप सब को शामिल करने जा रहे है। देश के पूर्वी हिस्से जिसे नार्थ ईस्ट यानि पूर्वोत्तर के नाम से जानते हैं। भारत का यह इलाका देश के बाकी हिस्से से लगभग कटा हुआ है। हालाँकि हाल के वर्षों में लोगों की दिलचस्पी पूर्वोत्तर में बढ़ी है। काफी दिनों से पूर्वोत्तर यात्रा के बारे में सोच रहा था। इसी साल सितम्बर की एक दोपहर मंत्रालय में खबरों की तलाश के दौरान  एशियन एज के विशेष संवाददाता मेरे मित्र विवेक भावसार ने बताया की हम कुछ पत्रकार मित्र पूर्वोत्तर यात्रा की योजना बना रहे हैं। पूछा क्या आप भी चलना चाहेंगे ? मैं तो पूर्वोत्तर देखने के लिए कब से लालायित था। इस लिए हा कहने में जरा भी देर नहीं की। धीरे धीरे पूर्वोत्तर जाने वाले पत्रकार साथियों की संख्या बढ़ते बढ़ते 18 तक पहुच गई। आख़िरकार पूर्वोत्तर यात्रा की तिथि भी तय हो गई। एयर टिकट सस्ते मिले इस लिए एक माह पहले ही टिकटों की बुकिंग कराई गई।

इस यात्रा की योजना बनाने ने व्हाट्सएप ने बड़ी मदद की। इसके लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप तैयार किया गया। इसी व्हाट्सएप ग्रुप पर सूचना मिली की 22 नवम्बर 2015 की सुबह 9 बजे की उड़ान से गुवाहाटी जाना है। यात्रा का वह दिन भी आ गया। सभी साथियो को कहा गया था कि सुबह 7 बजे सभी को सांताक्रुज हवाई अड्डे पहुचना है। मैं हवाई अड्डे के पास रहता हु। इस लिए समय से हवाई अड्डे पहुचने को लेकर निश्चिंत था। हमारी टीम के कुछ साथी जो लेट लतीफी के लिए कुख्यात रहे हैं, उनसे खास तौर पर कहा गया  कि वे समय पर एअरपोर्ट पहुँच जाये। लेट लतीफी के लिए मशहूर हमारे कुछ साथियों ने अपनी यह विशेषता बरक़रार रखी और 7 बजे की बजाय सुबह 8 बजे तक एअरपोर्ट पर पहुँच गए।

किरण तारे ( न्यू इंडियन एक्सप्रेस), विवेक भावसार ( एशियन एज), सिद्धेश्वर (सकाल), सुरेन्द्र मिश्र ( अमर उजाला), राजकुमार सिंह ( नवभारत टाइम्स), विनोद यादव ( दैनिक भास्कर), विपुल वैद्य ( मुम्बई समाचार), अभिजीत मुले ( फ्री प्रेस जनरल), चंद्रकांत शिंदे ( दिव्य मराठी), गौरीशंकर घाले ( लोकमत), राजेश प्रभु ( तरुण भारत), स्वतंत्र प्रेस फोटोग्राफर दीपक साल्वी और वरिष्ठ प्रेस फोटोग्राफर मोहन बने और हमारे विशेष आग्रह पर इस यात्रा में हमारे सहयात्री बने महाराष्ट्र भाजपा के सह मीडिया प्रभारी ओम प्रकाश चौहान उर्फ़ ओपी, एअरपोर्ट पहुच चुके थे। बने काका इंडियन एक्सप्रेस के वही मशहूर फोटोग्राफर हैं, जिन्होंने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का गुम्बद तोड़ने की ऐतिहासिक तस्वीर अपने कैमरे में कैद की थी। उनकी यह तस्वीर तब से आजतक हजारो पत्र पत्रिकाओं में छप चुकी है। उनको जाँच आयोग के सामने गवाही के लिए भी बुलाया गया था।

एअरपोर्ट पर सुरक्षा जाँच का काम पूरा कर हम सब इंडिगो के उस विमान की तरफ बढे, जो हमें कोलकाता एअरपोर्ट की सैर कराते हुए गुवाहाटी पहुचाने वाला था। पुरे 11 दिनों का कार्यक्रम अभिजीत जी ने पहले ही तैयार कर हमारे व्हाट्सएप ग्रुप पर पोस्ट कर दिया था। सुबह 9 बजे हमारे विमान ने उड़ान भरी। कोलकाता होते हुए दोपहर 2 बजे हम गुवाहाटी एअरपोर्ट पर पहुच गए। विमान से उतरते ही एअरपोर्ट पर गैंडे की आदमकद प्रतिमा ने हमारा स्वागत किया। गैंडा आसाम का राज्य पशु है। इस लिए इस जंगली जानवर की तस्वीर यहाँ हर तरफ दिख जाती है। एअरपोर्ट से बाहर निकले तो रणजीत डेका हमारा इंतज़ार कर रहे थे। डेका यहाँ माय होम इंडिया के कोआर्डिनेटर हैं। माय होम इंडिया पूर्वोत्तर और शेष भारत के बीच सेतु का कार्य करने वाली एक संस्था है। इसके अध्यक्ष सुनील देवधर मुम्बई में रहते है और हम पत्रकारो के अच्छे मित्रो में से हैं।

