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साहित्य

नवीन कुमार ने संस्कृत का मरण उत्सव मनाया है तो मैं संस्कृत का जीवनोत्सव मनाउंगा

(पहली किस्त) : न्यूज़ 24 में मेरे बेहद अनन्य नवीन कुमार ने अपने फेसबुक वॉल पर संस्कृत भाषा का बड़ा भारी मरण उत्सव मनाया है। मैंने उसे कहीं दूसरी जगह पढ़ा और देखा क्योंकि अब वो मुझे मेरे फेसबुक पर दिखाई नहीं देते। रोज दफ्तर में मिलते हैं, चर्चा होती है, कुछ हल्की-फुल्की बहस भी। नवीन कुमार में ओज है, तेजस्विता है, ऐसी प्रचंड लपलपाती आग हमेशा चेहरे पर दिखाई देती है कि मानो अभी जलाकर सब कुछ भस्म कर देगी। खैर, उनका मन बालसुलभ कोमलता से भरा है, वो गरजते हैं तो मैंने उन्हें लरजते भी देखा है, निजी चर्चा में उनकी भावना को मैंने समझा है।

(पहली किस्त) : न्यूज़ 24 में मेरे बेहद अनन्य नवीन कुमार ने अपने फेसबुक वॉल पर संस्कृत भाषा का बड़ा भारी मरण उत्सव मनाया है। मैंने उसे कहीं दूसरी जगह पढ़ा और देखा क्योंकि अब वो मुझे मेरे फेसबुक पर दिखाई नहीं देते। रोज दफ्तर में मिलते हैं, चर्चा होती है, कुछ हल्की-फुल्की बहस भी। नवीन कुमार में ओज है, तेजस्विता है, ऐसी प्रचंड लपलपाती आग हमेशा चेहरे पर दिखाई देती है कि मानो अभी जलाकर सब कुछ भस्म कर देगी। खैर, उनका मन बालसुलभ कोमलता से भरा है, वो गरजते हैं तो मैंने उन्हें लरजते भी देखा है, निजी चर्चा में उनकी भावना को मैंने समझा है।

चाय की चुस्कियों के साथ किसी मुद्दे पर लपकते और दुबकते भी देखा है। वो वरिष्ठ हैं, अनुभवी है, सब प्रकार से प्रशंसा के पात्र हैं, क्योंकि उनका मन खुला है, विचार खुला है, वो खुद के मन में खौलती, उबलती भावनाओं को औरों की तरह छुपाते नहीं हैं, वो पीछे से वार नहीं करते हैं, वो सीना चौड़ा कर 56 इंची छाती के साथ दक्षिण पंथ पर वामपंथी हसिया-हथौड़ा चलाते हैं, चाहे वो निजी चर्चा हो, फेसबुक वॉल हो या फिर टेलीविज़न पर उनकी दहाड़ती आवाज, उनकी स्क्रिप्ट, वो कोई भी मौका नहीं गंवाते, खुद के विचारों से तालमेल न रखने वाले विचार से दो-दो हाथ करने में। इस काम में उनका तर्क भी शानदार है कि पत्रकारिता व्यवस्था की आलोचना के लिए बनी है, अगर कोई व्यवस्था की तारीफों के पुल बांधता है तो वो पत्रकार नहीं है, उसमें पत्रकार होने का एबीसीडी वाला संस्कार भी नहीं है।

