
राजस्थान में सरकारी स्कूलों में डिजिटल पढ़ाई के नाम पर शुरू की गई आईसीटी लैब योजना अब शिक्षा सुधार की नहीं, बल्कि सिस्टम की सड़ांध की पहचान बनती जा रही है। 3213 सरकारी स्कूलों में आईसीटी लैब स्थापित करने की योजना पर ₹359 करोड़ खर्च होने थे, लेकिन हकीकत यह है कि यह पूरा मामला अफसरों की ज़िद, नियमों की अनदेखी और चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने के खेल में बदल गया।
लगभग आठ महीनों तक टेंडर की शर्तों में बार-बार बदलाव किए गए। तकनीकी खामियों, दस्तावेज़ी गड़बड़ियों और अनुभव संबंधी नियमों को नजरअंदाज कर उन कंपनियों को आगे बढ़ाया गया, जो तय मानकों पर खरी ही नहीं उतरती थीं। शिकायतें विभाग से निकलकर शासन और मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचीं, तब जाकर दिखावटी कार्रवाई हुई और विवाद बढ़ने पर शिक्षा मंत्री को निविदा निरस्त करनी पड़ी।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब शुरुआत से ही दस्तावेज़ों में भारी खामियां थीं, अनुभव और टर्नओवर के नियम पूरे नहीं हो रहे थे, तो फिर अफसर आख़िरी दम तक टेंडर को बचाने में क्यों जुटे रहे। ‘पुल’ के खेल के नाम पर केंद्र और राज्य सरकार को 50 करोड़ रुपये से अधिक के संभावित नुकसान की बात भी सामने आई, लेकिन इसके बावजूद अफसरों की आंखें नहीं खुलीं।
यह भी सामने आया कि जिन कंपनियों के खिलाफ शिकायतें थीं, उन्हें बार-बार नियमों में ढील देकर मौका दिया गया। कहीं अनुभव प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए तो कहीं पुराने प्रोजेक्ट्स को नए नाम से पेश किया गया। यहां तक कि केंद्रीय एजेंसियों के नियमों को भी तोड़-मरोड़ कर लागू किया गया, ताकि तयशुदा कंपनियों को बाहर न किया जाए।
यह पहला मौका नहीं है। यही टेंडर चौथी बार जारी हुआ और हर बार वही कहानी दोहराई गई। अफसर बदले, लेकिन नीयत नहीं बदली। सवाल यह नहीं है कि टेंडर क्यों रद्द हुआ, सवाल यह है कि इतने महीनों तक यह गड़बड़ी चलने ही क्यों दी गई। क्या अफसरों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन कर दिया जाएगा।
डिजिटल शिक्षा के नाम पर बच्चों का भविष्य और सरकारी खजाना दोनों दांव पर लगाए गए। ₹359 करोड़ का यह मामला साफ दिखाता है कि राजस्थान में शिक्षा सुधार से ज्यादा अफसरशाही का ‘खेल’ भारी पड़ रहा है। अब असली परीक्षा सरकार की है कि वह केवल टेंडर रद्द कर संतोष कर लेती है या फिर इस डिजिटल लूट के जिम्मेदार अफसरों पर ठोस कार्रवाई भी करती है।


