ओम थानवी-
मुट्ठी-भर अख़बार बचे हैं। इक्के-दुक्के संपादक। संकर्षण ठाकुर उनमें एक थे। द टेलिग्राफ़ के संपादक। रिपोर्टर। शानदार इंसान और जानदार लेखक।
सुलझा हुआ लिखते थे। साफ़-साफ़। वह साफ़गोई और साहस अब दुर्लभ हो चले। उनके जैसे संपादकों के होते टेलिग्राफ़ गोद-पड़े अख़बारों के बीच अलग चमक रखता था।

बिहार को तो वे अंदर-बाहर से जानते थे। ‘बंधु बिहारी’ किताब कितनी चर्चित हुई। लेकिन कश्मीर पर भी लिखते तो लगता उतनी ही वहाँ की पैठ है। असल में टेबल-रिपोर्टिंग नहीं करते थे। मौक़े की ख़ाक छानकर आते।
उन्होंने अपनी पहचान इस तरह बनाई कि ज़्यादातर लोग उन्हें पिता जनार्दन ठाकुर (ऑल-द-प्राइममिनिस्टर्स-मैन लिखने वाले) के नाम से नहीं जानते थे। उनके चाचा प्रियदर्शी ठाकुर शायर हैं। मेरे मित्र हैं।
परिवार से दुख की इस घड़ी में समवेदना ही प्रकट कर सकता हूँ।
संकर्षण से मेरी घनिष्ठता नहीं थी। लेकिन जब राज्यपाल कलराज मिश्र की बहुचित्र कॉफ़ीटेबल जीवनी की ख़रीद विवादग्रस्त हुई (बुद्धिजीवियों और लेखक संगठनों ने संवैधानिक मर्यादा और नैतिक आदर्शों की बात उठाई थी) तो संकर्षण ने मुझे लिखा — “Obnoxious, सुन पाना भी कठिन है”।
2018 में जब मैं दिल्ली में राजस्थान पत्रिका का सलाहकार संपादक हुआ, आइएनएस इमारत में उनका दफ़्तर हमसे एक कमरा छोड़कर था। एक रोज़ मैंने कहीं निकलते हुए उनके कमरे में झाँक लिया। वे खाना खा रहे थे। मैंने कहा, बाद में मिलते हैं।
बाद में मैं जयपुर चला आया। हमारे बीच बस वॉट्सऐप संदेश आए-गए। दुबारा मिलना नहीं हुआ। अब कहीं और मिलेंगे। अलविदा, बंधु!
प्रकाश के रे-
जाने-माने पत्रकार संकर्षण ठाकुर का निधन अत्यंत दुखद है. मुझे कई बार उनसे बात करने का मौक़ा मिला है. जितना सुंदर उनका व्यक्तित्व था, आवाज़ भी बड़ी असरदार थी, अंदाज़ तो निराला था ही. उनकी पत्रकारिता तथा उनके रिपोर्टों और किताबों की भाषा एवं कहन के ढंग से उनके अनगिनत पाठक परिचित हैं.
वे बिहार को लेकर बड़े आशान्वित रहा करते थे. एक बार पटना में बहुत साल पहले एक दावत में एक पत्रकार-संपादक ने उनके साथ बातचीत का हवाला दिया कि उन्होंने कहा था कि बिहार एक फ़्यूचर टेंस है. इस पर मैंने ग़ालिब का शे’र पढ़ दिया- हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन / दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है… उन्हें कुछ ठीक नहीं लगा. उन्होंने बड़ी-बड़ी आँखों से घूरते हुए मुझसे पूछा- आपने अपना नाम क्या बताया था!
बहरहाल, उसके बाद उनका स्नेह रहा. बिहार में जब भी चुनाव होते थे, तो उनके बिहार दौरे के दौरान पूछा करता था- कैसा मौसम है सर? उनका जवाब होता था- मौसम बहुत अच्छा है, चुनाव में दिल्ली क्या बैठे हो? आपातकाल पर उनके पिता प्रसिद्ध पत्रकार जनार्दन ठाकुर की किताबों के बारे में एक दफ़ा पूछा कि कहीं से प्रतियाँ उपलब्ध हो सकती हैं. उन्होंने बताया कि फिर से छापने की कोशिश हो रही है, हमारे पास एक ही प्रति है और माताजी उन प्रतियों को किसी को छूने नहीं देती हैं.
एक बार मैंने पूछा था कि ‘रोविंग एडिटर’ कैसा एडिटर होता है. उन्होंने हँसते हुए कहा था- जिसके पास कोई काम नहीं होता. कितना काम किया संकर्षण ठाकुर ने!

जब इतिहास में दशकों तक बिहार की राजनीति के शीर्ष पर रहे इन दो नेताओं का आकलन होगा, तो संकर्षण ठाकुर की यह किताब बहुत काम आएगी. यह किताब ‘बंधु बिहारी’ शीर्षक से हिंदी में भी उपलब्ध है.
अनिल सिन्हा-
सुबह संकर्षण ठाकुर के नहीं रहने की खबर मिली तो ख्याल आया कि पत्रकारिता में यकीन रखने वाले पत्रकारों की संख्या अब गिनती की रह गई. जब संकर्षण पत्रकारिता में आये होंगे तो उनके सामने अनेक उदाहरण होंगे, जब उन्होंने दुनिया छोड़ी तो मैदान लुच्चे लोगों से भरा है.
लगातार विपन्न होती पत्रकारिता और भी विपन्न हो गई है. लोकतंत्र, सेकुलरिज्म और जन सरोकार में कितने लोगों की आस्था रह गई है? कितने लोग ऐसे बचे हैं जिनकी रूचि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के बदले सामाजिक बदलाव लाने वाले नेताओं में है?

यह अस्सी के दशक का असर था. समय के साथ उन्होंने अपना रंग नहीं बदला और बिना शोर मचाये चलते रहे. सहजता और आत्मियता उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थी. शायद यही उनकी ताकत थी.
लेकिन सबसे ज्यादा योगदान टेलीग्राफ के मालिक का है जिन्होंने सत्ता के सामने सजदा करने वालों की जगह संकर्षण को अपना माना. संकर्षण याद आयेंगे. उन्हें हार्दिक श्रद्धान्जलि.
मूल खबर…
निधन : आज की पत्रकारिता के माहौल में ‘टेलीग्राफ’ को ऊंचाई पर पहुँचाना संकर्षण ठाकुर जैसों के बस का ही था!


