मनोज अभिज्ञान–
सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप छोड़ दिया। यह किसी साधारण मीडिया खबर की तरह पढ़ी जा सकती है, जैसे अक्सर पढ़ी जाती हैं। किसी ने इस्तीफा दिया, किसी ने नई राह चुनी। लेकिन अगर इस घटना को थोड़ा पीछे हटकर, ज़मीन से और समय की लंबी धारा में रखकर देखें, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति या एक पोर्टल की कहानी नहीं रह जाती। यह उस दौर की कहानी बन जाती है जिसमें विचार, श्रम, भाषा और बाज़ार आपस में उलझे हुए हैं।
सौरभ द्विवेदी का लल्लनटॉप से जाना दरअसल एक संकेत है। यह संकेत न तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तक सीमित है, न ही किसी आंतरिक टकराव तक। यह संकेत उस संरचना की ओर इशारा करता है जिसमें आज की पत्रकारिता सांस ले रही है।
लल्लनटॉप जब शुरू हुआ था, तब उसने हिंदी पत्रकारिता में एक नई खिड़की खोली थी। यह खिड़की भाषा की थी। लंबे समय से हिंदी समाचार या तो अदालत की भाषा में बोलते थे या फिर चिल्लाते हुए। लल्लनटॉप ने कहा कि खबर को उसी भाषा में कहा जा सकता है जिसमें लोग चाय पर बात करते हैं। यह कोई छोटी बात नहीं थी। भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं होती, वह सत्ता का औज़ार भी होती है। जो भाषा तय करता है, वह यह भी तय करता है कि कौन समझेगा और कौन बाहर रह जाएगा।
लल्लनटॉप ने उस दीवार को थोड़ा गिराया। उसने खबर को आम बोलचाल के करीब लाया। इससे नए पाठक आए, नए दर्शक आए। वे लोग, जो खबरों से डरते थे, या जिनके लिए समाचार हमेशा किसी और की चीज़ लगती थी, वे इसमें शामिल हुए। यह विस्तार अपने आप में एक सामाजिक घटना थी।
लेकिन हर विस्तार की एक कीमत होती है।
डिजिटल मीडिया में सफलता का पैमाना बहुत साफ है। संख्या। व्यूज़, लाइक्स, सब्सक्राइबर, रीच। यहां विचार की गहराई से ज़्यादा उसकी गति मायने रखती है। जो तेज़ चलता है, वही टिकता है। जो ठहरता है, वह पीछे छूट जाता है। लल्लनटॉप ने इस दौड़ में भाग लिया, क्योंकि भागे बिना अस्तित्व मुश्किल है। पर इसी दौड़ में वह सवाल पैदा होता है, जिसे अक्सर पूछा नहीं जाता: क्या हर दिन थोड़ा और तेज़ होना, हर दिन थोड़ा और हल्का होना, सच में आगे बढ़ना है?
सौरभ द्विवेदी की भूमिका यहीं दिलचस्प हो जाती है। वे सिर्फ संपादक नहीं थे, वे संतुलन थे। एक तरफ प्लेटफॉर्म की ज़रूरतें थीं, दूसरी तरफ पत्रकारिता की आत्मा। उनके इंटरव्यू, उनके शो, उनकी मौजूदगी ने यह भरोसा बनाया कि यहां सिर्फ खबर नहीं बेची जा रही, यहां समझाने की कोशिश भी है। वे ऐसे सवाल पूछते थे जो उत्तेजित नहीं करते थे, लेकिन बेचैन जरूर करते थे। यह बेचैनी बहुत कीमती चीज़ है। क्योंकि जो व्यवस्था बिना सवाल के चलती है, वह इंसान को धीरे-धीरे दर्शक में बदल देती है। सौरभ द्विवेदी का काम दर्शक को वापस सोचने वाला नागरिक बनाना था।
