निखिल वागले ने प्राइम टाइम डिबेट के दौरान सनातन संस्था के अभय वर्तक को लाइव शो से निकाल बाहर किया

मुंबई : वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले महाराष्ट्र01 न्यूज़ चैनल पर प्राइम टाइम की एंकरिंग कर रहे थे. डिबेट का विषय विवादित और संवेदनशील था. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान विवादित बयान दिया था- “धर्मसत्ता राजसत्ता से बड़ी होती है।’ इस बयान से लोगों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. मुख्यमंत्री के इस बयान को सीधा संघ नीति से जोड़ा गया. निखिल वागले ने प्राइम टाइम में इसी विषय पर डिबेट रखा.

डिबेट में कई गणमान्य वक्ताओं ने शिरकत की. कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत, सनातन संस्था के प्रवक्ता अभय वर्तक आदि. गरमा गरम बहस चल रही थी. लाइव शो के दरम्यान सनातन संस्था के प्रवक्ता अभय वर्तक ने एक विवादित स्टेटमेंट दिया. इस पर निखिल वागले आग बबूला हो गए. लाइव शो के दरम्यान सनातन संस्था के प्रवक्ता अभय वर्तक को वागले ने शो से तुरंत निकल जाने को कह दिया. वागले ने कहा कि आप नहीं गए शो से तो मेरे आदमी आकर आप को यहाँ से उठा कर लेकर जाएंगे.

निखिल वागले बार बार चिल्लाकर कह रहे थे अभय वर्तक आप दंगा करवाना चाहते हैं, जल्दी से निकल जाइये, नहीं तो मुझे गेट आउट कहना पड़ेगा. अभय वर्तक शो से निकल गए. निखिल वागले ने लाइव शो के दरम्यान घोषणा कर दी कि इसके बाद मेरे शो में कभी भी सनातन संस्था का कोई नुमाइंदा नहीं आएगा. मालूम हो कि अभय वर्तक एक विवादित शख्सियत हैं.

पुणे से सुजीत ठमके की रिपोर्ट. संपर्क : sthamke35@gmail.com

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उम्रदराजी की छूट अगर नीलाभ को मिली तो वागीश सिंह को क्यों नहीं?

Amitesh Kumar : हिंदी का लेखक रचना में सवाल पूछता है, क्रांति करता है, प्रतिरोध करता है..वगैरह वगैरह..रचना के बाहर इस तरह की हर पहल की उम्मीद वह दूसरे से करता है. लेखक यदि एक जटिल कीमिया वाला जीव है तो उसका एक विस्तृत और प्रश्नवाचक आत्म भी होगा. होता होगा, लेकिन हिंदी के लेखक की नहीं इसलिये वह अपनी पर चुप्पी लगा जाता है. लेकिन सवाल फिर भी मौजूद रहते हैं.

नीलाभ जी को रंग प्रसंग का संपादक बनने की बधाई. वैसे इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि अजित राय को एक बकियौता अंक का संपादन मिलने से वे क्षुब्ध थे. वैसे क्षुब्ध तो वो रानावि प्रशासन के रुख से भी थे जिसने, बकौल उनके, उनके संपादन में निकलने वाले दूसरे अंक की तैयारी के समय दिखाया था. और वह अंक भी क्या था! उसमें संपादक ने नाट्य आलेख के बारे में जो बचकाने सवाल पूछे थे उनकी चर्चा का ये समय नहीं है. ये बधाई का वक्त है. क्या हुआ कि नामवर सिंह के पैनल में रहते हुए भी वे संपादक बन गये, क्या हुआ कि उनकी उम्र सत्तावन से खासी अधिक है. लोगों को हैरत होती है तो होती रहे. उन्हें बधाई.

बधाई की बारी आती है अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की जिसने ये साबित किया कि युवा पीढ़ी में कोई भी रंग प्रसंग का संपादक बनने के योग्य नहीं है. लेकिन उम्रदराजी की छूट अगर नीलाभ को मिली तो वागीश सिंह को क्यों नहीं? क्योंकि उनके संपादन में निकलने वाले दो रंग प्रसंग के अंक में एक दृष्टि थी, एक योजना थी. तभी तो अभिनय वाला अंक दुबारा छपा.

थिएटर से जुड़े और शोध छात्र अमितेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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‘समाचार प्लस’ पर डिबेट में पते की बात कम, भाषण ज्यादा करते हैं पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री

मैं किसी भी पत्रकार के बारे में लिखने से बचता हूँ लेकिन कई पत्रकारों की हरकतों की वजह से आज यह पोस्ट लिखनी पड़ रही है. वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री ‘समाचार प्लस’ पर जब डिबेट में बैठते हैं तो खुद ही बोलते रहते हैं, गेस्ट को बोलने का मौका ही नहीं देते हैं. सवाल पूछने की जगह भाषण देते हैं. 

टीवी पर कई पत्रकार/ एंकर को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह कोई संत हैं जो लोगों को आदर्श सिखाता है. यही नहीं, एंकर कभी कभी नेताओं की तरह भाषण देने लगते हैं. ऐसे ही ‘समाचार प्लस’ के एक वरिष्ठ साथी हैं अमिताभ अग्निहोत्री. वह जब डिबेट में बैठते हैं तो खुद ही बोलते रहते हैं, गेस्ट को बोलने का मौका ही नहीं देते हैं. सवाल पूछने की जगह भाषण देते हैं. डिबेट में आये पार्टियों के नेता और अन्य लोग चुपचाप उनका भाषण सुनते रहते हैं. 

मेरा ऐसा मानना है कि एंकर को डिबेट में आये गेस्ट को अधिक मौका देना चाहिये और शायद यही पत्रकारिता भी है. अगर एंकर और उनके एडिटर को खुद ही भाषण देना है तो गेस्ट को बुलाने की क्या जरुरत है? पत्रकार भाषण नहीं देता है, वह केवल रिपोर्ट करता है…..अमिताभ जी के बारे में यह सिर्फ मेरी राय नहीं है बल्कि ढेर सारे लोगों व पत्रकारों की राय कुछ ऐसे ही है. कई लोगों ने मुझसे बातचीत में कहा कि अमिताभ का भाषण बेहद उबाऊ लगता है. हो सकता है, मैं गलत हूँ लेकिन मुझे और मेरे ढेर सारे लोगों को लगता है कि अमिताभ को भाषण और प्रवचन से बचना चाहिये.

देवकी नंदन मिश्रा के एफबी वाल से

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मजीठिया वेज बोर्ड पर हरिवंश अभी भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं!

नीचे राज्यसभा टीवी पर मजीठिया वेज बोर्ड पर हुई बहस का लिंक दिया जा रहा है। बहस में हरिवंश (संपादक, प्रभात खबर) और सुप्रीम कोर्ट में वकील कोलिन गोंसाल्विस भी शामिल हैं। जब हरिवंश से एंकर गिरीश निकम ने पूछा कि आपके अखबार में लागू हुआ तो बोले क‌ि अभी हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इतंजार कर रहे हैं। इस पर गोंसाल्विस ने कहा क‌ि एक साल पहले फैसला आ चुका है। बहस में जागरण, इंडियन एक्सप्रेस और भास्कर पर सीधे नाम लेक‌र आरोप लगाए गए हैं।

पूरी बहस देखने सुनने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

http://rstv.nic.in/rstv/video_upload/PlayYoutubeVideo.aspx?v=os_1zhZDg5I&feature=youtube_gdata

पूरा मामला क्या है, जानने के लिए इसे पढ़ें…

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर राज्यसभा टीवी पर बहस : हरिवंश संपादक हैं या मालिक ?

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मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर राज्यसभा टीवी पर बहस : हरिवंश संपादक हैं या मालिक ?

दिल्ली : राज्यसभा टीवी पर मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू करने, न करने को लेकर एक ‘मालिकाना’ किस्म की बहस प्रायोजित की गई। बहस में प्रभात खबर के संपादक एवं राज्यसभा सदस्य हरिवंश, डीयूजे के एसके पांडे, कोलिन गोंजाल्विस, अजय उपाध्याय ने भाग लिया। ‘मजीठिया मंच’ फेसबुक पेज से साभार प्राप्त बहस-सामग्री यहां वक्ताओं के कथन और उस पर मजीठिया मंच के प्रति-कथन के साथ प्रस्तुत है….

बहस में हरिवंश का कहना था कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने पर छोटे अखबार बंद हो जाएंगे। सरकार को उनकी मदद करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जरूर लागू किया जाना चाहिए क्योंकि यह देश के सर्वोच्च अदालत का फैसला है। उन्होंने यह भी कहा कि बीस वर्षों में उदारीकरण के बाद बहुत बदलाव आया है और यह वेज बोर्ड अन्य बेज बोर्ड की तुलना में सबसे बेहतर है। एंकर ने उनसे पूछा कि क्या प्रभात खबर ने अपने यहां लागू किया, तो उनका जवाब था, हम देख रहे हैं। अभी फैसले का इंतजार है। इसके अलावा अपनी व्यथा सुनाने लगे कि उनका अखबार बहुत छोटा है और 400 कॉपी से शुरू किया था। 

मजीठिया मंच की प्रति-टिप्पणी : ”बहस में हरिवंश कहीं से संपादक या पत्रकार नजर नहीं आ रहे थे। मालिकों की तरह मालिकों की बात कर रहे थे। और तो और, उन्हीं की तरह अंगुली पर लाभ और घाटे का सौदा गिनाने लगे। प्रभात खबर ने भी मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू नहीं किया है। यह सच कहा लेकिन या तो झूठ यह कहा या फिर लोगों को बरगलाने के लिए कहा कि आप फैसले का इंतजार कर रहे हैं। ( ताज्जुब हुआ गिरीश ने भी इस पर कुछ नहीं कहा।) दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर 7 फरवरी 2014 को फैसला दे चुका है। 63 पेज के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर देखा जा सकता है। रिव्यू पीटिशन भी 10 अप्रैल 2014 को खारिज हो चुका है। फिर हमारे महान पत्रकार –सह संपादक -सह सांसद –सह मालिक किस फैसले का इंतजार कर रहे हैं। पत्रकार मालिकों के खिलाफ किसी फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई नहीं लड़ रहे । यह मालिकों द्वारा सुप्रीम कोर्ट का अवमानना करने का केस है। इसका मतलब प्रभात खबर ने लागू नहीं किया है और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की है। साथ में यह भी कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जरूर लागू किया जाना चाहिए। इस समय तय यह होना है कि अखबारों ने सच में सुप्रीम कोर्ट की बात मानी है या नहीं । फैसला मजीठिया वेज बोर्ड पर नहीं होना है। इसलिए शर्म है तो अपने कहे अुनसार अपने यहां सिफारिश अपने कहे अनुसार लागू करें। और जहां तक 400 कापी की बात है हरिवंश के संपादक बनने से पहले प्रभात खबर देश का पहला अखबार था, जो रोटरी मशीन पर छप रहा था। उनको भी पता है और जाने वालों को भी, तब लेटेस्ट मशीन पर छपने वाला अखबार चार सौ कॉपी तो नहीं ही छप रहा हेागा। किसको उल्‍लू बना रहे हैं!”

