देशज पत्रकारिता के कीर्ति स्तंभ राजनारायण मिश्र की आज पुण्य तिथि है. उन्हें याद करते हुए उन पर केन्द्रित यह संस्मरण संभावना प्रकाशन हापुड से प्रकाशित मेरी किताब ‘एक सफर मुकम्मल’ में संकलित है….

दिवाकर मुक्तिबोध-
उनकी मौत से चंद रोज पूर्व मैं उनसे मिलने गीता नगर स्थित उनके घर गया था। लंबे समय से बीमार थे राजनारायण मिश्र जी। करीब 55-56 बरस तक ख़बरों के पीछे दौड़ता-भागता शरीर लाचार होकर बिस्तर पर पड़े-पड़े छटपटा रहा था। यह छटपटाहट तन से ज्यादा मन की प्रतीत हुई। टूटे-फूटे शब्दों में जब उन्होंने कहा कि अब मौत आ जाए तो बेहतर है, सुनकर स्तब्ध रह गया। मन भी भर आया। यह कैसी दुर्दशा! जो व्यक्ति ताउम्र जिंदगी को मस्ती के साथ जीता रहा हो, वह जिंदगी से इस क़दर बेज़ार हो जाए कि मौत माँगने लगे?
अकल्पनीय सी बात थी। पर इसके पीछे बडा सच यह था कि अपने शरीर की तकलीफ़ से ज्यादा तकलीफ़ उन्हें तीमारदारी में लगे परिजनों के चिंतित चेहरों को देखकर होती थी जो उनकी जिंदगी के लिए दिन-रात एक कर रहे थे। उन्हें दु:खी व निराश देखकर वे स्वयं को परिवार पर बोझ मानने लगे थे, इसलिए जिंदगी से ताबड़तोड़ छुटकारा चाहते थे। करीब आधे घंटे तक मैं और मित्र प्रदीप जैन इधर-उधर की बातों से उनका मन बहलाते रहे, उनका हौसला बढ़ाने की कोशिश करते रहे। लेकिन जब हम उनसे विदा ले रहे थे तब पीछा करती उनकी आँखों ने हमें अहसास करा दिया था कि क्या घटित होने वाला है।

अंतत: जिंदगी का वह सच कुछ ही दिनों में सामने आ गया। दिनांक 23अक्टूबर 2012। खबर मिली कि वरिष्ठ पत्रकार राजनारायण मिश्र नहीं रहे। चूंकि उम्मीदें सारी टूट चुकी थीं और ऐसा ही कुछ अपेक्षित था इसलिए मन की तैयारी होनी चाहिए थी। किंतु तैयारी कितनी भी हो दिल यह स्वीकार करने तैयार नहीं था कि वे अब इस दुनिया में नहीं है। उनकी मौत की खबर से दिलो-दिमाग़ में एक अजीब सा सन्नाटा भर गया। लेकिन यह हक़ीक़त थी कि हमने एक ऐसे खुश मिज़ाज वरिष्ठ पत्रकार को खो दिया था जिसे अपनी नहीं, दुनियाँ-जहाँ की चिंता थी और जिसने बड़ी शिद्दत के साथ पत्रकारिता व उसके मूल्यों को जिया।
उनके निधन से छत्तीसगढ की पत्रकारिता में एक विराट शून्य सा घिर आया जिसकी भरपाई मुश्किल नज़र आती है। निश्चय ही राजनारायण जी मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ की आदर्श पत्रकारिता के आधार स्तंभ थे।
