अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी के लिए कुशाभाऊ पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने ये कैसा टॉपिक रख दिया!

Yashwant Singh : देश में बहुत जोर जोर से बिकास होई रहा है बे। जो ससुरा खिलाफ बोलेगा उ अर्बन टर्बन नक्सल होगा। भामाकीजै बोलो। और, लौंडों लौंडियों को ऐसा मीडिया कोर्स पढ़ाओ कि ऊ राम से शुरू हों, अगरबत्ती जला के और हनुमान पर खत्म। सारे न्यूज़ चैनल को भक्ति चैनल में बदल दो। Continue reading

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कभी-कभी पत्रकारिता की डिग्री में आग लगाकर इसे जलते देखने की तमन्ना होती है

अपने हाथों मीडिया लिख रहा अपना मृत्युलेख….. देश के प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला पत्रकारिता आज खुद की साख पर सवाल खड़ा कर बैठा है. प्रलोभन और टीआरपी की भागदौड़ ने पत्रकारिता का उद्देश्य निरर्थक कर दिया है. आज पत्रकारिता का हाल कुछ यूँ हो गया है कि लोगों ने प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ से कन्नी काटना शुरू कर दिया.

कल तक जिस पेशे पर लोग आँख मूँद कर भरोसा कर लिया करते थे, उसे ही आज बीच भरे चौराहे में गाली बक़ी जाती है. गाली देना भी कुछ हद तक लाजमी है, क्योंकि जिस मीडिया ने सरोकार, सच्चाई दिखाने का ठेका ले रखा था, आज उसी ने टीआरपी और प्रलोभन के झांसे में पड़कर अपने महत्व को निरर्थक कर दिया है. मैं अपनी बात करूँ तो मैंने भी पूरी शिद्दत से इस पेशे को अपनाया था, लेकिन पत्रकारिता की स्थिति देख अब यूँ लगता है मानो पत्रकारिता की डिग्री फाड़कर मैं दूर खड़े होकर इसे जलते देखूं.

प्रलोभन टीआरपी ही बस नहीं बल्कि कुछ और भी आपराधिक तत्व हैं जिसने मीडिया को अपने पैरों की जूती बनाकर छोड़ दिया है। आज आलम कुछ यूँ है कि मीडिया संस्थान आज गुंडों और सत्ताधारियों के चमचे बन गए हैं. चारों तरफ झूठ के पुलिंदे बनाये जा रहे हैं. असलियत की खबर को मसाला बनाकर लोगों के बीच परोसा जाता है. अक्सर सुनता हूँ कि परिवारवाद की परिभाषा का जीता जागता सबूत भारतीय फिल्म इंडस्ट्री और कांग्रेस पार्टी है, लेकिन सच्चाई इतनी ही नहीं है.

परिवारवाद देखना हो तो मीडिया में भी बड़े ही आसानी से देखा जा सकता है. लेकिन मीडिया में परिवारवाद की परिभाषा रिफरेन्स के रूप में दिखाई देता है. किस मीडिया संस्थान में नौकरी के अवसर हैं इस बात का पता लग पाना भी पूरी तरह असंभव है. इसकी वजह है कि आपका मीडिया संस्थान में उपयुक्त रिफरेन्स होना जरूरी है. अगर आपका कोई रिफरेन्स है तो आपको चुटकी बजाते ही नौकरी की जानकारी और नौकरी दोनों ही समय समय पर मिलती रहेगी.

लेखक सचिन मिश्रा युवा पत्रकार हैं. हरिभूमि अखबार और न्यूज वल्ड इंडिया चैनल में काम कर चुके हैं.