बहस के दौरान डीयूजे के एसके पांडे से पूछा गया कि जब उन्होंने मुख्य लड़ाई लड़ी थी तो लागू कराने के लिए फिर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का मामला दर्ज क्यों नहीं किया? उन्होंने कहा – समय की बर्बादी ही कही जाएगी, क्योंकि सब जानते हैं कि कहीं भी, किसी भी अखबार ने वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू नहीं किया है।

मजीठिया मंच की प्रति-टिप्पणी : बहस के दौरान डीयूजे के एसके पांडे खूब मुंडी हिला-हिला कर, अंग्रेजी-हिंदी में बोलकर पांडेय असली मुद्दे को गोल कर गए। अभी जो उन्हें टीवी पर मुंडी हिलाने का वक्त और सौभाग्य जो मिला है वह भी दैनिक जागरण के उन साहसी कर्मचारियों की वजह से ही मिला है जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जाने की पहल की और अब तक डटे हैं। यूनियनों की हालत पर तो क्या कहने। अभी चार आदमी भी उनके पास मुश्किल से मिलेंगे धरना- प्रदर्शन के लिए। बहुत निराश किया पांडेय जी ने। उनके पास तो लगता है सुप्रीम कोर्ट में कितने मामले चल रहे हैं, ये भी जानकारी शायद ही हो।

समाचार पत्र कर्मचारियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इस समय भी लड़ रहे कोलिन गोंजाल्विस ने जो कहा, वह वास्तविकता के काफी करीब था लेकिन सबके बीच कोऑर्डिनेशन की कमी के कारण उनके पास भी जानकारी सीमित ही लगी। गोंजाल्विस का कहना कि सबसे पहले यूनियन बनाकर लोगों को जमा करना जरूरी है, यह बहुत ही मुश्किल काम है। गोंजाल्विस ने कर्मचारियों का पक्ष रखने की भरसक कोशिश की लेकिन उन्हें भी पूरे देश में चल रहे मामले के बारे में पता करना चाहिए। उन्हें विभिन्न समाचार पत्रों में चले रहे गोरखंधंधें को उजागर करना चाहिए। उनके लिए यह अच्छा फोरम था। वैसे उनका सुझाव स्वागत योग्य है। आशा है सभी साथी इस ओर ध्यान देंगे।

अब एक ऐसी संस्था के मुखिया की बात, जो इस धरती पर अब पाए नहीं जाते। जी हां, एडिटर्स गिल्ड की बात। अजय उपाध्याय के विचार एक बुद्धिजीवि के विचार जैसे ही थे। न इधर की, न उधर की। बीच की बात। मालिक भी खुश और वर्कर भी।

मजीठिया मंच की प्रति-टिप्पणी : सबको पता है कि अब अखबारों में कोई संपादक नहीं है। जो हैं, वे मालिक-संपादक हैं। बाकी सब इसलिए संपादक के पद को सुशोभित कर रहे हैं कि मालिक उन्हें वह कुर्सी किसी न किसी बहाने देना चाहता है। वह सब कुछ तो जानते हैं, मालिकों की चालबाजी, बदमाशी और ताकत। और तो और, सबसे बदनाम अखबार के वह ब्यूरो चीफ थे और उसी जैसे एक बड़े मीडिया समूह के अखबार के समूह संपादक भी। कैसे कॉन्ट्रैक्ट बनता है और कैसे – कैसे लेागों को प्रताडि़त किया जाता है, उनसे बेहतर इस देश में और कौन जान सकता है।”… बहस के सूत्रधार गिरिश निकम को भी और तैयारी करके आना चाहिए था।

बहस को इन लिंक्स पर देखा-सुना जा सकता है… 

http://rstv.nic.in/rstv/video_upload/PlayYoutubeVideo.aspx?v=os_1zhZDg5I&feature=youtube_gdata

https://www.youtube.com/watch?v=os_1zhZDg5I&feature=em-uploademail

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A lecture on ‘Role of Media in Intellectual Growth of the Nation’ was organised by Journalism University

Bhopal, January 30: Every nation has its own nature and behaviour. And development could b achieved only when the policies are made according to the nature otherwise there will be deformation. The first intellectual development of the human beings occur at the home and then in the society. Today, media has to play a great role in the intellectual growth of the human beings. Therefore, media should first understand the cultural India then transfer the knowledge to the people.

These views were expressed by the Governor of Haryana, Prof. Kaptan Singh Solanki while addressing a function organised to mark the death anniversaries of Father of Nation Mahatma Gandhi and one of the greatest poet, journalist and freedom fighters of the country Makhanlal Chaturvedi. The function was organised on the subject, ‘Role of Media in Intellectual Growth of the Nation’ by Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism and Communication wherein Prof. Solanki was present as Chief Guest.

Member of the freshly-constituted Central Film Censor Board of India and senior journalist, Ramesh Patange was also present as the keynote speakers on the occasion. Prof. Solanki, in his address, further said that India is a nation built by the sages and saints. He said that the lives of Mahatma Gandhi and Makhanlal Chaturvedi are the reflection of the India’s culture and philosophy and therefore, it is not only India that derives inspiration from them but the entire world. He said that American President Barack Obama always quotes Mahatma Gandhi’s name in his addresses all over the world. While underlining the role of journalism in shaping India’s future, Haryana Governor said that journalists would have to take lessons from the practices and values of Makhanlal Chaturvedi. He said that January 30 is a pious day for the country who gave to great sons to India who devoted a major part of their lives to journalism and cultivated a seed of development and enlightenment in the society through it.

Senior journalist and Member of Central Film Censor Board, Ramesh Patange while addressing the students, said four kinds of independence are important for a society for its inclusive growth: political, social, economic and intellectual. He said that political freedom has been achieved and the nation is in the process of achieving social and economic freedom and would be achieved in the days to come. But the struggle for intellectual freedom is the toughest and the most important one. Media could play a vital role in it and therefore, it should rethink how this freedom could be achieved. While presiding over the function, vice-chancellor of the university, Prof. Brij Kishore Kuthiala said that besides, the education imparted at schools, colleges and universities, media too plays a key role in giving an intellect to the society. It is the responsibility of the media to take the intellectual level of the society to the zenith.

Prof. Kuthiala further said, “Realizing their responsibilities, media-persons should disseminate information to the society only after a thorough analysis according to their intellectual abilities.” He also exhorted the student to take into account the points brought to the fore during the function and think and imbibe them to shape themselves into responsible and competent journalists. Earlier, the function began with the lighting of the traditional lamp by the guests and recitation of Saraswati Vandana and Makhanlal Chaturvedi’s poems by students. The guests also paid tribute to Father of Nation Mahatma Gandhi and Makhanlal Chaturvedi by garlanding their portraits.

The function was coordinated by the head of Mass Communication Department, Sanjay Dwivedi. Among those present on the occasion were many eminent citizens from the city, heads of different departments of the Journalism University, faculty members, officers, employees and large number of students.

Dr. Pavitra Shrivastava
Director – Public Relations

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प्यार नहीं, आपकी पॉलिटिक्स कुछ और है बॉस… प्यार है तो धर्मांतरण की जरूरत क्यों?

हाल ही में आया इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला न्याय व तर्क के हर पहलू पर फिट बैठता है. कितनी बेहतरीन बात कही न्यायालय ने… अगर धर्म में आस्था ही नहीं, तो धर्म परिवर्तन क्यों? सही बात है, इसे तो धर्मगुरु भी मानेंगे कि धर्म को एक दांव की तरह तो नहीं इस्तमाल किया जा सकता न कि शादी करनी हो या तालाक लेना हो तो धर्म का दांव खेल दिया. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जिन मामलों की सुनवाई करते हुए फैसला दिया, आईये उन पर गौर करते हैं. दरअसल एक ही विषय पर पांच अलग-अलग याचिकाएं न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गईं. इन सभी में हिन्दू लड़कियों ने मुसलमान लड़कों से शादी करने के खातिर इस्लाम कुबूल किया फिर निकाह किया व न्यायालय के समक्ष अपनी शादी को वैधता देने और सुरक्षा की मांग की. सभी याचिकाकर्ताओं ने मजिस्ट्रेट के समक्ष जो बयान दिए थे उनकी विषय वस्तु कमोबेश एक ही थी.

“मेरा नाम XYZ है, मेरे पिता जी का नाम ABC है. मैं जंगलीपुर जिला सिद्धार्थनगर की रहने वाली हूं. मैं इंटरमीडिएट तक पढी हूं. मेरा निकाह अब्दुल रहीम ने बब्लू उर्फ इरफान के साथ करा दिया. यह निकाह अकबरपुर जिला इलाहाबाद में कराया गया था. मेरा धर्म परिवर्तन अब्दुल रहीम ने कराया था. यह धर्म परिवर्तन उन्होंने शादी करने के लिए कराया था. धर्म परिवर्तन बब्लू उर्फ इरफान के कहने पर कराया गया था. मैं इस्लाम के विषय में कुछ नहीं जानती.”

न्यायालय ने इन्हीं शपथ पत्रों के आधार पर कहा कि मात्र शादी के लिए धर्म परिवर्तन कैसे जायज ठहराया जा सकता है. जबकि धर्म परिवर्तन की तो आवश्यक शर्त है आस्था में बदलाव. ऐसा नहीं है कि यह पहली बार है जब न्यायालयों ने किसी खास मकसद के लिए किए गए धर्म परिवर्तन को अवैध ठहराया हो. ऐसे ही एक मामले लिलि थॉमस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अगर कोई गैर मुस्लिम व्यक्ति मात्र दूसरी शादी करने के लिए मुस्लिम धर्म अपना लेता है, जबकि उसके धार्मिक आस्था में वास्तविक तौर पर कोई बदलाव नहीं हुआ है तो ऐसा धर्मांतरण शून्य होगा. ऐसे मामले जब बहुतायत में आने लगते हैं तो न्यायालयों को अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट रुख अपनाना ही पड़ता है.

