नीरेंद्र नागर-
परसों The Lallantop वाले Saurabh Dwivedi (सौरभ द्विवेदी) के बारे में एक शे’र पोस्ट किया था – झुकी-झुकी-सी कमर, लोचदार है कि नहीं, बचाखुचा ही सही, पत्रकार है कि नहीं।
पोस्ट करने से पहले कई-कई बार सोचा लेकिन अंत में शेयर कर ही दिया।
यह शेर उसका मज़ाक उड़ाने के लिए नहीं था बल्कि अपनी व्यथा जताने के लिए था क्योंकि जिस सौरभ द्विवेदी को मैंने नवभारत टाइम्स के दिनों में जाना था, और एक लंबे अंतराल के बाद पिछले साल हुई मुलाक़ात के दौरान देखा था, वह उस सौरभ द्विवेदी से बिल्कुल भिन्न था जो उस तस्वीर में अमित शाह की तरफ़ याचक-कम-श्रद्धावनत मुद्रा में देख रहा था।
यह सही है कि सत्ता से निकटता और लाखों के दिलो-दिमाग़ पर जादुई नियंत्रण – यह कॉम्बिन्शन किसी को भी सातवें आसमान पर चढ़ा सकता है। लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि सौरभ के दिल में कहीं तो कुछ कसक होगी कि मैं क्या कर रहा हूँ।
पिछले साल जब हमारी मुलाक़ात हुई थी LPU के एक कार्यक्रम में तो ट्रेन से लौटते हुए सौरभ ने कहा था, ‘सर, मन तो करता है सबकुछ छोड़छाड़ दूँ।’ मेरा जवाब था, ‘एक बार स्टारडम हासिल हो जाए तो उसे छोड़ना आसान नहीं है।’
यह देखकर अफ़सोस होता है कि इस सिस्टम की चकाचौंध ने कैसे नवभारत टाइम्स के उस प्यारे-दुलारे सौरभ द्विवेदी को लल्लनटाप के मग़रूर और लठैत सौरभ द्विवेदी में बदल दिया।
परंतु इस सबके बावजूद आज भी लगता है कि वह पुराना वाला सौरभ द्विवेदी इस नए वाले सौरभ द्विवेदी के भीतर थोड़ा ही सही, ज़िंदा है। अगर नहीं होता तो LPU के कार्यक्रम में उसने हम सबके भीतर छुपे धार्मिक और नस्लीय पूर्वग्रहों (biases) की बात इतने बेहतरीन अंदाज़ में नहीं कही होती।
आप सौरभ के प्रशंसक हों या आलोचक या बीच में फँसे हों कहीं मेरी तरह, आपसे निवेदन है कि LPU के उस कार्यक्रम में दिए गए उसके भाषण का यह पाँच मिनट का हिस्सा अवश्य देखें। उसके बाद आपकी उसके बारे में राय बदले या न बदले, लेकिन भाषण का वह हिस्सा कमाल का है, ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ की आख़िरी स्पीच की तरह।
लिंक कॉमेंट में है। यह 10:56 से शुरू होता है। अगर विडियो 10:56 से शुरू न हो तो उसे 10:56 से ही देखें।