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कभी-कभी दिल करता है, पत्रकारिता की ये डिग्री फाड़ कर फेक दूं…

Kavish Aziz Lenin : कभी कभी दिल करता है डिग्री फाड़ के फेक दूं…  पता नहीं, जर्नलिज्म में ही डिग्री की वैल्यू नहीं है या फिर और भी फील्ड में ये हाल है… जब बिना डिग्री के आदमी जर्नलिस्ट बन सकता है तो प्रोफेशनल एजुकेशन के नाम पर सभी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट को मास कॉम की क्लासेज बंद कर देना चाहिए… हम स्क्रिप्ट लिखना सीखते हैं, फोटोग्राफी सीखते है, voice over देना सीखते हैं, masthead से लेकर slug तक की जानकारी सीख कर आते है, tripod उठाना, लगाना, आर्टिकल लिखना ये सब कुछ सीखने के लिए ढाई तीन लाख रुपये के साथ साथ ज़िन्दगी के 3 साल खर्च करते हैं और हाथ लगता है बाबा जी का ठुल्लू…

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब कमज़ोर नहीं, गिर चुका है। यहां डिग्री लेकर नौकरी करने वालों की ज़रूरत नहीं है. किसी भी आम आदमी को जिसको लिखना पढ़ना भी न आता हो, 5000 रुपये देकर काम कराइये. अखबार के पन्ने यूँ ही भरवाईये, इक्का दुक्का पढ़े लिखों को रखिये ताकि करेक्शन कर सकें… कितने पढ़े लिखे पत्रकार हैं जिनकी मान्यता है, उसकी काउंटिंग भी कराइये… पुराने लोगों की कोई बात नहीं क्योंकि तब ये डिग्री हर जगह दी भी नहीं जाती थी लेकिन आज के दौर में जब जर्नलिस्ट बनने के लिए आपको क्लासेज लेना जरूरी हो चुका है, ऐसे में इन डिग्री धारकों को नज़रंदाज़ करना गलत है…  पत्रकारों के पकौड़े बेचने के दिन करीब आ रहे..

फोटो जर्नलिस्ट कविश अज़ीज़ लेनिन की एफबी वॉल से.

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मीडिया स्टूडेंट की गुहार-रिफरेंस और संपर्क से मीडिया संस्थानों में भर्ती बंद करें

Hello! I am a media student. After completing my college, i have come to know that media organisations only want the experience persons but we freshers wont even provide any opportunity  to prove ourselves. Some of media organizations have vacancies but they only select those people who are in their contact, who do compromize, who have references… etc. There are many other reasons too.

I have only only one questions to all media organizations arn’t we freshers are capable to get a chance in good organizations? Just give us a chance n we will never let ur organization down. Stop the selection procedure through contacts  and references. Give primary priority to our talants. Yes you can go through your organization rules but please provide us platform so that we give better results to ur organization.

Deepali

deepalisweet04@gmail.com

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जी ग्रुप के मीडिया स्कूल से पढ़े एक छात्र की आपबीती सुनिए

मैं चिन्मॉय सरकार, वेस्ट बंगाल के मालदा ज़िले के कालियाचक से हूँ. बंगाली मीडियम स्कूल से पढ़ा हूं. बंगाल के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूं. पत्रकारिता को पेशा बनाऊंगा, ये सपना स्कूल में पढ़ते समय से ही देखता था. न्यूज़ के साथ जुड़ाव था तो टीवी रेगुलर देखता था. एक दिन Zee News में एक टीवी विज्ञापन देखा कि “अगर आप पत्रकारिता के क्षेत्र में बनाना चाहते है पहचान तो देश के प्रतिष्ठित मीडिया हॉउस Zee Media के Zee Institute Of Media & Arts (ZIMA) कुछ चुनिंदा बच्चों को दे रहा है मौका… जल्द अप्लाई करें, आसन संख्या सीमित है.”

उस विज्ञापन में सुधीर चौधरी और दिलीप तिवारी (Zee MP CG के एडिटर) का फोटो भी दिखाया जा रहा था. Zee News का लोगो बार बार फ्लैश किया जा रहा था. ये टीवी विज्ञापन देखने के बाद एक मेल किया तो अगले दिन कॉल आई. इसमें कहा गया कि मैं Zee News से बोल रहीं हूँ, क्या आप यहाँ अप्लाई करना चाहते है? इसके बाद इनके जो भी Entrance Exam, interview था, वो पूरा करके एक साल के TV Journalism कोर्स में दाखिला लिया. कोर्स फीस है 2 लाख 87 हज़ार रुपये. मेरे लिए ये कोर्स फ़ीस बहुत ही ज्यादा था. बावजूद इसके सपने पूरे करने के लिए मोटे ब्याज दर पर पर्सनल लोन लेकर फीस भर दिया. उस टाइम ही मैंने पचासों बार पूछ लिया था कि प्लेसमेन्ट कंफर्म होगा न. तब इनके तरफ से भरोसा दिया गया था कि हमारे लगभग 9/10 न्यूज़ चैनल है इसलिए हम 100% प्लेसमेंट करा देंगे.