लव जिहाद की बहस गरम होने के बाद न्यायालय परिसरों में भी इस बहस ने जोर पकड़ा कि क्या वाकई हिन्दू लड़कियों को प्रेम जाल में फंसा कर मुसलमान बनाया जा रहा है. ज्यादातर वकीलों का तो यही मानना है कि जिस मात्रा में मुस्लिम लड़का व हिन्दू लड़की की शादी के मामले आते हैं उसकी आधी मात्रा में भी हिन्दू लड़का व मुस्लिम लड़की के मामले नहीं ही आते हैं. न्यायालयों के रुख से भी लगता है कि इन मामलों पर स्पष्ट व्यवस्था अब वे देना चाहती हैं. अभी पिछले दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ही लखनऊ खंडपीठ ने निकाह के मामलों में काजी को पार्टी बनाए जाने व निकाह की पूरी प्रक्रिया को आगे से स्पष्ट करने को कहा है. हैबियस कार्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) का एक मामला चावली बनाम राज्य सरकार पर भी लखनऊ खंडपीठ में बहस पूरी हो चुकी है, फैसला सुरक्षित कर लिया गया है, उम्मीद है जल्दी ही एक और बड़ा बड़ा फैसला सुनाया जाएगा. इस मामले के साथ भी दर्जनों प्रेम विवाह के मामले कनेक्ट किए गए हैं. उधर एटा के शहर काजी बदूद अहमद ने न्यायालय के फैसले को मानने से इंकार कर दिया है. उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन शरीयत का हिस्सा है. तो क्या काजी साहब ये कहना चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति कलमा पढ ले भले वो इस्लाम के नियमों को न माने वह मुसलमान हो सकता है? बल्कि मैं समझता हूं कि न्यायालय ने तो धर्मों का मजाक बनने से ही बचाया है.

बात लम्बी होती जा रही है. दरअसल मेरी समझ में एक महत्वपूर्ण मुद्दा आता है. अगर लड़का-लड़की में प्रेम है तो धर्म कैसे बीच में आ जाता है? नहीं, धर्म को बीच में कोई और नहीं खुद लड़का लेकर आता है. आखिर क्यों लड़की का धर्म परिवर्तन करा के ही विवाह या निकाह कराया जाता है? जबकि कानून ने स्पेशल मैरिज एक्ट की सुविधा दे रखी है. जिसमें दो अलग-अलग मजहब को मानने वाले भी शादी कर सकते हैं. फिर लड़कों के लिए क्यों जरूरी होता है अपने वाले मजहब में ही शादी करना. माफ कीजिएगा, समाज धर्मान्ध है लेकिन ऐसे लड़के क्या कुछ कम धर्मान्ध हैं? आपको पता है लखनऊ में इस साल मात्र 13 जोड़ों की स्पेशल मैरिज एक्ट में शादियां हुईं जिसमें अलग-अलग मजहब को मानने वाले लड़के और लड़्की थे. प्यार करते समय स्थिति चाहे जो होती हो लेकिन शादी के वक्त तो आपके प्यार पर आपका मजहब भारी ही पड़ जाता है, मिस्टर. इन तथ्यों से तो यही लगता है कि प्यार नहीं आपकी पॉलिटिक्स कुछ और ही है बॉस.

लेखक चन्दन श्रीवास्तव लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक कैनविज टाइम्स में बतौर वरिष्ठ संवाददाता कार्यरत हैं और लीगल बीट कवर करते हैं. चंदन से संपर्क chandan2k527@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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डीडी के मठाधीशों, आने वाली पीढ़ियों की जड़ों में मट्ठा मत डालो

सोशल मीडिया से ही सुना-पढ़ा है कि गोवा फिल्म फेस्टीवल में डीडी नेशनल का बैंड बजवा चुकी महिला एंकराइन को लेकर संस्थान में ही कई गुट हो गये हैं। प्रसार भारती के सीईओ जवाहर सिरकार इस सवाल के जवाब को लेकर व्याकुल हैं, कि इतने महत्वपूर्ण कार्यक्रम की कवरेज के लिए इन भद्र और अनुभवहीन महिला एंकर को गोवा भेजा ही क्यों गया? इस सवाल की पड़ताल के लिए प्रसार भारती ने अतिरिक्त महानिदेशक स्तर के आला-अफसर को दिल्ली से मुंबई भेजा है। साथ ही प्रसार भारती ने इस सब कलेश को ‘सिस्टम फेल्योर’ मान लिया है।

सुना है कि, डीडी की मट्टी पलीत कराने वाली आरोपी एंकराइन सदमे में हैं। मेरी समझ में नहीं आता, कि गल्ती मानने के बजाये और एंकरिंग से अपने पांव खुद ही पीछे खींचने के बजाये, मैडम सदमे में क्यों चली गयी हैं? दुनिया भर में डीडी की थू-थू कराने वाली इन अनुभवहीन मैडम के परिवार ने मुंबई पुलिस की शरण ली है। परिवार चाहता है, कि मैडम ने जो कुछ किया है। मैडम के कारनामे का जो वीडियो दुनिया में फैला है। उस वीडियो को यू-ट्यूब से गायब करा दिया जाये। ताकि न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। मतलब जब वीडियो ही गायब हो जायेगा, तो फिर लल्ली के कारनामे पर जमाना हंस ही कैसे पायेगा? बहुत सही। क्या रास्ता अख्तियार किया है परिवार और डीडी की मट्टी पलीत कराने वाली महिला एंकराइन ने। अरे अगर थीड़ी सी भी समझ है, तो मैडम को ऐसी थू-थू-मय पत्रकारिता और इतनी घटिया स्तर की एंकरिंग को लात मार देनी चाहिए। यह तो कुछ कर नहीं पायीं। परिवार उतर आया है मैडम के कारनामे को ‘ज़मींदोज’ कराने पर। इस रणनीति के तहत कि पुलिस से तुर्रेबाजी कराके वीडियो हटवा दो…और जो कुछ जमाने भर के सामने आ चुका है हमेशा-हमेशा के लिए उसे सुपुर्द-ए-खाक करा दो।

वाह बहुत खूब। क्या शानदार और निर्लज्जता का रास्ता अख्तियार कर रही हैं मोहतरमा और उनके शुभचिंतक परिवारीजन। इतना सब डीडी का मजाक उड़वाने के बाद परिवार का यह तुर्रा कि, मैडम इसलिए बीमार हो गयी हैं, क्योंकि उनका वो वीडियो यू-ट्यूब पर है, जिसमें उनकी कथित काबिलियत का सबसे बड़ा नमूना क़ैद हो चुका है (हकीकत में असलियत)। अरे मैडम और मैडम के परिवार वालो तुम चाहते हो कि, तुम्हारी और तुम्हारी लल्ली, और डीडी में बैठे तुम्हारी लल्ली जैसे नाकाबिलों के खैर-ख्वाहों की खुशी की खातिर तमाम जमाना अपनी आंखों को गरम सूजों से फोड़ ले। ऊं हूं….न कतई नहीं। तुम्हारी यह डिमांड बहुत गलत है। तुम अपनी खुशी के लिए तो मुंबई पुलिस से सबको गलत साबित कराने पर तुली बैठी हो। सबकी आंखों और जुबां बंद कराने की तमन्ना संजो रही/रहे हो। जरा एंकराइन (अधकचरी एंकराइन) मैडम और उनके शुभ-चिंतको यह तो सोचो और देखो ठंडे-संतुलित दिमाग से, कि डीडी के इतिहास में किस हद तक का ‘काला-पन्ना’ दर्ज करा बैठी हैं, यह अनुभवहीन और अल्पज्ञानी एंकराइन जी।

अब आओ डीडी के मुंबई प्रमुख कोई मुकेश शर्मा से भी दो-टूक बात कर लें। इस ‘एंकर-नामा’ या ‘एंकरिंग-एंकराइन-कांड’ के लिए सीधे तौर पर जबाबदेही इन्ही शर्मा जी की बनती है। वजह, श्रीमान जी मुंबई डीडी के सिरमौर मतलब सर्वे-सर्वा यह शर्मा साहब ही हैं। डीडी में कैसे-कैसे ‘नव-रत्न’ तराश कर ‘फिट’ किये या कराये जाते हैं…या अब तक किये जाते रहे हैं…इसका नमूना मैडम एंकराइन के ‘श्रीमुख’ से निकली वो ‘एंकर-धारा’ है, जो किसी भी पत्रकार/ मीडिया से जुड़े इंसान के दिमाग को पिघलाकर उसमें ‘मट्ठे’ का सा असर कर सकती है। मैडम की तरफदारी में गलतियों को घोटकर पीने के लिए मैदान में उतरे शर्मा जी फरमा रहे हैं कि, मोहतरमा की एंकरिंग के दौरान तकनीकी परेशानियां थीं। मसलन…..

1-मैडम का ‘इयरफोन’ सुचारु रुप से काम नहीं कर रहा था।

2-सरकारी चैनल में सरकारी स्तर का ‘धक्कम-धक्का’ इयरफोन बीमार होने के चलते एंकराइन-मैडम शो-प्रोड्यूसर से निर्देश नहीं ले पा रही थीं।

3-गोवा में फिल्म फेस्टीवल की भीड़ देखकर अल्पज्ञानी एंकर मैम ‘नर्वस’ हो गयी थीं।

इन अज्ञानी (अ-प्रैक्टिशनर) एंकराइन की बेजा ‘कलाकारी’ के चलती जिस डीडी नेशनल दुनिया भर में अपनी ऐसी-तैसी करानी पड़ गयी, उसके मुंबई प्रमुख शर्मा जी अंत में फरमाते हैं कि (फिजूल में चर्चित हुईं) महिला रिपोर्टर की रिपोर्टिंग स्तरीय नहीं थी।

सुनो शर्मा जी अब आप मेरी सुनो। आप खुद ही मान रहे हैं कि, मैडम एंकराईन ‘इयरफोन’ पर ‘शो-प्रोड्यूसर’ से ज्ञान ‘गटक’ कर (लेकर, ग्रहण करके) आगे (डीडी के दर्शकों को) लाइव एंकरिंग में ज्ञान ‘बघारकर’ खुद को काबिल जताने में जुटी थीं। मतलब एंकरिंग और एंकराईन दोनो की ज़मीन “बैसाखियों” (शो-प्रोड्यूसर) पर चिपकी/ लिपटी पड़ी थी। मुंबई डीडी के शर्मा जी ‘प्रमुख’ आप होंगे, लेकिन बताना चाहूंगा, कि एक अच्छे एंकर/ रिपोर्टर के लिए लाइव के दौरान खुद ही अपने मुंह, हासिल अनुभव और ज्ञान से दर्शकों को ज्ञान देना होता है। इसमें शो-प्रोड्यूसर कुछ नहीं करता। मैडम ने अपने अल्पज्ञान के चलते लाइव में ही ‘गवर्नर ऑफ इंडिया’ धर पेला। इसमें इयरफोन, स्वंय आप, मैं, शो-प्रोड्यूसर या कोई और (जो मैडम के अलावा आपकी नजर में जिम्मेदार हो) जिम्मेदार नहीं हो सकता।

