अशोक पांडे-
शराब पीकर मैंने ऐसे-ऐसे कारनामे किये जिनके लिए अब माफ़ी तक नहीं माँगी जा सकती. उनकी याद से भी गहरी शर्मिंदगी होती है. अल्कॉहोलिक बन चुका था. पंद्रह बरस पहले यह हालत हो गई थी मेरे नज़दीकी पीठ पीछे बाकायदा भविष्यवाणी करने लगे थे मैं तीन-चार साल में मर जाऊँगा.
शराब अच्छी लगती थी. बहुत अच्छी लगती थी. दुनिया भर की शराबों के बारे में जानना और उन्हें चखना पसन्द था. बांज और धुंए की लम्बी संगत से पैदा हुई सिंगल मॉल्ट व्हिस्की की महक प्राणवायु लगती थी. अपने जीवन में बढ़िया शराबों को मैंने वफ़ादार माशूकाओं से भी ज्यादा नाज़ के साथ जगह दी.
पीते हुए शराब को हमेशा डिफेंड किया. सारे दोस्त पीते थे. शुरू-शुरू में लगता था कि एक बार साथ पी लेने पर कोई भी व्यक्ति आपका अन्तरंग दोस्त बन जाता है. इस बात को समझने में कई बरस लगे कि मैं गलत सोचता था. ऐसे बहुत से हरामखोर थे जो पीते तो मेरी थे लेकिन खुद सच्चे गृहस्थ और शरीफ-सफल नागरिक बने रह कर मुझे शराबी घोषित किया करते. इस मामले में मेरी तुलना उस लेब्राडोर कुत्ते से की जा सकती है जो घर में घुसे चोर को देख कर भी दुम हिलाने लगता है.
शुरुआती जीवन की सबसे शानदार दोस्तियाँ और सबसे यादगार सबक शराब के बगैर संभव न थे. दोस्तों की संगत में पूरे माहताब की चांदनी तले उसके नशे में हवा की तरह हलके डोलते हुए अनन्त तक चलते चले जाना याद आता है. बेबात, बेमतलब हंसना और मूर्खों की तरह मौत की पसली को कोंच देना याद आता है.
दुनिया भर के उस्ताद कलालों की बनाई एक से एक आलीशान शराबों की रंगतें और खुशबुएँ याद आती हैं. और कैसे-कैसे उनके नाम – वाना तालीन, दामीयाना, कौन्त्रू, लैम्बोर्गिनी, तेकीला, अनीस, एब्सिंथ, कोन्याक, बेखेरोव्का, आमारो और जाने क्या-क्या. इसका एक अन्धेरा पहलू था.
शराब की वजह से सबसे सुन्दर मोहब्बतें तबाह हुईं. नशे में औरतों से ऐसी-ऐसी बातें कीं जिनकी मुझे अगली सुबह याद तक न रही. शराब के नशे में मैंने अपने जीवन में आईं सारी औरतों के साथ दगा किया.
अब न माँ इस दुनिया में है न बाबू. उन्हें और बहन-भाइयों और सच्चे दोस्तों को मेरी इस लत ने कितना दुखी किया उसका कोई हिसाब नहीं किया जा सकता.
जीवन के कई-कई दिन नशे में तबाह किये. बाज़ दिन ऐसे भी होते थे कि सुबह पांच बजे शराब से दिन की शुरुआत होती और तीन-तीन दिनों तक बिना खाए, बिना सोये सिर्फ पीता रहता. मैंने अपने परिवार और दोस्तों को बहुत परेशान किया.
हैंगओवर को मुझसे बेहतर कौन समझ सकता है. उससे निबटने के मुझे सौ से अधिक तरीके मालूम हैं. आप मुझसे दुनिया की किसी भी शराब के इतिहास और उसकी बारीक डीटेल्स के बारे में पूछ सकते हैं. मैं बिना रुके दो-तीन घंटे इस विषय पर बोलता रह सकता हूँ.
2006 में शुरू हुई पिता की बीमारी और उसके बाद 2010 में हुई उनकी मृत्यु के कुछ बाद तक का समय शराबखोरी में कीर्तिमान स्थापित करने का दौर था.
मैं दुनिया की श्रेष्ठतम कला और साहित्य के बारे में लगातार अध्ययनरत था. हर समय किताबों के ढेर के नीचे दबा रहता. नशे के बाहर रहता तो लिखता भी था लेकिन उस लिखे-पढ़े का अब कोई मतलब नजर नहीं आता. बेशुमार यात्राएं कीं लेकिन उनमें से अधिकाँश की स्मृति को शराब ने धुंधला चुकी.
मिसाल के तौर पर इस शताब्दी की बिल्कुल शुरुआत में जब नक्सल आन्दोलन चरम पर था, मैं डेढ़-दो माह तक छत्तीसगढ़ के कांकेर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर जैसे दुर्दांत इलाकों में अपनी बेटी को लेकर आदिवासियों के गाँव-गाँव घूमता रहा. उस दुस्साहसी यात्रा की कोई स्मृति नहीं बची सिवाय इसके कि हर शाम एक ड्राइवर के साथ नीम अंधेरे खोखों-झोपड़ों में शराब की खोज होती थी. समय ऐसा था कि मेरी जान कभी भी जा सकती थी. ऐसा हुआ होता तो बेटी और सबीने के साथ क्या बीतती, उसकी कल्पना से ही सिहर उठता हूँ. बुद्धिहीन दुस्साहस के ऐसे दसियों किस्से हैं.
