कानून और नैतिकता कभी भी तटस्थ नहीं होते। वे हमेशा सत्ताधारी वर्ग के हित में बनाए जाते हैं। वही तय करता है कि कौन-सा अपराध गंभीर है और कौन-सा मामूली। यही कारण है कि उद्योगपतियों के आर्थिक अपराध अक्सर गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन किसी आंदोलनकारी पर लगे आरोप उसे आसानी से पाँच साल की सज़ा वाले कानून में फँसा सकते हैं…
विश्व दीपक-
संविधान संशोधन बिल का मकसद भ्रष्ट्राचार का खत्मा नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक मनॉपली स्थापित करना ही. संशोधन के नाम पर संविधान को ही खत्म करना है.
याद है? हिमांता विश्व शर्मा, अजीत पवार, शुभेंदु अधिकारी आदि का किस्सा? ये सब परम भ्रष्ट्राचारी थे. इन सब के ऊपर हज़ारों करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप थे. फिर सब भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. शामिल होते ही इनमें से अधिकांश बेदाग और पवित्र हो गए.
2014 से लेकर अब तक विपक्षी पार्टियों के 25 बड़े नेता जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे बीजेपी में शामिल हुए. उनमें से 23 को राहत मिल गई.
यही है बीजेपी का असली चाल, चरित्र और चेहरा भारत में अंधकार युग का एक नया दौर शुरू होने जा रहा है.
यह विधेयक संविधान की आत्मा पर हमला है। प्रधानमंत्री और मंत्रियों को हटाने का अधिकार सिर्फ़ जनता और संसद के पास होना चाहिए, न कि किसी पुलिसिया या तानाशाही तंत्र के। भाजपा बार-बार ऐसे क़दम उठाकर देश को लोकतंत्र से हटाकर पुलिस राज्य बनाने की कोशिश कर रही है। हमें संविधान और जनता की शक्ति पर विश्वास है, न कि सत्ता की मनमानी पर। -असदुद्दीन ओवैशी
सुरेंद्र सिंह चौधरी-
आज जिन लोगों ने भी संसद की कार्यवाही देखी होगी उन्हें आश्चर्य हुआ होगा यह देखकर कि सरकार द्वारा लाये जा रहे एक बिल की प्रतियां फाड़कर, उसके टुकड़े-टुकड़े कर गृहमंत्री अमित शाह के मुंह पर फेंके गए। दरअसल यह बिल है ही ऐसा। इस बिल के पास होने का अर्थ है कि ED या CBI द्वारा गिरफ्तार कोई विधायक, सांसद, मंत्री यहां तक कि मुख्यमंत्री भी अगर 30 दिनों तक लगातार जेल में रहा तो उसका पद स्वत: समाप्त हो जायेगा।
यानी मात्र भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार होने पर ही किसी भी पद पर बने रहने के अयोग्य मान लिए जायेंगे। ट्रायल की नौबत ही नहीं आनी है।
आरोप लगना ही काफी है। पहले ‘दोष सिद्ध ‘ होने पर दंड मिलता था लेकिन अब नये कानून के लागू होने पर केवल आरोप लगने मात्र से मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री (यदि ३०दिनों तक जेल में रहे) तो कुर्सी छोड़नी पड़ेगी और जीवन भर चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जायेंगे।
विपक्ष के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, अरविंद केजरीवाल ED द्वारा गिरफ्तार कर जेल भेजे गए थे। अगर उनके जेल जाने से पहले यह कानून भाजपा बनाई होती तो ये दोनों हमेशा के लिए राजनीति से विदा हो गए होते। अपना दबदबा बनाए रखने की आखिरी लड़ाई प्र०म० मोदी लड़ रहे हैं। देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।
मनोज अभिज्ञान-
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 20 अगस्त 2025 को लोकसभा में 130वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया। बिल कहता है कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री अगर लगातार 30 दिन तक जेल में बंद रहता है, और आरोप ऐसा है कि उसमें 5 साल या उससे ज़्यादा की सज़ा हो सकती है, तो उसे पद से हटना पड़ेगा या उसका पद अपने आप समाप्त हो जाएगा।
सरकार का कहना है कि यह संशोधन इसलिए ज़रूरी है क्योंकि अभी संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। बिल में लिखा है कि मंत्री अगर गंभीर अपराधों में जेल चला जाता है तो यह संविधान पर लगे भरोसे को नुकसान पहुँचाता है। इसलिए ज़रूरी है कि उसे पद से हटाने का स्पष्ट प्रावधान हो।