डीडी के मुंबई प्रमुख मुकेश शर्मा जी के मतानुसार- समारोह की भीड़ देखकर मोहतरमा ‘नर्वस’ हो गयीं। अब इसका जबाब भी आपको ही देना होगा, कि नर्वस होने वाली इतनी कमजोर कर्मचारी को लाइव एंकरिंग के लिए क्यों, आपके किस चहेते अधीनस्थ ने गोवा में जबरिया लाइव कराके डीडी नेशनल की इस कदर ‘बैंड’ बजवाने के लिए भेजा। और आपने अब तक उसका क्या ‘हिसाब-किताब’ फाइनल किया? अपनी पूरी ‘सफाई-रामलीला’ के अंत में शर्मा जी मोहतरमा की रिपोर्टिंग को स्तरीय नहीं मानते हैं। तो शर्मा जी अब आप बताईये कि, इसमें सोशल-मीडिया यह हमारे जैसे ‘कम-अक्ल’ दो-चार लाइनें आपकी और आपकी एंकर मैडम की काबिलियत पर लिख-धरने वाले कहां और क्यों जिम्मेदार हैं? शर्मा जी अपना ‘गिरहवान’ झांकिये, सब-कुछ मसाला तुम्हें वहीं दिखाई दे जायेगा। जरुरत है तो बस सिर्फ-और-सिर्फ आपको, मैडम को, मैडम को परिवार वालों को एक अदद “ईमान” की नजर से देखने भर की। मेरी ईमान भरी नज़र में तो इस पूरे तमाशे के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार स्वंय आप और आपके वे तमाम अधीनस्थ (जी-हजूरी करने वाले) हैं, जो आपकी हां-में-हां मिलाकर, आपकी तरह ही इस तरह की ‘गुस्ताखियों’ को ‘कफन-दफन’ करके इस तरह के अल्पज्ञानियों को सजा देने के बजाये उन्हें उल्टे बचाकर उनका भविष्य ‘खाई-खंदकों’ में दबाने के रास्ते तलाशते हैं।

बताईये भला..जिन मैडम की एंकरिंग का वीडियो दुनिया में ‘गदर’ मचाये हुए है। जो वीडियो और मैडम, मीडिया के लिए ‘माथा-पच्ची’ का कारण बने हुए हैं। जिन मैडम ने इतना बड़ा ‘बलंडर (ब्लंडर)’ मीडिया और अपने देश के सबसे सम्मानित समझे जाने वाले ‘डीडी नेशनल चैनल’ की झोली में जबरिया ही धर-फेंका हो, उन मैडम के इस सब करे-धरे पर ‘सही-बयानी’ करने पर भी खुद मैडम और उनका परिवार अब हमारी (पाठक-लेखकों) आंखों पर जबरिया काली पट्टी और मुंह पर सिलाई लगवाने की जुगत मे है, मुंबई पुलिस से। क्या यह उससे भी ज्यादा घातक साबित नहीं होगा, जितना मैडम गोवा फिल्म फेस्टीवल में “गवर्नर ऑफ इंडिया” परोस और पेश करके वापिस मुंबई लौट आई हैं!

लेखक संजीव चौहान वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09811118895 के जरिए किया जा सकता है.

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दूरदर्शन की इस रिपोर्टर का लाइव कवरेज देखिए, हंसे बिना नहीं रह पाएंगे

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नवीन कुमार ने संस्कृत का मरण उत्सव मनाया है तो मैं संस्कृत का जीवनोत्सव मनाउंगा

(पहली किस्त) : न्यूज़ 24 में मेरे बेहद अनन्य नवीन कुमार ने अपने फेसबुक वॉल पर संस्कृत भाषा का बड़ा भारी मरण उत्सव मनाया है। मैंने उसे कहीं दूसरी जगह पढ़ा और देखा क्योंकि अब वो मुझे मेरे फेसबुक पर दिखाई नहीं देते। रोज दफ्तर में मिलते हैं, चर्चा होती है, कुछ हल्की-फुल्की बहस भी। नवीन कुमार में ओज है, तेजस्विता है, ऐसी प्रचंड लपलपाती आग हमेशा चेहरे पर दिखाई देती है कि मानो अभी जलाकर सब कुछ भस्म कर देगी। खैर, उनका मन बालसुलभ कोमलता से भरा है, वो गरजते हैं तो मैंने उन्हें लरजते भी देखा है, निजी चर्चा में उनकी भावना को मैंने समझा है।

चाय की चुस्कियों के साथ किसी मुद्दे पर लपकते और दुबकते भी देखा है। वो वरिष्ठ हैं, अनुभवी है, सब प्रकार से प्रशंसा के पात्र हैं, क्योंकि उनका मन खुला है, विचार खुला है, वो खुद के मन में खौलती, उबलती भावनाओं को औरों की तरह छुपाते नहीं हैं, वो पीछे से वार नहीं करते हैं, वो सीना चौड़ा कर 56 इंची छाती के साथ दक्षिण पंथ पर वामपंथी हसिया-हथौड़ा चलाते हैं, चाहे वो निजी चर्चा हो, फेसबुक वॉल हो या फिर टेलीविज़न पर उनकी दहाड़ती आवाज, उनकी स्क्रिप्ट, वो कोई भी मौका नहीं गंवाते, खुद के विचारों से तालमेल न रखने वाले विचार से दो-दो हाथ करने में। इस काम में उनका तर्क भी शानदार है कि पत्रकारिता व्यवस्था की आलोचना के लिए बनी है, अगर कोई व्यवस्था की तारीफों के पुल बांधता है तो वो पत्रकार नहीं है, उसमें पत्रकार होने का एबीसीडी वाला संस्कार भी नहीं है।

किसी का नवीन कुमार से वैचारिक मतभेद हो सकता है, जैसे कि मेरा भी किन्हीं मुद्दों पर मतभेद रहता ही है, लेकिन वो मनभेद वाले इंसान नहीं हैं, ऐसा मेरा अनुभव है। ये बात सही है कि तस्वीरों की मनमानी सुरुचिपूर्ण व्याख्या करने में कोई उनका सानी नहीं हैं, व्यंग्यात्मक पत्रकारिता और कटाक्ष वाली कटीली जुबान का इस्तेमाल वो टीवी स्क्रिप्ट में करके वाहवाही भी लूटते हैं। लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि वो एकतरफा लिखते हैं, जो उन्हें सही लगता है, उनके विचार के मुताबिक जो सही है, वही लिखते हैं, इतिहास के आईने में तथ्यों को खंगालना उन्हें पसंद नहीं है, भारत, भारतीय मानस, संस्कार और संस्कृति के साथ संस्कृत समेत तमाम पहलुओं पर जो बात भारत विरोधियों ने भारत में प्रसारित की है, उसी के साथ कदमताल करते रहना उनकी फितरत बन चुकी है, वो भारतीयता की रोशनी में सही तथ्यों को न जानना चाहते हैं, न सुनना चाहते हैं, न वो अपनी बातों का विहंगावलोकन करने की मेरी कोशिश को शायद कभी मंजूर ही करेंगे।

लेकिन जैसे उन्होंने संस्कृत का मरण त्योहार मनाया है, वैसे ही मेरा भी कर्तव्य बनता है कि मैं संस्कृत का जीवनोत्सव मनाऊं। उन्हें जवाब प्रेषित करुं। बहस के लिए उनकी चुनौती स्वीकार करुं। अब ऐसा मैं इसलिए नहीं करने जा रहा हूं कि मैं ब्राह्मण कुल में जन्मा हूं। ऐसा मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मेरी बौद्धिक चेतना मुझे तब तक झकझोरती रहेगी जब तक कि मैं उनके झूठ को जड़मूल से उखाड़ न डालूं जो असल में उसी साम्राज्यवादी साजिश की देन है, जिन्होंने हिंदुस्तान को उसके सांस्कृतिक मूल से उखाड़ने का पाप बीते हज़ार साल में किया है, जिसे अंग्रेजों ने साजिशन हमारे अध्ययन का हिस्सा बनाया, जिसे एनेस्थिसिया बनाकर आजादी के बाद तथाकथित सेक्युलर और वामपंथी गठजोड़ ने भारतीय मानस को उसकी जड़ों से काटने का कुकृत्य हिंदुस्तान में शुरु किया और इस पापपूर्ण काम में भी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्राप्त ब्राह्मण भी शामिल थे।

नवीन कुमार के मुताबिक, ‘सिर्फ संस्कृत के बल पर मूर्ख ब्राह्ण सदियों तक बाकी दुनिया से अपनी चरणवंदना करवाते रहे’। दूसरी बात शुरु में कही है कि ‘वो जमाना गया कि वेद सुन लेने पर दलितों के कान में शीशा पिघलवा करके डाल देते थे’। मैं भावनाओं से नहीं कुछ कहता लेकिन तथ्यों से बात करुंगा। मेरा सवाल है कि क्या नवीन कुमार इस बात को जानते हैं कि चारों वेदों के रचयिता कौन से ब्राह्ण थे? क्या महर्षि वेदव्यास जाति से ब्राह्ण थे? वेदों के जानकारों ने ही हमें बताया है कि वेदव्यास का जन्म तथाकथित ब्राह्मण कुल में नहीं हुआ था, शास्त्र ही बताते हैं कि वेदव्यास तथाकथित शूद्र कुल में जन्मे थे लेकिन अपने कर्म से वो ब्राह्मणों के लिए भी पूज्य बन गए। वेदव्यास के पहले चारों वेदों की परंपरा श्रुत थी, यानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक वेद कानों से सुनकर दिमाग से रटकर ट्रांसफर होते रहे। यह दुष्कर कार्य पीढ़ियों तक जिन कथित ब्राह्मणों ने किया, उन्हें गाली देकर आखिर आप क्या हासिल करना चाहते हैं? वेदकाल से यही सत्य है कि वेदव्यास ने ही वेदों को लिखित रुप दिया, लेखन-पठन-पाठन पर अगर ब्राह्मणों का ही आधिपत्य होता तो क्या ये संभव था?

