Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य

वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र पीएस की नई किताब- ‘मांसौषधि’

सत्येंद्र पीएस-

भारत में वैदिक धर्म मे आस्था रखने वाले लोग विश्व के समस्त ज्ञान का स्रोत वेद को मानते हैं। चार वेद हैं, जिन्हें अपौरुषेय कहा गया है। यानी उसे किसी एक व्यक्ति ने नहीं लिखा है, बल्कि सैकड़ों ऋषियों के शोध, गहन अध्ययन का परिणाम है। इस अध्ययन को ऋषियों के कुल ने पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों साल तक याद रखा और जब छपाई और कागज़ का आविष्कार हुआ तो उसे किताब के रूप में छापा गया।

आयुर्वेद को भी वेद से निकला हुआ कहा जाता है, जिससे हमारी चिकित्सा पद्धति विकसित हुई। आयुर्वेद के ग्रन्थों के बारे में भी स्पष्ट नहीं है कि किस व्यक्ति ने लिखी, किस से प्रेरित होकर लिखी गई। लेकिन उसमें लिखी गई अधिकतर बातें प्रमाणित होती जा रही हैं। जैसे एक मछली के बारे में बताया गया कि इसे खाने से कोढ़ होता है। 1930 के दशक में एलोपैथी के रिसर्चर्स ने उसका मज़ाक उड़ाया और 1960 आते-आते कह दिया कि हां, अगर कोई यह मछली निरन्तर साल दो साल खाता है तो उसे कोढ़ होने की संभावना है।

वेदों में बलि चढ़ाने की प्रथा है। आयुर्वेद में मांस खाने के लाभ बताए गए हैं। धर्म, स्वास्थ्य और खानपान इतना गड्डमड्ड है कि यह कह पाना मुश्किल है कि पहले इसे देवी देवताओं का प्रसाद माना गया, या स्वास्थ्यवर्धक होने के कारण इसे प्रसाद बना दिया गया कि इसे खाना ही है।

अभी हाल में एक टीएनजर बच्चे ने बताया कि मुसलमान बहुत गंदे होते हैं। एक व्यक्ति ने दिल्ली में पानी टंकी में भैंसे का मांस डाल दिया, जिससे हिंदुओं का धर्म भ्रष्ट हो गया। मुझे समझ में न आया कि कहां से उसे ज्ञान मिला कि भैंसे के मांस से हिंदुओ का धर्म नष्ट हो जाता है। अगर वह कहता कि पानी गंदा करने के लिए, हिंदुओ को प्रदूषित पानी पिलाकर मारने के लिए मुसलमान ने पानी मे मांस का टुकड़ा मिला दिया तो समझ में भी आता कि वह हिंदू से घृणा करता था, इसलिए उसने पानी में भैंसे का मांस मिला दिया।

कामाख्या देवी मंदिर में देवी सती की योनि की पूजा की जाती हैं। वहां भैंसे की बलि दी जाती है। अगर भैंसे का मांस कामाख्या देवी का प्रसाद है तो क्या कामाख्या देवी को मानने वाले हिन्दू या वैदिक नहीं हैं? देवी के विग्रहों में से एक बलरामपुर का देवीपाटन मन्दिर हैं, वहां देवी को सुअर की बलि दी जाती है। तंत्र चूड़ामणि के मुताबिक देवी के 52 पीठ हैं जो उनके विग्रहों पर स्थापित हैं क्या इन पीठों को हिन्दू धर्म, वैदिक धर्म, सनातन धर्म से अलग कर दिया जाए? देवघर में अष्टमी का प्रसाद बकरे का मांस है, जिसे लोग बगैर लहसुन मिर्च के, केवल नमक मसाले और घी में पकाते हैं। क्या उन्हें हिन्दू न माना जाए?

आयुर्वेद बहुत जटिल विषय है। अगर आप उसे पढ़ेंगे तो आपको दूध पीने से भी घृणा हो सकती है। गायों को आज जिन हालत में रखा जाता है, उनकी ब्रीडिंग करके उनकी नस्ल बदली गई, जिससे वह अप्राकृतिक रूप से ढेर सारा दूध दे सकें, इतना वीभत्स अत्याचार किसी अन्य जानवर पर नहीं किया जाता। आप किसी जानवर को मारकर खा जाएं तो उसे एक बार तकलीफ होगी। लेकिन किसी गाय को स्वेच्छा से यौन सम्बन्ध न बनाने दें, उसके बच्चे को उससे अलग कर दें, स्टेरॉयड देकर रोज जबरी उसका दूध निकालें, इससे बड़ा अत्याचार तो उसे मार डालना भी नहीं है।

खैर… यह मनोदशा का मसला है। कोई व्यक्ति मांस को चाव से खा सकता है, कोई व्यक्ति चुकंदर की सब्जी को मांस समझकर उल्टियां करने लग सकता है। क्योंकि दोनों की मनोदशाएं अलग-अलग हैं। आयुर्वेद में इन मनोदशाओं के मुताबिक उपचार तय होता है।

आप अगर मुस्लिम का विरोध करने का ठान ही चुके हैं तब भी। कम से कम तथ्यों के मुताबिक विरोध करें। कहीं आपका मुस्लिम विरोध ऐसा न हो जाए कि आप अपने ही देवी देवता, अपने ही वेद को जलाने फूंकने पर उतारू हो जाएं!

मांसौषधि नाम की यह पुस्तक आपको आपके धर्म, वेद और वेदांग माने जाने वाले आयुर्वेद से रूबरू कराती है। इसे पढ़कर आप कम से कम अपने अस्तित्व, अपने धर्म, अपने ग्रन्थ, अपने प्राचीन शोध को जान सकते हैं।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
1 Comment

1 Comment

  1. भारती

    October 29, 2024 at 8:27 pm

    बहुत आवश्यक किताब लग रही अपने विषय के कारण

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन