
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
सनातन को खत्म होना चाहिए, ऐसा आक्रामक बयान देकर तमिलनाडु में स्टालिन ने वही गलती कर दी है, जो कभी चारु मजूमदार ने बंगाल में नक्सली आंदोलन में की थी। हालांकि बंगाल और तमिलनाडु में वर्ण व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था एक जैसी नहीं है लेकिन स्टालिन के इस बयान का असर देश के उन राज्यों में जरूर पड़ सकता है, जहां जहां बंगाल की तरह की सामाजिक व्यवस्था है।
धर्म पर सीधा हमला बाकी राज्यों में न सिर्फ सवर्णों का ध्रुवीकरण कर सकता है बल्कि बाकी जनता भी इसके चलते भाजपा को ही चुनने का फैसला कर सकती है। तमिलनाडु में तो द्रविड़ आंदोलन ने सवर्णों को कब का राजनीति से बाहर कर दिया है इसलिए वहां सनातन को खत्म करने या न करने के बयान का चुनाव पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा।
द्रविड़ आंदोलन ने वहां की पिछड़ी, दलित, शोषित जनता को दशकों से इस कदर जागरूक कर रखा है कि वह वहां केवल बराबरी चाहती है और सवर्णों का वर्चस्व वह किसी भी सूरत में नहीं स्वीकारेगी।
जबकि बंगाल में मूलतः जमींदारी और सामंती व्यवस्था ही हावी रही है। वहां की क्षत्रिय जाति कायस्थ ही वहां के राजा, सामंत और जमींदार रहे हैं। इसलिए जमीन जायदाद और राजनीतिक ताकत में कायस्थों के मुकाबले वहां कोई जाति नहीं रही लेकिन सत्ता, रुतबे और धार्मिक वर्चस्व में ब्राह्मण और कायस्थों में 19-20 का ही फर्क रहा है।
चारू मजूमदार के नक्सली आंदोलन का निशाना कायस्थ वर्ग के जमींदार सामंत और पुरोहित वर्ग के ब्राह्मण, इन्हीं दो जातियों पर था।
ये दोनों जाति वर्ग भी तब तक नक्सली आंदोलन के सामने लगभग हार मान ही चुके थे , जब तक चारू ने बंगाल की नस नस में व्याप्त देवी पूजा और मंदिरों पर सीधा हमला करके धर्म को नष्ट करने की नीति नहीं अपनाई थी।
जमींदारों की जमीन छीनना और उसे सामाजिक न्याय के लिए शोषित, दलित और वंचित तबकों में बांट देना एक ऐसा आदर्श था, जिसे खुद कायस्थ जमींदारों और ब्राह्मणों के बच्चे बड़े बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ते समय नक्सली छात्र, सांस्कृतिक एवं मुख्य दलों से जुड़कर अपना रहे थे।
वे बंगाल ही नहीं पूरे देश और दुनिया में मार्क्सवाद के जरिए समानता लाने पर अडिग थे। लिहाजा कायस्थ जमींदार चाह कर भी नक्सली आंदोलन के खिलाफ सरकार और प्रशासन के कड़े एवं आर पार के रुख का समर्थन नहीं कर रहे थे। पुलिस की गोली नक्सलियों के नाम पर खुद उनके ही बच्चों को निशाना बना देती।
जमीदारों की इस मजबूरी और जमींदारों के बच्चों के नक्सली आंदोलन से जुड़ने के कारण बंगाल में नक्सली आंदोलन ने जबरदस्त तेजी पकड़ ली थी। कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे कायस्थ वर्ग से ही थे लेकिन अपनी ही बिरादरी के जमींदारों की जमीन जायदाद को बचाने में असफल माने जा रहे थे।
जैसे ही नक्सली आंदोलन ने धर्म स्थलों, मूर्तियों और त्योहारों से सीधा पंगा लिया, अचानक माहौल बदलने लगा। बंगाल की धर्मभीरू जनता को धर्म पर हमला पसंद नहीं आया। कायस्थ जमींदारों और ब्राह्मणों के बच्चे भी धर्म से ऐसी सीधी लड़ाई से कतराने लगे।
ऐसे में ज्योति बसु के रूप में कायस्थ समाज वर्ग से ही एक ऐसा नेता उभरकर सामने आया, जो था तो वाम पंथी लेकिन चारू मजूमदार की तरह धर्म, मंदिर, मूर्तियों और त्योहारों का दुश्मन नहीं था।
जमींदारों से जमीन छीनने और राज्य में बराबरी लाने के लिए जोर जबरदस्ती का हिंसक रास्ता अपनाने की बजाय बसु चुनाव लड़कर लोकतांत्रिक तरीके से वामपंथ लाने के पक्षधर थे।
नतीजा यह हुआ कि बंगाल के कायस्थ जमीदारों, कुलीनों और ब्राह्मणों ने राहत की सांस ली और बसु को तन मन से ही नहीं बल्कि धन से भी समर्थन दे दिया। जनता भी चारू के धर्म पर हमले से नाराज़ तो थी ही, बसु ने उन्हें अपनी तरफ खींचने में कामयाबी हासिल कर ली।
फिर बाद का इतिहास तो सभी को पता है कि चारू मजूमदार को कितनी आसानी से पुलिस ने यातना देकर मार डाला और नक्सली आंदोलन को खुद बसु ने कुचलने के लिए बरसों तक पुलिस तंत्र से बेपनाह करतूतें करवाईं।
जाहिर है. बंगाल में वामपंथ लाने के लिए धर्म पर हमला चारू और उनके आंदोलन के खात्मे की वजह बना। तो लोकतंत्र से वामपंथ लाने का विरोधाभासी सपना दिखाकर बसु ने बंगाल पर डेढ़ दो दशक तक अपनी बादशाहत बनाए रखी।
बहरहाल, चुनाव सर पर हैं। राहुल गांधी ने अदानी, मणिपुर, भ्रष्टाचार आदि मसलों पर मोदी को घेर कर अपनी छवि पहले से काफी मजबूत कर ली है। इंडिया नाम से मोर्चा गठित हो चुका है और लड़ाई फिलहाल राहुल के मुद्दों पर ही लड़ने की तैयारी भी है।
ऐसे में स्टालिन के सनातन धर्म के खत्म होने वाले आक्रामक बयान ने एक बार फिर अगर धर्म का मुद्दा गरमा दिया तो भाजपा को मुंह मांगी मुराद मिल जाएगी। वह तो चाहती ही यही है कि चुनाव में लड़ाई धर्म, देशभक्ति, पाकिस्तान. कश्मीर, मुसलमान आदि के उसके मुद्दों पर हो….


