मृत्युंजय कुमार-
लल्लनटॉप वाले सौरभ द्विवेदी गृह मंत्री के यहां भोज खाने चले गए तो कुछ क्रांतिकारी पत्रकारों को तकलीफ हो गई। मज़े की बात यह है कि तकलीफ मानने वाले ज्यादातर बंधु सौरभ के पूर्व सहकर्मी, क्लासमेट या दोस्त रहे हैं।
पहली बात तो यह कि सौरभ द्विवेदी पंडीजी आदमी हैं, भोज का न्योता ठुकराते तो ब्राह्मण धर्म की हानि होती, उनके पूर्वजों की आत्मा दुखी होती। उन्होंने वही किया जो उनको सूट करता है।
दूसरी बात यह कि सौरभ सरस्वती शिशु मंदिर के पढ़े बाल्यकाल स्वयंसेवक हैं। विटामिन C आप हैं जो उनमें चे ग्वेरा ढूंढ रहे थे। द्वितीय स्तर के विटामिन C वे हैं जो चे ग्वेरा द्विवेदी के दीवाने होकर गर्मी में शॉल ओढ़ते और खुद को कूल समझते हैं। जबकि पूरी फिल्म सीटी में वे उपहास का पात्र बनते हैं।
सिंपल सी बात है कि सभी मीडिया संस्थानों की तरह सौरभ द्विवेदी भी बिजनेस कर रहे हैं। नफा नुकसान देखकर भोज खाने या ठुकराने का उनका विशेषाधिकार है। आपकी क्रांति और मिशन की ऐसे फैसलों में शून्य भूमिका है।
लल्लनटॉप के लल्लनों को तनख्वाह एड और फंडिंग से मिलती है, गर्मी में ओढ़ा जाने वाला शॉल भी इन्हीं पैसों से खरीदा जाता है; फेसबुकिया क्रांति इन खर्चों का वहन नहीं कर सकती। नई उम्र के क्रान्तिकारियों की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि वे किसी भी रेंडम बंदे की चार लाइनें पढ़ने सुनने के बाद उसे तत्काल मार्क्सावतार घोषित कर देते हैं। फिर कुछ सालों बाद कहते हैं कि यार फलां आदमी तो क्रांति पथ से भटक गया है।
अरे भाई! अमुक अपने पथ पर ही है, गर्मी में ओढ़े जाने वाले शॉल ने आपकी बुद्धि ढंक दी थी, इसलिए आपको सौरभ द्विवेदी की भाषा से क्रांति की भीनी खुशबू आने लगी थी।
वैसे मेरा मानना है कि भोज खाकर सौरभ द्विवेदी ने कोई गलती नहीं की। वर्षों की मेहनत से उन्होंने यह कमाया है, इसलिए उनको गृह मंत्री बुला रहे हैं। विरोध करने वालों में ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो ग्राम प्रधान के बुलावे पर भी जीमने पहुंच जाएंगे। बाकी एक सलाह द्विवेदी जी को भी है। और हमारे गांव में कबीर के नाम से एक दोहा प्रचलित है~
कहे कबीर दो नाव न चढ़िहऽ
गां#@ फार बिचे में मरिहऽ
वैसे मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसा दोहा कबीर साहब ने खुद नहीं लिखा होगा। वैसे ही जैसे लच्छेदार स्क्रिप्ट और कविताएं सौरभ खुद नहीं लिखते।
सौमित्र राय-
मित्र सौरभ द्विवेदी से मिलिए। सरस्वती शिशु मंदिर में शिक्षित। बचपन से आरएसएस की शाखा में जाते रहे। पिता रविकांत ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा।
फिर बेटे ने जेएनयू में वाम दलों के साथ दोस्ती की। तो कुर्ता–पैजामे और गमछा में वामपंथी बन गए। छुप–छुपकर आरएसएस के नेताओं से मिलते रहे, ताकि असल मुद्दा इसकी दलाली वाली फर्जी पत्रकारिता की आड़ में छिप जाए।
कल रात ये अमित शाह के आगे घुटनों पर खड़े पकड़ा गए। इसकी पत्तलकारिता सिर्फ इतनी ही है।
सौरभ, माफ करना। मैंने तुम्हें NNR में सालों पहले तुरंत पहचान लिया था। मैं तुम्हारी कुंडली पहले से जानता था। मुंह अभी खोला, क्योंकि तुम नंगे हो गए। अब नंगई क्यों छिपाना भाई?
