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सुख-दुख

भारत का रतन खोने के साथ पारसी समुदाय अपनी परम्परा में बदलाव भी कर रहा है!

रंगनाथ सिंह-

पारस (अब ईरान) में रहने वाले जरथुश्त्र के कुछ अनुयायी जबराना कनवर्जन और दमन से बचने के लिए भारत भाग आये। इस छोटे से समूह के माध्यम से जरथुश्त्र की शिक्षाएँ एवं पारसी प्रथाएँ भारत पहुँची और दुनिया में जीवित रहीं। शरणार्थी समुदाय शरणदाता देश के विकास के लिए लिए क्या योगदान दे सकता है, इसकी सर्वश्रेष्ठ मिसाल पारसी समुदाय है।

इस छोटे से समुदाय ने भारत में जितने काबिल लोग पैदा किये हैं, वह किसी अन्य समुदाय के लिए ईर्ष्या का कारण हो सकता है। इस समुदाय के बारे में सबसे कम नकारात्मक खबरें आती हैं। कोरोना काल में पारसी समुदाय के पारम्परिक अन्त्येष्टि पर सरकार ने रोक लगा दी। कोई हल्ला-गुल्ला नहीं हुआ। आज रतन टाटा के निधन पर पढ़ा कि उन्हें भी दाह दिया जाएगा। पारसी समुदाय ने अपनी हजारों साल पुरानी परम्परा में समयानुसार बदलाव करना शुरू कर दिया है।

अफसोस है कि हमारी आँखों के सामने पारसी समुदाय विलुप्त होता जा रहा है क्योंकि वे रिप्लेसमेंट रेट से बच्चे पैदा नहीं कर रहे हैं। हर साल उनकी आबादी पिछले साल से काफी कम हो जाती है।

ऐसा समुदाय जिसका वैल्यू सिस्टम इतना सकारात्मक हो, उसकी आबादी का घटते जाना दुनिया को कम बेहतर होते जाने जैसा है। कोई कारोबारी भी आम जनता का दिल जीत सकता है, रतन टाटा इसकी मिसाल रहे हैं। मुझे नहीं लगता है कि किसी अन्य समकालीन उद्योगपति के निधन पर इतने आम लोग दुखी होंगे जितने रतन टाटा के जाने पर दुख व्यक्त कर रहे हैं। सादर नमन

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