राजनारायण जी पर लिखने के लिए इतना कुछ है कि उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर एक बडा सा ग्रंथ तैयार हो जाए। विशाल मित्र परिवार और करीब 56 बरस की उनकी पत्रकारीय यात्रा और ढेर सारा लेखन। यानी उन पर लिखने के लिए बहुत कुछ। एक विचारशील व दृष्टि सम्पन्न पत्रकार के रूप में उन्होंने जो मानदंड स्थापित किए वह तो खैर अलग हैं ही, लेकिन महिलाओं के प्रति उनकी अतिरिक्त संवेदनशीलता ने उनके व्यक्तित्व में चटख रंग भर दिए थे। चूँकि वे रोमांटिक तबियत के थे इसलिए महिलाओं से भी दोस्ती स्वाभाविक थी। लेकिन हमारा सामाजिक ताना बाना कुछ ऐसा है कि उसे चटखारे लेने में मज़ा आता है। राजनारायण जी के साथ भी अनेक ऐसे क़िस्से जुड़े हुए थे। लेकिन इसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की। बल्कि खुले मन से उन्होंने अपने संबंधों को स्वीकार करते हुए अपनी आत्मकथा ‘पत्रकारिता : परिकथा’ में उनका उल्लेख भी किया।
व्यक्तित्व की ऐसी पारदर्शिता बहुत कम लोगों में देखने को मिलती है। इसके लिए तगड़े आत्मबल की ज़रूरत होती है। इस संदर्भ में प्रख्यात पत्रकार, उपन्यासकार ख़ुशवंत सिंह याद आते हैं जिनका व्यक्तित्व राजनारायण जी की तरह खुली किताब था। ख़ुशवंत सिंह ने लंबी उम्र पाई, 99 साल तक वे ज़िंदा रहे। वे जैसे जिए ,शब्दों के जरिए बताते रहे। उनकी बहुपठनीय किताब ‘सच, प्यार और थोड़ी सी शरारत’ इसकी गवाह है। राजनारायण जी ने भी अपने भीतर का सब कुछ उघाड़ दिया ताकि हर कोई उसमें झाँक सके तथा उजले मन की अतल गहराइयों को परख सके। जिन्होंने परखा वे मुरीद हुए। राजनारायण जी के ऐसे मुरीदों की संख्या छत्तीसगढ ही नहीं, मध्यप्रदेश में भी काफी बड़ी है जो उन्हें न सिर्फ प्रखर पत्रकार मानती है वरन सामाजिक सरोकारों का अटल प्रहरी भी।
कुछ अन्य वरिष्ठ पत्रकारों की तरह राजनायण जी भी न सिर्फ मेरे आदर्श थे बल्कि प्रथम गुरू थे। मैं उन्हें सिर्फ भैया कहकर संबोधित करता था, राजू दा नहीं। सन् 1969 के प्रारंभ में मैंने तत्कालीन नई दुनिया (बाद में देशबंधु) में दाख़िला लिया और राजनारायण जी के हवाले कर दिया गया। वे प्रांतीय ख़बरें संपादित करते थे और मैं बना उनका सहायक प्रूफ़ रीडर। वे शायद इस बात से अभिभूत थे कि उनके प्रिय कवि-लेखक का बेटा उनके साथ काम कर रहा है, सहायक है।
दरअसल, वे ही नहीं, नई दुनिया के संपादकीय विभाग में मेरी उपस्थिति, हालाँकि उस कालखंड में वह अल्पकालिक रही, सभी वरिष्ठजनों के लिए स्नेहसिक्त थी, भाव की दृष्टि से कुछ अलहदा थी। पिताजी की पुण्याई का, ख्याति का फ़ायदा मुझे उनके स्नेह के रूप में मिल रहा था। उसका घेरा मेरे चारों ओर था। इसलिए जाहिर था, मेरे कामकाज पर सबकी बारीक निगाहें थी। विशेषकर राज भैया की। पत्रकारिता में मुझे भाषा के जो संस्कार मिलें, उसकी वजह राजनारायण जी की हेडमास्टरी थी।
चूँकि मैं उनका मातहत था अत: उनके सीधे सम्पर्क में था। भाषा की तमीज़ उन्हीं से सीखी। उस दौर में देशबंधु में जो भी नवयुवक संपादकीय विभाग में प्रवेश पाता था, उसे प्रूफ़ रीडिंग के कार्य में लगा दिया जाता था ताकि उसकी हिंदी सुधरे व समाचारों के विभिन्न स्वरूप का ज्ञान हो। महत्वपूर्ण बात यह थी कि राजनारायण जी हमारे पढ़े हुए प्रूफ़ को जाँचते थे। ग़लतियों को बताते थे। सुधारते थे व आगे ध्यान रखने की हिदायत देते थे।