लेकिन कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही सक्षम क्यों न हो, किसी संरचना से ज़्यादा बड़ा नहीं हो सकता। डिजिटल मीडिया की संरचना आज ऐसी है जिसमें कंटेंट का जीवन बहुत छोटा है। सुबह जो महत्वपूर्ण है, शाम तक अप्रासंगिक हो जाता है। ऐसे में गंभीरता भी बोझ बन जाती है। उसे ढोना मुश्किल होता है। धीरे-धीरे यह सवाल उठने लगता है कि क्या यह बोझ उठाना ज़रूरी है। लल्लनटॉप के साथ सौरभ द्विवेदी का सफर भी इसी तनाव से गुज़रा। एक तरफ उसकी पहचान थी, दूसरी तरफ उसकी वृद्धि की ज़रूरत। पहचान ठहराव मांगती है, वृद्धि निरंतर बदलाव। इन दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता। अक्सर होता यह है कि व्यक्ति से ज़्यादा अपेक्षा की जाती है, जबकि निर्णय कहीं और लिए जाते हैं।
सौरभ द्विवेदी का जाना इसी बिंदु पर पढ़ा जाना चाहिए। यह किसी व्यक्तिगत असहमति की कहानी नहीं है। यह उस स्थिति की कहानी है जिसमें विचार और व्यवस्था की गति अलग-अलग हो जाती है। जब एक व्यक्ति यह महसूस करने लगता है कि उसकी भूमिका अब सिर्फ चेहरा बनने तक सिमट रही है, जबकि दिशा कहीं और तय हो रही है।
यहां यह समझना ज़रूरी है कि संस्थान भावनाओं से नहीं चलते। वे तर्क से भी नहीं चलते। वे ज़रूरत से चलते हैं। जिस दिन कोई व्यक्ति उस ज़रूरत में फिट नहीं बैठता, या उस ज़रूरत को चुनौती देने लगता है, उस दिन रास्ते अलग हो जाते हैं। यह नैतिक सवाल नहीं है, यह ढांचे का सवाल है।
लल्लनटॉप आगे भी चलेगा। शायद और तेज़, और चमकदार, और विविध। वह नए चेहरों के साथ नई भाषा गढ़ेगा। यह स्वाभाविक है। लेकिन सौरभ द्विवेदी के जाने के बाद जो खालीपन रहेगा, वह किसी चेहरे से नहीं भरा जा सकेगा। वह खालीपन उस भरोसे का है कि यहां कोई है जो सवालों को जल्दबाज़ी में नहीं छोड़ता।
सौरभ द्विवेदी के लिए भी यह मोड़ आसान नहीं होगा। क्योंकि किसी संस्थान को बनाना, उसे पहचान देना, और फिर उससे अलग होना, सिर्फ पेशेवर फैसला नहीं होता। यह अपने ही श्रम से बनी दुनिया से बाहर निकलने जैसा होता है। लेकिन कभी-कभी बाहर निकलना ज़रूरी होता है, ताकि यह याद रखा जा सके कि काम सिर्फ प्लेटफॉर्म का नाम नहीं होता, काम उस दृष्टि का नाम होता है जिसे कोई व्यक्ति अपने साथ लेकर चलता है।
इस पूरी घटना में सबसे बड़ा सवाल हम पाठकों और दर्शकों के लिए है। हम क्या चाहते हैं? क्या हम सिर्फ वही देखना चाहते हैं जो हमें तुरंत संतुष्टि दे? या हम ऐसी पत्रकारिता भी चाहते हैं जो हमें असहज करे, धीमा करे, सोचने पर मजबूर करे?
अगर दूसरा विकल्प सच में ज़रूरी है, तो उसे सिर्फ पसंद से नहीं, समर्थन से ज़िंदा रखना होगा। क्योंकि जो चीज़ मुनाफ़े की तात्कालिक भाषा में फिट नहीं बैठती, वह अपने आप गायब कर दी जाती है। सौरभ द्विवेदी का जाना इस मायने में चेतावनी भी है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जो लोग सवाल पूछते हैं, वे गायब नहीं होते। वे सिर्फ जगह बदलते हैं। उनका असर देर से दिखता है, लेकिन गहरा होता है। हो सकता है सौरभ द्विवेदी की अगली भूमिका हमें तुरंत न दिखे। लेकिन यह तय है कि वे उस जगह जाएंगे जहां बोलने से पहले रुकने की गुंजाइश होगी। और हम जानते हैं कि इतिहास अक्सर उन्हें याद रखता है, जो चुपचाप उठकर अलग रास्ता चुन लेते हैं।



