विष्णु नागर-
दैनिक भास्कर में सोमवार के दिन घोषणा होती है कि वह ‘देश का एकमात्र नो निगेटिव अखबार’ है। उसके फ्रंट पेज पर कुछ सकारात्मक- सी खबरें होती हैं लेकिन अक्सर उसी पेज तक क्योंकि हिंसा और झूठ समाज का एक बड़ा सत्य भी है और वह बिकाऊ है। इसे अनेक बार राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है, इसलिए इस तरह की खबरें छापना सुरक्षित भी है।
यही अखबार सोमवार के दिन बाकी खबरों को दबाकर सिर्फ ‘सकारात्मक’ खबरें छापे तो पिट जाएगा। इसलिए आज के दिल्ली संस्करण को देखें तो इसमें दर्जन भर से अधिक ही हिंसात्मक खबरें हैं।
जिस तरह की ‘सकारात्मक खबरें’ उसमें छपती हैं, उनका महत्व गर्मी में प्याऊ खोले देने जैसा है। अनेक बार लगता है कि हिंसा और दमन की व्यापक सच्चाई को दबाने- धकेलने में भी जाने- अनजाने इसकी भूमिका होती है।
इस अखबार में हिंसाग्रस्त मणिपुर में शांति स्थापना के लिए पुस्तक मेले लगाए जाने की खबर है। छत्तीसगढ़ के एक बिल्डर ने मां के नाम पर एंबुलेंस सेवा शुरू की है, एक दिव्यांग महिला ने 4500 किलोमीटर कार से सफर का रिकार्ड बनाया है, आदि।
जिस मणिपुर की सकारात्मक खबर भास्कर ने छापी है, उसी मणिपुर की नकारात्मक खबर भी आज इसी अखबार में छपी है। वहां सरकारी बस से मणिपुर का नाम हटाने पर पुलिस और मणिपुर के एक संगठन के सदस्यों के बीच टकराव हुआ है। हिंसा और परस्पर अविश्वास आज भी वहां की बड़ी सच्चाई है। आज भी यह सच है कि प्रधानमंत्री की हिम्मत नहीं कि वहां जाएं पर पुस्तक मेले लग रहे हैं और इसे ख़बर बनाया गया है तो ठीक है।
वैसे रोज के अखबारों को देखें तो हिंसा, हिंसा की धमकी, हत्या, बलात्कार, अश्लील हरकतें और धर्म और अध्यात्म की आड़ में छिपी या खुली हिंसा के उपदेश या प्रवचन होते हैं। इस माहौल को बनाने में सरकार के सभी अंगों और उसके समर्थक तत्वों का किसी न किसी रूप में दैनिक योगदान होता है। यहां तक कि प्रधानमंत्री- गृहमंत्री आदि के कथनों पर गौर करें तो उसमें भी हिंसा और धमकी की भाषा अकसर दिखाई देती है। बहाना जो भी हो।
आज संघ प्रमुख का एक साक्षात्कार भी छपा है, जिसमें ‘शत्रु ताकतों से निबटने के लिए हिंदुओं को मजबूत करने की अपील है’। युद्ध के लिए स्मार्ट ड्रोन का ब्लूप्रिंट तैयार करने की खबर भी है। ऐसी कम से कम बीस खबरों का हवाला दिया जा सकता है, जो एक न एक किस्म से हिंसा का वातावरण बनाती हैं। फिर यह भी पढ़ने -जानने को मिलता है कि जो हिंसा करता है धर्म या भाषा या जाति के नाम पर उसी की आवाज़ सुनी जाती है। उसी का दबदबा चारों ओर छाया हुआ है।
सच यह है कि कोई भी अखबार आज हिंसा या हिंसक भाषा या हिंसक उपायों की जरूरत बताने की खबरों के बिना पूर्ण नहीं होता। ख़बरें सरकारी हिंसा या हिंसा की तैयारी के औचित्य की खबरों से भी भरे होते हैं। बदला लो, मार दो, काट दो की खबरों से भरे होते हैं। ऐसे में इस तरह की सकारात्मकता महज़ हिंसा की सच्चाई को छुपाने का बहाना सी लगती है क्योंकि ऐसे अखबारों में ऐसी हिंसा की खबरें दबाई जाती हैं, जो अल्पसंख्यकों, गरीबों के विरुद्ध लगभग रोज होती है।
आज के इस अखबार में ही मुझे गोकशी के नाम पर अलीगढ़ जिले में अल्पसंख्यक समुदाय के तीन युवकों की निर्मम पिटाई की खबर नहीं दिखी, जबकि ऐसी खबरें दिखीं, जिनमें अल्पसंख्यक समुदाय को किसी और संदर्भ में आरोपित किया गया है। मंत्रियों के मूर्खतापूर्ण कथनों का प्रमुखता से प्रकाशन हिंदी अखबारों की जिम्मेदारी सी बन गई है। और जिन अनिल अंबानी के दिवालिया होने की खबरें कभी छपती थीं, वे दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा मिलिट्री प्लांट महाराष्ट्र में खोल रहे हैं, यह खबर भास्कर ने पांच कालम में छापी है।


