
खबर को कम महत्व देने के लिए शीर्षक भी वैसा ही चुना जाता है
खबर ऐसे भी छप सकती थी, कहीं और दिखी?

संजय कुमार सिंह
आज कई अखबारों ने दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से आवारा कुत्ते हटाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को प्रमुखता से छपा है। कई अखबारों में यह खबर लीड है। लेकिन चुनाव आयोग के खिलाफ 300 सांसदों के सड़क पर उतरने की खबर को इससे कम महत्व मिला है। मेरे नौ अखबारों में यह सिर्फ देशबन्धु में लीड है जबकि आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश वाली खबर अमर उजाला के दूसरे पहले पन्ने पर लीड है और सांसदों के प्रदर्शन की खबर फोल्ड से नीचे है। दो कॉलम की फोटो के साथ चार कॉलम में। इसके साथ सिंगल कॉलम की एक खबर है, भाजपा ने कहा – अस्थिरता फैलाने की सुनियाजित साजिश। आप जानते हैं कि चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष का यह आंदोलन पूर्व घोषित था। बिहार में चल रहे एसआईआर के खिलाफ आंदोलन पहले से चल रहा था। हाल में राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि लोकसभा चुनाव में कर्नाटक के बैंगलोर सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र में भाजपा की जीत चोरी के वोट से हुई है। यह तथ्य है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की 25 सीटें कम होतीं तो उसकी सरकार नहीं बनती और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं होते। उन्होंने कहा है कि चुनाव आयोग उन्हें मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची दे तो वे साबित कर देंगे कि 25 सीटें चोरी के वोट से जीती गई हैं। इस आरोप और चुनौती की गंभीरता को समझने और देशवासियों को तथ्य बताने की बजाय हमारा मीडिया सरकार और चुनाव आयोग का साथ दे रहा है। लग रहा है कि तीनों मिल कर काम कर रहे हैं और सब मिलकर राहुल गांधी का न सिर्फ विरोध कर रहे हैं उन्हें बदनाम और डिस्क्रेडिट करने का अपना अभियान जारी रखे हुए हैं।
इसी क्रम में कल विपक्ष के इस प्रदर्शन की खबर गंभीरता से नहीं थी। जब लगा कि जो हुआ वह ऐतिहासिक है और दुनिया भर में खबर फैल चुकी है तब आज उसे प्रमुखता दी गई है। आज कई अखबार इस खबर को पहले पन्ने पर प्रकाशित करने के लिए मजबूर हुए हैं। उसमें भी उन्हें कुत्ते वाली खबर ज्यादा महत्वपूर्ण लगी है। अमर उजाला में ये दोनों खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं और सरकार (असल में प्रधानमंत्री) की छवि बनाने वाली हेडलाइन मैनेजमेंट की खबरें हैं। लीड का शीर्षक है, “पाकिस्तान गैर जिम्मेदार देश… परमाणु ब्लैकमेल के आगे नहीं झकेंगे : भारत”। पहले पन्ने पर पांच कॉलम की इस लीड के अलावा दूसरी खबर भी पांच कॉलम की है। शीर्षक है, “जेलेंस्की को पीएम मोदी ने दिया भरोसा, संघर्ष विराम में देंगे हर संभव मदद”। उपशीर्षक है, “ट्रम्प-पुतिन की मुलाकात से पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति ने की बात : कहा – द्विपक्षीय रिश्तों को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध”। कुत्तों और सांसदों की खबर अमर उजाला में दूसरे पहले पन्ने यानी पेज नंबर तीन पर है जो पहले पन्ने पर ज्यादा विज्ञापन होने की स्थिति में पहले पन्ने जैसा बनाया जाता है। अमर उजाला में सरकारी प्रचार वाली जो खबर लीड है वह दि एशियन एज, द हिन्दू और द टेलीग्राफ में लीड है। नवोदय टाइम्स में ‘सड़कों से हटायें कुत्ते’ दो कॉलम की लीड है लेकिन ‘वोट चोरी की लड़ाई सड़क तक’ टॉप पर चार कॉलम में है।
