आज के अखबार, भाग – दो
संजय कुमार सिंह
दिल्ली या देश की राजधानी में दीवाली जैसे त्यौहार के कारण, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद प्रदूषण था और हवा की गुणवत्ता पांच साल में सबसे बुरी थी तो यह राजनीति ही है। लेकिन मुझे लगता है कि इंडियन एक्सप्रेस के मुकाबले देशबन्धु ने इसे ज्यादा अच्छी तरह प्रस्तुत किया है। निष्कर्ष निकालना पाठकों पर छोड़ दिया है। निश्चित रूप से यह राजनीति देश और जनता के लिए बुरी है। पार्टियों के गुण-दोष के साथ हिन्दुत्व और हिन्दुओं के त्यौहार आदि के मु्द्दे को समझाए जाने की जरूरत है लेकिन अखबारों की प्रस्तुति अपने विशेष पाठकवर्ग के लिए भी होती है और इस अंतर को इस दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए। देशबन्धु ने सिरसा के आरोप के साथ आप के सौरभ भारद्वाज के पलटवार को भी जगह दी है और तार्किक बात की है कि पंजाब का एक्यूआई सिर्फ 156 था। ऐसे में पंजाब में किसानों को पराली जलाने के लिए मजबूर भी किया गया हो तो वह किसानों के हित में हो सकता है और उसका नुकसान न पंजाब में न दिल्ली में हो सकता है। लेकिन दीवाली पर आतिशाबाजी चलाने की छूट दिलाना, इसका दावा करना और सीमित समय के लिए सिर्फ हरित पटाखों की अनुमति होने के बावजूद कोई रोक नहीं लगना, पूरे एनसीआर में सुप्रीम कोर्ट का निर्देशों का पालन नहीं होना, भाजपा सरकार की कार्यशैली, स्वायत्ता और संविधान के पालन पर टिप्पणी है और इसे ऐसे ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। भाजपा हिन्दुओं की राजनीति करती है। यह अब खबर नहीं है और यह भी नहीं कि कांवड़ यात्रियों पर फूल बरसाए जाते हैं और सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ने की इजाजात नहीं है। खबर यह है कि हिन्दुओं का हित साध कर वोट लेने के फेर में भाजपा अपना, अपने लोगों का हिन्दुओं का और देश का भी नुकसान कर रही है। आतिशबाजी की इजाजत दिलाकर और फिर उसका पालन नहीं करके ऐसा ही किया गया है। दूसरी ओर छठ मनाने जाने वालों के लिए कुछ खास नहीं किया है और इस साल भी कई मामलों में स्थिति वैसी ही रही जैसी 1990 के दौरान होती थी।
इस साल प्रदूषण या एक्यूआई अगर चार या पांच साल में सबसे ज्यादा था तो जाहिर है कि स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ती जा रही है। हालत ऐसी हो गई है कि दिल्ली की दीवाली में दिल्ली आने वाले लोग अब दीवाली और आस-पास दिल्ली में रहने से बचते हैं। इस साल की स्थिति अगले साल भी लोगों को ऐसा करने के लिए प्रेरित करेगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली की दीवाली को उसका पुराना सम्मान दिलाने के लिए कई साल काम करने की जरूरत होगी। इसमें खबर यह भी है और देशबन्धु ने ही इसे पहले पन्ने पर छापा है कि अस्पतालों में सांस के मरीज बढ़ गए हैं। आप जानते हैं कि सरकार नए अस्पताल बनवाने की जगह बीमा करवाती है और आयुष्मान योजना भी बीमा ही है। उसका लाभ जिन लोगों को जैसे मिलेगा या मिलना है वह भी तभी संभव होगा जब व्यक्ति इलाज करा पाए, जीवित रहे। पर जो हालात हैं उसमें सीमित राशि से गरीब का इलाज करा पाना कितना संभव है, पता नहीं। सरकारी अस्पतालों में जगह नहीं होती है, एम्स में महीनों इंतजार करना पड़ता है यह सब तो पुरानी बात हो गई। अब महंगे निजी अस्पलातों में भी खाली बिस्तर नहीं होते हैं और यह मैं कोविड के समय से सुनता रहा हूं। कोविड के समय वेंटीलेटर खरीदने का क्या हुआ और कैसे खरीदे गए उससे क्या लाभ मिला, बताने की जरूरत नहीं है। फिर भी अगर अखबारों को यह महत्वपूर्ण नहीं लगे तो आप स्थिति का अनुमान लगा सकते हैं। आज के मेरे अखबारों ने दिल्ली के प्रदूषण पर तकरीबन अच्छी खबर दी है। इंडियन एक्सप्रेस और दि एशियन एज अपवाद है।
