गुवाहाटी: भारत में आमतौर पर पत्रकारों की हत्या के मामलों में कार्रवाई में जो सुस्ती देखने को मिलती है, उसे एक तरफ रखते हुए पुलिस ने 1 जनवरी 2025 के बाद अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पत्रकार हत्याओं के मामलों में त्वरित कदम उठाए हैं। मीडिया समुदाय ने इन पहलों की सराहना की है और आशा जताई है कि दोषियों को कानून के तहत सजा मिलेगी, ताकि पीड़ित परिवारों को न्याय मिल सके।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने हाल ही में अंडमान व निकोबार द्वीप समूह के डिज़लीपुर क्षेत्र में एक ऑनलाइन पत्रकार सहदेव डे को खो दिया। स्थानीय पुलिस ने इस सनसनीखेज हत्या के चारों आरोपियों – एस. गंगैया, ए. रामसुब्रमणियम, एम. रमेश और बिथिका मल्लिक – को गिरफ्तार कर मामले को सुलझा लिया है।
पुलिस अधीक्षक श्वेता के सुगठन द्वारा अनुमोदित बयान के अनुसार, मृतक की पत्नी देबादृति डे ने 30 मार्च को अपने 38 वर्षीय पति की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। सहदेव “न्यूज़ रिपब्लिक अंडमान” नामक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिपोर्टर थे और अवैध लकड़ी तस्करी, मिट्टी कटाई, अवैध शराब और जुए के खिलाफ खुलकर बोलते थे। पुलिस ने तकनीकी और मानवीय सूचनाओं के आधार पर तेजी से कार्रवाई की और अगले ही दिन उनका जला हुआ शव डीबी ग्राम क्षेत्र से बरामद कर लिया गया।
पुलिस के अनुसार, इस हत्याकांड का मास्टरमाइंड गंगैया था, जो डिज़लीपुर में एक रेस्टोरेंट और बार चलाता है। उसने बाकी तीनों को शामिल कर हत्या की योजना बनाई और सबूत मिटाने की कोशिश की। सभी आरोपियों को कोर्ट में पेश किया गया और अब वे न्यायिक हिरासत में हैं। पुलिस ने जनता से भी अपील की है कि अगर उनके पास कोई विश्वसनीय जानकारी है, तो वे उसे नज़दीकी पुलिस स्टेशन में गोपनीय रूप से साझा करें। सूचना देने वालों को उचित इनाम भी दिया जाएगा।
अन्य दो मामलों में भी पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है और अदालत में कार्यवाही जारी है। उत्तर प्रदेश के सीतापुर में 8 मार्च को राघवेंद्र वाजपेयी की हत्या में पुलिस ने पांच संदिग्धों की पहचान की, जिनमें से तीन – विकास राठौर (उर्फ शिवानंद बाबा), निर्मल सिंह और अस्लम गाज़ी – को गिरफ्तार कर लिया गया है। राघवेंद्र एक लोकप्रिय हिंदी अखबार के स्थानीय संवाददाता होने के साथ-साथ एक RTI कार्यकर्ता भी थे।
इसी तरह, छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में 3 जनवरी को पत्रकार मुकेश चंद्राकर की क्षत-विक्षत लाश बरामद की गई थी। इस मामले में प्रमुख आरोपी ठेकेदार सुरेश चंद्राकर सहित चार व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया। हाल ही में अदालत में उनके खिलाफ 1,200 पन्नों की चार्जशीट दायर की गई है। ‘बस्तर जंक्शन’ नामक डिजिटल प्लेटफॉर्म के संस्थापक मुकेश ने स्थानीय अधिकारियों और ठेकेदारों द्वारा सरकारी धन की गड़बड़ी के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, जिसकी कीमत उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी।
यह बताना आवश्यक है कि भारत में पत्रकारों की हत्या से जुड़े मामलों में सजा दर बेहद कम (लगभग शून्य) है, खासकर तब जब हत्या का कारण उनका पेशेवर कार्य हो। अक्सर पुलिस जांच ढीली होती है और चार्जशीट दाखिल करने में देरी के कारण मुकदमा लंबा खिंचता है। इसका फायदा उठाकर कई अपराधी सजा से बच निकलते हैं और मीडिया-विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
सिर्फ भारत ही नहीं, दुनियाभर में भी पत्रकारों की स्थिति चिंताजनक है। UNESCO के एक ऑब्जर्वेटरी के अनुसार, 1993 से अब तक दुनियाभर में 1,700 से अधिक पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। इनमें से 10 में से 9 मामलों में दोषियों को सजा नहीं मिलती। यह दंडमुक्ति की संस्कृति को जन्म देता है, जो आगे और हिंसा को प्रोत्साहित करता है। पत्रकारों की हत्या तो मीडिया सेंसरशिप का चरम रूप है, लेकिन इसके अलावा उन्हें अपहरण, यातना, हमले, धमकी और डिजिटल उत्पीड़न जैसे खतरों का भी सामना करना पड़ता है।



