कभी-कभी पत्रकारिता की डिग्री में आग लगाकर इसे जलते देखने की तमन्ना होती है

अपने हाथों मीडिया लिख रहा अपना मृत्युलेख….. देश के प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला पत्रकारिता आज खुद की साख पर सवाल खड़ा कर बैठा है. प्रलोभन और टीआरपी की भागदौड़ ने पत्रकारिता का उद्देश्य निरर्थक कर दिया है. आज पत्रकारिता का हाल कुछ यूँ हो गया है कि लोगों ने प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ से कन्नी काटना शुरू कर दिया.

कल तक जिस पेशे पर लोग आँख मूँद कर भरोसा कर लिया करते थे, उसे ही आज बीच भरे चौराहे में गाली बक़ी जाती है. गाली देना भी कुछ हद तक लाजमी है, क्योंकि जिस मीडिया ने सरोकार, सच्चाई दिखाने का ठेका ले रखा था, आज उसी ने टीआरपी और प्रलोभन के झांसे में पड़कर अपने महत्व को निरर्थक कर दिया है. मैं अपनी बात करूँ तो मैंने भी पूरी शिद्दत से इस पेशे को अपनाया था, लेकिन पत्रकारिता की स्थिति देख अब यूँ लगता है मानो पत्रकारिता की डिग्री फाड़कर मैं दूर खड़े होकर इसे जलते देखूं.

प्रलोभन टीआरपी ही बस नहीं बल्कि कुछ और भी आपराधिक तत्व हैं जिसने मीडिया को अपने पैरों की जूती बनाकर छोड़ दिया है। आज आलम कुछ यूँ है कि मीडिया संस्थान आज गुंडों और सत्ताधारियों के चमचे बन गए हैं. चारों तरफ झूठ के पुलिंदे बनाये जा रहे हैं. असलियत की खबर को मसाला बनाकर लोगों के बीच परोसा जाता है. अक्सर सुनता हूँ कि परिवारवाद की परिभाषा का जीता जागता सबूत भारतीय फिल्म इंडस्ट्री और कांग्रेस पार्टी है, लेकिन सच्चाई इतनी ही नहीं है.

परिवारवाद देखना हो तो मीडिया में भी बड़े ही आसानी से देखा जा सकता है. लेकिन मीडिया में परिवारवाद की परिभाषा रिफरेन्स के रूप में दिखाई देता है. किस मीडिया संस्थान में नौकरी के अवसर हैं इस बात का पता लग पाना भी पूरी तरह असंभव है. इसकी वजह है कि आपका मीडिया संस्थान में उपयुक्त रिफरेन्स होना जरूरी है. अगर आपका कोई रिफरेन्स है तो आपको चुटकी बजाते ही नौकरी की जानकारी और नौकरी दोनों ही समय समय पर मिलती रहेगी.

लेखक सचिन मिश्रा युवा पत्रकार हैं. हरिभूमि अखबार और न्यूज वल्ड इंडिया चैनल में काम कर चुके हैं.

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Comments on “कभी-कभी पत्रकारिता की डिग्री में आग लगाकर इसे जलते देखने की तमन्ना होती है

  • Raj Alok Sinha says:

    बिल्कुल सही टिप्पणी की है सचिन मिश्रा जी ने. आज स्थिति बहुत ही खराब है. मीडिया की पहचान शब्दों व लेखनी से होती थी, लेकिन आज यहां शब्द बेमानी होने लगे हैं. अस्सी फीसदी मीडिया पूंजीपतियों के हाथ में है. संपादकीय.विभाग में नौकरी करने के लिए योग्यता कोई मानक नहीं है. यही कारण है कि कई लीडिंग अखबारों के संपादकीय में भी व्याकरण की कई गलतियां आज आम है. इसपर किसी का ध्यान नहीं है. आज व्याकरण से ज्यादा महत्वपूर्ण है पेज मेकिंग की जानकारी.

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