इस बीच प्रधानमंत्री अपने चुनावी मोड में बने हुए हैं। अभी भी ऑपरेशन सिन्दूर को कामयाब बता रहे हैं। दावा कर रहे हैं कि ऑपरेशन सिन्दूर ने अन्याय का बदला लिया। मन की बात करते हुए अब देशवासियों को पत्र लिखा है। दूसरी ओर, आज कई अखबारों में खबर है कि आतंकवाद खत्म कर देने के दावे के बावजूद आज देशबन्धु की खबर है, विदेशी आतंकियों ने जम्मू और कश्मीर पुलिस की नाक में किया जम। मुख्य शीर्षक है, रोजाना सवा सौ से अधिक सर्च अभियानों से जूझ रही है। सुरेश एस डुग्गर की खबर में कहा गया है कि आतंकी अब जम्मू-संभाग को निशान बना रहे हैं। आइए, आज की कुछ और अलग दिखने वाली खबरों की चर्चा कर लें। अमर उजाला में एक खबर का शीर्षक है, केंद्र भी रद्द कर सकेगा दवा कंपनियों के लाइसेंस। मुझे लगता है कि इस कानून की जरूरत अब क्यों महसूस की गई और केंद्र सार अधिकार अपने पास क्यों रखना चाहता है। मोटी सी बात है जहरीली दवा के मामले में सरकारी अधिकारियों ने समय पर लगभग कोई कार्रवाई नहीं की। इससे विदेशों में बदनामी तो हुई ही, भारत में भी बच्चों की मौत हुई जो रोकी जा सकती थी। मोटे तौर पर मामला यह है कि सरकार को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी जो लगभग नहीं हुई। दूसरी ओर, खबर यह भी थी कि दवा बनाने वाली कंपनियों ने इलेक्टोरल बांड खरीदे थे। जाहिर है अपना धंधा सामान्य ढंग से करने और ज्यादा मुनाफा न कमाने वालों को चंदा देने की जरूरत नहीं है औरं चंदा दिया गया तो दबाव हो सकता है। सवाल है कि क्या दबाव उन अधिकारियों का था जिनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। और अगर ऐसा नहीं है तो लाइसेंस रद्द करने का अदिकार सरकार को क्यों चाहिए। जाहिर है, यहां पारदर्शिता की जरूरत है और वह नहीं है। दूसरी ओर, मोदी सरकार के जो दावे होते हैं वो अपनी जगह हैं।
बिहार चुनाव से संबंधित तमाम गड़बड़ियों और आरोपों के बीच आज एक खबर है, चुनाव आयोग ने विज्ञापनों के लिए जारी किए सख्त निर्देश। मुझे लगता है कि इसमें कुछ नया नहीं है और यह नियम पहले से है। चुनाव आयोग के जिन मामलों में कार्रवाई करना चाहिए और जिनपर अपना पक्ष रखना चाहिए वैसे तमाम मामलों में चुप्पी साधे आयोग के इस निर्देश का कोई खास महत्व नहीं है। फिर भी यह पहले पन्ने की खबर है। एक आरोप द टेलीग्राफ में भी है। प्रशांत किशोर ने कहा है उनके उम्मीदवारों को धमकाया जा रहा है। मुझे लगता है कि प्रशांत किशोर को बिहार चुनाव में भाजपा की बी टीम मानने के पर्याप्त कारण हैं। ऐसे में इस दावे का अलग महत्व है और इससे बी टीम के दावों की सच्चाई भी मालूम हो सकती है। देखना है, अखबार वाले ऐसा कुछ करते हैं कि नहीं और अगर करते हैं तो वह कौन सा अखबार होता है। राजग में तमाम विरोध की खबरों के बीच दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, झामुमो के बिहार की दौड़ से अलग होने से इंडिया समूह को झटका। कहने की जरूरत नहीं है कि झामुमो बिहार में ऐसी बड़ी ताकत नहीं है और वह चुनाव नहीं लड़ेगा तो इंडिया ब्लॉक को झटका लगने का कोई कारण नहीं है। चुनाव नहीं लड़कर भी वह इंडिया समूह का साथ दे सकता है। और यह झटका नहीं सहयोग होगा। राजनीतिक खबरों का यह हाल है तो अमेरिकी एच-1बी वीजा पर स्पष्टीकरण बताता है कि अमेरिका या अमेरिका की ट्रम्प सरकार भी भारत सरकार जैसी हो गई लगती है। इस शुल्क में वृद्धि की खबर जिस दिन आई थी उसके अगले ही दिन आदेश में स्पष्टीकरण के बाद से इस आदेश को लेकर मेरी राय ऐसी ही बन गई है।
द हिन्दू में भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के हवाले से एक महत्वपूर्ण खबर है जो बताती है कि भारत में शुद्ध एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेश निवेश) में 159 प्रतिशत की कमी आई है। इसके साथ छपी खबर बताती है कि आठ अहम क्षेत्रों में विकास धीमा हुआ है और यह तीन महीने में सबसे कम तीन प्रतिशत है। दूसरी ओर, सरकार जीएसटी दरों में कमी करने का श्रेय लेकर बचत उत्सव मनाने का प्रचार कर चुकी है। तब भी कहा गया था और अब इन खबरों से यह स्प्ष्ट हो चला है। लेकिन इन खबरों को ना प्रमुखता मिलती है ना ही इनपर चर्चा होती है। (समाप्त)
लिंक – https://www.bhadas4media.com/diwali-ke-baad-pradushan-badi-chinta-lekin/
पहली किस्त पढ़ें : आज के अखबार : दीवाली के बाद प्रदूषण बड़ी चिन्ता, इंडियन एक्सप्रेस-एशियन एज की एक जैसी राजनीति
लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है.