क्लास स्टार्ट होते ही हमारे साथ धोखा शुरू हो गया था… एक दिन के लिए भी न रिपोर्टिंग की क्लास हुई न एंकरिंग की… बस हर दिन बैठ के ही टाइम निकल जाता था.. जब हमने क्लास के लिए कहा तो जवाब मिला कि इसके लिए HR वालों को मेल किये हैं, वो भेजेंगे… आगे ये भी कहा गया कि मीडिया में किसी के पास टाइम नहीं है, कोई मिल ही नहीं रहा है क्लास लेने के लिए… साल भर में कुल 5/7 वीडियो एडिटिंग की थ्योरी और कैमरा के प्रैक्टिकल क्लास हुए हैं… रोचक कहानी तो ये कि कोर्स शुरू होने के छह महीने बाद एक दिन सुधीर चौधरी और अगले दिन रोहित सरदाना को बुलाकर इंट्रोड्यूस किया गया और क्लास में जमकर फोटो सेशन चला…

बाद में पता चला कि ये तो बस प्रमोशन के लिए था जिसे फेसबुक और वेबसाइट में अपडेट किया गया है ताकि बाकी लुभाने के लिए देश भर के बच्चों को ये बोला जाए कि हमारे यहां सुधीर और रोहित जी क्लास लेते हैं… इसके बाद इन दोनों में से एक दिन भी कोई नहीं आया… बीच बीच में एकाध दिन किसी किसी को बुलाकर जमकर फोटो ली जाती थी हमारे साथ… एक बड़ा फ़्रॉड काम हमसे करवा लिया है Zee Media ने… मेरे और बाकी तीन दोस्तों से एक एक कर चार टीवी एड शूट करवा लिया जिसमें हमें ये कहने के लिए कहा गया कि हम यहां से पढ़के प्रैक्टिकल सब कुछ सीख के Zee Media में जॉब कर रहे हैं, आप भी एडमिशन लीजिये… मुझे बांग्ला में कहने के लिए कहा गया था ताकि ये बंगला चैनल Zee 24Ghanta में चला सकें… ये एड On Air भी किया गया है… ये सब कोर्स के बीच में ही करा लिया गया… तब इंटर्नशिप भी नहीं शुरू हुया था… इसके बाद जब इंटर्नशिप शुरू हुआ तो हमने सोचा कि हम यहाँ रिपोर्टिंग सीखेंगे… लेकिन हमें ये नही पता था कि हमारे नसीब में तो बस बाइट काटना और प्रिंट लेना ही सीखना मंजूर था… न हमे कुछ क्लासेस के दौरान कुछ सीखने को मिला, न और कहीं…

असली परेशानी तब शुरू हुई जब जब कोर्स ख़त्म हुया और हमने इनसे प्लेसमेंट के लिए कहा… पिछले तीन महीने से मैं ZIMA यानि Zee Institute Of Media & Arts वालों का चक्कर लगा रहा हूं… हर दिन मुझे ये कहा जा रहा है कि हमने Zee News के HR को मेल कर दिया है, देखो हो जाएगा, वेट करो। ऐसा भी वाकया हुआ कि हमारे एक सहपाठी को सिक्योरिटी गार्ड को बुलाकर धक्का मार के निकाल दिया गया था। ग़लती बस ये थी कि इसने ZIMA वालों से प्लेसमेंट के लिए पूछ लिया था। जॉब मिलना न मिलना अलग बात, लेकिन इन्होंने किसी को intervew के लिए भी Zee Media या अन्य किसी चैनल में HR के पास नहीं भेजा। बस पैसा हड़प लिया।