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किसी का नवीन कुमार से वैचारिक मतभेद हो सकता है, जैसे कि मेरा भी किन्हीं मुद्दों पर मतभेद रहता ही है, लेकिन वो मनभेद वाले इंसान नहीं हैं, ऐसा मेरा अनुभव है। ये बात सही है कि तस्वीरों की मनमानी सुरुचिपूर्ण व्याख्या करने में कोई उनका सानी नहीं हैं, व्यंग्यात्मक पत्रकारिता और कटाक्ष वाली कटीली जुबान का इस्तेमाल वो टीवी स्क्रिप्ट में करके वाहवाही भी लूटते हैं। लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि वो एकतरफा लिखते हैं, जो उन्हें सही लगता है, उनके विचार के मुताबिक जो सही है, वही लिखते हैं, इतिहास के आईने में तथ्यों को खंगालना उन्हें पसंद नहीं है, भारत, भारतीय मानस, संस्कार और संस्कृति के साथ संस्कृत समेत तमाम पहलुओं पर जो बात भारत विरोधियों ने भारत में प्रसारित की है, उसी के साथ कदमताल करते रहना उनकी फितरत बन चुकी है, वो भारतीयता की रोशनी में सही तथ्यों को न जानना चाहते हैं, न सुनना चाहते हैं, न वो अपनी बातों का विहंगावलोकन करने की मेरी कोशिश को शायद कभी मंजूर ही करेंगे।

लेकिन जैसे उन्होंने संस्कृत का मरण त्योहार मनाया है, वैसे ही मेरा भी कर्तव्य बनता है कि मैं संस्कृत का जीवनोत्सव मनाऊं। उन्हें जवाब प्रेषित करुं। बहस के लिए उनकी चुनौती स्वीकार करुं। अब ऐसा मैं इसलिए नहीं करने जा रहा हूं कि मैं ब्राह्मण कुल में जन्मा हूं। ऐसा मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मेरी बौद्धिक चेतना मुझे तब तक झकझोरती रहेगी जब तक कि मैं उनके झूठ को जड़मूल से उखाड़ न डालूं जो असल में उसी साम्राज्यवादी साजिश की देन है, जिन्होंने हिंदुस्तान को उसके सांस्कृतिक मूल से उखाड़ने का पाप बीते हज़ार साल में किया है, जिसे अंग्रेजों ने साजिशन हमारे अध्ययन का हिस्सा बनाया, जिसे एनेस्थिसिया बनाकर आजादी के बाद तथाकथित सेक्युलर और वामपंथी गठजोड़ ने भारतीय मानस को उसकी जड़ों से काटने का कुकृत्य हिंदुस्तान में शुरु किया और इस पापपूर्ण काम में भी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्राप्त ब्राह्मण भी शामिल थे।

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नवीन कुमार के मुताबिक, ‘सिर्फ संस्कृत के बल पर मूर्ख ब्राह्ण सदियों तक बाकी दुनिया से अपनी चरणवंदना करवाते रहे’। दूसरी बात शुरु में कही है कि ‘वो जमाना गया कि वेद सुन लेने पर दलितों के कान में शीशा पिघलवा करके डाल देते थे’। मैं भावनाओं से नहीं कुछ कहता लेकिन तथ्यों से बात करुंगा। मेरा सवाल है कि क्या नवीन कुमार इस बात को जानते हैं कि चारों वेदों के रचयिता कौन से ब्राह्ण थे? क्या महर्षि वेदव्यास जाति से ब्राह्ण थे? वेदों के जानकारों ने ही हमें बताया है कि वेदव्यास का जन्म तथाकथित ब्राह्मण कुल में नहीं हुआ था, शास्त्र ही बताते हैं कि वेदव्यास तथाकथित शूद्र कुल में जन्मे थे लेकिन अपने कर्म से वो ब्राह्मणों के लिए भी पूज्य बन गए। वेदव्यास के पहले चारों वेदों की परंपरा श्रुत थी, यानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक वेद कानों से सुनकर दिमाग से रटकर ट्रांसफर होते रहे। यह दुष्कर कार्य पीढ़ियों तक जिन कथित ब्राह्मणों ने किया, उन्हें गाली देकर आखिर आप क्या हासिल करना चाहते हैं? वेदकाल से यही सत्य है कि वेदव्यास ने ही वेदों को लिखित रुप दिया, लेखन-पठन-पाठन पर अगर ब्राह्मणों का ही आधिपत्य होता तो क्या ये संभव था?

