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मध्य प्रदेश

सागर में पत्रकारों के आंदोलन का 14वां दिन, हठधर्मी अफसरों के खिलाफ चक्का जाम

सागर | पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन जब पत्रकारों को खुद अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़े, तो यह स्थिति वाकई चिंताजनक हो जाती है। सागर जिले में बीते 14 दिनों से पत्रकार प्रशासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला है।

अवैध उत्खनन के खिलाफ आवाज उठाने पर पत्रकार पर कार्रवाई

मामला 5 मार्च का है, जब पत्रकार मुकुल शुक्ला ने जिले में हो रहे अवैध उत्खनन को लेकर खनिज अधिकारी अनित पंड्या से सवाल किए। जब उन्होंने इस विषय पर इंटरव्यू देने को कहा, तो अधिकारी नाराज हो गए और कथित तौर पर गाली-गलौच करने लगे। आरोप है कि उन्होंने पत्रकार का मोबाइल छीनकर जमीन पर पटक दिया और बाद में मुकुल शुक्ला के खिलाफ ही थाने में मामला दर्ज करवा दिया। जब पत्रकार ने खुद की शिकायत दर्ज करानी चाही, तो पुलिस ने इसे सुनने करने से इनकार कर दिया।

प्रशासन के खिलाफ पत्रकारों का उग्र आंदोलन

इस घटना के बाद पत्रकारों में भारी आक्रोश फैल गया। उन्होंने सागर बंद का आह्वान किया, जिसे 40 से अधिक संगठनों और व्यापारियों का समर्थन मिला। आम जनता भी इस आंदोलन में शामिल हो गई, जिससे पूरे जिले में माहौल गर्मा गया।

विरोध प्रदर्शन के अनोखे तरीके

पत्रकारों का आंदोलन सिर्फ धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने प्रशासन को “मृत” घोषित कर दो मिनट का मौन रखा और सद्बुद्धि के लिए प्रशासन की “तेरहवीं” करवाई। विरोधस्वरूप कचहरी परिसर में लोगों को भोजन कराकर प्रशासन की कार्यशैली से अवगत कराया गया। पैदल मार्च, चक्का जाम और आत्मदाह की चेतावनी जैसे कदम भी उठाए गए, लेकिन प्रशासन अब तक पत्रकारों की सुनवाई के लिए तैयार नहीं हुआ।

प्रशासन के दबाव के बाद भी जारी है आंदोलन

भारी समर्थन मिलने के बावजूद प्रशासन ने आंदोलन को कमजोर करने के लिए कई संगठनों पर दबाव डालने की कोशिश की। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई संगठनों को धमकियां दी गईं कि वे अपना समर्थन वापस ले लें। बावजूद इसके, पत्रकारों और उनके समर्थकों का हौसला कम नहीं हुआ।

क्या प्रशासन झुकेगा या आंदोलन और भड़केगा?

13 दिन से जारी इस आंदोलन ने अब प्रदेशभर में सुर्खियां बटोर ली हैं। सागर से लेकर भोपाल तक इस मुद्दे की चर्चा हो रही है। सवाल यह है कि क्या प्रशासन पत्रकारों की मांगें मानेगा या यह आंदोलन और तेज होगा? यह मामला सिर्फ पत्रकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के मूल्यों से भी जुड़ा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सागर के पत्रकारों की यह लड़ाई कब और कैसे खत्म होगी।

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