नवीन कुमार तर्कों का जाल बुन देंगे जैसे वेद विरोधी बुनते चले आए हैं। लेकिन क्या वो बताने की कृपा करेंगे कि महर्षि वाल्मिकी का जन्म किस कथित ब्राह्मण कुल में हुआ था। वाल्मीकि ऋषि तो आदि कवि हैं, संसार के पहले कवि, संस्कृत में लिखी पूरी रामायण में वेदों के जाने कितने श्लोकों को उन्होंने उद्धृत किया है, किस माई के लाल ब्राह्मण ने तथाकथित शूद्र कुल में जन्में महर्षि वाल्मीकि के कान में पिघलाकर शीशा डाला था…? इतिहास में कोई एक उदाहरण तो बताइए? लेकिन ये वाल्मीकि ऋषि को ही सत्य मानने को तैयार नहीं हैं, तो फिर बाकी बात ही क्या की जाए। भारत की जो लिखित विरासत इनके विचार को खंडित करती है, उसे ये मिथक बताकर इतिहास से बाहर कर देते हैं और जो कुछ इधर-उधर की कपोल गप्पें और बेकार बातें इनकी बातों को पुष्ट करती हैं, उसका ये बड़े चाव से बखान करते हैं। जब भारत का सारा अतीत आपके लिए मिथक है, झूठ है, कहानी है तो फिर उसमें से किसी विवादित तथ्य को उद्धरण बनाकर, सच बताकर पेश करना कैसे सही हो सकता है।

तो मनगढ़ंत कहानियों के आधार पर, अंग्रेजों की विभाजनकारी पढाई और कथित सेक्युलर मार्क्सवादी पाठ के आधार पर लोगों को दिग्भ्रमित करना बंद करिए। अपने ज्ञान को तथ्यों के आईने में संवारिए। आज से डेढ सौ साल पहले ये हिंदी भी नहीं थी जो हम आप लिख रहे हैं, देशज भाषा जो आज भी हमारे गांव-जवार में बोली जाती है, वही हमारे लोकजीवन की भाषा थी। भाषा का संस्कार राजनीतिक जय-पराजय से जुड़ा है, हम हज़ारों सालों से अपने राजनीतिज्ञों के अलगाव की वजह से पददलित हुए, इसी में संस्कृति भी धुंधली पड़ी और संस्कृत भाषा भी। क्या भूल गए- पढ़ें फारसी बेचें तेल वाली कहावत। अंग्रेजी राज में अरबी-फारसी इसी हिंदुस्तान में कैसे देखते-देखते तेल बेचने लगी थी। बात करिए तो सप्रमाण बात करुंगा। क्यों नालंदा जीवित करने की याद आई, किसने नालंदा जलाया, किसने तक्षशिला मिटाया, किसने ज्ञान के सारे स्रोत हिंदुस्तान से उखाड़ फेंकने की कसमें खाईं, किसने सुजलाम-सुफलाम ज़मीन पर खून की नदियां सिर्फ इसलिए बहाईं क्योंकि वैचारिक और मजहबी तालमेल नहीं बैठ रहा था।

नहीं तो यही संस्कृत भाषा है जिसके पचास से अस्सी फीसद शब्द आज भी कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, मराठी, गुजराती, डोगरी और हिंदी समेत तमाम भारतीय और विदेशी भाषाओं तक में पाए जाते हैं। यही संस्कृत है जिसने हिंदुस्तान को बताया कि उसकी पहचान क्या है। संस्कृत से इतनी ही अलर्जी है तो नष्ट कर दीजिए ये सारी भाषाएं, मिटा दीजिए सारे सांस्कृतिक प्रमाण, हटा दीजिए अपना ‘नवीन’ पद जिसे रावण ने भी गुनगुनाया था…नवीन मेघमंडली निरुद्धदुर्धर्स्फुरत्करालवालहव्यवाट, जब शिव के सामने रावण ने आंखों में आंसू भरकर नवीन उद्दभट रुप दिखाया था। अरे भारत का सारा सृजन और लोकजीवन और लोकमन का सार बीजमंत्र, भारत के हर शख्स के सुख-दख से जुड़ा राम-कृष्ण-शिव का जीवन काव्य, भारत के जीवन का सारा संगीत, स्वास्थ्य, साहित्य, आयुर्वेद, विज्ञान सबका स्रोत तो इसी संस्कृत में है। इसकी खिलाफत क्यों ? फुर्सत मिले तो दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन की दरगाह चले जाइए किसी रात में, देखिए और सुनिए बड़े-बड़े कव्वाल और बड़े संगीत घराने कैसे गाते हैं शास्त्रीय गायन। सुनकर जिसे दुनिया आज भी खुद को धन्य-धन्य कहने लगती है, सदियों पुरानी वास्तु कला और ऐसी तमाम महान विरासत जो संस्कृत भाषा के जरिए शुद्ध रुप में दुनिया को मिली, अगर उसे सही तरीके से हम और आप संभाल नहीं सकते तो कम से कम उसके लिए जो काम करते हैं, काम करना चाहते हैं, उनके प्रयत्नों को क्यों गरिया रहे हैं।

चलते-चलते बोलूंगा गच्छ, गच्छ। आप सोचेंगे ये क्या बात है। ये गच्छ-गच्छ क्या बला है तो गच्छ-गच्छ की बोली आज भी महावत बोलते हैं, हाथियों को चलने केलिए, बैठे हाथी को उठाने के लिए महावत आज भी गच्छ-गच्छ बोलते हैं। नवीनजी जो अपनी पोस्ट लिख रहे थे तो बता रहे थे कि ब्राह्मणों ने संस्कृत को मार डाला। मैंने पूछा कि गच्छ-गच्छ की आवाज सुनी है कभी? कभी किसी महावत के पास बैठकर बात की है? हिंदुस्तान में हाथी भी समझता है कि गच्छ का मतलब क्या होता है…वही गच्छ जिसके मायने हैं चलो-उठो-चलो। गच्छति, गच्छतः और गच्छंति। कहां हैं मित्रवर, आइए नवीन दिशा में चलें, फिर से कहें गच्छ-गच्छ-गच्छ।

टीवी जर्नलिस्ट राकेश उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.


नवीन कुमार की मूल पोस्ट और संंबंधित अन्य पोस्ट…

संस्कृत एक मर चुकी भाषा है… ब्राह्मणों ने सैकड़ों बरसों में बड़े जतन से इसकी हत्या की है…

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संस्कृत भाषा जीवित है, उसे कोई मार नहीं सकता

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सलाम मांझी! सलाम कंवल भारती!

दलित-पिछड़ों यानी मूलनिवासी की वकालत को द्विज पचा नहीं पा रहे हैं। सामाजिक मंच पर वंचित हाषिये पर तो हैं ही, अब राजनीतिक और साहित्यिक मंच पर भी खुल कर विरोध में द्विज आ रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान से उच्च जाति वर्ग पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर बौखलाहट और तीखा विरोध के साथ सामने आया तो वहीं लखनउ में कथाक्रम की संगोष्ठी ‘लेखक आलोचक, पाठक सहमति, असहमति के आधार और आयाम’, में लेखक कंवल भारती के यह कहने पर कि ‘साहित्य और इतिहास दलित विरोधी है। ब्राह्मण दृष्टि असहमति स्वीकार नहीं करती।

सत्ता में बदलाव और संघ परिवार के मजबूत होने से दलित साहित्य के ज्यादा बुरे दिन आने वाले हैं।’ बस इतना ही कहना था कि संगोष्ठी में मौजूद द्विजों ने कंवल पर मुद्दे को भटकाने का आरोप लगाते हुए हमला बोल दिया। साहित्यिक माहौल में द्विजों का एक दलित लेखक पर उसकी अभिव्यक्ति पर हमला, साबित करता है कि राजनीतिक और सामाजिक मंच की तरह साहित्यिक मंच भी जातिवादी जड़ता से बाहर नहीं आ पाया है। जातिवादी जड़ता पूरी मजबूती से कायम है। तथाकथित जातिवादी नहीं होने का जो मुखौटा दिखता है वह नकली है।

जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान पर द्विजों की बौखलाहट और तीखा विरोध से एक बात बिलकुल साफ है कि उच्च जाति वर्ग के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और कार्यकर्ताओं में पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर उच्च जाति के मुद्दे पर एक एकता है। पीएमएआरसी के अध्यक्ष और दलित चिंतक अरूण खोटे मानते हैं कि उन सबके बीच इस बात की भी आम सहमति है कि सत्ता व्यवस्था पर चाहें कोई भी दल, व्यक्ति या विचाधारा का कब्जा हो लेकिन वह पूर्णरूप से उच्च जाति वर्ग के अधीन हो और जो उच्च जाति की वर्चास्यता को चुनौती न दे सके वहीं दलित और पिछड़े वर्ग के नेता और बुद्धिजीवी अपनी पार्टी, नेता और विचारधारा को अपने वर्ग से ज्यादा महत्त्व देते हैं बल्कि अनेक अवसरों पर अपने वर्गीय हितों के खिलाफ होने वाली गोलबंदी के समथन में भी खड़े हो जाते हैं। सच भी है मांझी के बयान से सभी द्विज गोलबंद हो गये। हिन्दूवादी मीडिया भी मांझी के बयान के विपक्ष में खड़ा दिखा। सोषल मीडिया पर जीतन राम मांझी के ज़ज्बे को सलाम किया गया। सत्ता व व्यवस्था के शिखर पर पहुंच कर जिस तरह से मांझी ने वंचित वर्ग की अस्मिता, पहचान और हक-हूक के सवाल को पूरी ताकत के साथ रखा है वह काबिले तारीफ है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जीतन राम मांझी ने अपने बयान में दलित, आदिवासी और पिछड़ों को एक पहचान दिलाने की भरपूर कोषिष की। मूल निवासियों के हक की बात की। वह भी व्यवस्था के उच्च पद से।

मूल निवासी की बात को लेकर मुख्यधारा की मीडिया कभी सामने नहीं आयी। सोशल मीडिया में मूल निवासी की अवधारणा पर बहस करने वालों को इस बहस को आगे बढ़ाने में बल मिलेगा। साथ ही जीतनराम मांझी के समर्थन में मजबूती से साथ खड़ा सार्थक भूमिका होगी। जीतन राम मांझी  और कंवल भारती के बयान से बौखलाये द्विजों की प्रतिक्रिया ने बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और सामाजिक कार्यकत्ताओं के चेहरे से नकाब हटा दिया है। बल्कि खुद ही उनके असली और नकली होने का प्रमाण दे दिया। थोड़ी देर के लिए राजनीतिक मंच को छोड़ दिया जाये और साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों को देखा जाये तो, जो कुछ कथाक्रम की संगोष्ठी में दलित मुद्दे की बात कहने पर घटित हुई वह द्विजों के लिए अक्षम है। संस्कृति की राह दिखाने वाले खुद जब अपसंस्कृति की राह पकड़ ले तो इसे क्या कहा जाये?

इस हंगामे पर प्रो रमेश दीक्षित कहते हैं, कंवल भारती बढि़या बोल रहे थे। किसी को कोई दिक्कत थी, तो उसके लिए मंच था। वैचारिक स्वतंत्रता है, देश में अभी फासीवाद नहीं आया। वहीं जलेस के नलिन रंजन सिंह मानते हैं कि लोकतंत्र में अपनी बात कहने का हक है। ऐसे में कंवल भारती का विरोध करना गलत था। उनसे असहमति रखने के बाद भी उनके बोलने के अधिकार पर रोक का विरोध करता हूं। लेखक पंकज प्रसून कहते हैं, कंवल भारती तय करके के आए थे कि उनको क्या बोलना है। ऐसा कई बार लोग लोकप्रियता के लिए भी करते हैं। वे मुद्दों पर रहते तो विवाद नहीं होता। साहित्य में विवाद न हो तो संवाद नहीं होगा। विरोध पर कंवल भारती कहते हैं, ऐसा विरोध मेरे लिए नया नहीं है। मेरे साथ अक्सर ऐसा होता रहता है मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं अपनी बात तो कहूंगा ही आप असहमत हैं तो अपना पक्ष रख सकते हैं।

द्विजों ने मूल निवासी पर मांझी को एवं साहित्य-इतिहास दलित विरोधी पर कंवल भारती को जिस तरह से धेरा वह सवाल खड़ा करता है। क्या कोई दलित-पिछड़ा (वंचित वर्ग) अपनी बात नहीं कह सकता? मांझी या फिर कंवल भारती ने कौन सी गलत बात कर दी? जब किसी वंचित को सत्ता-व्यवस्था में उच्च स्थान मिलता है तो उसे उसकी जाति से जोड़ कर क्यों देखा जाता है? सवाल उठाया जाता है। मुद्दों-बयानों में धेरा जाता है और साबित करने की कोषिष की जाती है कि दलित-पिछड़े-आदिवासी है इसलिये मोरचे पर असफल हैं! जबकि द्विजों पर यह हमला दलित-पिछड़े-आदिवासी की ओर से नहीं होता है। बहरहाल, दलित-पिछड़े-आदिवासी की आवाज को बुलंद करने के लिये जीतन राम मांझी और कंवल भारती को सलाम!

