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राहुल गांधी की छवि खराब करने के प्रयास जारी, ‘सरकार’ के खिलाफ शीर्षक ढूंढ़ने पड़ते हैं

संजय कुमार सिंह

आज शपथग्रहण का दिन है। सबसे बड़ी खबर यही है। इससे संबंधित अटकलें भी आज खबर हो सकती हैं। लिखने को यह भी लिखा जा सकता था कि देश के खिलाफ काम करने, साथी पूंजीपति और सासंदों का खुलकर बचाव करने, विरोधियों को अकारण   परेशान करने और अनुभवी चोर होने के आधार पर विपक्षी मुख्यमंत्री को जेल में रखने जैसी व्यवस्था चलाने और इसमें सामाजिक ताना-बाना चौपट हो जाने तथा चुनावों में नैतिक हार के बावजूद नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन रहे हैं। इसके कई कारणों में एक यह भी है कि पार्टी में उनका कोई विकल्प नहीं है। अगले साल मार्ग दर्शक मंडल में जाने  की उम्र हो जायेगी तब भी। यही नहीं, नीतिश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की पार्टी उनका समर्थन कर रही है। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि मोदी नहीं तो कौन का प्रचार करने वाले बहुमत नहीं मिलने पर भी कुर्सी के जुगाड़ में लगे रहे वरना विपक्ष किसी ना किसी को प्रधानमंत्री बनाता ही और तब पता चलता कि वह मोदी से बेहतर है या नहीं।

सच्चाई यह है कि ये उदारता भी विपक्ष ही दिखा पाया। पर यह सब खबर नहीं है। शपथग्रहण की खबर भी कुछ ही अखबारों में है। हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू में आज की लीड का शीर्षक है, कांग्रेस कार्यसमिति ने राहुल गांधी से लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने की अपील की”। सोनिया गांधी फिर से संसदीय दल की नेता चुनी गईं यह हिन्दुस्तान में टाइम्स में लीड के साथ दो कॉलम की खबर है। द हिन्दू में उपशीर्षक है, राहुल गांधी ने कहा कि वे बहुत जल्दी फिर निर्णय करेंगे। यहां, सोनिया गांधी फिर से संसदीय दल की नेता चुनी गईं – उपशीर्षक में है। मुझे लगता है कि, कांग्रेस कार्यसमिति ने राहुल गांधी से लोकसभा में विपक्ष का नेता बनने की अपील की – इतनी बड़ी खबर नहीं है। वैसे भी, यह पार्टी का आंतरिक मामला है। वैसे ही जैसे भाजपा ने अपने संसदीय दल का नेता चुना ही नहीं। चूंकि भाजपा नेता प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं इसलिए खबर राहुल गांधी से पक्ष का नेता बनने की मांग या अपील के मुकाबले बड़ी खबर है।  

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मेरे एक भक्त मित्र का मानना है कि राहुल गांधी को संसदीय दल का नेता नहीं बनना है तो यह मांग की ही नहीं जानी चाहिये थी और उन्हें इसे रोकना चाहिये था। मांग किये जाने और स्वीकार नहीं करने से उनकी छवि खराब होगी। मैं इससे सहमत नहीं हूं। मांग करना पार्टी का अधिकार है, लोकतांत्रिक तरीका है और मना करना राहुल गांधी का विशेषाधिकार। इसमें बाहर वालों की दिलचस्पी होनी ही नहीं चाहिये पार्टी, या राहुल गांधी या प्रक्रिया छवि खराब होने का कारण नहीं है। अगर राहुल गांधी को अपने लोगों को यह मांग करने से रोक देना चाहिये था तो क्या राहुल गांधी को अमेठी से लड़ने की चुनौती को नहीं रोकना चाहिये था? अगर वे रोक पाते या रोकने के पक्ष में होते तो इसपर वैसे बात करते जैसे एक महिला पत्रकार से करने या यह कहने के लिए कि, ये तो बीजेपी की लाइन है – कुछ निष्पक्ष दिखना चाहने वाले पत्रकार राहुल गांधी को ट्रोल कर रहे हैं। राहुल गांधी ने उसे नहीं रोका और बिला वजह रायबरेली से लड़कर चुनौती स्वीकार की और जवाब दिया।

