एक नेक इंसान की बहुत ही ख़राब कविताएँ

पंकज चौधरी के एकल कविता पाठ पर कवि पंकज सिंह कहते हैं कि ‘‘भाषा जब तक एक जटिल प्रक्रिया से न निकले, वह सर्जनात्मक नहीं होगी ! पंकज चौधरी की कविताओं पर हिन्दी के प्रसिद्ध कवि पंकज सिंह ने कहा कि एक नेक इंसान की ये बहुत ही ख़राब कविताएँ हैं।

उन्होंने कहा कि भाषा को लेकर जो समझ एक कवि में होनी चाहिए, वह दिखती नहीं। कवि को यह समझ होनी चाहिए कि शब्दों के बनने की एक प्रक्रिया होती है–तत्सम शब्द फ़ारसी शब्द के साथ मिलकर कोई पद नहीं बना सकते, यह अधकचरापन है। भाषा जब तक एक जटिल प्रक्रिया से न निकले, वह सर्जनात्मक नहीं होगी। सृजन के लिए ग़ुस्सा ज़रूरी है, लेकिन अगर वह सर्जनात्मक न हो तो आत्मघाती ढंग से कविता को नष्ट कर देता है। कई बार पुराने पतनशील सामन्ती मूल्य हमारे दिमाग़ में कालिख की तरह भरे होते हैं, अगर रचनाकार सचेत न हो तो वे चीज़ें उसकी रचना में प्रवेश कर जाती हैं, जिसका उदाहरण ‘ये बदतमीज़ लड़कियाँ’ कविता है। पंकज की कविताओं पर मैं इसलिए यह सब कह रहा हूँ कि इस कवि से हमें उम्मीदे हैं।

पंकज चौधरी अपनी कविताओं का पाठ हिन्दी की ज़मीनी रचनाशीलता को अनौपचारिक मंच देने के उद्देश्य से गठित साहित्यिक संस्था ‘हुत’ की ओर से आयोजित एकल कविता-पाठ कार्यक्रम के दौरान प्रस्तुत कर रहे थे। ‘हुत’ की तरफ़ से यह आयोजन गत दिनो एनडीएमसी पार्क, अबुल फ़ज़ल रोड, नियर तिलक ब्रिज रेल्वे स्टेशन, मंडी हाउस, नई दिल्ली में किया गया था।

‘‘युवा कवि पंकज चैधरी का एकल कविता-पाठ’’

वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन ब्राह्मणों को ही कवि मानेंगे

वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन ब्राह्मणों को ही पुरस्कार दिलाएँगे

वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन ब्राह्मणों को ही मंच पर बुलाएँगे 

वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन ब्राह्मणों के ही गुट में शामिल रहेंगे

वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन बाह्मणों को ही नौकरी दिलाएँगे

वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन ब्राह्मणों के ही लेखक संगठन में शामिल रहेंगे

वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन ब्राह्मणों को ही आलोचक मानेंगे

वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन ब्राह्मणों के नेता बनते जा रहे हैं

वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं लेकिन ब्राह्मणवादियों को गाली देनेवालों को जातिवादी कहेंगे !

यह कविता कवि की अपनी स्पष्ट पहचान को दर्ज तो करती ही है–साथ ही, हमारे समय के उस घिनौने सच को भी सामने रखती है, जिसे तथाकथित बुद्धिजीवियों और प्रगतिशिलों के भीतर झाँकें तो देखा जा सकता है। यह कविता प्रत्यक्ष रूप से अपनी संरचना में जितनी सहज है, उतनी ही अप्रत्यक्ष रूप से असहज भी कर देनेवाली है। यानी पंकज चौधरी की यह कविता वर्णवादी छद्मों को रेखांकित करते हमारे मनुष्य होने पर सवाल भी खड़ी करती है।