डेका हमें 25 सीटो वाली उस टेम्पो ट्रेवलर के पास ले गए। अगले 12 दिनों तक यही वाहन हमारे  साथ रहने वाला था। इस मिनी बस की छत पर हमने अपने भारी भरकम बैग लादे और चल पड़े अपनी अगली मंजिल शिलांग के लिए। शिलांग-आसाम के पडोसी राज्य मेघालय की राजधानी। कभी पूर्वोत्तर के सातो राज्य आसाम के हिस्से थे। बस एक राज्य था आसाम पर बाद में यहाँ सात राज्यो का गठन किया गया। जिसे अब सेवन सिस्टर के नाम से जाना जाता है। भूख भी लग गई थी। इस लिए शहर से बाहर निकल कर एक ढाबे पर भोजन के बाद गुवाहाटी से शिलांग की 100 किलोमीटर कि यात्रा शुरू हुई। गुवाहाटी एअरपोर्ट से थोडा आगे निकलने पर हमारी बाई तरफ एक भव्य स्मारक दिखाई दिया।

डेका ने बताया, यह महान गायक संगीतकार भूपेन हजारिका का स्मारक है। आसाम का बच्चा बच्चा इस नाम से परिचित है। भूपेन दा 5 नवम्बर 2011 को यह दुनिया छोड़ गए थे। उनकी शव यात्रा में जैसा मानवी महासागर उमड़ा, वह इस राज्य के इतिहास में दर्ज हो चुका है। बताते हैं कि आसाम में इसके पहले किसी नेता- अभिनेता के लिए इतने लोग नहीं जूटे। आठ सितंबर 1926 को असम के सादिया में जन्मे भूपेन दा ने बचपन में ही अपना पहला गीत लिखा और उसे गाया भी, तब उनकी उम्र महज दस साल थी। असमिया फिल्मों से उनका नाता बचपन में ही जु़ड गया था।

भूपेन दा को दक्षिण एशिया के श्रेष्ठतम जीवित सांस्कृतिक दूतों में से एक माना जाता था। उन्होंने कविता लेखन, पत्रकारिता, गायकी, फिल्म निर्माण आदि अनेक क्षेत्रों में काम किया है। भूपेन दा ने हिन्दी सिनेमा में कई फिल्मों में गीत गाए। फ़िल्म रूदाली का गाना ‘दिल हुम हुम करे’ आज भी लोग गुनगुनाते हैं। भूपेन दा ने  न केवल असम व बंगाल के लोक संगीत को फिल्मों में इस्तेमाल किया बल्कि राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों की लोकधुनों को भी अपनाया। उनके दिल में असम के वनवासियों के लिए काम करने की सदैव उत्कट इच्छा रहती थी। भूपेन दा ने मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में अंतिम सांस ली थी।

गुवाहाटी- शिलांग हाइवे पर हमारा वाहन आगे बढ़ा तो हमारे स्थानीय साथी डेका ने दिलचस्प बात बताई। उन्होंने बताया कि हमारी दाई तरफ सड़क के किनारे का इलाका मेघालय का हिस्सा है, जबकि जिस सड़क पर हमारी बस दौड़ रही थी, वह आसाम में है। यानि हम आसाम और मेघालय में एक साथ यात्रा कर रहे थे। तय कार्यक्रम के अनुसार शाम 5 बजे तक हमें शिलांग पहुचना था। पर समय तो मुट्ठी में रेत की भांति फिसलता रहता है। आख़िरकार रात 8 बजे हम अपनी मंजिल पर पहुँच गए। वहा डारमेट्री में हमारे रहने की व्यवस्था थी। सभी साथियो ने अपने अपने सामान के साथ बिस्तर पकड़ लिया।

पर कुछ साथी रात्रि विश्राम के लिए इससे अच्छी जगह कि व्यवस्था में जुट गए थे। इधर उधर फोन करने के बाद पास में स्थित राजस्थान भवन में रात्रि विश्राम कि व्यवस्था हो गई। अब हम राजस्थान भवन की तीन मंजिला ईमारत में पहुँच चुके थे। देश के दूर दराज के इस इलाके में भी राजस्थानी समाज की मजबूत उपस्थिति देख कर अच्छा लगा। व्यापार के क्षेत्र में इस समाज का कोई सानी नहीं साथ ही राजस्थानी समाज चाहे जहा रहे, समाजसेवा करना नहीं भूलता। यही हमारी मुलाकात कमल झुनझुनवाला से हुई। झुनझुनवाला मेघालय प्लानिंग बोर्ड के सदस्य रह चुके है। उनको राज्यमंत्री का दर्जा मिला हुआ था। उनका परिवार तीन पीढ़ियों से शिलांग में रह रहा है। मृदुभाषी कमल जी रात का खाना खिलाने  हम सबको पास के एक होटल में ले गए।

पेट पूजा के बाद अब निद्रासन की बारी थी। रात को ही हमारे टीम लीडर किरण तारे जी ने बता दिया था की सुबह जल्द उठाना है। हमें चेरापूंजी के लिये निकलना था। प्राथमिक कक्षाओ में भूगोल की किताब में चेरापूँजी के बारे में पढ़ा था कि यहाँ दुनिया में सबसे अधिक बारिश होती है। स्कुल की किताबो में पढ़ा था कि चेरापूँजी में हर रोज दिन में एक बार बरसात जरूर होती है। चेरापूँजी को लेकर बचपन में जानी इन बातो की चर्चा साथी पत्रकारो से करते- करते कब नीद आ गई पता ही नहीं चला। (जारी)

लेखक विजय सिंह ‘कौशिक’ दैनिक भास्कर (मुंबई) के प्रमुख संवाददाता हैं.

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