फर्क बस इतना है — पहले शराब के लिए पुरुष बेचारा था, अब वाइन ने स्त्री को भी बेचारा बना लिया… वह अब साथ बैठकर जाम से जाम लड़ा रही है…

प्रदीप चौधरी-
जिसने लिखा, उसे बाज़ार ने शाबाशी दी। जिसने पढ़ा, उसने मुस्कुरा कर बोतल उठाई। और जिस औरत के नाम पर यह सब हुआ, उसने शायद आज भी बच्चों की फीस, रसोई का खर्च और सास की दवा को जोड़-घटा कर देखा।
पर अब हालात बदल गए हैं — अब बीवी भी मायके नहीं जाती, वो यहीं आपके साथ रेड वाइन के जाम से जाम मिला रही है।
स्वतंत्रता का स्वाद, या बाज़ार का गिलास?
“रेड वाइन हृदय के लिए अच्छी है” — यह कथा कहाँ से आई?
यह कहानी शुरू हुई फ़्रांस से, जहाँ सैचुरेटेड फैट भरे आहार (मक्खन, चीज़, मांस) के बावजूद हृदय रोग अपेक्षाकृत कम पाए गए। तो वैज्ञानिकों ने सोचा — “कहीं ये रेड वाइन की वजह से तो नहीं?”
बस… विज्ञान से ज़्यादा, यह कल्पना का प्याला था — जिसमें रेज़वेराट्रॉल नाम का पॉलीफिनॉल मिलाया गया, और वाइन को औषधि घोषित कर दिया गया।
पर वहीं से विज्ञान ने खुद पलटी भी खाई:
बाद में पाया गया कि रेज़वेराट्रॉल अंगूर, मूँगफली, अनार, सेब, चाय तक में होता है। और यह भी कि वाइन से उतनी मात्रा नहीं मिलती जिससे चिकित्सा हो सके। बल्कि शराब की आदत से लीवर, हृदय, मस्तिष्क पर दीर्घकालिक असर होता है।
तो प्रश्न उठता है — अगर वही तत्व बिना विष के मिल सकता है, तो ज़हर को ही औषधि क्यूँ मानें?
आयुर्वेद क्या कहता है?
आयुर्वेद कहता है कि: “मात्रया हितं मेध्यं बल्यमोजःकरं रसम्”
यानी जो आहार मात्रा में संतुलित, बुद्धिवर्धक, बलदायक, और ओजवर्धक हो — वही श्रेष्ठ है।
अब बताइए — शराब इनमें से क्या है?
वह जो अग्नि को जलाती है, मन को भटकाती है, स्मृति को हर लेती है, और शरीर को सुखाकर छोड़ती है।
“मदात्ययं हि संतप्तं देहमालस्य संवृतम्।
शुष्कोष्णं रूक्षमन्नं च कफपित्तं च तर्पयेत्॥”
मद्य से उत्पन्न व्याधियाँ स्वयं बताती हैं कि वह औषधि नहीं, आत्मघाती स्वाद है।
स्त्रियाँ और शराब — एक विशेष दृष्टिकोण
आयुर्वेद के अनुसार:
- स्त्री शरीर – उष्ण, स्निग्ध, आग्नेय होता है।
- पुरुष शरीर – शीत, स्निग्ध लेकिन फिर भी आग्नेय होता है।
अब शराब जो खुद उष्ण और तीव्र है, जब उष्ण शरीर में जाएगी, तो ज़्यादा नुकसान करेगी।
आधुनिक विज्ञान भी यही कहता है:
- महिलाओं में ADH (Alcohol Dehydrogenase) कम होता है,
- शरीर में जल की मात्रा कम होती है — शराब जल्दी रक्त में घुलती है,
- हार्मोनल उतार-चढ़ाव शराब के असर को और असंतुलित करते हैं।
और हाँ, अब वो सिर्फ़ पुरुषों की बीमारी नहीं रही। महिलाएँ भी अब बराबरी कर रही हैं — शराब में भी, स्किन डिज़ऑर्डर में भी, लिवर फेल्योर में भी।
आख़िर बाज़ार चाहता क्या है?
बाज़ार एक मनोचिकित्सक की तरह आपको जानता है —
- आपको गिल्ट में बेचता है,
- आपको स्वैग में लपेटता है,
- आपके भावनात्मक खालीपन को एक ग्लास में भरकर परोसता है।
फर्क बस इतना है — पहले पुरुष बेचारा था, अब स्त्री को भी बेचारा बना लिया।
तो क्या करें?
आपके अंदर का तर्कवादी पूछे — “पर पॉलीफिनॉल तो हैं न इसमें?”
तो आप मुस्कुराकर कहिए —
“रेज़वेराट्रॉल नहीं, विषय-वेराट्रॉल है ये। अंगूर खाइए, अनार खाइए — लेकिन उस प्याले से बचिए जो यादें नहीं, व्यक्तित्व तक मिटा देता है।
“जो रस, बल, ओज और स्मृति दे — वही ‘रस’ है।
बाकी सब मोह है, बाज़ार है — और भ्रम का वास।”
“बीवी मायके गई” — तो एक प्याला जीवन का बनाइए, जिसमें स्मृति हो, स्पष्टता हो, संयम हो।
बाक़ी जो बनता है — वो शरीर नहीं, बाज़ार के लिए बनता है।