मेरे बाकी सहपाठी यहाँ से थक हार कर चले गए हैं। बस मैं अकेला चक्कर काट रहा हूँ। मैं घर भी नहीं जा सकता क्योंकि मोटे ब्याज दर में लोन है मेरा। अब इतना सारा पैसा कैसे लौटाऊंगा, ये सोचकर मैं और मेरे परिवार वाले परेशान हैं। बेरोजगार तो हूँ ही, ऊपर से दिल्ली में रहने का इतना खर्च। ये लोग मुझे तीन महीने से बस घुमा रहे हैं। क्या करूँ, कुछ समझ में भी नहीं आ रहा है। इस झूठ के लिए हमने एस्सेल ग्रुप के अध्यक्ष सुभाष चंद्र जी से बहुत बार संपर्क करने की कोशिश की है लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगी है। बहुत बार मेल करने के बाद भी कोई रिप्लाई नहीं आया है।

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कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के मुताबिक भीख से चलते हैं मीडिया संस्थान!

रायपुर : काठाडीह स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि एक बार फिर अपनी हरकतों से सुर्खियों में हैं। इस बार वजह बना है एक प्रश्नपत्र। MSC इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग के थर्ड सेमेस्टर के क्वेश्चन् पेपर के सवाल नम्बर 5 में विवि ने पूछा है कि मीडिया संस्थान के लिए धन की व्यवस्था कैसे होती है? और जवाब के विकल्प में भीख और दान जैसे शब्द शामिल हैं। आपको बता दें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पूर्व विभागाध्यक्ष नरेंद्र त्रिपाठी भी अपने चहेते छात्रों की फर्जी अटेंडेंस लगवाते कैमरे में कैद हुये थे जिसे न केवल खबर बनने से रोका गया बल्कि एक छात्र को गैर क़ानूनी तरीके से बिना कारण बताये मुख्य परीक्षा से वंचित भी कर दिया गया।

यह मामला उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमप्रकाश पांडे से लेकर शिक्षा विभाग और राज्यपाल तक पहुंचा लेकिन राजनीतिक ताकत के आगे छात्र की गुहार ने दम तोड़ दिया। और दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई जिसके बाद छात्र ने कोर्ट की शरण ली है। अब सवाल यह उठता है कि पत्रकार बनाने वाला एक तथाकथित पत्रकारिता विवि क्या इस तरह पत्रकार तैयार करेगा? या विवि की आड़ में सिर्फ शिक्षा की दलाली चल रही है? वो दलाली जो पूर्व वीसी सच्चिदानंद जोशी के समय से शुरु हुई।

बहरहाल प्रश्नपत्र में ऐसा सवाल देखकर छात्र संघटन NSUI ने इस पर कड़ा आक्रोश व्यक्त किया है। छात्र नेता हनी सिंह बग्गा ने इसे मीडिया संस्थानों की छवि से खिलवाड़ बताते हुये प्रश्नपत्र की छवि कई मीडिया संस्थानों को भेजी लेकिन विवि ने कई पत्रकारों को बड़े कोर्सेस में दाखिल दे रखा है, जिसके बदले वे विवि की ऐसी खबरें प्रकाशित होने से रोकते हैं। आपको बता दें कि नेताओं के विशेष संरक्षण में चलने वाला यह विवि आये दिन किसी न किसी स्कैंडल को अंजाम देता रहता है। यही वजह है कि विवि की छवि तार-तार हो चुकी है और इसने बेहद कम समय में बदनामी की दौड़ में खुद को काफी आगे पहुंचा लिया है।

स्टाफ से लेकर कुलपति तक कोई पाक साफ़ नहीं…

विवि के पूर्व कुलपति सच्चिदानंद जोशी ने अपने कार्यकाल में अपने पद का सिर्फ नाजायज फायदा उठाया। उसके राज में छात्रों की आवाज दबा दी जाती थी। ऐसे भी हालात बने कि कोई छात्र आत्महत्या करने तक मजबूर हुआ तो किसी ने प्रशासन के खिलाफ कोर्ट में केस दर्ज किया। इतना ही नहीं भ्रष्ट कुलपति को देख स्टाफ भी खुलकर मनमानी करता था। क्लास में पढ़ाई कराने की बजाय छात्रों से गाने गवाये जाते थे। यही वजह है कि जोशी के जाते ही छात्रों को लगा अब उनके भविष्य से खिलवाड़ बन्द हो जायेगा लेकिन हाल वही ढ़ाक के तीन पात।

