
प्रशांत टंडन-
एक चैनल का संपादक रहते हुए एक दिन में सुबह दफ्तर पहुंचा. जब तक सिक्युरिटी गेट खोलती एक युवक ने मेरी कार का दरवाज़ा खटखटाया. मैंने शीशा नीचे किया तो उसने अपना परिचय दिया ‐ एक अंग्रेज़ी अखबार का रिपोर्टर था. उसने जो बताया वो चौंकाने वाला था.
उसने कहा कि वो मुझसे मिलने की महीनों से कोशिश कर रहा है लेकिन किसी ने लाइन कनेक्ट नहीं की, हमेशा कह दिया जाता कि मैं मीटिंग में हूं. मेरा मोबाइल नंबर नहीं दिया.
उसे एक घंटे बाद का टाइम दिया, रिसेप्शन पर उसका नाम बताया और चाय कॉफ़ी के साथ लाउंज में बैठाने को कह कर अंदर चला गया. बाद में उससे केवल मिला ही नहीं, स्टाफ़ की बदतमीजी की माफ़ी मांगी और उसे रिपोर्टर के तौर पर रिक्रूट भी किया. मुझे अप्रोच करने वालों के लिये सिस्टम भी ठीक किया.
जब मुझ जैसे आदमी के साथ ये हो सकता है तो सोचिये राहुल गांधी के साथ किस स्केल पर होता होगा.
बहुत ऐसे लोग मिलते हैं जिनसे मिलकर राहुल गांधी और उनके ज़रिए देश और कांग्रेस पार्टी का फायदा होगा लेकिन उनके इर्द गिर्द का मज़बूत घेरा ऐसा होने नहीं देता. कभी-कभी तो लगता है कि राहुल गांधी के चारों तरफ जो लोग हैं उनके और राहुल गांधी के राजनीतिक और सामाजिक सरोकार मेल नहीं खाते. ये लोग बहुत होशियारी से फिल्टर करते हैं कि कौन राहुल गांधी के करीब आये और कौन न आने पाये. राहुल गांधी किन कुलियों, किसानों, टैक्सी ड्राइवर से मिले ये तो ठीक ठाक करता है और यही ग्रुप अमेरीका में किस सिनेटर से मिले इसमें गलती कर देता है.
राहुल गांधी ने संविधान और सामाजिक न्याय पर एक बड़ा नेरेटिव खड़ा किया है जिससे बीजेपी और आरएसएस दोनों परेशान हैं. बीजेपी चाहती है कि राहुल गांधी गलतियां करें और उनकी इमेज ख़राब करने का नया अभियान सफल हो.
कम्युनिकेशन एक पेचीदा क्षेत्र है जिसमें विषय की जानकारी, तकनीक, भाषा और राजनीतिक दूरदर्शिता सब एक साथ काम करते हैं. जो देख पा रहा हूं कि राहुल गांधी के कम्युनिकेशन में कुछ कमियां दिखाई दे रहीं हैं.
सामाजिक न्याय की राजनीति में दिशा बदलनी है तो बहुत कुछ पढ़ना भी पड़ेगा, भाषा पर काम करना पड़ेगा, लगातार ऐसे लोगों के बीच रहना होगा जो दशकों से सामाजिक न्याय का संघर्ष कर रहे हैं. डॉ तुलसीराम का मुर्दहिया, ओम प्रकाश वाल्मीकि का जूठन जैसा बहुत सा साहित्य पढ़ना होगा.
बुलडोज़र ने जिन्हें बेघर किया, जिनके घर वाले लिंचिंग में मारे गये उनसे भी मिलने की हिम्मत जुटानी होगी.
आरक्षण की कानूनी और संवैधानिक पेचीदगियों को समझना होगा, दुनिया के दूसरे देशों में वंचित समाज ने कैसे संघर्ष किये और सरकारों ने क्या affirmative action लिए जानना होगा.
राजनीति बदली है तो उठना बैठना और संवाद, साहित्य सब बदलना होगा नये दोस्त भी बनाने होंगे जों ये कहने की हिम्मत भी रखे कि ‘खारगे जी’ नहीं ‘खड़गे जी’ कहना चाहिये. अंदर का दुश्मन बाहर वाले से ज़्यादा खतरनाक होता है.
‘मुझे सब मालूम है’ एक ऐसा स्विच है जो फौरन सब खिड़की दरवाज़े बंद कर देता है. ये स्विच दबा और खेल खत्म.


