खुद को पत्रकार बताने में अब ज़बान लड़खड़ाने लगती है!

यूं तो दोस्तों और हमउम्र के जानने वालों के ज़रिए जब यह सवाल पूछा जाता है कि ‘क्या करते हो’ तो मज़दूरी करते हैं जैसे तमाम हल्के जवाबों से उनके सवालों को टाल देता हूं। लेकिन यही सवाल कोई बड़ा (उम्र में), रिश्तेदार, घर में आए मेहमान करते हैं तो ज़बान लड़खड़ाने लगती है, यह …

अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के लिए कुशाभाऊ पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने ये कैसा टॉपिक रख दिया!

Yashwant Singh : देश में बहुत जोर जोर से बिकास होई रहा है बे। जो ससुरा खिलाफ बोलेगा उ अर्बन टर्बन नक्सल होगा। भामाकीजै बोलो। और, लौंडों लौंडियों को ऐसा मीडिया कोर्स पढ़ाओ कि ऊ राम से शुरू हों, अगरबत्ती जला के और हनुमान पर खत्म। सारे न्यूज़ चैनल को भक्ति चैनल में बदल दो। …

कभी-कभी पत्रकारिता की डिग्री में आग लगाकर इसे जलते देखने की तमन्ना होती है

अपने हाथों मीडिया लिख रहा अपना मृत्युलेख….. देश के प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला पत्रकारिता आज खुद की साख पर सवाल खड़ा कर बैठा है. प्रलोभन और टीआरपी की भागदौड़ ने पत्रकारिता का उद्देश्य निरर्थक कर दिया है. आज पत्रकारिता का हाल कुछ यूँ हो गया है कि लोगों ने प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ से कन्नी काटना शुरू कर दिया.

कभी-कभी दिल करता है, पत्रकारिता की ये डिग्री फाड़ कर फेक दूं…

Kavish Aziz Lenin : कभी कभी दिल करता है डिग्री फाड़ के फेक दूं…  पता नहीं, जर्नलिज्म में ही डिग्री की वैल्यू नहीं है या फिर और भी फील्ड में ये हाल है… जब बिना डिग्री के आदमी जर्नलिस्ट बन सकता है तो प्रोफेशनल एजुकेशन के नाम पर सभी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट को मास कॉम की क्लासेज बंद कर देना चाहिए… हम स्क्रिप्ट लिखना सीखते हैं, फोटोग्राफी सीखते है, voice over देना सीखते हैं, masthead से लेकर slug तक की जानकारी सीख कर आते है, tripod उठाना, लगाना, आर्टिकल लिखना ये सब कुछ सीखने के लिए ढाई तीन लाख रुपये के साथ साथ ज़िन्दगी के 3 साल खर्च करते हैं और हाथ लगता है बाबा जी का ठुल्लू…

मीडिया स्टूडेंट की गुहार-रिफरेंस और संपर्क से मीडिया संस्थानों में भर्ती बंद करें

Hello! I am a media student. After completing my college, i have come to know that media organisations only want the experience persons but we freshers wont even provide any opportunity  to prove ourselves. Some of media organizations have vacancies but they only select those people who are in their contact, who do compromize, who have references… etc. There are many other reasons too.

जी ग्रुप के मीडिया स्कूल से पढ़े एक छात्र की आपबीती सुनिए

मैं चिन्मॉय सरकार, वेस्ट बंगाल के मालदा ज़िले के कालियाचक से हूँ. बंगाली मीडियम स्कूल से पढ़ा हूं. बंगाल के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूं. पत्रकारिता को पेशा बनाऊंगा, ये सपना स्कूल में पढ़ते समय से ही देखता था. न्यूज़ के साथ जुड़ाव था तो टीवी रेगुलर देखता था. एक दिन Zee News में एक टीवी विज्ञापन देखा कि “अगर आप पत्रकारिता के क्षेत्र में बनाना चाहते है पहचान तो देश के प्रतिष्ठित मीडिया हॉउस Zee Media के Zee Institute Of Media & Arts (ZIMA) कुछ चुनिंदा बच्चों को दे रहा है मौका… जल्द अप्लाई करें, आसन संख्या सीमित है.”

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के मुताबिक भीख से चलते हैं मीडिया संस्थान!

रायपुर : काठाडीह स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि एक बार फिर अपनी हरकतों से सुर्खियों में हैं। इस बार वजह बना है एक प्रश्नपत्र। MSC इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग के थर्ड सेमेस्टर के क्वेश्चन् पेपर के सवाल नम्बर 5 में विवि ने पूछा है कि मीडिया संस्थान के लिए धन की व्यवस्था कैसे होती है? और जवाब के विकल्प में भीख और दान जैसे शब्द शामिल हैं। आपको बता दें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पूर्व विभागाध्यक्ष नरेंद्र त्रिपाठी भी अपने चहेते छात्रों की फर्जी अटेंडेंस लगवाते कैमरे में कैद हुये थे जिसे न केवल खबर बनने से रोका गया बल्कि एक छात्र को गैर क़ानूनी तरीके से बिना कारण बताये मुख्य परीक्षा से वंचित भी कर दिया गया।

दसवीं पास हैं तो तीन महीने में पत्रकार बनें!

जी हां. ये दावा है एक विज्ञापन का. विज्ञापन में बताया गया है कि उन्हें तीन महीने में क्या क्या सिखाया जाएगा ताकि पत्रकार बन सकें. साथ ही पांच सौ रुपये अलग से देने पर उन्हें क्या अलग ज्ञान दिया जाएगा. सोचिए. दसवीं पास अगर तीन महीने की ट्रेनिंग के बाद पत्रकार बन गया तो वह क्या देश समाज को दिशा देगा और सच्चाई को क्या कितना समझ पाएगा. जिनको खुद अपने ज्ञान को अपडेट करने की जरूरत है, वही जब पत्रकार बनकर सही गलत का फैसला करेंगे तो जाहिर तौर पर उनका दकियानूसी माइंडसेट आम जन और समाज का बहुत नुकसान करेगा. दसवीं पास पत्रकार बनने का यह विज्ञापन आजकल सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है और लोग पत्रकारिता के गर्त में गिरने को लेकर चिंता जता रहे हैं.