लेखक संजय कुमार बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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संस्कृत भाषा जीवित है, उसे कोई मार नहीं सकता

भाई, संस्कृत भाषा मर नहीं सकती। अब यह मत सोचिए कि मैं ब्राह्मण हूं क्या? नहीं भाई मैं ब्राह्मण नहीं हूं। लेकिन ब्राह्मण होता तो भी यही लिखता जो अभी लिख रहा हूं। और भाई ब्राह्मणों ने किसी भाषा की हत्या नहीं की। किसी भी जाति विशेष पर हमें कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। अब आइए संस्कृत के अस्तित्व की बात पर। करोड़ो लोग प्रतिदिन  भगवत् गीता का पाठ करते हैं। दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। महामृत्युंजय जाप करते हैं। रोज, बिना किसी नागा के। अन्य पुस्तकों का सस्वर पाठ करते हैं पूजा के वक्त। और वे जो पाठ करते हैं, उसका अर्थ भी जानते हैं। भगवान शिव की दिव्य स्तुति-

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं।।

इसका अर्थ  वे सभी लोग जानते हैं जो इसका पाठ करते हैं।  कौन कहता है कि संस्कृत मर चुकी है? भाई, इस तरह बिना तथ्यों की जानकारी के अपनी रौ में किसी भी भाषा को मृत कह देना कहां तक उचित है?  संस्कृत के विद्वानों के पास जाइए और देखिए कि किस तरह वे इस भाषा के विशिष्ट तत्वों को समझाते हैं।  संस्कृत एक मात्र भाषा है कि जिसके मंत्रों के जाप से पूरे शरीर औऱ मन की शुद्धि होती है। जो इस बात को नहीं जानते वे इसका मजाक उड़ा सकते हैं, लेकिन इंटरनेट की दुनिया बहुत व्यापक है, अनंत है- यहां आप सर्च कर जानकारी पा सकते है। सिर्फ भगवत् गीता के श्लोक ही मुझे आश्चर्य में डाल देते हैं। खास तौर से सोलहवें अध्याय के श्लोक। दो लाइन में न जाने कितनी जानकारी और गहराई है। हां, यह कठिन भाषा के तौर पर जानी जाती है। लेकिन जब आप इसमें रच बस जाएंगे तो इसे पढ़ कर आप आनंद पाएंगे। यह उतनी कठिन भी नहीं है।

संस्कृत भाषा पूरी तरह जीवंत है और धड़क रही है। इसे कोई मार ही नहीं सकता। जब तक पृथ्वी रहेगी, तब तक संस्कृत रहेगी। और हां, इसे देवभाषा  कहा जाता है तो ठीक ही कहा जाता है। इसमें जो पवित्रता है, वह और कहीं नहीं मिलेगी। करोड़ो लोग प्रतिदिन  भगवत् गीता का पाठ करते हैं। दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। महामृत्युंजय जाप करते हैं। रोज, बिना किसी नागा के। अन्य पुस्तकों का सस्वर पाठ करते हैं पूजा के वक्त। और वे जो पाठ करते हैं, उसका अर्थ भी जानते हैं। भगवान शिव की दिव्य स्तुति-

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं।।

इसका अर्थ वे सभी लोग जानते हैं जो इसका पाठ करते हैं।  कौन कहता है कि संस्कृत मर चुकी है? भाई, इस तरह बिना तथ्यों की जानकारी के अपनी रौ में किसी भी भाषा को मृत कह देना कहां तक उचित है?  संस्कृत के विद्वानों के पास जाइए और देखिए कि किस तरह वे इस भाषा के विशिष्ट तत्वों को समझाते हैं।  संस्कृत एक मात्र भाषा है कि जिसके मंत्रों के जाप से पूरे शरीर औऱ मन की शुद्धि होती है। जो इस बात को नहीं जानते वे इसका मजाक उड़ा सकते हैं, लेकिन इंटरनेट की दुनिया बहुत व्यापक है, अनंत है- यहां आप सर्च कर जानकारी पा सकते है। सिर्फ भगवत् गीता के श्लोक ही मुझे आश्चर्य में डाल देते हैं। खास तौर से सोलहवें अध्याय के श्लोक। दो लाइन में न जाने कितनी जानकारी और गहराई है। हां, यह कठिन भाषा के तौर पर जानी जाती है। लेकिन जब आप इसमें रच बस जाएंगे तो इसे पढ़ कर आप आनंद पाएंगे। यह उतनी कठिन भी नहीं है।

संस्कृत भाषा पूरी तरह जीवंत है और धड़क रही है। इसे कोई मार ही नहीं सकता। जब तक पृथ्वी रहेगी, तब तक संस्कृत रहेगी। और हां, इसे देवभाषा  कहा जाता है तो ठीक ही कहा जाता है। इसमें जो पवित्रता है, वह और कहीं नहीं मिलेगी।

संस्कृत भाषा के जीवित होने के और प्रमाण

देश के करोड़ो लोग त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव कह कर ईश्वर की स्तुति करते हैं। जब मैं स्कूल में पढ़ता था (यह सन १९५७- ६३ की बात है) तो वहां सुबह यही प्रार्थना दोहराई जाती थी। आज भी हर उम्र और जाति के  असंख्य लोग ओम नमः शिवाय और ओम गणेशाय नमः जैसे मंत्रों का अत्यंत श्रद्धा से जाप करते हैं।  यह क्या है। संस्कृत ही तो है। हिंदू रीति- रिवाज से देश- विदेश में जहां भी विवाह की रस्म होती है, वहां गणेश पूजा से प्रारंभ होता है और मंत्रोच्चार के साथ विवाह न हो तो उसे पूर्ण नहीं माना जाता। मैं पोंगापंथ में विश्वास नहीं करता। लेकिन मेरा यह विश्वास है और विज्ञान ने इसे सिद्ध भी कर दिया है कि मंत्र न सिर्फ हमारे शरीर बल्कि मन और प्राण (पंच प्राण- प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान) में भी विशिष्ट ऊर्जा संचारित होती है।  यह अंधविश्वास तो बिल्कुल नहीं है।

पढ़े- लिखे या बुद्धिजीवी होने का यह अर्थ तो बिल्कुल नहीं है कि धर्म की हर बात को नकार दें। आखिरकार आदि शंकराचार्य से लेकर संत कबीर, मीराबाई, संत रविदास से लेकर रामकृष्ण परमहंस और परमहंस योगानंद तक ने जो बातें कही हैं, उसे सतही तौर पर लेना हमारी गलती होगी। मैं जानता हूं कि एक तबका ऐसा है जो हिंदू धर्म को गाली देता है और उसे परम बुद्धिजीवी होने का प्रमाण पत्र दिया जाता है। यह परंपरा भी रही है और अब भी है। ऐसे लोगों की विशिष्टता बस यही है कि वे हिंदू धर्म को गाली देते हैं, आध्यात्म को गाली देते हैं। इसीलिए वे चरम विद्वान कहे जाते हैं। चाहे उनके भीतर और कोई विशेषता न हो तो भी। चाहे लाख दुर्गुण भरे हों तो भी। लेकिन मेरी इन पंक्तियों के लेखन से मुझे किसी खेमे से संबंधित न समझ लिया जाए। मैं किसी भी खेमे से नहीं जुड़ा हूं। यह  मेरी व्यक्तिगत राय है। और मुझे लगता है कि इससे असंख्य लोग सहमत होंगे।

संस्कृत भाषा के बिना हमारा जीवन नहीं चल सकता। ऊं () शब्द भी तो संस्कृत का ही है। इससे कौन इंकार करेगा? एक बार फिर मैं इसे दुहराना चाहता हूं कि संस्कृत को  देवभाषा कहना सही है। क्योंकि एक तो सारे देवताओं के मंत्र संस्कृत में हैं और दूसरे इसकी ध्वनियां वर्णनातीत हैं। उच्चारण में जादू है। महारुद्राभिषेक के समय  होने वाले मंत्रोच्चार को मैं जादू ही मानता हूं। मैं किसी जाति पर टिप्पणी नहीं करूंगा क्योंकि यह मेरे लिए संभव ही नहीं है। मैं हर जाति और धर्म का हृदय से सम्मान करता हूं। लेकिन संस्कृत सारी भाषाओं की माता मानी जाती है।

लेखक विनय बिहारी सिंह जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके हैं और कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Secular राजदीप सरदेसाई को Communal मनोहर पर्रिकर पर प्यार आ गया!

Dilip C Mandal : सेकुलर और कम्युनल में क्या रखा है? राजदीप सरदेसाई कट्टर Secular गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB) हैं और मनोहर पर्रिकर कट्टर Communal गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB). और फिर प्राइड यानी गर्व का क्या है? हो जाता है. राजदीप को पर्रिकर और प्रभु पर गर्व हो जाता है. सारस्वत को सारस्वत पर गर्व हो जाता है. सेकुलर को कम्युनल पर दुलार आ जाता है. वैसे, अलग से लिखने की क्या जरूरत है कि दोनों टैलेंटेड हैं. वह तो स्वयंसिद्ध है. राजदीप भी कोई कम टैलेंटेड नहीं हैं.

सेकुलर को
कम्युनल पर
प्यार आ गया
प्राइड आ गया.

प्यार शाश्वत है,
प्यार सारस्वत है.