प्रस्तुत संविधान संशोधन विधेयक संविधान के अनुच्छेद 75, अनुच्छेद 164 और अनुच्छेद 239AA में बदलाव करेगा।
अनुच्छेद 75 में मौजूदा प्रावधान है कि जो मंत्री छह महीने तक संसद का सदस्य नहीं बनता, वह मंत्री नहीं रह सकता। संविधान संशोधन करके नया उपबंध (5A) जोड़ा जा रहा है जिसमें कहा गया है कि अगर कोई मंत्री 30 दिन तक जेल में है और उस पर पाँच साल या उससे ज़्यादा की सज़ा वाले अपराध का आरोप है, तो प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति उसे हटा देंगे। अगर प्रधानमंत्री सलाह नहीं देंगे तो 31वें दिन से वह मंत्री अपने आप हट जाएगा। यही बात प्रधानमंत्री पर भी लागू होगी। अगर प्रधानमंत्री 30 दिन तक जेल में रहते हैं तो उन्हें इस्तीफ़ा देना होगा, वरना उनका पद अपने आप खत्म हो जाएगा।

अनुच्छेद 164 में मौजूदा प्रावधान यह है कि राज्य सरकार का मंत्री छह महीने तक विधानसभा/विधान परिषद सदस्य न बने तो मंत्री नहीं रह सकता। संविधान संशोधन द्वारा इसमें नया उपबंध (4A) जोड़ा जा रहा है कि अगर कोई मंत्री 30 दिन तक जेल में है और उस पर पाँच साल या उससे ज़्यादा की सज़ा वाले अपराध का आरोप है, तो मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल उसे हटा देंगे। अगर मुख्यमंत्री सलाह नहीं देंगे तो 31वें दिन से उसका पद अपने आप खत्म हो जाएगा। यही नियम मुख्यमंत्री पर भी लागू होगा। अनुच्छेद 239AA द्वारा दिल्ली सरकार के बारे में प्रावधान में भी यही बदलाव किया जा रहा है।
सवाल ये है कि क्या इससे राजनीति साफ़ सुथरी होगी?
पहली नज़र में यह व्यवस्था बड़ी साफ़-सुथरी लगती है। ऐसा लगता है कि अब अपराधी नेता सत्ता का सुख नहीं भोग पाएँगे। जनता के सामने सरकार यह दावा कर सकती है कि वह राजनीति को अपराधमुक्त कर रही है। लेकिन यह संशोधन असल में सत्ता के हितों को ही सुरक्षित करता है।
सबसे पहले यह सवाल कि अपराधी राजनीति में क्यों आता है? राजनीति में अपराधी इसलिए आता है क्योंकि यह व्यवस्था अपराधी को पैदा करती है और फिर उसी को बचाती भी है। नेता इसलिए अपराध करते हैं ताकि पूँजी और सत्ता का गठजोड़ बना रहे। वही पूँजी उन्हें चुनाव जिताती है, वही ताक़त उन्हें अदालत और पुलिस से बचाती है। इस बुनियादी समस्या को यह संशोधन छूता तक नहीं। इसके बजाय यह कहता है कि अगर मंत्री तीस दिन जेल में है तो उसका पद चला जाएगा। लेकिन जेल में जाना और अपराध साबित होना, दोनों अलग बातें हैं। हमारे देश में मुक़दमे सालों-साल चलते हैं। कोई व्यक्ति अपराधी है या नहीं, यह तय होने में दस-दस साल लग जाते हैं। ऐसे में तीस दिन जेल में रहना केवल इतना दिखाता है कि सत्ता पक्ष चाहकर किसी को भी सत्ता से बाहर कर सकता है।
न्याय का बुनियादी सिद्धांत यही है कि हर व्यक्ति तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसका दोष सिद्ध न हो जाए। इसे रोमन क़ानून की प्रसिद्ध लैटिन सूक्ति में इस तरह व्यक्त किया गया है—Ei incumbit probatio qui dicit, non qui negat, जिसका अर्थ है कि दोष साबित करने की ज़िम्मेदारी उस पर है जो आरोप लगाता है, न कि उस पर जिस पर आरोप लगाया गया है। इसी से निकला सिद्धांत है ‘presumption of innocence’ यानी निर्दोष मानने की धारणा। अगर इस आधार को छोड़ दिया जाए और केवल आरोप या हिरासत को ही अपराध मान लिया जाए, तो न्याय का पूरा ढाँचा सत्ता के हाथों में खिलौना मात्र बन कर रह जाएगा।
तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को शराब नीति मामले में गिरफ़्तार किया गया। महीनों तक जेल में रहे, लेकिन अदालत में अभी तक अपराध साबित नहीं हुआ। अगर यह संशोधन लागू होता, तो तीस दिन पूरे होते ही उनका पद अपने आप चला जाता। इससे लोकतंत्र का क्या भला होता? जनता की चुनी हुई सरकार का क्या होता? यही हाल झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ हुआ। उन्हें भी ईडी ने गिरफ़्तार किया, गंभीर धाराएँ लगाईं, और लंबे समय तक जेल में रखा। अगर यह संशोधन पहले होता, तो उनका पद भी चला जाता। बाद में अगर साबित हो कि आरोप झूठे थे तो क्या खोया हुआ राजनीतिक अधिकार वापस आ जाएगा?