इस प्रशिक्षण का नतीजा यह निकला कि कभी जो हिंदी मुझे कठिन लगती थी व ठीक भी नहीं थी, वह शुद्धता की दृष्टि से आसान होती चली गई। प्रांतीय डेस्क पर उनके साथ काम करना मेरे लिए बहुत लाभदायक रहा। भाषा के संस्कार व उसके सौंदर्य से मेरा परिचय उन्हीं के जरिए हुआ।
देशबंधु में मैंने उनके साथ अलग-अलग अवधि में काम किया। वर्ष 1969 फिर 1973 एवं 1976 से 1983 के कुछ महीने। इस दौरान राजनारायण जी के साथ प्रांतीय डेस्क के अलावा सिटी डेस्क पर भी काम करने का अवसर मिला। प्रांतीय डेस्क पर कार्य करते हुए हम देखते थे कि ख़बरों का विशाल साम्राज्य उनके पास था, छत्तीसगढ के कोने-कोने से संवाददाताओं द्वारा प्रतिदिन भेजी जाने वाली ख़बरों का साम्राज्य। वे बडी ख़बरें छाँटकर अलग कर लेते थे और उनका पुनर्लेखन करते थे। जाहिर इस वजह से बेतरतीब शैली व भाषा की अशुद्धियों से भरी ख़बरें शुद्ध होकर पठनीय बन जाती थीं।
हमने यह भी देखा कि पर्यटक संवाददाताओं की पोथीनुमा ख़बरें जिन्हें डेस्क का कोई साथी हाथ लगाना भी पसंद नहीं करता था, वे राजनारायण जी के हवाले कर दी जाती थीं और भाई साहब उन रिपोर्ट्स में डूबकर उनका पुनर्लेखन करते थे। बाद में इन रिपोर्ट्स के आधार पर देशबंधु के जिन आँचलिक संवाददाताओं को स्टेट्समैन ग्रामीण रिपोर्टिंग के पुरस्कार मिले उसका मूल श्रेय राजनारायण जी को है जिनकी क़लम ने उन्हें पुरस्कार के योग्य बनाया।
एक बार मुझे भी उनके साथ गाँव का दौरा करने का अवसर मिला। अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री रहते मध्य प्रदेश सरकार ने गाँवों के समग्र विकास की दृष्टि से योजना के अंतर्गत राज्य के चुनिंदा गाँवों का चयन किया था जिन्हें रजत जयंती ग्राम कहा गया। इनमें छत्तीसगढ के भी कुछ गाँव थे। महासमुंद जिले का डूमरपाली ऐसा ही चयनित गाँव था जहाँ रोज़मर्रा ग्रामीण जिंदगी का जायज़ा लेने राजनारायण जी के साथ मुझे भी भेजा गया। 11अप्रेल 1982 को हुए दौरे के बाद रिपोर्ट तैयार करने की ज़िम्मेदारी मुझ पर डाली गई। स्वाभाविक रूप से मैं दबाव में था पर उन्होंने हौसला अफ़्जाई की व बाद में मेरे लिखे को सराहा, संतोष व्यक्त किया। उनके साथ किया गया यह पहला व आख़िरी दौरा मुझे हमेशा याद रहेगा क्योंकि ग्रामीण जीवन को एक पत्रकार के नज़रिए से देखने, परखने व समझने का यह बेहतर प्रशिक्षण था।