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दो चीज़ों का डर नहीं होना चाहिए। एक तो कि कोई हैक कर लेगा। तो क्या? फिर से बना लेंगे और 10 दिन में पढ़ने वाले भी आ जाएँगे। दूसरा डर कि धार्मिक आस्था को चोट वाला कोई मुक़दमा हो गया तो? एक तो होगा नहीं। कौन अपने धार्मिक ग्रंथों की क़ानूनी पड़ताल कराके उनकी फ़ज़ीहत करना चाहेगा? मुक़दमा हुआ तो हम इस बारे में पढ़ेंगे बहुत और बताएँगे भी बहुत। दूसरे, इस धारा में सज़ा होती नहीं। मैंने कभी सुना नहीं। मुझे करेक्ट कीजिए। तो मस्त रहिए। टेक्नोलॉजी और लोकतंत्र को थैंक यू कहिए। इतने साल में न मेरा हैक हुआ न किसी ने मुक़दमा किया।

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मनुस्मृति और तमाम स्मृतियों के हिसाब से गोडसे जी को तो क्या, उनकी बिरादरी में किसी को भी बड़े से बड़े अपराध के लिए फाँसी नहीं हो सकती थी। मैकॉले जी ने भारत में पहली बार IPC यानी इंडियन पीनल कोड बना दिया। क़ानून की नज़र में सब बराबर हो गए। समान अपराध के लिए समान दंड लागू हो गया। तो गोडसे जी को फाँसी हो गई मैकॉले जी के विधान से। इसलिए भी मैकॉले जी भारत में विलेन माने जाते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

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अभिसार आज आशुतोष की क्‍लास ले रहे थे…

Kumar Sauvir : पालतू कूकुर और सड़कछाप कूकुर की फितरतों में बड़ा फर्क होता है। ताजा-ताजा पालतु हुआ कूकुर बहुत भौकता है और ताजा-ताजा सड़कछाप हुआ कूकुर बहुत झींकता हैं, मिमियाता है और बगलेंं भी खूब झांकता है। यह हकीकत दिखाया एबीपी-न्‍यूज के एक कार्यक्रम में। मौका है दिल्‍ली के चुनावों को लेकर। एक दौर हुआ करता था जब वरिष्‍ठ पत्रकार रहे आशुतोष ने एक कार्यक्रम में कांग्रेस के एक सांसद की इस तरह क्‍लास ली थी कि वह खुद ही कार्यक्र से भाग गया। ऐसे कई मौके आ गये हैं आशुतोष के कार्यक्रमों में जब उन्‍होंने बड़े-बड़े नेताओं की जमकर क्‍लास ली।

सवाल यह नहीं कि वह क्‍लास जायज हुई थी या फिर गलत। आज अभिसार-हनीमून के दिनों में ताजा-नवेली वधू की तरह दूसरों को लतिया रहे थे, जबकि आशुतोष किसी बूढ़े सांड़ की तरह खुद के होने की हरचंद मगर बेकार कोशिशों में जुटे थे। आज अभिसार जिस तरह आशुतोष की क्‍लास ले रहे थे तो आशुतोष उस तरह बिलबिला रहे थे जैसे आशुतोष अपने कार्यक्रमों में दीगर वक्‍त में दूसरे वक्‍ताओं पर बिलबिलाते रहते थे। पुरानी कहावतों में बिलकुल सही कहा गया है कि:- समय बहुत बलवान।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना, बाकी किसी के भी खिलाफ लिख देना

आज से 35 साल पहले जब आज के ही दिन मैने अखबार की नौकरी शुरू की तो अपने इमीडिएट बॉस ने सलाह दी कि बच्चा पीएम, सीएम, डीएम और लोकल थानेदार को बचा लेना। बाकी किसी के भी भुस भरो। पर वह जमाना 1979 का था आज का होता तो कहा जाता कि लोकल कारपोरेटर, क्षेत्र के एमएलए और एमपी के खिलाफ भी बचा कर तो लिखना ही साथ में चिटफंडिए, प्रापर्टी दलाल और मंत्री पुत्र रेपिस्ट को भी बचा लेना। इसके अलावा डीएलसी, टीएलसी, आईटीसी और परचून बेचने वाले डिपार्टमेंटल स्टोर्स तथा पनवाड़ी को भी छोड़ देना साथ में पड़ोस के स्कूल को भी और टैक्सी-टैंपू यूनियनों के खिलाफ भी कुछ न लिखना। हां छापो न गुडी-गुडी टाइप की न्यूज। पास के साईं मंदिर में परसाद बटा और मां के दरबार के भजन। पत्रकारिता ने कितनी तरक्की कर ली है, साथ ही समाज ने भी। सारा का सारा समाज गुडी हो गया।  

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आज बहुत दिनों बाद एनडीटीवी प्राइम टाइम में रवीश कुमार दिखे। अच्छा लगा। रवीश अपने विषय पर पूरी स्टडी करते हैं और कहीं भी नहीं लडख़ड़ाते। इसी तरह उनकी टीम भी उम्दा होती है। अभय कुमार दुबे हिंदी के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जिनकी जिनकी जमीनी समझ लाजवाब है। अभय जी के अपने कुछ पूर्वाग्रह हो सकते हैं पर इसमें कोई शक नहीं कि अभय जी राष्ट्रीय राजनीति को समझने में निष्णात हैं। वे हर जटिल से जटिल समस्या का भी ऐसा समाधान पेश कर देते हैं कि लगने लगता है अरे ऐसा तो सोचा ही नहीं था। आज भी उन्होंने महाराष्ट्र में भाजपा के ढोल की पोल खोल दी। भाजपा लगातार एक देश एक जाति एक धर्म की बात करती है जबकि भारत जैसे बहुजातीय, बहुधर्मी और बहु संस्कृति वाले देश में ऐसा नामुमकिन है। यही कारण है कि भाजपा अपनी पूरी ताकत लगाकर भी महाराष्ट्र में मोदी के व्यक्तित्व को तेज हवा में भी नहीं बदल सकी। इतने धुंआधार प्रचार के बावजूद कोई ऐसी लहर नहीं पैदा कर सकी कि बहुमत के करीब तक पहुंच पाती। उसे जो भी सीटें मिली हैं वे मोदी की सोच और तैयारी के मुकाबले बहुत कम हैं। यहां तक कि वह लोकसभा में जो सीटें जीती थी वह भी नहीं जीत पाई। नीलांजल मुखोपाध्याय और संजय कुमार भी अपनी बात ढंग से रख सके तथा भाजपा कोटे से आर बालाशंकर भी और भाजपा के प्रच्छन्न चिंतक सुधींद्र कुलकर्णी भी। आज रवीश के आने पर प्राइम टाइम देखा और उनकी टीम का वाक् कौशल सुनकर अच्छा लगा। कल से लगातार टीवी पर विश्लेषण हो रहे हैं लेकिन 50 मिनट के इस कार्यक्रम से ही पता चला कि हकीकत क्या है बाकी में तो प्रवचन ही चल रहा था।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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न्यूज चैनल ‘जिओ टीवी’ के डिबेट में नशा करके आए मौलवी साहब (देखें वीडियो)

पाकिस्‍तान के एक मौलवी ने खूब दारू पीने के बाद न्‍यूज चैनल की डिबेट में शिरकत की. अपने इस कृत्‍य से मौलवी साहब ने पाकिस्‍तान और विश्‍वभर में रहने वाले मुसलमानों को शर्मिंदा किया है. इस्‍लाम में शराब पीने को हराम यानि गलत माना गया है. यही कारण है कि मौलवी साहब के शराब पीकर न्यूज चैनल डिबेट पर आने को इतना तूल दिया जा रहा है. पाकिस्‍तानी के एक बड़े न्‍यूज चैनल जिओ टीवी पर नशेबाज मौलवी ने अपनी हरकत से अपने देश की नाक कटा दी. मौलवी नशा करने के बाद न्‍यूज चैनल डिबेट पर ऑन एयर चले गए. नशे में उन्‍होंने इमरान खान को काफी खरी-खोटी सुनाई.

जिओ टीवी के इस शो में मौलवी साहब को नशे में देखकर पहले पहल तो एक महिला एवं पुरुष एंकर सकपका गए. लेकिन इसके बाद मौलवी साहब ने नशे की हालत में तहरीके पाकिस्‍तान के सुप्रीमो इमरान खान को खरीखोटी सुनाना शुरू कर दिया. गौरतलब है कि पुरुष एंकर मौलवी जी को नशे की हालत में लड़खड़ाता देखकर अपनी हंसी नहीं रोक पा रहा था. हालांकि महिला एंकर इस पुरे वाक्‍ये के दौरान शांत दिखाई दी. नशे की हालत में मौलवी सा‍हब ने इमरान खान पर व्‍यक्तिगत हमलों की झड़ी लगा दी. मौलवी साहब ने कहा कि उन्‍हें अपनी बेटी पर फख्र है और दुनिया के सभी पिताओं को अपनी बेटियों पर फख्र करना चाहिए. इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि जब इमरान खान ने अपनी बेटी को पहचान नहीं दी तो वे पाकिस्‍तान-एक मुल्‍क को कैसे अपनी पहचान देखेंगे.

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https://www.youtube.com/watch?v=-HTOTVvwf9k

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हिंदी का संपादक एक रोता हुआ जीव है, जिसके जीवन का लक्ष्य अपनी नौकरी बचाना है

भारत यूरोप नहीं है, अमेरिका भी नहीं है. यहां अखबार अभी भी बढ़ रहे हैं, और यह सिलसिला रुक जाए, इसका फिलहाल कोई कारण नहीं है. इंटरनेट पर हिंदी आई ही है और अगर सब कुछ ठीक रहा तो भारत में इंटरनेट हर मुट्ठी तक नहीं भी तो ज्यादातर मुट्ठियों तक पहुंच ही जाएगा और साथ में हिंदी भी इसकी सवारी करेगी. टीवी भी भारत में बढ़ता मीडियम है. और फिर यह टेक्नोलॉजी का बाजार है. यहां कारज धीरे होत है टाइप कुछ नहीं होता. अगर सारे कोऑर्डिनेट्स सही हैं, तो एक का सौ और सौ का लाख होने में समय नहीं लगता. कुल मिलाकर प्रिंट, टीवी और वेब पर न्यूज मीडियम की हालत ठीक है. बढ़ता बाजार है. मांग बनी हुई है. समस्या बाजार में नहीं है. 

तो फिर हिंदी का संपादक आज ढंग का प्रोडक्ट क्यों नहीं दे पा रहा है? इंग्लिश के मीडिया प्रोडक्ट के सामने उसका प्रोडक्ट निस्तेज क्यों है? रेवेन्यू मॉडल कमजोर क्यों है? संपादक मीडिया मालिकों से यह क्यों नहीं कह पा रहा है कि मैं जागरण या भास्कर या अमर उजाला या हिंदुस्तान को देश का सबसे असरदार अखबार बना दूंगा. हिंदी का कोई संपादक यह क्लेम क्यों नहीं करता कि हमारे पास सबसे ज्यादा खबरें और सबसे ज्यादा तस्वीरें हैं और सबसे सघन स्ट्रिंगर नेटवर्क है, इसलिए मैं इंटरनेट पर अपने ब्रांड को टाइम्स ऑफ इंडिया से बड़ा और पॉपुलर न्यूज ब्रांड बना दूंगा? कॉमस्कोर पर टाइम्स ऑफ इंडिया से आगे जाने का सपना देखने में वह डरता क्यों है? हिंदी के टीवी चैनल देखकर ऐसा क्यों लगता है कि उन्हें संपादक और पत्रकार नहीं, जोकरों और विदूषकों की टोली चला रही है. इनमें से किसी को भी हिंदी के पाठक की समझदारी का भरोसा क्यों नहीं है? खबरों के नाम पर भंड़ैती और तमाशा हावी क्यों है?  कोई संपादक मालिक को यह क्यों नहीं कह रहा है कि मैं ‘समाचार’ दिखाकर आपको नंबर दूंगा.