यह उनकी कार्यशैली है और उनका व्यक्तित्व। इसका नफा-नुकसान भी उन्हें होता होगा। पर एक लोकतांत्रिक व्यक्ति भक्तों के भगवान की तरह तानाशाह कैसे हो जाये और भक्तों की तरह हर कोई तानाशाही स्वीकार क्यों कर ले। ठीक है कि अखबारों को खबरों के चयन का अधिकार है पर वैसे ही मुझे भी अपनी बात कहने, अपनी राय रखने का अधिकार है। मेरा मानना है कि वायनाड से जीतने का यकीन था या होता तो रायबरेली से लड़ने की जरूरत नहीं थी। चुनौती का तो कोई मतलब ही नहीं था और तब होता जब नरेन्द्र मोदी दक्षिण में कहीं से लड़ते। अब राहुल गांधी एक सीट छोड़ेंगे, वहां उपचुनाव होंगे और उसमें पैसे खर्च होंगे पर वह मुद्दा नहीं है क्योंकि भाजपा का एजंडा था। राहुल गांधी दोनों जगह से अच्छे मतों से जीते, नरेन्द्र मोदी का अंतर बहुत कम हुआ है। उनकी नैतिक हार भी हुई है। पर मुद्दा यह है कि राहुल गांधी तीसरी बार ‘फेल’ हो गये और नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाकर रिकार्ड बना रहे हैं। उनके घटिया भाषण, बिना मुद्दों के चुनाव लड़ना और चुनाव आयोग की भूमिका आदि मुद्दा नहीं है।

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राहुल गांधी की खबर को लीड बनाना आपकी या कुछ लोगों की राय में उन्हें महत्व और प्रचार देना हो सकता है। लेकिन संभव है कि असल में इस खबर से यह प्रचारित किया जा रहा हो कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन पाये और उन्हें लोकसभा में विपक्ष के नेता से संतोष करना पड़ा। अगर वे मना कर देंगे तो यह प्रचारित किया जा सकेगा कि वे प्रधानमंत्री से कम पर मान नहीं रहे हैं आदि आदि। और यह सब बिना कुछ कहे हो सकता है। संसदीय दल का नेता होने की अपील इतनी बड़ी बात नहीं है कि उससे संबंधित खबर को लीड बनाया जाये। लेकिन मामला राहुल गांधी और कांग्रेस का है। फैसला राहुल गांधी को करना है। वे जो भी फैसला करें उसे किसी भी तरह गलत साबित करके राहुल गांधी को अपरिपक्व राजनेता साबित किया जा सकता है। यह मैं ऐसे ही नहीं कह रहा हूं। एक भक्त मित्र ने मुझे आज यही समझाने की कोशिश की तो लगा कि इस खबर का उद्देश्य हो सकता है। वैसे भी जब मीडिया का एक बड़ा वर्ग यह साबित करने में लगा है कि नरेन्द्र मोदी या भाजपा ही श्रेष्ठ और देश भक्त है तो जनता को यह सब समझना होगा और अपने लिए योग्य व सक्षम सरकार खुद अपनी मेहनत से चुनना या बनाना होगा।   

आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी सरकार में बने रहने के लिए अपनी योग्यता से ज्यादा राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी की अयोग्यता को प्रचारित करते हैं और इस बार पूरे चुनाव प्रचार में, चुनाव आयोग के सहयोग से यही किया है। यह अलग बात है कि उन्हें इसका फायदा मिला या नहीं या कितना मिला पर राहुल गांधी की छवि खराब करने में करोड़ों फूकें गये हैं यह अब किसी से छिपा नहीं है। अब तो यह भी सबको पता है कि उसका अपेक्षित लाभ नहीं हुआ और राहुल गांधी के नेतृत्व में ही न सिर्फ कांग्रेस बल्कि इंडिया गठबंधन ने भी अच्छी सफलता पाई है। यही नही, उत्तर प्रदेश में बसपा अगर इंडिया गठबंधन का साथ देती या पूरी तरह स्वतंत्र रूप से लड़ती तो नतीजे कुछ और हो सकते थे। ऐसा कई राज्यों में, कई क्षेत्रीय दलों के लिए कहा जा सकता है। हालांकि, अभी यह मुद्दा नहीं है और अभी मुद्दा यह है कि भाजपा और नरेन्द्र मोदी की राजनीति का आधार राहुल गांधी, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को बदनाम करना है और यह अभी भी जारी है