दोस्तों के आने की खुशी होती तो बोतल खुलती. किसी बात से दुखी या नाराज होता तो बोतल खुलती. कभी-कभार यह भी लगता कि मैं कोई बहुत महत्वपूर्ण आदमी हूँ जिसे दुनिया ने उतनी इज्जत नहीं दी जितनी का वह हकदार था. इससे कुंठा होती और बोतल निकाल ली जाती.
किसी की दी हुई ग्लेनमॉरेन्जी ब्रांड की ग्रैंड विंटेज मॉल्ट की एक लीटर वाली बोतल लम्बे समय से रखी हुई थी. आज उसकी कीमत की साठ हज़ार है. ग्यारह साल पहले की बात है. सितम्बर महीने की आख़िरी तारीख थी. शाम के वक़्त मेरा एक बहुत अन्तरंग दोस्त घर पहुंचा. उसकी शान में वह बोतल खोली गई. दोस्त अपने हिस्से की पीकर दस बजे चला गया. मैंने रात भर में बाकी बची बोतल अकेले निबटा ली.
अगली सुबह वैसी ही होनी थी जैसी होनी थी. उतनी सारी शराब पीकर मैंने अपने दिन को तबाह कर लिया था. दरअसल मैंने अपनी जिन्दगी को तबाह कर लिया था. मैं खतरनाक रूप से आत्ममुग्ध, स्वार्थी, चिढ़खोर, आलसी, नशेड़ी और आत्मघाती हो चुका था. कोई हितैषी शराब की मेरी लत को लेकर आपत्ति करता तो मैं उससे दूरी बना लेता. रातों को तीन-तीन बजे टेलीफोन पर उसे उलटा-सीधा बकता.
कभी-कभी जब डर लगता तो शराब छोड़ने के बारे में पढ़ा करता. इस काम में आने वाली कठिनाई के बारे में जितना मालूम था उससे मुझे निश्चित मालूम था कि मैं विदड्राल सिम्पटम्स को ही बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगा और मर जाऊँगा. सच तो असल में यह है कि मुझे तब तक मर जाना चाहिए था. मेरे कम से कम दस अज़ीज़ पचास का होने से पहले-पहले अल्कोहोलिक होकर मर चुके थे.
पता नहीं भीतर क्या घटा, मैंने उसी दिन एक प्रयोग करने का फैसला लिया. सबसे पक्के दोस्तों को बताया मैंने शराब छोड़ने का फैसला किया है. इसकी प्रतिक्रिया में मेरी पीठ पीछे इन दोस्तों ने अनेक लोगों को बताया कि मैं हफ्ते भर से पहले दुबारा धुत्त मिलूंगा.
सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि शराब के बिना नींद कैसे आएगी. मेरे दोस्तों में शहर के एक शानदार फिजीशियन शामिल हैं. उनकी शरण गया. उन्होंने और मैंने मिलकर नींद के साथ अनेक प्रयोग किये और तरह-तरह की दवाइयां खाईं. दवाइयां मतलब अलग-अलग तरह की नींद की गोलियां – कोई पांच एमजी की तो कोई दस की. उन दिनों लिखी गई डायरी बताती है 5 नवम्बर 2014 की रात मैंने जीवन में आख़िरी बार नींद की गोली खाई थी.
उधर शराब छूटे एक हफ्ता बीत गया तो दोस्तों ने मेरी ज़ब्त और बर्दाश्त को एक पखवाड़े या हद से हद एक माह की मोहलत दी. महीना बीता तो इसे छः माह कर दिया गया. एक साल होने के बाद ही मुझे थोड़ी-बहुत संजीदगी से लिया जाना शुरू हुआ. अब महफ़िलों में जाता हूँ तो सबसे पहले मेरे लिए शरबत मँगाया जाता है.
पता है न उस्ताद गाबो मारकेज़ क्या कह गए हैं – “इन्सान सिर्फ उसी दिन जन्म नहीं लेते जब उनकी माताएं उन्हें पैदा करती हैं. ज़िन्दगी बार-बार आप पर यह अहसान करती है कि आप खुद को हर सुबह नया जन्म देते जाएं.”
लिहाजा अक्टूबर का महीना मेरे लिए ख़ास मायने रखता है. यह दूसरे जीवन शुरुआत का महीना है. बगैर शराब का मेरा यह जीवन अपने बारहवें बरस में प्रविष्ट हो चुका है. खुद के सच्चे अनुभव पर आधारित ये बातें लिखता हुआ मैं न आपको शराब छोड़ने को उकसा रहा हूँ न शुरू करने को.
(सिगरेट छोड़ने वाली पोस्ट के हाल ही में दोबारा लगाए जाने के बाद कुछ मित्रों ने इस आलेख को भी रीपोस्ट करने का आग्रह किया था.)
लेखक अशोक पांडे उत्तराखंड के निवासी हैं और जाने माने साहित्य – सिनेमा विश्लेषक, आलोचक और अनुवादक हैं।


