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सुख-दुख

ज़रा पत्रकारिता के पुरखे और चलते-फिरते Wikipedia शारदा पाठक को याद कर लें

पंकज स्वामी-

शारदा पाठक यदि जीवित होते तो वे आज 88 वर्ष के होते। वे अपने जन्मदिन की तारीख 28 जुलाई को सर गैरी सोबर्स के जन्मदिन के कारण याद रखते थे। शारदा पाठक का जबलपुर में 21 नवम्बर 2011 को निधन हुआ। लगभग 13 वर्षों के बाद शारदा पाठक को याद करने के कई कारण हैं। शारदा पाठक चलते-फिरते विकीपीडिया थे। इतिहास की कोई तारीख हो, किसी फिल्म के निर्माण का वर्ष हो, संगीतकार और निर्देशक का नाम जानना हो या फिर दर्शन और विज्ञान के किसी गूढ़ विषय पर चर्चा करनी हो, फट से शारदा पाठक से संपर्क किया जाता था। फटाफट कुछ लिखवाना हो तो पाठक जी तुरंत लेखक बन जाते थे। लेकिन बात-बात में किसी की पगड़ी उछाल देना उनकी आदत थी।

दीक्षितपुरा में रामेश्वर प्रसाद गुरू के घर के पीछे पाठकों का बड़ा कुनबा था। वहीं वे भी रहते थे। साठ के दशक में दीक्षितपुरा, मिलौनीगंज और गढ़ा बाम्हनों के गढ़ हुआ करते थे। अप्पा दीक्षित राजा सागर के पुरोहित थे। उन्हीं के नाम पर दीक्षितपुरा बसा। इस बात की जानकारी शारदा पाठक ने ही थी।

आईटीओ चौराहे से दिल्ली गेट के बीच का हिस्सा बहादुरशाह जफर मार्ग कहलाता है। यहीं पर एक डॉउन स्ट्रीट भी है जिसे हम लंदन की तर्ज पर दिल्ली की फ्लीट स्ट्रीट भी कह सकते हैं। तमाम बड़े अखबारों की इमारतें इसी गलियारे में हैं। एकतरफ एक्सप्रेस बिल्डिंग तो दूसरे कोने में हेराल्ड हाउस और इनके बीच टाइम्स ऑफ इंडिया, द पायोनियर वगैरह एक कतार में। स्टेट्समेन और एचटी (हिंदुस्तान टाइम्स) हाउस कनॉट प्लेस में हैं। एक्सप्रेस बिल्डिंग के पिछवाड़े कोटला किला है जिसका कुछ हिस्सा रिहायशी भी है। यहीं कुठलियानुमा कमरे में शारदा पाठक रहते थे।

द‍िल्ली में ‘जनसत्ता’ अखबार और ‘हिन्दुस्तान’ अखबार दोनों उनके सहज ठिकाने थे, जब दिल्ली में होते वहां जरूर जाते थे। लेकिन उनकी चर्चा में थोड़े समय बाद अपना शहर ‘जबलईपुर’ भी आ जाता था। इसीलिए उन्होंने 74 साल की उम्र में अंतिम सांस वहीं ली। उनका जाना एक फक्कड़ पत्रकार का चले जाना था। शरीर और सांसारिकता से अलग वे बहुत पहले ही हो गए थे, लेकिन उसकी विधिवत घोषणा वर्ष 2011 के नवम्बर के तीसरे हफ्ते में हुई। मैले -कुचैले, होली-दीवाली पर भी न नहाने वाले शारदा पाठक जी मन से निर्मल, वाणी से कभी मजाकिया, तो कभी तल्ख, लेकिन ज्ञान से लबरेज थे। साधारण सी शर्ट-पैंट, हवाई चप्पल और कंधे पर भूदानी झोला, जिसमें लिखने के लिए कुछ कागज, एक पैड, खाने के लिए दो पराठे और दो बीड़ा पान पड़ा रहता था। यही उनकी गृहस्थी थी।

हिंदी और अंग्रेजी पर व्याकरण सम्मत पकड़ रखने वाले शारदा पाठक असाधारण पाठक थे। उनकी अंतर्दृष्टि विलक्षण थी, शायद इसी नाते जब तक वे जीवित रहे उन्हें कोई चश्मा नहीं लगा। जीवन में जब भी, जो भी, पढ़ा वह आखिर तक याद रहा। इसीलिए वे जिनके भी संपर्क में आए, उन्हें भी वे हमेशा याद रहेंगे। बिना किसी संदर्भ के राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास, खेल, फिल्म, धर्म, साहित्य किसी भी विषय पर लिख सकते थे और किसी भी विषय पर बात कर सकते थे। जबलपुर विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास और अर्थशास्त्र में एमए करने वाले पाठक जी पहले विषय के गोल्ड मेडलिस्ट भी थे। वे आचार्य रजनीश यानी ओशो से दो साल जूनियर थे और उनकी लीलाओं का आंखों-देखा वर्णन सुनाते थे। शारदा पाठक व रजनीश ने अगल-बगल बैठ नवभारत में साथ काम किया था। उस समय मायाराम सुरजन नवभारत के संपादक थे।

