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सियासत

रीढ़-न-जमीर, नाम ‘संपादक’

जिस संस्थान के लिए पत्रकार जीतोड़ मेहनत करते हैं, ख़बर लिखते हैं, सामाजिक सरोकारों और जनता के हक़ की लड़ाई लड़ते हैं, गरीबों को न्याय दिलाते हैं, बेसहारों का सहारा बनते हैं, उन्हीं संस्थानों का का संपादक प्रतिष्ठान पतन की हद तक आत्मजीवी और बाजारवादी हो चुका है। पत्रकारों की ही लेखनी की बदौलत मीडिया संस्थान तरक्की करते हैं, ज्यादा से ज्यादा संख्या में लोग पत्रकारों की ही लिखी खबरें पढ़ते हैं, उन्हीं पत्रकारों की बदौलत वाहवाही लूटने के लिए अखबार आत्मप्रचार करते हैं कि हमारी  “खबर का असर”, सबसे पहले हमने उठाई थी ये आवाज, हमने दिलाया न्याय, आदि आदि। लेकिन इस खोखलेपन का पता उस समय चलता है, जब उन पत्रकारों पर मुसीबत पड़ती है, कोई आफत आती है।

जिस संस्थान के लिए पत्रकार जीतोड़ मेहनत करते हैं, ख़बर लिखते हैं, सामाजिक सरोकारों और जनता के हक़ की लड़ाई लड़ते हैं, गरीबों को न्याय दिलाते हैं, बेसहारों का सहारा बनते हैं, उन्हीं संस्थानों का का संपादक प्रतिष्ठान पतन की हद तक आत्मजीवी और बाजारवादी हो चुका है। पत्रकारों की ही लेखनी की बदौलत मीडिया संस्थान तरक्की करते हैं, ज्यादा से ज्यादा संख्या में लोग पत्रकारों की ही लिखी खबरें पढ़ते हैं, उन्हीं पत्रकारों की बदौलत वाहवाही लूटने के लिए अखबार आत्मप्रचार करते हैं कि हमारी  “खबर का असर”, सबसे पहले हमने उठाई थी ये आवाज, हमने दिलाया न्याय, आदि आदि। लेकिन इस खोखलेपन का पता उस समय चलता है, जब उन पत्रकारों पर मुसीबत पड़ती है, कोई आफत आती है।

 स्वयं को प्रतिभावान, तेज-तर्रार और ख़बरों से समझौता न करने का दम भरने वाले ऐसे रीढ़हीन संपादकों और ब्यूरो प्रमुखों की स्वामिभक्ति और चाटुकारिता पर हजारों बार लानत है। उन्हें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। बड़े नाम वाले अखबारों से तो कम प्रसार संख्या वाले अखबार और उनके संपादक, पत्रकार ज्यादा मिशनरी हैं। वे पत्रकारों के गर्दिश के दिनों में कम से कम उनकी आवाज तो बनते हैं, उनकी मुश्किलों और उत्पीड़न पर खबर तो प्रकाशित कर देते हैं। पूंजीपतियों के हाथ के कठपुतली संपादकों का हाल ये है कि पत्रकारिता पर बड़ी ऊंची-ऊंची बातें करते हैं, बड़े बड़े और आदर्श और नैतिकता का पाठ पढ़ाते डोलते हैं, लेकिन मालिकानों के आगे दुम दबाकर चापलूसी की पराकाष्ठा कर देते हैं। तब संदेह होता है कि उनमें कोई जमीर या रीढ़ नाम की चीज है भी कि नहीं। 

हर पत्रकार को नाज होता है कि उसका संस्थान उसके पीछे खड़ा है, उसके सुखदुख का साथी है। अगर सम्पादक रीढ़ वाला हो तो उसके पत्रकार को कोई आँख नहीं दिखा सकता, मार-पीट तो बड़ी दूर की बात है, लेकिन लगता है, आज के ज्यादातर संपादकों ने कलम गिरवी रख दी है, सिर्फ गुलामी कर रहे हैं, गुलामों की जिंदगी जी रहे हैं, मोटा माल कमाने में लग गए हैं, कथित बड़े-बड़े लोगों के साथ उठने-बैठने की लत पाल लिये हैं। वे भी तो कभी छोटे पत्रकार रहे होंगे, नये पत्रकारों जैसी पीड़ा या जुनून से गुजरे होंगे, तमाम झंझावातों से लड़े होंगे। फिर कैसे सब भूल कर पूरी बेशर्मी से मालिकों के चरणों में लोट लगाने लगे हैं। 

कहते हैं, इंसान को अपने पुराने दिन नहीं भूलने चाहिए और एक पत्रकार को तो संवेदनशील भी माना जाता है, फिर संपादक कैसे भूल जाते हैं कि आधुनिक मीडिया मालिकों ने मोटी पगार के बदले उन्हें सिर्फ दलाली के लिए कुर्सी दे रखी है। पुलिस और नेताओं पर रोब गांठने वाले ये संपादक अपने गिरेबान में झांकने से डरते हैं। सुविधाएं छिन जाने का डर रहता है। जब कोई पत्रकार किसी माफिया, समाजविरोधी तत्वों के हाथ मारा जाता है, संपादक उस पर एक लाइन खबर भी देने से डर जाते हैं। लानत है ऐसे संपादकों और उनकी दलाल पत्रकारिता पर। 

(लेखक से संपर्क : फोन – 9919122033, ई-मेल – [email protected])

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