राजनारायण जी ख़बरों के संपादन के साथ-साथ रिपोर्टिंग में भी बेजोड़ थे। सन् 1979 में आंग्ल दैनिक स्टेट्समैन ग्रामीण रिपोर्टिंग का अखिल भारतीय पुरस्कार जीतने वाले वे मध्य प्रदेश के पहले पत्रकार थे। यह प्रथम पुरस्कार उन्हे गरियाबंद के कुल्हाडीघाट में बसे आदिवासियों की दीन-हीन स्थिति की मर्मस्पर्शी रिपोर्टिंग के लिए मिला था। आज भी जब तमाम आदिवासी बहुल गाँव विकास से कोसों दूर है और हर तरह के शोषण के शिकार है, तब कल्पना की जा सकती है कि तीस वर्ष पूर्व उनकी क्या स्थिति रही होगी। कुल्हाडीघाट राजनारायण जी की रिपोर्टिंग के बाद इस क़दर चर्चा में आया कि सन् 1987 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के छत्तीसगढ प्रवास कार्यक्रम में इस वन ग्राम को भी शामिल किया गया था।
जाहिर है यह राजनारायण जी की रिपोर्टिंग का प्रभाव था। प्रधानमंत्री के प्रवास के बाद कुल्हाडीघाट व आदिवासियों की स्थिति कितनी कुछ बदली, इसका आकलन करने राज जी पुन: वहाँ गए और फ़ालोअप स्टोरी तैयार की।
राजनारायण जी की भाषा-शैली में ग़ज़ब की मिठास थी। सरल, सुघड व बोधगम्य। उसमें निरंतरता थी। स्पष्टता थी। साहित्यिकता का पुट लिए अखबारी भाषा। आवश्यकतानुसार उन्होंने शैली बदली भी। देशबंधु में उनका साप्ताहिक स्तंभ ‘घूमता हुआ आईना’ बहुपठनीय व बहुप्रशंसित इसलिए था क्योंकि वह रोज घटित होने वाली व समाज को प्रभावित करने वाली घटनाओं की इस तरह चीरफाड़ करता था कि सच्चाई सामने आ जाए। चुटीली शैली में लिखा जाने वाला यह देशबंधु का सर्वाधिक लोकप्रिय कॉलम था। उनके लेखन में विविधता थी। कला, संस्कृति व साहित्य के क्षेत्र में उनकी सहभागिता व रिपोर्टिंग की बडी सराहना होती थी।
मैंने वर्ष 1983 के प्रारंभ में देशबंधु से इजाज़त ली, चंद वर्षों बाद अप्रत्याशित खबर मिली कि राजनारायण जी भी अलग हो गए। यह अकल्पनीय बात थी। देशबंधु व राजनारायण जी एक दूसरे के पर्याय माने जातेथे। देशबंधु का पाठक वर्ग जानता था कि सुरजन परिवार, विशेषकर ललितजी से उनके बहुत आत्मीय संबंध है तथा अखबार को नई उंचाइयां देने में उनका (राजनारायण जी) का बड़ा योगदान है। लेकिन ऐसी कुछ परिस्थितियां बनीं कि उन्हें अलग होना पड़ा। लेकिन इससे संबंधों पर आँच नहीं आई। राजनारायण जी ने नई राह पकड़ ली। वे दुर्ग चले गए जहाँ से एक नए दैनिक अखबार ‘अमर किरण’ के प्रकाशन की तैयारी चल रही थी।
संपादक के रूप में वे वहाँ करीब दो साल ही रहे। वर्षों बाद मेरा उनका साथ सन् 2005 में हुआ जो 2008 तक चला। उन दिनों मैं यहाँ दैनिक भास्कर में संपादक था और वे मेरे संपादक। दरअसल दैनिक भास्कर प्रबंधन की नीति के अनुसार रोज के अखबार की समीक्षा के लिए किसी वरिष्ठ पत्रकार की नियुक्ति की जाती थी। मैंने राजनारायण जी निवेदन किया और वे समीक्षक बनने राज़ी हो गए। यह कोई गुरू दक्षिणा नहीं थी। दरअसल मुझे व मेरे अखबार को उनकी ज्यादा आवश्यकता थी। आयु के पचहत्तर बरस तक अपनी कर्मठता को तरोताज़ा रखने वाले पत्रकार हैं ही कितने?