अब सोचिए कि इतनी धीमी न्याय-व्यवस्था के बीच किसी को जेल में डालना क्या न्याय का हिस्सा है या राजनीतिक हथियार है? महाराष्ट्र में नवाब मलिक और अनिल देशमुख जैसे कई मंत्री लंबे समय तक जेल में रहे। बाद में अदालत ने कहा कि सबूत पुख़्ता नहीं हैं। लेकिन इतने दिनों में उनकी राजनीतिक साख और ताक़त को नुकसान पहुँच चुका था। सत्ता में बैठे लोग चाहें, तो विरोधी नेताओं को गंभीर धाराओं में फँसाकर जेल भेज सकते हैं और तीस दिन बाद उनका पद अपने आप चला जाएगा।
अब ज़रा देखें कि इस संशोधन के पीछे कैसी राजनीतिक सोच काम कर रही है। सरकार कह रही है कि यह जनता के भरोसे को बचाने के लिए है। जनता चाहती है कि अपराधी राजनीति से बाहर हों। लेकिन असल अपराध तो वे हैं जो रोज़ जनता पर ढाए जाते हैं—किसानों को क़र्ज़ के बोझ में मरने पर मजबूर करना, मज़दूरों को न्यूनतम वेतन से कम पर काम कराना, बेरोज़गारों को उज्ज्वल भविष्य से वंचित करना, शिक्षा को सबकी पहुंच से दूर करना, चाटुकार मीडिया के माध्यम से जनता की स्वतंत्र चेतना को कुंद करना। लेकिन इन अपराधों पर कोई कानून लागू नहीं होता। किसी भी मंत्री को जेल नहीं होती। असली अपराधी बचा रहता है, जबकि जनता को केवल यह दिखावा मिलता है कि देखो, हमने अपराधियों को सत्ता से बाहर करने का कानून बना दिया है।
कानून और नैतिकता कभी भी तटस्थ नहीं होते। वे हमेशा सत्ताधारी वर्ग के हित में बनाए जाते हैं। वही तय करता है कि कौन-सा अपराध गंभीर है और कौन-सा मामूली। यही कारण है कि उद्योगपतियों के आर्थिक अपराध अक्सर गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन किसी आंदोलनकारी पर लगे आरोप उसे आसानी से पाँच साल की सज़ा वाले कानून में फँसा सकते हैं।
अपराध और राजनीति का रिश्ता व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का नहीं, वर्गीय सत्ता का है। जब तक व्यवस्था ही पूँजी और ताक़त के आधार पर चलेगी, राजनीति से अपराध को बाहर नहीं किया जा सकता। कानून हमेशा सत्ता का औज़ार होता है। जिस पर यह कानून लागू होगा, वही सत्ता से बाहर हो जाएगा। इसी तरह ऐसे कानून नैतिकता का दावा करते तो हैं लेकिन असली अपराध पर बात ही नहीं होती। वह छिपा रहता है। जनता को जो लूटा जा रहा है, वह सबसे बड़ा अपराध है, लेकिन उस पर कोई संशोधन नहीं आता। इसीलिए ऐसे तथाकथित सुधार सत्ता के हाथ एक और औजार मात्र हैं। असली समस्या गहरी है—मुक़दमे का लंबा खिंचना, पुलिस और अदालतों का सत्ता पर निर्भर होना, और चुनावों में पैसे का बेहिसाब दख़ल। जब तक इन समस्याओं पर चोट नहीं की जाती, तब तक राजनीति साफ़ नहीं होगी।
ममता बनर्जी-
मैं भारत सरकार द्वारा आज प्रस्तुत किये जाने वाले 130वें संविधान संशोधन विधेयक की निंदा करती हूँ। मैं इसकी निंदा करती हूं क्योंकि यह एक सुपर-इमरजेंसी से भी अधिक है, यह भारत के लोकतांत्रिक युग को हमेशा के लिए समाप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम है। यह कठोर कदम भारत में लोकतंत्र और संघवाद के लिए मौत की घंटी है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर भारतीय नागरिकों के मताधिकार को दबाने के लिए यह केंद्र द्वारा उठाया गया एक और अति-कठोर कदम है।