मोहम्मद अनस-
सौरभ द्विवेदी से मेरी कोई निजी दुश्मनी नहीं रही कभी। 2013-14 में जब सौरभ वामपंथियों के बीच पैठ बना रहा था तभी मैंने कॉमरेड्स को समझाया था कि ये संघी है। फिर बहुत से कॉमरेड्स, लिबरल, सेक्यूलर जिन्हें छपास रोग की समस्या है वे इसके दवाखाने में जाने लगे।
धीरे-धीरे डिजीटल मीडिया ने पैर पसारा और यही वो समय था जब खाली बैठे लोग लेटे-लेटे मोबाइल चलाने लगे और गमझा एवं शॉल ओढ़े सौरभ संघी के दिवाने हो गए। कुल मिला कर मैं बस एक या दो बार ही किसी के लिए चेताता हूं, फिर छोड़ देता हूं।
जो आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, उनसे मेरी सहानुभूति हैं। बाकि सब कथा कहानी है। जो पहले कभी संघी था वह हमेशा संघी रहेगा यही सत्य है।
दीपांकर-
गृहमंत्री के बुलावे वाले जलसे में एक कंटेंट क्रिएटर/पत्रकार कुर्सी पर बैठने की कोशिश कर रहा है, लेकिन टाइमिंग देखिए,
बैठने के लिए जैसे ही वो झुकता है. कैमरा क्लिक हो जाता है. फोटो वायरल हो जाती है. वो झुका हुआ है या नहीं? किसलिए झुका है, क्या उसी लिए झुका है जिसके लिए लोग कह रहे हैं, वो सच है? या किसी और चीज के लिए झुका है, झुकाव का इतना महत्त्व इस तस्वीर में क्यों बन पड़ा है?

तस्वीर है किसी और एक्शन की लेकिन उस पर व्याकरण किसी और एक्शन का चल रहा है. सांकेतिक निहितार्थ निकालना इसी को कहते हैं. कभी-कभी भाषा जो नहीं कह पाती शरीर की भाषा वो कह देती है.
इससे भी बड़ी बात… वो झोला और वो ज्ञान जो दूसरे मालवीय जी ने (बगिया वाले नहीं) संपादकों को दिया. झोले के ऊपर एक जोक चलता था पहले, उसकी ट्रिक ये थी कि झोले में क्या है ये नहीं पूछना होता था.
नवेद शिकोह-
इंटरव्यू, खबर,लेख, सवाल, विश्लेषण यानी पत्रकारिता में ये नहीं झलकना चाहिए कि कौन पत्रकार का अपना दिख रहा है और कौन पराया। लल्लन टॉप के सौरभ द्विवेदी जब पत्रकारिता करते हैं तो उनके सामने कोई भी बैठा हो सौरभ वहीं सवाल पूछते हैं जो पत्रकार को बेझिझक पूछना चाहिए हैं। वो सत्ता के सामने लचीले कभी नहीं दिखे, हमेशा सत्ताधारियों के सामने इन्होंने सख्त सवाल किए हैं।
ऐसे बहुत से कारण है कि देश ने इन्हें दस सालों में टॉप टेन पत्रकारों में शुमार किया। बेहद लोकप्रिय, कामयाब और ब्रॉंड पत्रकार हैं सौरभ।
मीडिया के लोगों की प्रेस मीट, भोज इत्यादि में बुलाए जाने का पुराना रिवाज है। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है। पत्रकारिता की जरुरत भी है कम्युनिकेशन यानी हर तरह के लोगों से जुड़ना और उनसे मिलना जुलना,बात करना। यूपीए सरकार में भी सत्ता के बड़े नेता खासकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी संपादकों और देश के शीर्ष पत्रकारों के साथ प्रेस मीट करते थे। साथ में भोज भी होते थे।
साधु-संतों, महात्माओं से पत्रकार मिलते हैं और चंबल के डाकुओं से भी पत्रकारों ने एकांत में मुलाकात की है। बरखा दत्त कश्मीर के दुर्दांत आतंकियों से मिलकर उनका ख्याल जानने की कोशिश कर चुकी हैं। भारत के एक बड़े पत्रकार वेद प्रताप वैदिक ने पाकिस्तान जाकर हाफिज सईद से मुलाकात और वार्ता की। पत्रकारों को रिक्शा-टैक्सी यूनियन का रिक्शेवाला बुलाए, प्रधानमंत्री या विपक्ष के नेता बुलाएं, पत्रकार पंहुच जाते हैं। जाना भी चाहिए है। प्रेस कांफ्रेंस,प्रेस मीट में भोज या केवल भोज पर आमंत्रण में पहुंचना भी ग़लत नहीं।
अभी गृहमंत्री अमित शाह ने देश के शीर्ष पत्रकारों के साथ भोज किया। लल्लन टॉप के सौरभ भी गए। कुर्सी पर बैठते के दरम्यान फोटो क्विक हुई। तो इस तस्वीर में सौरभ ना बैठे हैं और ना सीधे खड़े हैं, झुके हुए दिख रहे हैं। नकारात्मकता को ही ओढ़ने-बिछाने, पहनने, खाने, उगलने.. वाले कह रहे हैं कि सौरभ की बॉडी लेंग्वेज बता रही हैं कि वो अमित शाह के सामने नतमस्तक हो गए हैं, सरेंडर कर लिया है। जी हुजूरी कर रहे हैं।
दरअसल सोशल मीडिया ने जहां सौरभ जैसे युवकों को मीडिया स्टार बना दिया वहीं सोशल मीडिया ही बेरोजगारी और खालीपन की पनाहगाह बन गई है। और खालीपन-बेरोजगारी की पाहगाह के खंडहर में ही दिमागों में नकारात्मकता के फितूर की फसलें पैदा होती है।
मूल खबर…
अमित शाह की शाही दावत में 40 सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर बुलाए गए! देखें तस्वीरें