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पश्चिम बंगाल में संदेशखाली का मामला और दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ भाजपा ने जो किया वह भी सर्वविदित है और नतीजों से लगता है कि बंगाल में तो नहीं पर दिल्ली में भाजपा की दाल गल गई। यह व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी का भी कमाल हो सकता है और ईवीएम तो संदेह के घेरे में है ही। दूसरी ओऱ प्रधानमंत्री यह मानकर चल रहे लगते हैं कि भाजपा की सीटें कम हो गईं और इंडिया गठबंधन की बढ़ गईं तो यह मान लिया जायेगा कि ईवीएम ठीक है और इसके खिलाफ आवाज नहीं उठेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए संसदीय दल की बैठक में सात जून को ईवीएम का विरोध करने वालों का मजाक बनाया और विपक्षी दलों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे सभी चार जून की शाम से चुप हो गए हैं। नरेन्द्र मोदी ने कहा: “जब 4 जून को नतीजे आ रहे थे, मैं काम में व्यस्त था, बाद में फोन आने लगे, मैंने किसी से पूछा, नंबर तो ठीक हैं, बताओ ईवीएम जिंदा है या मर गई? वे (विपक्ष) इस बार ईवीएम के अंतिम संस्कार की योजना बनाएंगे।”

पीएम ने कहा कि विपक्षी दलों ने मतगणना शुरू होने से पहले ईवीएम पर सवाल उठाने की पूरी रणनीति भी बनाई थी। “इन लोगों (विपक्ष) ने यह सुनिश्चित करने का फैसला किया था कि लोग भारत के लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास करना बंद कर दें। उन्होंने लगातार ईवीएम का दुरुपयोग किया। मैंने सोचा था कि वे ईवीएम का अंतिम संस्कार निकालेंगे। लेकिन चार जून की शाम तक, उनको ताले लग गए। ईवीएम ने उनको चुप कर दिया।” प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई कि कम से कम अगले पांच साल तक ईवीएम पर किसी को संदेह नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री ईवीएम पर विपक्ष की चुप्पी का जिक्र कर रहे थे, क्योंकि लोकसभा चुनावों में इंडिया ब्लॉक पार्टियों ने सर्वेक्षणकर्ताओं की व्यापक भविष्यवाणी से बेहतर प्रदर्शन किया था। मुझे नहीं पता विपक्ष चुप है या नहीं और चुप है तो क्यों। विपक्ष तो भाजपा से समझौता भी कर सकता है। और मामला विपक्ष का नहीं जनता का है, वोटर का है लेकिन प्रधानमंत्री की बातों से लगता है कि वे कुछ करने ले नहीं हैं और अखबारों के लिए यह मुद्दा नहीं है।

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आइये अब आज के अपने सभी अखबारों के पहले पन्ने की प्रमुख खबरें बता दूं। इससे आप समझ पायेंगे कि किन खबरों को छोड़कर राहुल गांधी को महत्व दिया गया है। जैसा मैंने कहा है, राहुल गांधी को महत्व देना खबर के रूप में ठीक हो सकता है लेकिन उसका उपयोग गलत ढंग से किया जा सकता है या किया जा रहा है।

1.नवोदय टाइम्स

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– एनडीए 3.0 इस बार सबका साथ सबका विश्वास

– मोदी आज शाम 7:15 बजे लेंगे पीएम पद की शपथ

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– 18 मंत्री भी ले सकते हैं साथ शपथ, इनमें सात कैबिनेट और 11 राज्य मंत्री संभव

– सोनिया गांधी चुनी गईं कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख

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– कहा – नरेन्द्र मोदी को नेतृत्व करने का नहीं अधिकार, हुई है नैतिक हार

– नीट : कृपांक पाने वालों की फिर से जांच के लिए कमेटी गठित    

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2. अमर उजाला

– मोदी @3.0:शपथ के साथ बनेगा इतिहास (लीड)

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– सात देशों के राष्ट्राध्यक्ष समेत आठ हजार से अधिक हस्तियां बनेंगी गवाह

3. इंडियन एक्सप्रेस

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– शपथग्रहण की तैयारियों की खाली कुर्सियों की फोटो और खबर के साथ मणिपुर के मुख्यमंत्री के इंटरव्यू की खबर खास है। इसका शीर्षक है, केंद्र और राज्य जनता की अपेक्षाएं पूरी नहीं कर रहे हैं – मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह ने माना। उपशीर्षक है, केंद्रीय बलों को सक्रियता से राज्य की मदद करना चाहिये