विद्रोही स्वभाव के कारण उनकी अपने गाइड डॉ. राजबली पांडे से नहीं पटी और पीएचडी छूट गई। वे उनकी पुरातनपंथी स्थापनाओं से सहमत नहीं थे। लेकिन जीवन से विरक्त वे तब हुए, जब उनके पिता ने एक खास जगह विवाह करने का हिंसक दबाव बनाया। उसके बाद उन्होंने अपना सब कुछ समय की धारा में छोड़ दिया। उनका मोह सिर्फ मां के लिए बचा। कैरियर, पैसा, नौकरी और प्रतिष्ठा समेत समस्त इच्छाओं को तिलांजलि दे दी। यही विद्रोह उन्हें पत्रकारिता की तरफ ले आया, जिसे उन्होंने दूसरों के विपरीत ‘दिया बहुत ज्यादा और लिया बहुत कम’। निजी जीवन के प्रति नफरत की हद तक बीतरागी होने के बावजूद उन्हें दुनिया की हर चीज को जानने और उसकी चर्चा करने में भरपूर रस आता था।

जबलपुर के ‘नवभारत’ में कई सालों तक काम करके जब मन भर गया तो 1972 में दिल्ली आ गए। यहां ‘हिन्दुस्तान’ अखबार उनका पहला ठिकाना बना। शीला झुनझुनवाला के संपादकत्व में उन्होंने ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के कई अंकों के लिए श्रेष्ठ योगदान दिया। बताते हैं कि इमरजंसी में जब दिल्ली में ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह हुआ तो उसकी दैनिक ‘फेस्टिवल’ पत्रिका को उन्होंने कमाल का निकाला। उस समारोह में फेदरिको फेलिनी, अकीरो कुरोसोवा और सत्यजित राय जैसे फिल्मकार हिस्सा ले रहे थे। ज्ञान-विज्ञान और मनोरंजन को समझने, संभालने और उसे अभिव्यक्त करने की अद्भुत क्षमता के धनी शारदा पाठक वास्तव में करपात्री थे। बड़े से बड़े काम का न ज्यादा मांगा न किसी ने दिया।

तमाम संपादक उनके मुरीद हुआ करते थे। हिन्दी अंग्रेजी पर उनकी पकड़ एक जैसी थी। बिना काटे पीटे लिखते थे। किसी अंग्रेजी अखबार का विज्ञापन परिशिष्ट निकाल दिया तो किसी की पीएचडी लिखवा दी। कभी दो जून भोजन पर तो कभी प्रेम के दो बोल में।

शारदा पाठक से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा है। एक शाम वे और जबलपुर निवासी पत्रकार राजेश नायक दिल्ली की फ्लीट स्ट्रीट पर टहल रहे थे। तभी एक छरहरे से सज्जन ने उन्हें रोका और बेतकल्लुफी से बोले – पाठकजी झोले में कुछ है क्या? बड़े भोले भाव से कक्काजी बोले – हां! एक स्टोरी है। दिल्ली प्रेस जा रहा हूं। सरिता वाले मांग रहे हैं। उन सज्जन ने कहा दिखाना। कक्काजी ने स्टोरी उन्हें थमा दी। उन सज्जन ने सड़क से थोड़ा एकतरफ हटकर स्टोरी पर सरसरी निगाह फेरी और फटाफट अपने बैग में डाल ली। फिर सौ सौ के बीस नोट गिने और पाठक जी को थमा दिए। यह सब इतना झटपट हुआ कि शारदा पाठक को कुछ समझ में ही नहीं आया। अरे यार ये क्या कर रहे हो। वे बस इतना ही बोल पाए।

वह सज्जन फुर्ती से एक्सप्रेस बिल्डिंग की सीढ़ियां चढ़ते हुए बोले – सरिता वरिता को भूल जाओ। ये मेरे काम की कवर स्टोरी है। मैं जल्दी में हूं। किसी से मिलना है। पाठक जी ने नोट कंधे पर लटके अपने भूदानी झोले में डाले और बोले चलो अब पराठा गली चलते हैं। आटो में बैठकर वे और राजेश नायक चांदनी चौक की तरफ निकल लिए। रास्ते में राजेश नायक ने पूछा – कक्काजी ये सज्जन कौन हैं? वे ऐसे ही मुस्कराते हुए बोले , जैसे तस्वीर में नज़र आ रहे हैं, अरे ये सुरेंद्र प्रताप सिंह हैं। रविवार के प्रधान संपादक। आनंद बाजार की साप्ताहिक पत्रिका है। कलकत्ता से निकलती है। ये वहीं रहते हैं।

जबलपुर लौटने के कुछ दिनों बाद राजेश नायक सहित रविवार के लाखों पाठकों का वह अंक मिला जिसमें महर्षि महेश योगी पर कवर स्टोरी थी जिसका शीर्षक था – “सिद्धियों के सौदागर”.

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