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साहित्य

सलमान रुश्दी: बीते 25 सालों से जीवन पर मंडराते खतरे के बाद भी अपने लिखे को खारिज नहीं किया

दिनेश श्रीनेत-

सलमान रुश्दी को चाहे कितना बुरा-भला कहा जाए, मगर वे पोस्ट मार्डन समय के उन साहसी लेखकों में हमेशा के लिए दर्ज रहेंगे, जिन्होंने अपना जीवन को जोखिम में डालकर अभिव्यक्ति के खतरे उठाए। रुश्दी ने अपने जीवन में सिर्फ कहानियां कहना चुना। कहानी कहते-कहते ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’, ‘शेम’, हारून एंड द सी ऑफ़ स्टोरीज़’, ‘होमलेस बाई चाइस’, ‘द ग्राउंड बिनीथ हर फीट’, ‘शालीमार द क्लाउन’ जैसी जाने कितनी किताबें लिख डालीं।

कहानी यानी ‘फिक्शन’ बहुत मामूली सी चीज होती है। आप सुनें या बिना ध्यान दिए निकल जाएं। आप पढ़ें या उसे रद्दी की टोकरी में डाल दें। मगर रुश्दी की अभिव्यक्ति से लोग विचलित हुए। हाल ही में आई उनकी किताब ‘नाइफ’ इस मायने में अनोखी किताब है, जहां एक लेखक अपने समय और अपने मन को उस वक्त टटोल रहा है, जब उसने लिखने की कीमत अपनी एक आँख खोकर चुकाई है। उनके अनूठे व्यंगात्मक उपन्यास को कुफ़्र माना गया और उसके बाद से उनके जीवन पर संकट मंडराता रहा। वे स्कॉटलैंड यार्ड की सुरक्षा में रहे और ‘बरसों-बरस’ लगभग भूमिगत होकर लिखते रहे।

हालांकि सलमान ने बीते 25 सालों से लगातार जीवन पर मंडराते खतरे के बावजूद अपने लिखे को खारिज़ नहीं किया। वे इस उपन्यास को प्रवास, कायांतरण (काफ्का की तरह?), विभाजित-सेल्फ, प्रेम, मृत्यु तथा उनके जिए गए दो शहरों लंदन और बॉम्बे के बारे में लिखा गया बताते हैं। ‘सैटेनिक वर्सेज’ से जुड़े बाकी लोग भी हिंसा के शिकार हुए, सन 1991 में उपन्यास जापानी अनुवादक हितोशी इगाराशी की हत्या कर दी गई थी; उसी साल उपन्यास के इतावली अनुवादक को चाकू मारा गया था, लेकिन वह बच गया था। सन 1993 में नॉर्वे में उपन्यास के प्रकाशक को गोली मार दी गई थी, लेकिन वह भी बच गया।

अंततः सन 2022 में न्यूयॉर्क के एक सार्वजनिक कार्यक्रम में रश्दी पर जानलेवा हमला हो ही गया। हमलावर ने उनको कई बार चाकू घोंपा, वे गंभीर रूप से घायल हुए, बच गए मगर एक आंख की रोशनी चली गई। यह हमला भी उनके लिए लिखने का सबब बना और अपनी किताब नाइफ में वे लिखते हैं, “अपने खाली रतजगों में मैंने एक विचार के तौर पर चाकू के बारे में बहुत सोचा। भाषा भी एक चाकू है। यह दुनिया को काटकर इसके अर्थ को सामने ला सकती है। यह लोगों की आँखें खोल सकती है। सौंदर्य रच सकती है। भाषा मेरा चाकू थी।”

रश्दी ने यूं तो तथाकथित ‘सामाजिक यथार्थ’ वाली रचनाएं नहीं लिखीं, मगर सामाजिक यथार्थ को अपनी भाषा के धार से रेशा-रेशा जरूर किया है। वे अच्छे लेखक हैं, खराब लेखक हैं, यह बहस का विषय हो सकता है, मगर शब्दों के प्रति अपनी जान की कीमत तक उत्तरदायी होना आसान नहीं है।

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