विश्व दीपक-
भारत के इतिहास में अगर सबसे असफल विदेश मंत्रियों की लिस्ट बनेगी तो उनमें एस जयशंकर का नाम सबसे ऊपर आएगा. कोई नहीं समझ पाया कि मोदी जी ने जयशंकर को 2019 में विदेश मंत्री बनाया ही क्यों था?
आज जबकि ईरान के चाबार पोर्ट से भारत को 120 मिलियन डॉलर खर्च करके भी भागना पड़ा – मैं पूछना चाहता हूं कि भारत का विदेश मंत्री कर क्या रहा है? उसकी कोई जिम्मेदारी है या नहीं? या सिर्फ सूट पहनकर मीडिया के सामने हार्ड-टॉक करना ही उनका काम रह गया है? प्रधानमंत्री न सही, विदेश मंत्री तो कुछ बोल सकता है. वह क्यों नहीं बोल रहा?
अमरीका ने भारतीयों को हथकड़ी पहनाकर भेजा. ट्रंप रोज भारत की बैंड बजाता है. भारत ने क्या किया?
- चीन लद्दाख में घुस गया – जयशंकर कुछ नहीं कर सके
- श्रीलंका में तख्तापलट हुआ – हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे
- नेपाल में तख्तापलट हुआ – शायद उनको खबर ही नहीं लगी
- बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ बगावत हो गई – भारत मुंह ताकता रह गया
जयशंकर ने पिछले पांच सालों में ऐसा क्या किया है जिससे भारत की विदेश नीति सुदृढ़ हुई हो या दुनिया में भारत की छवि मजबूत हुई हो?
हनुमान जी के लंका कांड को आज के दौर में डिप्लोमेसी की मास्टर क्लास बताने वाले एस जयशंकर को मोदी के विरोधी, उनकी ही पार्टी के लोग अमरीकन डीप स्टेट का प्लांट कहते हैं. उनका बेटा अमरीका में ही रहता है. उनकी पत्नी जापान की हैं. जापान – एक तरह से अमरीका का ही विस्तार है.
सोनिया गांधी की देशभक्ति पर सवाल उठाने वाली भक्त मंडली जयशंकर के मामले में चुप हो जाती है क्यों?
सुब्रमण्यम स्वामी ने उनके बारे में जो कहा है उसको दोहराना नहीं चाहता लेकिन जिस तरह से अमरीका भारत को कमजोर कर रहा है उससे यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार कहीं न कहीं, किसी न किसी वजह से कंप्रोमाइज्ड है.
ऐसी क्या वजह है कि अमरीका आंंख दिखाता है और मोदी सरकार घुटनों पर बैठ जाती है. चाहे ऑपरेशन सिंदूर का मामला हो या चाबार पोर्ट से बाहर निकलने की बात हो. ऐसा प्रतीत होता है जैसे मोदी सरकार ने भारत की संप्रभुता को गिरवी रख दिया हो.
सवाल है कि एस जयशंकर की आंखों से लाल लेज़र कब निकलेगा?भारत की दृष्टि पीली पड़ चुकी है. मोदी जी और भारतीय जनता पार्टी के शुभचिंतको को जयशंकर पर निगाह रखनी चाहिए.
एसएम कृष्णा विदेश मंत्री थे. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री. हालांकि अभी स्वर बहुत स्पष्ट नहीं थे लेकिन वातवरण में सत्ता विरोधी आंदोलन की सुगबुगाहट सुनाई पड़ने लगी थी.
माह-फरवरी, 2011 का साल था. कृष्णा संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में भाषण देने गये. धोखे से उन्होंने पुर्तगाल के विदेश मंत्री का भाषण पढ़ दिया. वजह? पुर्तगाल के विदेश मंत्री का भाषण ठीक उनके पहले हुआ था. कागज वहीं पड़ा था. कृष्णा ने ध्यान नहीं दिया, पढ़ दिया.
हरदीप सिंह पूरी उस वक्त यूएन में बाबू थे.उन्होंने दौड़कर कृष्णा को भारत वाले भाषण की कॉपी दी. फिर कृष्णा ने भाषण पढ़ा.
यहां भारत में तहलका मच गया. मीडिया ने कृष्णा के साथ साथ मनमोहन सरकार की भी बैंड बजा दी. बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद और वेंकैया नायडू ने कहा कृष्णा ने भारत की बेइज्जती करवाई है. उनको पद में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं.
मोदी जी ने भी कृष्णा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने मर्दवादी तरीके से कृष्णा की लानत-मलानत की. उन्होंने कहा – मित्रों अगर मैं यहां पुरुषों के बीच महिलाओं का भाषण पढ़ दूं तो आप कहेंगे कि मोदी जी को क्या हो गया. उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिये होता है क्योंकि गवर्नेंस पर किसी का ध्यान ही नहीं.
आज उन्हीं मोदी जी के विदेश मंत्री एस जयशंकर गल्ती पर गल्ती कर रहे हैं. कृष्णा जी ने तो धोखे से दूसरे का भाषण पढ़ा था यहां तो जानबूझकर देश के सामने झूठ परोसा जा रहा है.
विश्वमंच पर भारत की लगातार हो रही बेइज्जती की जिम्मेदारी क्या एस जयशंकर की नहीं है? क्या उन्हें अपने पद पर बने रहने का हक है? आज का मीडिया सवाल करना भूल चुका है. जब सवाल ही नहीं करते तो फिर जिम्मेदारी तय करने की बात कौन करेगा?
हां, एक बात और. जिस वक्त भारत चाबार पोर्ट से भाग रहा था, वेबसाइट डिलीट की जा रही थी विदेश मंत्रालय ओबरॉय होटल में पत्रकारों की पार्टी करवा रहा था.