दिल्ली की सड़कों पर सांसदों के प्रदर्शन की खबर कोलकाता के दैनिक द टेलीग्राफ में भी पहले पन्ने पर प्रमुखता से है आवारा कुत्तों वाली खबर छह लाइन की सिंगल कॉलम में है। कहने की जरूरत नहीं है कि संसद का सत्र चलते हुए, संसद में कई बार मुद्दा उठाने पर भी चर्चा नहीं होने पर कल सांसदों का यह प्रदर्शन अपनी तरह का पहल और पर्याप्त बड़ा व महत्वपूर्ण था। इसलिए अखबारों को पहले पन्ने पर तो छापना ही था लेकिन महत्व कम कर दिया गया है और इसके लिए कुत्तों की खबर को भी ज्यादा महत्व दिया गया है। यह अमृतकाल में संपादकीय विवेक की स्थिति है। सांसदों के प्रदर्शन को मेरे नौ अखबारों में सबसे ज्यादा महत्व देशबन्धु ने दिया है और तीन तस्वीरों के साथ पांच कॉलम की लीड का शीर्षक है, “यह संविधान बचाने की लड़ाई : राहुल”। यह विपक्ष के नेता और आंदोलन को पर्याप्त महत्व देने का उदाहरण है जो मीडिया भूल सा गया है। आज भी नहीं लगता है कि होश में आया है। सांसदों की इस ‘व्यस्तता’ के बीच नया आयकर बिल लोकसभा में बिना चर्चा के पास हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन करगे ने इसे लोकतंत्र के साथ धोखा बताया है और सरकार से जवाब मांगा है। यह खबर लीड के साथ टॉप पर है। उधर, प्रधानमंत्री ने कहा है, सांसद जब अपनी निजी परेशानियों से मुक्त होंगे तो वे जनता को अधिक समय दे पायेंगे तथा उनकी समस्याएं हल कर सकेगे। वे सांसदों के लिए दिल्ली के बाबा खड़क सिंह मार्ग पर बने 184 टाइप सेवन फ्लट की बहुमंजिली बिल्डिंग का उद्घाटन करने के मौके पर बोल रहे थे।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने सांसदों के मार्च को पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है। चार कॉलम की लीड के साथ दो कॉलम की फोटो भी है। मुख्य शीर्षक है, “विपक्ष के 300 सासंदों ने ‘वोट चोरी’ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के लिए चुनाव आयोग तक मार्च किया”। इसके साथ सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, भाजपा ने कहा विपक्ष फोटो ऑपरचुनिटी (मौका) चाहता था, चर्चा नहीं। अखबार ने लिखा है, भाजपा ने मंत्रियों – शिव राज सिंह चौहान, धर्मेन्द्र प्रधान और पीयूष गोयल को विपक्ष के मुकाबले के लिए मैदान में उतारा। इस खबर का इंट्रो है, ‘इजाजत नहीं’ : इंडिया ब्लॉक के कई नेता हिरासत में लिये गये। अधपन्ने पर इस लीड के नीचे मुनीर के बयान पर भारत की प्रतिक्रिया दो कॉलम में है जो अमर उजाला में पांच कॉलम की लीड है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक बताता है कि पाकिस्तान के खिलाफ भारत के आज के हेडलाइन मैनेजमेंट का कारण क्या है। शीर्षक है, भारत ने कहा – अमेरिका की मिट्टी से मुनीर की परमाणु चेतावनी बताती है कि पाकिस्तान ‘गैर जिम्मेदार’ है। पहली बार प्रधानमंत्री चुने जाने पर शपथग्रहण में नवाज शरीफ को बुलाने और फिर बिना बुलाये (या बिना तय कार्यक्रम) पारिवारिक समारोह में जाने वाले नरेन्द्र मोदी की सरकार और उनके कार्यकाल में पाकिस्तान को न जाने कितनी बार गैर जिम्मेदार कहा गया है और परमाणु ब्लैकमेल में नहीं आयेंगे की ‘वीरता’ भी कई बार जताई जा चुकी है। फिर भी आज अखबारों में इस खबर को महत्व मिला है तो मकसद समझना मुश्किल नहीं है।
दि एशियन एज में प्रदर्शन की खबर को लीड माना जा सकता है हालांकि यह फोटो के साथ है और शीर्षक से ऊपर फोटो है। खबर का शीर्षक है, चुनाव आयोग तक मार्च के दौरान राहुल (गांधी), प्रमुख विपक्षी सांसद गिरफ्तार। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने की लीड कुत्तों वाली खबर है। शीर्षक है – सुप्रीम कोर्ट का आदेश, दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से सभी आवारा कुत्ते हटाये जायें। इस तरह आप समझ सकते हैं कि चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान बिहार की मतदाता सूची से 65 लाख नाम हटा दिये। इसके खिलाफ याचिका पर आज सुनवाई है लेकिन कुत्तों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को आदेश देना पड़ा या कुछ लोग कह रहे हैं कि दिल्ली की भाजपा सरकार ऐसा चाहती थी और उसे अब कोर्ट का आदेश मिल गया। वास्तविकता जो हो या दोनों हो, तथ्य है कि चुनाव आयोग ने वोटर तो आसानी से हटा दिये पर सरकार को कुत्ते हटाने के लिए आदेश मिल गये हैं। आप इसे चाहें जैसे देखिये, यह संयोग है या प्रयोग, मैं नहीं जानता। इंडियन एक्सप्रेस में चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन की खबर नहीं है, फोटो लगाकर काम चलाया गया है। कुत्तों वाली खबर तीन कॉलम की लीड है और मुनीर के खिलाफ भारत का बयान बराबर में दो कॉलम की खबर है। बीच के तीन कॉलम में विपक्ष के प्रदर्शन की खबर है। इंडियन एक्सप्रेस ने सांसदों के प्रदर्शन की फोटो के नीचे कर्नाटक के एक मंत्री के इस्तीफे (क्विट्स यानी छोड़ दिया) की खबर छपी है। फोटो के साथ छोटी सी खबर से मामला स्पष्ट नहीं होता है लेकिन शीर्षक है, कर्नाटक के “मंत्री ने अपनी टिप्पणी, ‘कांग्रेस ने मतदाता सूची की निगरानी नहीं की’ के लिए इस्तीफा दिया, कहा साजिश है”।
लाइव हिन्दुस्तान डॉट कम के अनुसार, कर्नाटक के सहकारिता मंत्री केएन राजन्ना को सोमवार को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया। खास बात है कि राजन्ना को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का करीबी माना जाता था, लेकिन कहा जा रहा है कि वोट चोरी के मुद्दे पर कांग्रेस को ही घेरने के चलते उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है। हालांकि, इसे लेकर कांग्रेस या राज्य सरकार ने साफतौर पर कुछ नहीं कहा है। अखबार ने लिखा है, राजन्ना ने जून में ही दावा किया था कि प्रदेश कांग्रेस में कई पावर सेंटर हैं और सितंबर में बड़ा फेरबदल हो सकता है। उन्होंने कहा था, ‘सितंबर होने दो…। प्रदेश की राजनीति में कुछ होगा। इसकी शुरुआत (सितंबर के बाद) होगी।’ इस खबर का शीर्षक है, इस्तीफा नहीं चाहिए, बाहर करो; राहुल गांधी के कहने पर निकाले गए कर्नाटक के मंत्री? यहां कांग्रेस के एक पूर्व सांसद, संजय निरुपम का ट्वीट उल्लेखनीय है जो अब भाजपा वाली शिवसेना में हैं। उन्होंने लिखा है और इसे कम से कम एक अखबार ने छापा है, तथाकथित एटम बम का धमाका उल्टा हो गया। आदित्य श्रीवास्तव सामने आये हैं। वे लखनऊ के हैं। जब वहां थे तो वोटर थे। फिर मुंबई आए, यहां वोटर हो गये। फिर शिफ्ट हो गये बेंगलुरु, वहां वोटर हो गये। इसमें चुनाव आयोग का षडयंत्र क्या है? कांग्रेस को हवा में तीर छोड़ने का धंधा बंद करना चाहिये। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह एक आदमी का नाम तीन-तीन जगह नहीं रह सकता है और रहने लगे तो सबका रहना चाहिये। एक आदितय श्रीवास्तव का ही क्यों। हालांकि, पता बदलने पर नई जगह नाम लिखवाने के आवेदन में यह भी लिखना होता है कि पुरानी जगह से नाम हटा दिया जाये और यह चुनाव आयोग का काम है। 70 साल का मतदाता पहली बार का वोटर नहीं हो सकता है। उसके लिए दूसरा फॉर्म है और उसकी घोषणाएं अलग होंगी।