नवीन कुमार तर्कों का जाल बुन देंगे जैसे वेद विरोधी बुनते चले आए हैं। लेकिन क्या वो बताने की कृपा करेंगे कि महर्षि वाल्मिकी का जन्म किस कथित ब्राह्मण कुल में हुआ था। वाल्मीकि ऋषि तो आदि कवि हैं, संसार के पहले कवि, संस्कृत में लिखी पूरी रामायण में वेदों के जाने कितने श्लोकों को उन्होंने उद्धृत किया है, किस माई के लाल ब्राह्मण ने तथाकथित शूद्र कुल में जन्में महर्षि वाल्मीकि के कान में पिघलाकर शीशा डाला था…? इतिहास में कोई एक उदाहरण तो बताइए? लेकिन ये वाल्मीकि ऋषि को ही सत्य मानने को तैयार नहीं हैं, तो फिर बाकी बात ही क्या की जाए। भारत की जो लिखित विरासत इनके विचार को खंडित करती है, उसे ये मिथक बताकर इतिहास से बाहर कर देते हैं और जो कुछ इधर-उधर की कपोल गप्पें और बेकार बातें इनकी बातों को पुष्ट करती हैं, उसका ये बड़े चाव से बखान करते हैं। जब भारत का सारा अतीत आपके लिए मिथक है, झूठ है, कहानी है तो फिर उसमें से किसी विवादित तथ्य को उद्धरण बनाकर, सच बताकर पेश करना कैसे सही हो सकता है।

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तो मनगढ़ंत कहानियों के आधार पर, अंग्रेजों की विभाजनकारी पढाई और कथित सेक्युलर मार्क्सवादी पाठ के आधार पर लोगों को दिग्भ्रमित करना बंद करिए। अपने ज्ञान को तथ्यों के आईने में संवारिए। आज से डेढ सौ साल पहले ये हिंदी भी नहीं थी जो हम आप लिख रहे हैं, देशज भाषा जो आज भी हमारे गांव-जवार में बोली जाती है, वही हमारे लोकजीवन की भाषा थी। भाषा का संस्कार राजनीतिक जय-पराजय से जुड़ा है, हम हज़ारों सालों से अपने राजनीतिज्ञों के अलगाव की वजह से पददलित हुए, इसी में संस्कृति भी धुंधली पड़ी और संस्कृत भाषा भी। क्या भूल गए- पढ़ें फारसी बेचें तेल वाली कहावत। अंग्रेजी राज में अरबी-फारसी इसी हिंदुस्तान में कैसे देखते-देखते तेल बेचने लगी थी। बात करिए तो सप्रमाण बात करुंगा। क्यों नालंदा जीवित करने की याद आई, किसने नालंदा जलाया, किसने तक्षशिला मिटाया, किसने ज्ञान के सारे स्रोत हिंदुस्तान से उखाड़ फेंकने की कसमें खाईं, किसने सुजलाम-सुफलाम ज़मीन पर खून की नदियां सिर्फ इसलिए बहाईं क्योंकि वैचारिक और मजहबी तालमेल नहीं बैठ रहा था।

