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सोशल मीडिया पर किसी लेखक की सराहना देखकर कभी पुस्तक न पढ़ें!

दिनेश श्रीनेत-

साहित्य में विमर्श का भी अपना एक अनुशासन होता है. जब आप किसी रचनाकार को सार्वकालिक रूप से श्रेष्ठ कहे जाने वाले रचनाकार के बरअक्स महान बताते हैं, मसलन, दूसरी इस्मत चुगताई, आज का मंटो, नए जमाने का प्रेमचंद आदि-आदि तो पहले तो यह समझना होगा कि जिनके समकक्ष आप अपने किसी चहेते तो खड़ा कर रहे हैं, उन्हें किसी ने आपकी तरह रातों-रात सर्टीफिकेट नहीं दिया है, यहां तक कि किसी एक व्यक्ति या आलोचक ने उन्हें महान नहीं कहा है.

उन पर बाकायदा एक विमर्श चला, वाद-प्रतिवाद हुए, समय की कसौटी पर वे खरे पाए गए तभी उनकी चमक आज भी बरकरार है, वे आज भी प्रासंगिक हैं, तो आपको यह भी बताना होगा कि जिन्हें आप आज का ‘कखग’ साबित करने पर तुले हैं, उनका किस तरह से वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन हुआ है, कैसे वे आपकी निजी पसंद-नापसंद से परे अपनी अहमियत स्थापित कर पाए हैं. अभी कितना समय गुजरा है कि उनके साहित्य पर सार्वकालिक होने का ठप्पा लगाया जा सके.

फेसबुक पर किसी लेखक या रचना के बारे में लिखी गई कोई भी टिप्पणी विमर्श नहीं होती है. वह विमर्श हो सकती है अगर उसका परिप्रेक्ष्य ऐतिहासिक हो, यदि कोई बात सिर्फ निजी कुंठा के तहत कही गई है तो उसका कोई साहित्यिक मोल नहीं है. उदाहरण के लिए किसी किताब या लेखक को यह कहकर खारिज कर देने कि वह मुझे समझ में नहीं आए.

ऐसा नहीं कि पहले ऐसी बातें नहीं कही जाती थीं. हमने अपने बचपन में जाने कितने लोगों को श्याम बेनेगल जैसे निर्देशक और कमलेश्वर जैसे लेखकों के लिए गालियां निकालते देखा है. मगर उनकी बात किसी की बैठक या चाय की टपरी तक सीमित रहती थी, बात ओछी होती थी तो उसका विस्तार भी सीमित ही रहता था, ऐसा नहीं हुआ कि ऐसी टिप्पणी को किसी साहित्यिक पत्रिका ने विमर्श का विषय बना दिया हो. मगर सोशल मीडिया के दौर में हम सस्ती या सतही टिप्पणियों को विमर्श समझने की भूल कर बैठते हैं और खुद भी उसमें कूद पड़ते हैं. ऐसा करने से हल्की से हल्की बात को भी वजन मिल जाता है, जिसकी जरूरत नहीं है.

बेहतर होगा कि हम यह समझ सकें कि कौन सी बात विमर्श के दायरे में आती है और कौन सी नहीं. हिंदी के कई लेखक भी सोशल मीडिया पर आकर बेहद हल्की, कुंठाग्रस्त और संदर्भ से कटी हुई बातें कहने लगे हैं. याद रखें बात का मोल तब होगा जब लिखने वाले के पास कोई (अ) तुलनात्मक अध्ययन हो, (ब) बात रखने के पीछे कोई सुचिंतित ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य हो, (स) बात स्थापित साहित्यिक, सौंदर्यशास्त्रीय या समाजशास्त्रीय कसौटी पर टिकी हो. यदि कोई निजी मत रख रहा है तो भी यह देखा जाना जरूरी है कि क्या वह मत उसके निजी वैयक्तिक आग्रह से परे किसी ऐसे मूल्य पर आधारित है, जिस पर अधिकांश लोग एकमत या कम से कम विचार करने को प्रस्तुत हों?

सोशल मीडिया पर किसी लेखक का रचनाकार की सराहना देखकर कभी पुस्तक या लेखक को न पढ़ें. वह लिखने वाले की निजी पसंद या अपने मित्र का प्रमोशन भर हो सकता है. उस लिखे को मूल्यांकन समझने की भूल न करें. यदि किताब अथवा लेखक का जिक्र करने वाला इतना ही भरोसेमंद है तो यह जरूर जांच ले कि क्या वह नियमित लेखकों और किताबों पर टिप्पणी करता रहता है? क्या वह सिर्फ समकालीनों पर ही टिप्पणी करता है, क्लासिक और अन्य महत्वपूर्ण समझे जाने वाले लेखक उसकी सूची में नहीं है?

क्या वह जब किसी किताब या रचनाकार के बारे में लिखता है तो सिर्फ तारीफ़ करता है? वह कमियों की तरफ ध्यान नहीं दिलाता? उसकी शैली में विश्लेषण, तुलनात्मकता, रचनाकार के संसार की समझ नदारद है? यदि ऐसा है तो उसकी लेखनी गड़बड़ है. उस पर भरोसा न करें. उसे किसी भी तरह का मानक लेखन समझने की भूल न करें. उन्होंने वही किया है जो हम किसी के घर डिनर के बाद करते हैं. खाने की तारीफ करते हैं, क्योंकि यह औपचारिकता है और रिश्ते का तकाजा है.

बेहतर हो कि सोशल मीडिया के जरिए किसी लेखक को महान न मान लें, वहां पर सुझाई गई किताबें न खरीदें, पूर्ववर्ती लेखकों पर की जाने वाली अनर्गल टिप्पणियों पर कान न दें. जो ऐसा कर रहे हैं वो चाहे कुछ भी कर रहे हों, बौद्धिक और साहित्यिक संसार में किसी भी प्रकार का योगदान नहीं दे रहे हैं. उनकी टिप्पणियों को दो दिन बाद खोजना भी मुश्किल हो जाता है. एक महीने बाद तो शायद याद रखना भी.

वास्तविक विमर्श के पास एक भाषा होगी, विमर्श में मानक होंगे, एक किस्म का अनुशासन होगा. उस विमर्श में तहजीब होगी. सामने वाले को सुनने का धैर्य होगा. खुद के लिखे-कहे पर पुनर्विचार का विवेक होगा. साहित्य सही-गलत के बीच परख और विवेक पैदा करता है, विवेकहीनता की अंधी दौड़ में आपको शामिल होने का आह्वान नहीं करता.

यदि कभी ऐसा लगे तो समझ लें वो चाहे जो हो, सत्य. शिव और सुंदर नहीं है. वह किसी काम का नहीं है. आप अनपढ़-कुपढ़-कुतर्की विमर्श को खारिज़ करेंगे तभी बेहतर लेखन की परख करने की योग्यता हासिल कर सकेंगे और साहित्य में वास्तविक और मूल्यवान विमर्श की तरफ बढ़ पाएंगे.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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