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सियासत

दुनियाभर में सत्ता के मनमाफिक बोलने और लिखने वाले पत्रकारों की संख्या बढ़ी है!

नदीम अख्तर-

कुछ टीवी न्यूज एंकर्स को पता है कि उनका फलक क्या है? क्या करने से नौकरी बची रहेगी और तरक्की मिलती रहेगी। यह राजाओं के ज़माने में भी होता था। राजा की तारीफ लिखने के लिए विशेष गुणी व्यक्ति नियुक्त किए जाते थे। अब उसकी जगह पत्रकारिता ने ले ली है।

दुनियाभर में सत्ता के मनमाफिक बोलने और लिखने वाले तथाकथित पत्रकारों की संख्या बढ़ी है। रूस में आप पुतिन के खिलाफ और अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ नहीं बोल सकते। अमेरिका में फिलहाल कोई बोल भी ले लेकिन रूस में बिल्कुल नहीं। चीन में तो हरगिज नहीं।

एमेजॉन के मालिक बेज़ोस ने New York Times अखबार खरीदने के बाद उसे अपनी एडिटोरियल पॉलिसी चेंज करने के लिए बाध्य किया। इसलिए कि कहीं मालिक ट्रंप नाराज़ ना हो जाएं।

दरअसल, कई देशों में पत्रकारिता अब सत्ता प्रतिष्ठानों का भोंपू बनकर रह गई है। उन देशों में जो पार्टियां विपक्ष में हैं, वो अपनी बारी का इंतज़ार कर रही हैं। अब चूंकि परम्परा बन गई है कि पत्रकारों को कैसे टाइट करना है और कैसे उनका गला दबाना है, कैसे मीडिया मालिकों को लाइन पर लाना है तो वे बहुत खुश हैं।

विपक्ष को पता है कि जिस दिन वे सत्ता में आएंगे, उस दिन पत्रकारिता को और जलील करेंगे। पत्रकारों को और बड़ा गुलाम बनाएंगे। सारा खेल पैसे का है। मीडिया मालिक को पत्रकारिता से पैसे कमाना है और तथाकथित पत्रकार को अपना जीवन आर्थिक रूप से समृद्ध करना है। सो दोनों की जय-जय है।

पत्रकारिता अब बहुत कम लोगों के लिए मिशन है। नई पीढ़ी में देखता हूं तो बहुत कम लोग पत्रकार बनना चाहते हैं। ज्यादातर PR, मार्केटिंग, इवेंट मैनेजमेंट और कॉरपोरेट एंकरिंग जैसी फील्ड में जाना चाहते हैं। उनके लिए अब कोई पत्रकार प्रेरणा स्त्रोत नहीं। ज्यादातर तो बड़े पत्रकारों के चेहरे और नाम पहचानते तक नहीं।

नई पीढ़ी इंस्टाग्राम इत्यादि पर रील देखने में मस्त है। ज्यादातर का जनसरोकार सिर्फ अपने से है। मास कम्युनिकेशन में अब वे सेवा भाव से नहीं आते, कैरियर बनाने आते हैं। अब प्लेसमेंट और पैकेज प्रायोरिटी पर है।

हमने अपने पूरे पत्रकारिता करियर में ना कभी पैसा मांगा, ना पद मांगा। मुंह ही नहीं खुला। सामने वाले ने जो दे दिया, उसे कुबूल कर लिया। और हमारे समय के लोग बड़े थे। उन्होंने बिना मांगे अच्छे से अच्छा दिया।

अब पत्रकारिता में ना वैसे लोग हैं और ना वैसा कल्चर। अब सब कुछ बाज़ार है। और पत्रकार उस फैक्ट्री का एक पुर्जा। नई पीढ़ी के पत्रकारों की अब कोई पहचान नहीं बनती। समय बहुत बदल गया है। काल के कपाल पर ये सब कुछ अंकित रहेगा।

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