कभी डिग्री फर्जी तो कभी पैसा लेकर एग्जाम में पास किये छात्र…

विवि के शिक्षकों के कारनामों की बात करें तो कई प्रोफेसर ऐसे हैं जिनकी डिग्री और नियुक्ति सन्देह के घेरे में है। कुछ तो कोर्ट के डर से तड़ीपार हुये घूम रहे हैं। इन सबके बीच पेपर में पास कराने के बदले पैसे मांगते बाबू का स्टिंग भी सामने आया लेकिन वह भी सिर्फ एक खबर बनकर रह गया। ऐसा नहीं कि प्रबन्धन के खिलाफ शिकायतें नहीं हुई लेकिन कान में बत्ती डालकर बैठे नेताओं तक पीड़ितों की आवाज पहुंचती नहीं।

आशीष कुमार चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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दसवीं पास हैं तो तीन महीने में पत्रकार बनें!

जी हां. ये दावा है एक विज्ञापन का. विज्ञापन में बताया गया है कि उन्हें तीन महीने में क्या क्या सिखाया जाएगा ताकि पत्रकार बन सकें. साथ ही पांच सौ रुपये अलग से देने पर उन्हें क्या अलग ज्ञान दिया जाएगा. सोचिए. दसवीं पास अगर तीन महीने की ट्रेनिंग के बाद पत्रकार बन गया तो वह क्या देश समाज को दिशा देगा और सच्चाई को क्या कितना समझ पाएगा. जिनको खुद अपने ज्ञान को अपडेट करने की जरूरत है, वही जब पत्रकार बनकर सही गलत का फैसला करेंगे तो जाहिर तौर पर उनका दकियानूसी माइंडसेट आम जन और समाज का बहुत नुकसान करेगा. दसवीं पास पत्रकार बनने का यह विज्ञापन आजकल सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है और लोग पत्रकारिता के गर्त में गिरने को लेकर चिंता जता रहे हैं.

असल में पत्रकारिता शिक्षा के नाम पर इन दिनों हर कोई अपनी जेब भर रहा है. लुट रहे हैं आम घरों के नौजवान जो मीडिया के ग्लैमर के चक्कर में गली गली खुले संस्थानों के प्रलोभनों दावों वायदों में फंस कर लाखों रुपये गंवा बैठते हैं और बाद में दर दर भटकने को मजबूर हो जाते हैं. कोई छोटा न्यूज चैनल हो या बड़ा, कोई छोटा अखबार हो या बड़ा, सब के सब मीडिया स्कूल चला रहे हैं और बच्चों को फंसाकर उनका पैसा, समय और जीवन बर्बाद कर रहे हैं. इसी तर्ज पर अब कमाई के चक्कर में कुछ ऐसे धंधेबाज आ गए हैं जो दसवीं पास को पत्रकार बनाने लगे हैं.

अभी तो गनीमत है कि ये दसवीं पास को पत्रकार बनाने का दावा कर रहे हैं. कल को कुछ लोग दसवीं फेल, आठवीं फेल को पत्रकार बनाने का दावा लेकर आ सकते हैं और लोग धड़ल्ले से पैसे देकर पत्रकार बनने के लिए लालायित भी हो जाएंगे. गांवों से लेकर शहरों तक के युवाओं को ये लगता है कि अगर वे पत्रकार बन गए और उन्हें पत्रकार होने का कार्ड मिल गया तो बड़े आराम से पुलिस ले लेकर अफसर नेता मंत्री सबसे मिल लेंगे और गाड़ी पर प्रेस लिखाकर खुद को पत्रकार कहते हुए भीड़ में अलग दिखेंगे व कई तरह के लाभ हासिल कर लेंगे. ऐसे छोटे मोटे प्रलोभनों के कारण मीडिया स्कूल की ढेर सारी दुकानें खुल रही हैं जिसमें प्रेस कार्ड बेचा जा रहा है.

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