– मंच तैयार, शपथ ग्रहण समारोह से पहले मोदी मंत्रियों की सूची भेजेंगे। 

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– यूसीसी, डीलिमिटेशन और कोटा (आरक्षण), एक दिन पहले टीडीपी ने चर्चा के लिये जो मुद्दे महत्वपूर्ण बताये। 

अब संसद का मुंह बंद करना और गला घोंटना संभव नहीं होगा : सोनिया

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4. हिन्दुस्तान टाइम्स

लीड की चर्चा पहले कर चुका हूं। सेकेंड लीड भी वही है जो खबर नहीं है। सबको पता है। और गठोड़ की सरकारें ऐसी ही होती रही हैं। इसीलिए नरेन्द्र मोदी भाजपा की मजबूत सरकार और 56 ईंची की बात करते थे। अब सबको भुला दिया गया है। शीर्षक है, भाजपा सहयोगियों को चार पद दे सकती है। दूसरी खबर भी ऐसी ही है। शीर्षक है, मेहमान पहुंचे, शपथग्रहण के लिए सुरक्षा बढ़ाई।

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सशस्त्र भीड़ ने मणिपुर में पुलिस चौकी, कई घर जलाये गये (सिंगल कॉलम में है)। इंडियन एक्सप्रेस ने सरकारी कार्यालय भी जलाने की बात लिखी है और खबर दो कॉलम में है। 

5. टाइम्स ऑफ इंडिया   

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– लीड का शीर्षक है, मलाईदार पोर्टफोलियो भाजपा अपने पास रखेगी, सहयोगियों से कहा कि उम्मीद कम करें।

– यहां नीट की खबर सेकेंड लीड है।

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मणिपुर की खबर सिंगल कॉलम में। शीर्षक में सरकारी दफ्तर यहां भी नहीं है।

– टाइम्स ऑफ इंडिया ने राहुल गांधी से सीडब्ल्यूसी की मांग वाली खबर को इस फोटो के साथ दो कॉलम में छापा है। 

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नरेला की एक फैक्ट्री में आग लगने से तीन लोगों की मौत की खबर सिर्फ फोटो के साथ दो कॉलम में है।

कहने की जरूरत नहीं है कि आग से बड़ा हादसा तभी होता है जब अग्निशमन की व्यवस्था ठीक नहीं होती है. देश भर में कई मामलों के बावजूद कार्रवाई का तो पता नहीं घटनाएं नहीं रुक रही हैं। भ्रष्टाचार नहीं होने दूंगा के दावे के बावजूद।

6. द हिन्दू

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लीड की चर्चा पहले कर चुका हूं। विज्ञापन के कारण पहले पन्ने पर खबरें ज्यादा नहीं हैं। दूसरी खबर नीट की है।

7. द टेलीग्राफ

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– लीड का फ्लैग शीर्षक है, नायडू नीतिश ने अहम छूट के लिए दबाव बनाया। मुख्य शीर्षक है, चार बड़े मंत्रालयों के बाद सहयोगियों की चांदी रहेगी।

– राहुल गांधी के मामले में सीडब्ल्यूसी की खबर का शीर्षक यहां तीन कॉलम में टॉप पर है। शीर्षक है, सीडब्ल्यूसी ने विपक्ष का नेता बनने के लिए राहुल पर भारी दबाव बनाया।

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– आधे पन्ने का विज्ञापन होने के बावजूद यहां एक चुनावी खबर भी है।

इसका शीर्षक है, “बंगाल में दीदी के इंडिया गठबंधन से दूर रहने की कीमत लोकसभा की छह सीटें रहीं”। इसमें बताया गया है कि ममता बनर्जी अगर इंडिया गठबंधन के साथ सीटों का तालमेल करके लड़तीं तो राज्य में भाजपा को जो 12 सीटें मिली हैं उनमें से कम से कम छह नहीं मिलतीं। ये सीटें हैं – मालदा उत्तर, रायगंज, पुरुलिया, बिष्णुपुर, बालुरघाट और तामलुक। खबर के अनुसार साथ मिलकर लड़ने से ये सीटें तृणमूल को मिली होतीं। मेरे एक भक्त मित्र का मानना है कि राहुल गांधी को संसदीय दल का नेता नहीं बनना है तो ऐसी मांग नहीं होनी चाहिये उन्हें इसे रुकवा देना चाहिये। हालांकि वे राहुल गांधी को अमेठी से लड़ने की चुनौती देने का मतलब नहीं समझा पाये।

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