हाल की हिंदी फिल्मों में पत्रकार को अगर लगातार जोकर और मूर्ख की तरह दर्शाया जा रहा है, तो यह किसके प्रताप से हुआ है? पत्रकार समाज में अगर अब प्रतिष्ठित आदमी नहीं रहा, और पत्रकारिता अगर प्रतिष्ठित पेशा नहीं है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या कोई सब-एडिटर या रिपोर्टर या ट्रेनी?

वैसे क्या है हिंदी का संपादक? वह करता क्या है और क्यों करता है? दरअसल, वह एक रोता हुआ भयभीत प्राणी है, जिसे अपने काम और अपनी क्षमता और हुनर के अलावा, हर चीज से शिकायत है. वह बस किसी तरह अखबार या चैनल या साइट चलाता रहेगा. कभी कभार मैनेजमेंट के कहने पर कुछ लॉन्च कर देगा. हमेशा कम लोगों के होने और टैलेंटेड मैनपावर की कमी का रोना रोएगा. कभी कहेगा कि मालिक करने नहीं देता. जबकि मालिक बेचारा इंतजार कर रहा है कि संपादक कोई अच्छा आइडिया लेकर तो आए.

हिंदी का संपादक कभी भी नए प्रयोग नहीं करेगा. नए रेवेन्यू स्ट्रीम खोलने की बात भी नहीं करेगा. कहेगा कि यह तो मैनेजरों का काम है. जबकि उसके दब्बूपने की असली वजह यह है कि वह डरता है. कुछ गलत हो गया तो? नौकरी चली गई तो? वह हमेशा अपनी और प्रोडक्ट की कमियों के लिए नीचे के किसी को या कई लोगों को दोषी ठहराकर अपनी पोजिशन बचाने के लिए तत्पर नजर आएगा. वह गैर-पत्रकारीय तरीके से मालिकों के लिए उपयोगी बनकर या चापलूसी करके नौकरी बचाने की कोशिश करेगा. 

वह हमेशा अपना गिरोह बनाने की कोशिश करेगा. संपादकी के पहले छह महीने मालिक को यह कहेगा कि पुराने लोगों से काम ले कर देखते हैं. फिर कहेगा, इनसे काम नहीं बनेगा. छह महीने-एक साल में पुराने के बदले नए लोग लाएगा. अपनी जाति, रिश्तेदारी, इलाके से लोग लाएगा. फिर उन्हें काम करने का मौका देने के नाम पर साल दो साल निकालेगा और फिर भी बात नहीं बनी तो और प्रपंच करके टिकने की कोशिश करेगा या निकाला जाएगा. वह बी है इसलिए सी कटेगरी के लोगों को लाएगा. क्योंकि वह खुद ए नहीं है, इसलिए ए प्लस को कभी नहीं लाएगा. एवरेज टैलेंट वालों के बीच वह खुद को आश्वस्त महसूस करेगा. उसके रोजमर्रा के जीवन में मिलने वाले 90 फीसदी से ज्यादा लोग पत्रकार ही होंगे, जिनके बीच वह खुद को अच्छा फील करेगा. वह रेवेन्यू बढ़ाने की नहीं, खर्चा घटाने की सोचेगा. टॉप लाइन ठीक किए बगैर, बॉटम लाइन सुधारने के लिए कभी रिपोर्टिंग का खर्चा घटाएगा, तो कभी मैनपावर कट करेगा, तो कभी सुविधाओं में कटोती करेगा, तो कभी लोगों की सैलरी घटाएगा.

जब मालिक व्यूअरशिप और रीडरशिप के लिए दबाव बढ़ाएगा, तो प्रोडक्ट में गंदगी फैला देगा. वेबसाइट है तो पोर्न और सेमीपोर्न परोस देगा. चटपटे के नाम पर कूड़ा बिखेर देगा. टीवी पर है तो नागिन का बदला और कातिल हसीना टाइप कुछ कर लेगा या स्वर्ग के लिए सीढी लगा देगा. लाफ्टर चैलेंज के शॉर्ट कट में घुस जाएगा. न्यूज के नाम पर तमाशा करने लगेगा. जब इस वजह से प्रोडक्ट की ब्रांडिंग खराब होगी और विज्ञापन का रेवेन्यू प्रभावित होगा, तो अपना हाथ झाड़कर खड़ा हो जाएगा.

हिंदी का संपादक बौद्धिक आलस्य करेगा, अच्छा केंटेंट नहीं जुटाएगा और कहेगा कि हिंदी का रीडर और व्यूअर तो कोई अच्छी चीज पसंद ही नहीं करता. अपने बौद्धिक आलस्य का ठीकरा वह अंग्रेजी वर्चस्व के सिर पर फोड़ देगा. कहेगा कि सारी गड़बड़ी इसलिए है क्योंकि अंग्रेजी हावी है.

हिंदी का संपादक अपना स्किल सेट बेहतर करने की कोशिश नहीं करेगा. वह अपनी क्षमताओं को ब्रांच आउट नहीं करेगा. अगर वह नौकरी पर नहीं होगा, तो फिर कुछ भी नहीं रह जाएगा और मर जाएगा. वह पढ़ाई नहीं करेगा. रिसर्च नहीं करेगा. विज्ञापन की कॉपी लिखने की तमीज नहीं सिखेगा. वह पढ़ाने का हुनर नहीं सिखेगा. वह यूजीसी-नेट और पीएचडी के बारे में सोचेगा तक नहीं. वह सीरियल की स्क्रिप्ट या किताब लिखने को कोशिश नहीं करेगा. अनुवाद करना उसके वश में नहीं है, और इसे सीखने की कोशिश भी नहीं करेगा. डॉक्यूमेंट्री बनाना भी ऐसा ही मामला है, जिससे जाहिर है उसका कोई वास्ता नहीं होगा. इंग्लिश के कई संपादकों की तरह कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन में जाने का हुनर भी हासिल नहीं करेगा. प्रिंट में है तो प्रिंट में और टीवी पर है तो टीवी में ही उलझा रहेगा. दूसरे मीडियम में हाथ आजमाने का जोखिम नहीं लेगा. भाषा के मामले में भी हिंदी से शुरू और हिंदी में खत्म की स्थिति में रहेगा. वह टीम को ट्रेनिंग दिए जाने और खुद ट्रेनिंग लेने, दोनों का विरोध करेगा. पान-दुकानदार की तरह हर चीज पर उसकी एक राय जरूर होगी लेकिन वह देश-दुनिया के किसी भी विषय का एक्सपर्ट नहीं होगा.

दूसरे विषय का एक्सपर्ट होना तो छोड़िए, हिंदी का संपादक अक्सर अपने प्रोफेशन की बुनियादी बातों से भी अनजान होगा. मिसाल के तौर पर, उसे नहीं मालूम होगा कि उसके काम की संवैधानिक, कानूनी और नियम संबंधी मर्यादाएं क्या हैं. वह कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ, आईपीसी, लॉ ऑफ डिफेमेशन, रूल्स ऑफ पार्लियामेंट्री प्रिविलेज, आईटी एक्ट, केबल एक्ट, प्रेस कौंसिल के मीडिया नॉर्म इनमें से किसी भी बात का जानकार नहीं होगा और न ही अपनी टीम को इनकी ट्रेनिंग दिए जाने की व्यवस्था करेगा. इसके लिए कोई वर्कशॉप आयोजित करना उसकी कल्पना से बाहर की चीज होगी. संपादन संबंधी गलतियों को वह आसानी से विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता करार दे सकता है. कानूनी झमेले में कभी मामला फंसा, तो किसी रिपोर्टर या डेस्क के किसी कर्मचारी के नाम उसका दोष मढ़कर वह खुद को बचा लेने की कोशिश करेगा. या फिर मामले को मैनेज करने में जुट जाएगा. रिपोर्टर या डेस्क जो कुछ अच्छा करेगा, उसका श्रेय संपादक ले लेगा, लेकिन गलती उसकी कभी नहीं होगी. उसने न कभी कोई गलती की है, न कोई गलती करेगा.  

वह जब तक संपादक है, तब तक है, और जब वह नौकरी में नहीं है, तो कुछ नहीं है. वह संपादक के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि उसने कुछ और सीखने की कभी कोई कोशिश की ही नहीं है.  

तो क्या हमेशा ऐसा ही रहेगा? इस स्थिति को बदलने के दो उपाय हैं, जिसके बारे में मीडिया मालिकों को सोचना चाहिए. अगर वे चाहते हैं कि संपादक प्रयोग करें, नया सोचें, प्रोडक्ट के लिए वैल्यू क्रिएट करें, नए रेवेन्यू मॉडल बनाएं, तो पहले तो उन लोगों से बचें, जिनके लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ आलेख लिखना, मंत्री के साथ दौरे करना और गिरोहबाजी-गोष्ठीबाजी करना है. संपादकों का कंपनी के राजस्व से, रेवेन्यू मॉडल से, सर्कूलेशन और व्यूअरशिप से तथा प्रोडक्ट के प्रभाव से…इन सबसे वास्ता है. एवरेज और मंदबुद्धि संपादकों को रास्ता दिखाना जरूरी है. मैनेजमेंट को संपादकों के टार्गेट फिक्स करने चाहिए और ये टार्गेट आलेख-विश्लेषण लिखने या चेहरा पोतकर एंकरिंग करने से आगे और चीजों के बारे में भी होने चाहिए. 

दूसरा उपाय, संपादकों की सैलरी इतनी बढ़ाई जाए कि अगर वह दो साल नौकरी कर ले, तो उसमें दो साल नौकरी न करके जीने का साहस और सुविधा हो. नौकरी बचाने के लिए डरा हुआ संपादक न तो पत्रकारिता के लिए अच्छा है और न ही मीडिया इंडस्ट्री के लिए. ऐसा डरा हुआ संपादक मालिकों के लिए किसी काम का नहीं है. अपने नीचे काम करने वालों के लिए तो ऐसे संपादकों से बुरा और कुछ नहीं हो सकता, जो अपनी नौकरी बचाने के लिए दूसरों की जान लेने को हमेशा तैयार बैठा है. ऐसा संपादक पाठकों और दर्शकों के लिए भी बेकार है.

दिलीप मंडल, इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर, इकोनॉमिक टाइम्स हिंदी ऑनलाइन के संपादक तथा सीएनबीसी आवाज चैनल के एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूशर रहे. लगभग एक दर्जन मीडिया संस्थानों में काम का अनुभव. मीडिया शिक्षण, रिसर्च और पुस्तक लेखन में सक्रिय. सूचना और प्रसारण मंत्रालय और प्रेस कौंसिल द्वारा सम्मानित. संपर्क: dilipcmandal@gmail.com

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