Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार और कवि शैलेन्द्र शांत के कविता संग्रह की एक साल में सिर्फ 17 प्रतियां बिकीं

शैलेंद्र शांत-

खुशी और गम! वित्तीय वर्ष 2023-24 की रॉयल्टी का विवरण आया है। जाहिर है, किताब की बिकी प्रतियों का विवरण भी। खुशी इस बात की कि इस नए और उत्साही प्रकाशक ने कम से कम इस जरूरी औपचारिकता का निर्वाह जारी रखा है।

दुख इस बात का कि एक साल में महज सतरह प्रतियाँ बिकने की सूचना है। ‘चयनित कविताएँ’ के आवरण को इसी मंच पर पाँच सौ से अधिक दोस्तों ने पसंद किया है, बधाई दी है।

पिछले साल, यानी प्रकाशन वाले साल में चालीस प्रतियों के बिकने का विवरण मिला था। बीस प्रतियाँ मैंने मंगाई थी। कुछ मित्रों ने खरीदी। कुछ भेंट में दी गईं।

जाहिर है कि यह कोई उत्साहजनक स्थिति नहीं है। फिर भी जिन मित्रों ने किताब खरीदी, पढ़ी उनके लिए हार्दिक आभार। न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन का भी।

लेखक जनसत्ता कोलकाता के पूर्व संपादक और साहित्यकार हैं.


दया शंकर राय-

रिष्ठ पत्रकार और कवि मित्र शैलेन्द्र शांत जी ने अपने कविता संग्रह की पिछले साल की बिक्री को लेकर एक पोस्ट डाली है जिसमें उन्होंने साल में संग्रह की सिर्फ 17 प्रतियां बिकने पर निराशा जताई है..! जाहिर है निराशा की बात तो है ही और शायद शैलेन्द्र जी जैसा निश्छल और मासूम व्यक्ति न होता तो इस तथ्य को छुपा भी सकता था ताकि पाठकों के बीच जितने भी समय तक हो सके, एक भ्रम बना रहे।

दरअसल शुद्ध साहित्यिक और खासकर कविता को लेकर एक कड़वा सच ये है कि इधर कुछ सालों से पैसा लेकर किताब छापने और फेसबुक पर कविताओं की भरमार ने अच्छी और कविता के नाम पर कुछ भी परोसे जाने के चलन ने पठनीयता पर बहुत बुरा असर डाला है। इतने थोक भाव में कविता की किताबें आ रही हैं कि पाठक के लिए चयन करना मुश्किल है। सब कुछ पढ़ा भी नहीं जा सकता इसलिए असली और नकली लेखन इस वक्त लेखकों के लिए भी चिंता का विषय होना चाहिए खासकर हिंदी क्षेत्र में..!

दूसरे बहुत से कवि कविता के अलावा देश के किसी भी और ज्वलंत विषय पर लिखने की जरूरत नहीं महसूस करते। देश और समाज को मथ रहे राजनीति और मानविकी और समाज विज्ञान से जुड़े विषय अगर किसी रचनाधर्मी को उद्वेलित नहीं करते तो यह पता कैसे चलेगा कि कोई कवि अपनी रचना की ऊर्जा कहाँ से ग्रहण कर रहा है..?

रचना और विचार की यह अन्योन्याश्रित प्रक्रिया ही किसी रचनाकार को वास्तविक संवेदनशील रचनाकार बनाती है। प्रेमचंद और मुक्तिबोध इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं जिनकी पैनी नजर अपने समय के हर महत्वपूर्ण सवाल पर रहती थी और उन्होंने हर ऐसे विषय पर बिना किसी लाग लपेट के निडर होकर कलम चलाई है। तो आज पठनीयता कम होने के बहुआयामी कारकों पर दरअसल लेखकों को खुद भी सोचना है कि इसके कारक कौन-कौन से हैं..!

बहुत सी कविताएं पढ़कर कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि वे रची नहीं गई हैं बल्कि उनका उत्पादन किया गया है..!

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन