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सुख-दुख

इस अख़बार ने यूँ किया रतन टाटा की मौत की खबर को कवर!

हेमंत शर्मा-

तन नवल टाटा खबरों के उन विषयों में से एक हैं जो किसी भी संपादक को चुनौती देते हैं। और आज जब उनके ना होने की खबर आई तो एक क्षणिक उदासी के साथ पहली चिंता यही कौंधी कि उनके ‘ना होने’ के होने का शीर्षक क्या हो? फोटो क्या हो? और ऐसा ख़ास क्या हो जो इस अविस्मरणीय इंसान की खबर के साथ न्याय कर सके। और आप जब किसी शख़्सियत से प्रभावित हों तो कवरेज को अंतिम रूप देते हुए खबर, फोटो और उनकी एक खूबसूरत बात को एक साथ लाना थोड़ा मुश्किल होता है।

यही संपादक की कसौटी भी होती है।

पिछले 35 सालों में ऐसे कई संपादकों से साबका हुआ जो ऐसे समय में भी अपनी धमनियों में रक्त के प्रवाह को नियंत्रित किए रहते थे भले ही उन्हें रक्तचाप की दवाई प्रतिदिन लेनी होती थी।

ऐसे संपादक भी रहे जिनके साथ रक्त का संचार ऐसी खबरों के साथ और और बढ़ जाता था। तो एक ऐसे इंसान पर कवरेज करना जिसके बारे में समाज ने बहुत ऊँचे मानदंड बना रखे हों और जो ऐसी सादगी का भी प्रतीक हो जिसे वैसी ही लिख दी जाए तो लगे कहीं अन्याय तो नहीं हो गया?

पहले हेडिंग, फिर फोटो और उसके साथ उनकी कही एक ऐसी बात को पाठको तक पहुँचाना जो उनके पूरे जीवन का निचोड़ हो- कम समय में एक कठिन चुनौती था।

अख़बार को अंतिम रूप देते-देते फ़ेसबुक पर आशीष नौटियाल का लिखा कुछ ऐसा दिख गया कि लगा इसे भी कहीं होना चाहिए तो बिना उनकी इजाज़त के कवरेज के अंत में यह भी… ‘एक बार रतन टाटा…’ से शुरू होने वाली कहानियाँ भी उन्हीं की तरह अमर रहेंगी।

उम्मीद है आपको कवरेज पसंद आएगा…

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