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सुख-दुख

रवीश कुमार, नेमत ख़ाना और हिंदी पत्रकारिता

दिनेश श्रीनेत-

जब मैं गोरखपुर विश्वविद्यालय में स्नातक का छात्र था तो उन दिनों अंगरेजी साहित्य में विलियम गोल्डिंग का उपन्यास ‘लॉर्ड ऑफ द फ्लाइज़’ पढ़ाया जाता था. मुझे रुचि जगी तो क्लास में पढ़ाए जाने की बजाय खुद से ही इसे पढ़ना शुरू कर दिया था. ऊपरी तौर पर यह दुर्घटना से बचकर एक सुनसान द्वीप पर पहुँचे बच्चों की रोमांच गाथा है. मैंने यह उपन्यास शुरू किया तो धीरे-धीरे इसका जादू छाता गया. बच्चों के बीच किस तरह धीरे-धीरे हिंसा सिर उठाती है और कैसे एक काल्पनिक भय का इस्तेमाल करके उपन्यास का एक किरदार जैक बच्चों पर नेतृत्व करने की कोशिश करता है – यह इसकी लोमहर्षक गाथा है.

तब तक मुझे फ़ासीवाद की बहुत सैद्धांतिक समझ नहीं थी, मगर इसे पढ़ते हुए फ़ॉसिज़्म की अवधारणा साफ होती चली गई. यूरोप में ऐसे बहुत से उपन्यास हैं जो सीधे-सीधे राजनीतिक नहीं हैं मगर उनके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं. चाहे वह ऐन रैंड के उपन्यास ‘ऐटलस श्रग्ड’ और ‘फाउंटेनहेड’ हों, चाहे जॉर्ज ऑरवेल के ‘1984’ और ‘एनीमल फॉर्म’. यहां तक कि बच्चों के लिए समझी जाने वाली जोनाथन स्विफ्ट की ‘गुलिवर्स ट्रैवल्स’ में भी तत्कालीन राजनीति पर गहरे व्यंग्य हैं.

इसके विपरीत हिंदी में ज्यादातर लेखन ऊपरी तौर पर राजनीतिक दिखता है, मगर अक्सर उसकी राजनीतिक रूप से प्रासंगिकता बहुत कम होती है. इसलिए क्योंकि अक्सर हिंदी में सायास राजनीतिक दिखने के लिए लेखन किया जाता है. अखबार की खबरों और घटनाओं को आधार बनाकर उपन्यास और कहानियां लिखी जाती हैं. नतीजा यह होता है कि वह पत्रकारिता का ही बाइ-प्रोडक्ट बनकर रह जाता है. शायद यही वजह है कि हिंदी के पत्रकारों ने लंबे समय से साहित्य से एक दूरी बना रखी है.

वास्तविक घटनाओं से रू-ब-रू होते हुए जब वे किसी गहरी अंतर्दृष्टि के लिए साहित्य की ओर मुड़ते हैं तो उनको वहां पर अपनी की गई पत्रकारिता पर आधारित और भी दोयम दर्जे का लेखन मिलता है. यही वजह है कि ले-देकर हिंदी के पत्रकारों की पसंद हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल और दुष्यंत कुमार के इर्द-गिर्द मंडराकर रह जाती है. इससे अधिक उन्हें हिंदी साहित्य में अपने काम का कुछ नहीं दिखता.

अब रवीश कुमार की बात करते हैं, जिन्होंने एक रोचक प्रयोग किया. उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल में ‘न्यामूर्ति बुलडोजर’ के नाम से एक वीडियो जारी किया. इसमें वे एक रोचक तरीके से अपनी बात कहते हैं, वे कहते हैं – मैं एक ऐसी काल्पनिक कहानी को प्रकाशित करवाना चाहता हूँ, जिसमें बुलडोजर ने अदालत को ही चोरी कर लिया है. उसने खुद को ही न्यायमूर्ति घोषित कर दिया है. वे आगे कहते हैं कि उनकी इस कल्पना को कोई भी प्रकाशक छापने को तैयार नहीं है. उन्होंने कहा कि स्वतः संज्ञान का आर्टिफीशियल इंटैलीजेंस बुलडोजर में आ गया है, तो वह ये मान लेता है कि देर-सवेर दोष साबित होगा, लिहाजा आज ही इसका घर गिरा दो.

अब आगे रवीश कुमार कहते हैं कि इस न्यामूर्ति बुलडोजर का रेफरेंस आपको सिर्फ साहित्य में मिल सकता है और इस रेफरेंस के लिए वे खालिद जावेद के उपन्यास ‘नेमत ख़ाना’ का जिक्र करते हैं. वे कहते हैं इसमें नायक अपने गुनाहों की सजा के लिए अदालत खोज रहा है. वे कहते हैं न्यामूर्ति बुलडोजर भी उसी उपन्यास के नायक की तरह सोचता है. उसके अनुसार सजा हमेशा लावारिस की तरह हवा में भटकती फिरती है. वह किसी को भी मिल सकती है.