अपने कविता-पाठ में पंकज चौधरी ने ‘किस-किस से लड़ोगे यहाँ’, ‘कैसा देश, कैसे-कैसे लोग’, ‘लहर है’, ‘वे ब्राह्मणवादी नहीं हैं’, ‘रामदेव’, ‘मैं हार नहीं मानूँगा, तो तुम जितोगे कैसे’, ‘कविता में’, ‘साहित्य में आरक्षण’, ‘पिछड़ो, तुम हमें वोट दो’, ‘यौन दासियाँ’, ‘लड़ना ज़रूरी है’, ‘जैसा कि उसने कहा’, ‘हिन्दी कविता के इस द्विजवादी प्रदेश में आपका प्रवेश दंडनीय है’, ‘प्रार्थना’, ‘ये बदतमीज़ लड़कियाँ’ आदि कई कविताएँ प्रस्तुत कीं।

युवा आलोचक आशीष मिश्र ने विचार व्यक्त किया कि भाषा में निरपेक्ष और अहिंसक नहीं हुआ जा सकता, इसमें होते हुए सार्वभौमिकता और सार्वकालिकता का दावा मूर्खता है, पंकज चौधरी जी इस बात को ठीक से महसूस करते हैं। वे पक्षधर हैं, प्रतिगामी तत्त्वों के प्रति भरपूर आक्रामक और हिंसा के सकारात्मक नैतिक पक्ष को समझते हैं। इसी कारण आपको इन कविताओं में अपने समकाल में हस्तक्षेप करने के लिए ज़रूरी ‘डाइरेक्टनेस’ मिलेगा। यहाँ पक्ष और प्रतिपक्ष एकदम स्पष्ट हैं, कोई घालमेल नहीं। ये कविताएँ किसी काली स्लेट पर चाक से खींची चटक, सीधी रेखा की तरह हैं। पर इस बात का एक दूसरा पक्ष भी है–क्या जिस समय में हम रहते हैं वह इतना स्पष्ट और सीधा है ? क्या हम इसे पारंपरिक भाषा और बोध के ‘कैडे’ से पकड़ सकते हैं ? क्या हम इस समय को उसी भाषा में पकड़ सकते हैं जिस भाषा को सत्ता यथार्थ को छिपाने और विपथित करने लिए लादती जाती है, अर्थात हम सत्ता को उसी की भाषा में पकड़ और उदघाटित नहीं कर सकते? यह ऐसा चक्र है जिससे हम निकल नहीं पाएँगे, उल्टे सत्ता को ही मज़बूत करेंगे। सत्ता अपना विकल्प भी रचती है, जैसे नोकिया के किसी मॉडेल का विकल्प उसी का दूसरा मॉडेल या योगी आदित्यनाथ के विकल्प मोदी। हम भी अधिकतर जिन विकल्पों, तर्कों और भाषा का इस्तेमाल करते हैं, वे सत्ता द्वारा बहु-प्रचारित होते हैं। पंकज जी की सीमा यह है कि उनके पास वह भावदृष्टि और वह सर्जनात्मक भाषा नहीं है जो अपने समय के उलझे यथार्थ को पकड़ पाए और इस दुष्चक्र से निकल पाए। पंकज जी अगर इस ज़रूरी ‘डाइरेक्टनेस’ के साथ जब बहुविमीय यथार्थ को रचनेवाली भाषा खोज लेंगे तो और अच्छी कविताओं की सम्भावना बनेगी।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे युवा कवि और साहित्यिक पत्रिका ‘रू’ के सम्पादक कुमार वीरेन्द्र ने कहा कि पंकज चौधरी की कविताएँ हमारे समय के सवालों से जूझती कविताएँ हैं। इसलिए एक व्यक्ति की नहीं, समूह और समाज की कविताएँ हैं। इनकी कविताओं में जो संघर्ष है, वह उम्मीदों का संघर्ष है।

कार्यक्रम में महत्त्वपूर्ण युवा कवि आर. चेतनक्रांति, रंगकर्मी राकेश रंजन, रंगकर्मी व संपादक राजेश चन्द्र, युवा कथाकार-पत्रकार अरविन्द शेष, साहित्यकार मजीद अहमद, युवा कवि-कहानीकार-पत्राकार सुशील सांकृत्यायन, युवा रचनाकार पूजा, गौरव हन्दुजा, युवा कवि इरेन्द्र बबुअवा आदि की न सिर्फ़ उपस्थिति रही, बल्कि इन्होंने अपने विचार भी व्यक्त किए।

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