राजनारायण जी में कमाल की वह ऊर्जा बरक़रार थी। यहाँ भी वे मेरे मार्गदर्शक थे। दैनिक अखबार की प्रतिदिन समीक्षा करना कोई आसान काम नहीं होता। सभी ख़बरों को पढ़ना, गल्तियों को पाइंट आउट करना व सुझाव देना। उनके लिए एक अलग कक्ष की व्यवस्था कर दी गई थी। समीक्षा का कार्य समाप्त होने के बाद वे मुझसे पूछते थे कि लड़कों ने पिछली समीक्षा देखी कि नहीं। उनकी चिंता थी कि समाचारों में तथ्य व भाषा की तृटियां रिपीट नहीं होनी चाहिए। तभी समीक्षा का कोई अर्थ है। वे समय-समय पर टिप्पणियाँ भी लिखा करते थे।
प्रख्यात मानवतावादी डॉ विनायक सेन को नक्सलियों के शहरी समर्थक होने के आरोप में जन सुरक्षा कानून के तहत को गिरफ़्तार किया गया। इस घटना पर उन्होंने टिप्पणी लिखी। वह हस्तलिखित कापी मेरे पास सुरक्षित है जो यादों को ताज़ा करती रहती है। अपनी सुदीर्घ पत्रकारिता के दौरान शायद उन्होंने कभी इस बात पर विचार नहीं किया कि उनके लिखे का कोई संग्रह प्रकाशित होना चाहिए। यह ख़्याल बहुत बहुत बाद में आया। उनकी इच्छा थी देशबंधु मे लिखा उनका कालम ‘घूमता हुआ आईना’ पुस्तकाकार रूप में उनके 75 वे जन्मदिन पर आ जाए।
साथी पत्रकार गिरिजाशंकर ने यह बीड़ा उठाया लिहाजा इसके प्रकाशन की तैयारी शुरू हो गई पर यह किताब जन्मदिन पर तो नहीं अलबत्ता चंद महीनों बाद प्रकाशित हो गई। एक और मित्र पत्रकार परितोष चक्रवर्ती के प्रयास से दूसरी किताब ‘पत्रकारिता : परिकथा’ मृत्युपरांत प्रकाशित हुई जो राजनारायण जी के मित्र परिवार की यादों से सजी हुई है।
मेरे लिए यह सौभाग्य की बात है कि वर्ष 2008 व 2009 में प्रकाशित मेरी दो किताबों की भूमिका उन्होंने लिखीं। तीसरी के लिए भी उन्होंने लिखा है जो अप्रकाशित है। मेरे लिए यह उपलब्धि है क्योंकि यह उस व्यक्ति द्वारा लिखी गई जो न केवल ख्यात पत्रकार है वरन जूनियर साथियों की पत्रकारिता एवं उनके लेखन से रूबरू भी है, उन्हें पढ़ते रहते हैं। इसलिए इन किताबों में विस्तार से लिखी गई उनकी टिप्पणियों ने, मैं समझता हूँ, मेरी पत्रकारिता को सार्थकता प्रदान की है। उत्साह वर्धन किया है, संतुष्टि दी है।
दरअसल दोनों पुस्तकों का प्रकाशन उन्हीं की वजह से संभव हो पाया। एक दिन बहुत सहज भाव से मैंने पूछा था- क्या मेरे लिखे की कोई किताब बन सकती है? वे जानते थे कि साप्ताहिक स्तंभों के अलावा मेरी राजनीतिक -ग़ैरराजनीतिक टिप्पणियाँ भी काफी हैं और अख़बारों में लगातार छपती रही हैं। उन्होंने तुरंत जवाब देते हुए कहा- जितना कुछ लिखा है और जो कतरनों के रूप में सुऱक्षित हैं, मुझे सौंप दें। एक-एक करके मैंने सारा कुछ उन्हें सौंप दिया। वे कितने