यह विधेयक अब हमारी न्यायपालिका की स्वतंत्रता को ख़त्म करना चाहता है। हम जो देख रहे हैं वह अभूतपूर्व है—यह विधेयक भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर हिटलरी हमले से कम नहीं है। यह विधेयक न्यायपालिका से उसकी संवैधानिक भूमिका छीनने का प्रयास करता है – ताकि न्यायालयों से उन मामलों पर निर्णय देने की शक्ति छीन ली जाए जो न्याय और संघीय संतुलन के मूल में हैं। इस तरह की शक्तियों को पक्षपातपूर्ण हाथों में सौंपकर यह विधेयक लोकतंत्र को विकृत करता है।
यह सुधार नहीं है। यह प्रतिगमन है – एक ऐसी व्यवस्था की ओर जहाँ कानून अब स्वतंत्र न्यायालयों के हाथों में नहीं, बल्कि निहित स्वार्थों के हाथों में है। यह एक ऐसा शासन स्थापित करने का एक भयावह प्रयास है, जहां न्यायिक जांच को दबा दिया जाता है, संवैधानिक सुरक्षा उपायों को खत्म कर दिया जाता है, और लोगों के अधिकारों को कुचला जाता है। इतिहास में सत्तावादी शासनों ने, यहाँ तक कि फ़ासीवादी शासनों ने भी, इसी तरह अपनी सत्ता को मज़बूत किया है। यह उसी मानसिकता की बू आती है जिसकी दुनिया ने 20वीं सदी के सबसे काले दौर में निंदा की थी।
अदालतों को कमज़ोर करना जनता को कमज़ोर करना है। उन्हें न्याय पाने के अधिकार से वंचित करना, उन्हें लोकतंत्र से वंचित करना है। यह विधेयक संविधान के मूल ढांचे – संघवाद, शक्तियों का पृथक्करण और न्यायिक समीक्षा – पर प्रहार करता है – ऐसे सिद्धांत जिन्हें संसद भी रद्द नहीं कर सकती। यदि इसे पारित होने दिया गया तो यह भारत में संवैधानिक शासन के लिए मृत्यु वारंट होगा।.
हमें इस खतरनाक अतिक्रमण का विरोध करना होगा। हमारा संविधान अस्थायी सत्ताधारियों की संपत्ति नहीं है। यह भारत की जनता का है।
इस विधेयक का उद्देश्य एक व्यक्ति-एक दल-एक सरकार की व्यवस्था को सुदृढ़ करना है। यह विधेयक संविधान के मूल ढाँचे को कुचलता है।
यह विधेयक संघ को जनता के जनादेश में हस्तक्षेप करने का अधिकार देने का प्रयास करता है। निर्वाचित राज्य सरकारों के कामकाज में हस्तक्षेप करने के लिए अनिर्वाचित प्राधिकारियों (ईडी, सीबीआई – जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने ‘पिंजरे में बंद तोते’ कहा है) को व्यापक शक्तियां सौंपना। यह हमारे संविधान के मूल सिद्धांतों की कीमत पर प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री को भयावह तरीके से सशक्त बनाने का कदम है।
इस विधेयक का हर हाल में विरोध होना चाहिए! इस समय लोकतंत्र को बचाना होगा! जनता अपनी अदालतों, अपने अधिकारों और अपने लोकतंत्र को छीनने की किसी भी कोशिश को माफ़ नहीं करेगी।