यही नहीं, दो एपिक कार्ड या दो जगह नाम होने के लिए चुनाव आयोग ने तेजस्वी यादव और फिर बिहार के मंत्री विजय सिन्हा को नोटिस दिया है। लेकिन शकुन रानी का नाम दो जगह होने और दोनों के वोट पड़ने के राहुल गांधी के आरोप पर चुनाव आयोग ने उन्हें भेजे पत्र में लिखा है, पूछताछ में सकुन रानी ने कहा है कि उन्होंने एक ही बार वोट किया है, न कि दो बार जैसा कि आपने आरोप लगाया है। यहां सवाल यह है कि दो बार नाम होना ही गलत है तो उसपर कार्रवाई करने, उसका जवाब देने की बजाय चुनाव आयोग यह साबित करने में क्यों लगा है कि श्रीमती शकुन रानी ने एक ही बार वोट दिया। वोट एक ही बार पड़ा हो, दो बार नाम होना सही है? इसका जवाब क्यों नहीं, कौन देगा और कब? यही नहीं, सुकन रानी ने एक बार वोट दिया या दो बार यह तो चुनाव आयोग के पास उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज से साबित हो जायेगा पर निजता की रक्षा और देश भर के सभी फुटेज देखने में 3600 साल लगेंगे के बिना पर फुटेज 45 दिन बाद नष्ट करने का नियम बना दिया गया है और राहुल गांधी से सबूत मांगा जा रहा है। अब सबूत यह निकलकर आया है कि सकुन रानी के नाम दो नहीं, तीन जगह हैं। यानी चुनाव आयोग (गोदी चैनल भी) किसी को तो नोटिस दे रहा है और किसी को स्पष्टीकरण का मौका। राहुल गांधी को भेजे पत्र में आगे कहा गया है, इस कार्यालय द्वारा की गई प्राथमिक जांच से पता चलता है कि आपने अपने प्रेजेंटेशन में सही का निशान लगा जो दस्तावेज दिखाया है वह चुनाव अधिकारी द्वारा जारी दस्तावेज नहीं है। हो सकता है न हो और होना जरूरी भी नहीं है। लेकिन अपने आका की सेवा में लगे चुनाव आयोग के मुखिया के मातहतों को शायद यह बताये जाने की जरूरत है कि मतदान के समय चुनाव आयोग के अधिकारी के अलावा सभी दलों या उम्मीदवारों के नुमाइंदे होते हैं जो मतदाता सूची पर मतदान करने आये मतदाता के नाम के आगे निशान लगाते हैं।
राहुल गांधी को यह दस्तावेज अपनी या किसी और पार्टी के एजेंट से मिला हो सकता है और जरूरी नहीं है कि चुनाव आयोग का अधिकृत दस्तावेज इससे अलग हो। मुझे नहीं लगता कि यह सूची चुनाव आयोग के अधिकृत दस्तावेज में होगी। अगर है तो चुनाव आयोग इसे जारी करके बताये कि जितने वोट पड़े हैं वो किसके हैं और जो नहीं पड़े वो किसके? बहुत सारे भक्तों ने कहा है कि फर्जी वोट हैं तो क्या हुआ, पहले भी होते थे। वो वोट पड़े हैं, कैसे पता चलेगा? यह सब तब जब वोट पड़ा या नहीं, मुद्दा होना ही नहीं चाहिये। मुद्दा (जो चुनाव आयोग को देखना है) यह है कि दो बार नाम कैसे है? इसका जवाब देने या तलाशने की जगह चुनाव आयोग लगभग फालतू काम में लगा है। ऐसे काम कर रहा है जिसकी जरूरत ही नहीं है। दूसरी ओर पहले तेजस्वी को नोटिस और अब विजय सिन्हा को लेकिन सकुन रानी को नहीं? या दिया हो तो बताया नहीं है और उस मामले में राहुल गांधी से पूछताछ हो रही है। और जो सब हो रहा है वह हम देख ही रहे हैं। अभी तक खबर भी नहीं छप रही थी आज छपी है तो कुत्तों को ज्यादा महत्व दिया गया है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