भावुक थे, इसकी एक झलक तब देखने मिली जब वे कुछ कतरनों का लिफ़ाफ़ा रिक्शे में भूल गए और इसका अहसास होते ही उस रिक्शेवाले को खोजने को उन्होंने सारा शहर छान मारा। पर वह लिफ़ाफ़ा नहीं मिला। वे अपराध-बोध से ग्रस्त हो गए। मैंने उन्हें दिलासा दी कि कुछ कतरनों के गुम होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। नहीं सही। पर उनकी ख़ामोशी बता रही थी, वे व्यथित हैं।
बहरहाल, उन्होंने एक-एक कतरन ध्यान से पढ़ी, कुछ के शीर्षक बदले व भूमिकाएँ लिखकर पांडुलिपि तैयार कर दी। और तो और पहली किताब ‘इस राह से गुज़रते हुए’ के विमोचन के लिए उन्होंने नई दिल्ली से प्रख्यात आलोचक डॉ नामवर सिंह को आमंत्रित किया। यह वर्ष 2010 की बात है। इतना अटूट स्नेह, इतनी मेहनत वही करेगा जो आपका अपना हो, आपका खैरख्वाह हो, हितैषी हो और आपकी बहुत चिंता करता हो। राजनारायण जी ऐसे ही थे। बडे भाई, महागुरू। वे ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने चेहरे देखकर विचार नहीं बदले, हमेशा नीर-क्षीर विवेचन किया। जैसा कि मैंने पहले बताया, मेरी किताबों के संबंध में उनकी लिखी भूमिका मेरे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह उस अखबारनवीस का लेखन है जिसने समकालीन पत्रकारिता को नए शब्द दिए, उसे जनोन्मुख बनाया तथा एक ऐसी शैली विकसित की जिसका भाषाई सौंदर्य उसके चुटीलेपन की वजह से बेमिसाल था। उनकी तमाम रिपोर्ट्स, संस्मरण व स्तंभ ऐसी ही सुंदरता से भरे पड़े हैं।
राजनारायण जी के बारे में और भी बातें की जा सकती है। सादगी भरा उनका व्यक्तित्व, वैसा ही पहिरावा। उन्होंने हर ज़रूरतमंद व्यक्ति की मदद की जो उनके सम्पर्क में आया। वे आम आदमी के बेहद करीब थे । खुद को आम आदमी ही मानते थे जबकि पत्रकार के रूप में उनकी ख्याति ज़बर्दस्त थी। पीड़ित की किसी भी तरह की समस्या निपटाने किसी से भी मिलने में उन्हें गुरेज़ न था, चाहे वे मुख्यमंत्री, मंत्री या सर्वोच्च अधिकारी ही क्यों न हो। ‘घूमता हुआ आईना’ में प्रख्यात साहित्यकार धनंजय वर्मा ने भूमिका में लिखा है- “समकालीन पत्रकारिता में राजनारायण उस दुर्लभ प्रजाति का पत्रकार है जो घोषित करता है कि पत्रकारिता का धर्म है संवेदनशीलता-मानवता। यह महज़ उसकी घोषणा नहीं है, इसे उसने अपने लेखन से चरितार्थ भी किया है, उसे अपने आचरण में भी उतारा है।”
वे आगे लिखते हैं- “राजनारायण ने अपने लेखन को सिर्फ अख़बारों तक सीमित न किया होता तो हिंदी साहित्य के समकालीन परिदृश्य में वो एक श्रेष्ठ निबंधकार व प्रखर व्यंग्य लेखक के रूप में निर्विवाद रूप से प्रतिष्ठित होते।”
तो ऐसे थे राजनारायण मिश्र…