रोचक बात यह है कि यूट्यूब जैसे लोकप्रिय माध्यम में, जहां वीडियो व्यूज बढ़ाने के लिए बात को जानबूझकर हल्का बनाया जाता है, रवीश अपनी बात कहने के लिए जटिल तरीका चुनते हैं. उनकी उपमाएं आम आदमी के सिर के ऊपर से निकल जाएंगी, जिन्हें यह पता नहीं कि खालिद जावेद कौन हैं या उन्होंने यह कैसा उपन्यास लिखा है. मगर जिन्होंने पढ़ा है उन्हें भी कम से कम दो बार 14 मिनट के इस वीडियो को चलाकर इसे समझना होगा. लेकिन उसे जितना भी समझ में आए, वह यह जरूर सोचेगा कि राजनीति का अर्थ टीवी के पैनल डिस्कशन में बैठकर चीखना भर नहीं है, बल्कि वह जीवन के हर पहलू में शामिल है.

पत्रकारिता के शुरुआती दौर में बरेली में मेरे एक वरिष्ठ थे, जेके सिंह. साधारण घटनाओं को प्रस्तुत करने का उतना तरीका बहुत दिलचस्प था. वे साधारण जीवन में नाटकीयता खोज लेते थे और उसे अपनी रिपोर्टिंग में पिरो देते थे. एक बार बारिश में एक पेड़ सड़क के आरपार गिरा, किसी तरह उसकी डालियों को काटकर आने-जाने का रास्ता बनाया गया था. मगर तना अभी भी आधी सड़क को छेंके हुए था. उसे हटाने के लिए विभागों को चिट्ठियां लिखी गईं. यह तय ही नहीं हो पा रहा था कि यह किस विभाग की जिम्मेदारी है. फाइल एक विभाग से दूसरे विभाग में घूमती रही.

धीरे-धीरे कई महीने बीत गए. बरसात का मौसम फिर लौटा और तने में से हरी-हरी पत्तियां झांकने लगीं. जेके सिंह ने इसी पूरे प्रसंग पर एक रिपोर्ट लिखी, जिसका शीर्षक संभवतः कुछ ऐसा था, ‘ठूंठ में कोंपलें निकल आईं. मगर फाइल अभी भी घूम रही है’. मुझे जहां तक याद है कि इसे लिखने से पहले उन्होंने मुझसे कृशन चंदर की कहानी ‘जामुन का पेड़’ पर चर्चा की थी, जिसमें आंधी से गिरे पेड़ में दबा व्यक्ति इसी तरह की कागजी कार्यवाही के बीच दम तोड़ देता है. उन्होंने उस कहानी की काल्पनिक नाटकीयता को मौजूदा यथार्थ में पिरो दिया.

रवीश कुमार ने अपनी बात को कहने के लिए इसी तरह एक किस्सागोई से भरे रूपक का प्रयोग किया. यदि वे सीधे-सीधे बुलडोजर और न्याय व्यवस्था पर कुछ कहते तो शायद बात हल्की पड़ जाती. जब यथार्थ पर बात करना धीरे-धीरे अप्रासंगिक होता जाए तो हकीकत की व्याख्या के लिए रेटॉरिक या कल्पनाओं का सहारा लेना पड़ता है. मगर इस तरह के रूपक के लिए सपाट कथानक वाला या नारेबाजी से भरा साहित्य काम नहीं आएगा. वहां भी कुछ परतदार चाहिए. यह परतें सामाजिक आख्यानों की गहरी समझ से पैदा होती हैं.

गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं, “कवियों की बुद्धिमत्ता साधारण में असाधारण को देखना है. इसलिए यह एक ऐसा प्रश्न है जो मैं खुद से पूछता हूँ, कि जो लोग हजार रातों वाले आख्यान में उड़ने वाली कालीनों पर यकीन करते थे, वे क्यों न मानें कि उनके अपने गाँव में भी उड़ान भरी जाती रही होगी? मेरे गाँव में कालीन नहीं हैं, बल्कि चटाईयाँ हैं. इसलिए लोग चटाईयाँ उड़ाते हैं, और दूसरे अनोखे काम करते हैं, इनके बीच ही हम बड़े हुए और जीए. मुझे लगता है कि मैंने एक नई वास्तविकता का आविष्कार या निर्माण करने के बजाय उस वास्तविकता को खोजने का मन बना लिया था जिससे मैं जुड़ा हुआ था और जिसे मैं जानता था.”

साहित्यिक रचनाओं में ऐसी दृष्टि हो कि वह लंबे समय तक अपने पाठकों, अपने समाज और अपनी राजनीति को उद्वेलित कर सके और पत्रकारिता में ऐसी समझ हो कि वह साहित्यिक रचनाओं को अपने आसपास के घटनाक्रम, बदलती प्रवृतियों की पहचान करने का जरिया बना सके. रवीश कुमार की पत्रकारिता और ख़लिद जावेद का ‘नेमत ख़ाना’ दोनों ही इस मामले में दुर्लभ हैं, इस तरह के प्रयास का अनूठा उदाहरण हैं.

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