नहीं तो यही संस्कृत भाषा है जिसके पचास से अस्सी फीसद शब्द आज भी कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, मराठी, गुजराती, डोगरी और हिंदी समेत तमाम भारतीय और विदेशी भाषाओं तक में पाए जाते हैं। यही संस्कृत है जिसने हिंदुस्तान को बताया कि उसकी पहचान क्या है। संस्कृत से इतनी ही अलर्जी है तो नष्ट कर दीजिए ये सारी भाषाएं, मिटा दीजिए सारे सांस्कृतिक प्रमाण, हटा दीजिए अपना ‘नवीन’ पद जिसे रावण ने भी गुनगुनाया था…नवीन मेघमंडली निरुद्धदुर्धर्स्फुरत्करालवालहव्यवाट, जब शिव के सामने रावण ने आंखों में आंसू भरकर नवीन उद्दभट रुप दिखाया था। अरे भारत का सारा सृजन और लोकजीवन और लोकमन का सार बीजमंत्र, भारत के हर शख्स के सुख-दख से जुड़ा राम-कृष्ण-शिव का जीवन काव्य, भारत के जीवन का सारा संगीत, स्वास्थ्य, साहित्य, आयुर्वेद, विज्ञान सबका स्रोत तो इसी संस्कृत में है। इसकी खिलाफत क्यों ? फुर्सत मिले तो दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की दरगाह चले जाइए किसी रात में, देखिए और सुनिए बड़े-बड़े कव्वाल और बड़े संगीत घराने कैसे गाते हैं शास्त्रीय गायन। सुनकर जिसे दुनिया आज भी खुद को धन्य-धन्य कहने लगती है, सदियों पुरानी वास्तु कला और ऐसी तमाम महान विरासत जो संस्कृत भाषा के जरिए शुद्ध रुप में दुनिया को मिली, अगर उसे सही तरीके से हम और आप संभाल नहीं सकते तो कम से कम उसके लिए जो काम करते हैं, काम करना चाहते हैं, उनके प्रयत्नों को क्यों गरिया रहे हैं।

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चलते-चलते बोलूंगा गच्छ, गच्छ। आप सोचेंगे ये क्या बात है। ये गच्छ-गच्छ क्या बला है तो गच्छ-गच्छ की बोली आज भी महावत बोलते हैं, हाथियों को चलने केलिए, बैठे हाथी को उठाने के लिए महावत आज भी गच्छ-गच्छ बोलते हैं। नवीनजी जो अपनी पोस्ट लिख रहे थे तो बता रहे थे कि ब्राह्मणों ने संस्कृत को मार डाला। मैंने पूछा कि गच्छ-गच्छ की आवाज सुनी है कभी? कभी किसी महावत के पास बैठकर बात की है? हिंदुस्तान में हाथी भी समझता है कि गच्छ का मतलब क्या होता है…वही गच्छ जिसके मायने हैं चलो-उठो-चलो। गच्छति, गच्छतः और गच्छंति। कहां हैं मित्रवर, आइए नवीन दिशा में चलें, फिर से कहें गच्छ-गच्छ-गच्छ।

टीवी जर्नलिस्ट राकेश उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

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नवीन कुमार की मूल पोस्ट और संंबंधित अन्य पोस्ट…

संस्कृत एक मर चुकी भाषा है… ब्राह्मणों ने सैकड़ों बरसों में बड़े जतन से इसकी हत्या की है…

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संस्कृत भाषा जीवित है, उसे कोई मार नहीं सकता

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0 Comments

  1. Sushil

    November 28, 2014 at 10:45 am

    ‘नवीन’ नाम भी तो संस्कृत में ही है, यदि संस्कृत से इतनी ही घृणा है तो ये सज्जन अपना नाम “नया कुमार” क्यों नहीं रख लेते हैं भला।

  2. Ashish Pratap Singh

    November 28, 2014 at 12:01 pm

    Naveen ji ko mere hisab se rakesh ji ke lekh se sanskriti ka matlab samajh me aa jana chahiye. sankriti bhasha ka is tarah durvyavhar bahut hi apman janak hai. umda artical

  3. brijesh dwivedi

    November 29, 2014 at 11:33 am

    बधाई राकेश जी….
    आपने मन जीत लिया….वैसे नवीन की स्क्रिप्ट मुझे भी अच्छी लगती है…लेकिन संस्कृत भाषा को लेकर उन्होंने लिखा है वो एकदम बकवास और एकतरफा है….लगता है नवीन ब्राम्हणों के सताए हुए हैं…खैर वो अलग बात हो सकती है….लेकिन नवीन ने अपने तमाम मित्रों को निराश किया है

  4. umesh chaturvedi

    November 29, 2014 at 4:02 pm

    bahut shaandaar Rakesh Jii

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