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सियासत

शेयर मार्केट को उबरने में चार से पांच साल लगेंगे, मतलब पैसा फँस गया!

आलोक प्रियदर्शी-

शेयर मार्केट बर्बाद हो गया, 30 साल का रिकॉर्ड टूटा। पिछले 6 महीने में आधे से अधिक लिस्टेड कंपनियों के पोर्टफोलियो में 50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। एक अनुमान के मुताबिक अब इसे उबरने में चार से पांच साल लगेंगे। यानि जिन लोगों ने अभी 6 महीने या उससे पहले बाजार में निवेश किया था उनका पैसा अगले 4 से 5 साल के लिए ब्लॉक हो गया।

इस बर्बादी को ऐसे समझे कि अगर आपने दूरगामी फायदे के लिए चार से पांच लाख का शेयर बाजार में निवेश किया है तो आपके पैसे से लाभ कमाना तो दूर , वो चार से 5 साल के बाद अगर बाजार में सुधार हुआ तो वो बराबरी पर आएगा। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अपनी गाढ़ी कमाई बिना किसी फायदे के अगले चार साल इंतजार के बाद आप निकाल पाएंगे। अगर इन पैसे की अभी जरूरत हुई तो शेयर को अभी के बाजार भाव में बेचने पर कुल फोर्टफोलियो का 50% से अधिक का आपको घाटा होगा।

शेयर बाजार में निवेश की सलाह देने वाले हमारे पीएम और हमारे होम मिनिस्टर किस बिल में छुपे हैं? आज क्यों उनकी बोलती बंद है? पेट काटकर भविष्य के लिए निवेश करने वाले मिडिल क्लास की बर्बादी का जिम्मेदार हमारे पीएम के मुंह में दही क्यों जमा हुआ है? सरकार के पास इससे उबरने का क्या कोई उपाय है या फिर बाबाओं के चक्कर लगाने से सब कुछ ठीक हो जाएगा?


नदीम अख़्तर-

शेयर मार्केट में आज जो संहार हुआ है, लगातार पांच महीने टूटने -फूटने का जो रिकॉर्ड बना है, लगभग तीन दशक बाद होने वाले प्रलय का जो नज़ारा दिखा है, उस पर आश्चर्य कैसा? छाती क्यों पीटना? ये तो होना ही था। ये अचानक तो नहीं हुआ। ये क्रमिक विकास की तरह ही हुआ। महीनों से इसकी पटकथा लिखी जा रही थी।

ये अलग बात है कि आंख मूंदे भेड़ों के झुंड शेयर मार्केट को दुधारू गाय की तरह देखे जा रहे थे। वे चमत्कार की उम्मीद कर रहे थे कि बस आसमान में बिजली कड़केगी, एक ज़ोर का धमाका होगा और शेयर बाजार में वे हिमालय पर्वत पे खड़े नज़र आएंगे।

लेकिन आज अगर वे पाताल लोक की गहराइयों में समाए हुए हैं, तो उन्हें ये स्वीकार कर लेना चाहिए कि विध्वंस कुदरत का नियम है। तोड़कर ही नया बनता है। इस टूटने और नए निर्माण के क्रम में लाखों करोड़ रुपए स्वाहा हो जाते हैं। कुछ लोग इसे मार्केट करेक्शन का दर्जा देते हैं, पर ये उससे आगे की चीज़ है। क्या कारण है कि हमारा शेयर बाज़ार जमीन सूंघ रहा है और बगल में दुश्मन चीन का शेयर बाजार कुलाचें भर रहा है। पब्लिक को मुनाफा दे रहा है।

क्या कारण है कि विदेशी निवेशक जिसे FII कहते हैं, वह भारत से पैसा निकालकर चीन के बाज़ार में झोंक रहा है? क्या कारण है कि डॉलर के मुकाबले सिर्फ भारत की मुद्रा यानि रुपया लगातार दुबला होकर बिस्तर पे लेट गया है और चीन की करेंसी को कोई बीमारी नहीं हुई? ट्रंप के ट्रेड वॉर की आड़ मत लीजिए। चीन पे वह भारत से ज्यादा प्रहार कर रहे हैं और करेंगे। फिर भी चीन ने अपने शेयर बाज़ार और इकॉनमी को कैसे थाम रखा है, वह उससे सीखिए।

तमाम आरोपों के बाद शेयर बाज़ार को कंट्रोल करने वाली संस्था SEBI की मुखिया को बदला गया और उनकी जगह एक सीनियर ब्यूरोक्रेट को लाया गया, तब तक बहुत देर हो चुकी। अब का होत पछताय जब चिड़िया चुग गई खेत। शेयर बाज़ार निवेशकों के विश्वास से चलता है और जब भरोसा उठता है तो सब अपना अपना पैसा बचाने के लिए वहां से भागते हैं। ये तो सिर्फ एक कारण है। आज भारतीय शेयर बाज़ार में हुए संहार के कई आयाम हैं। ये गणित नहीं है कि दो और दो चार हो जाए।

शेयर बाज़ार में दो का दस मिल जाता है और दस का एक बन जाता है। जोखिम का संसार है पर आज जोखिम लेने वाले सारे सूरमा वीरगति को प्राप्त हुए। बहुतों की पीड़ा ऐसी है कि ना दिखा पा रहे हैं और ना बोल पा रहे हैं। आज हम 100 रुपए पाव मिलने वाला लहसुन 50 रुपए के भाव लाए। अंगूर 100 रुपए किलो मिला। सब्जी मंडी अपने मूड से चलती है और शेयर बाजार अपने स्वभाव से। दोनों जगह व्यापार है पर खेल के नियम बिल्कुल अलग हैं। अभी ईरान के साथ तेल का खेल खेलने वाली भारतीय कंपनियों पर विश्व के दादा गुरु यानि ट्रंप की सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है।

भारत को BRICS में शामिल होने पे हड़का भी दिया है। ब्रिक्स में रूस और चीन भी हैं। दोनों अमेरिका से दो दो हाथ करने को तैयार हैं सो ट्रंप यूक्रेन वाले जेलेंस्की का साथ छोड़कर रूस वाले पुतिन के साथ हो गए हैं। इतिहास बदल दिया है। ईरान भी ट्रंप से भिड़ने को तैयार बैठा है और उसका मूड ज्यादा बिगड़ा तो इजरायल पे ये भारी पड़ सकता है, सो वहां भी अमेरिका पलटी मार सकता है। तो बचा कौन? भारत!! एशिया में चीन को बैलेंस करने वाली ताकत! पर चीन और रूस तो पहले से एक हैं। पाकिस्तान गोद में है और ईरान बगल में।

नॉर्थ कोरिया बैक सपोर्ट में। तो क्या भारतीय शेयर बाज़ार के पतन के पीछे कोई बड़ी प्लानिंग है? किसी आदमी को कमज़ोर करना हो तो सबसे पहले उसे आर्थिक झटका दो। इस गेम में सबके अपने दांव हैं और अपना गुट। यूरोप का भी अपना गुट है और फिलहाल वह ट्रंप के साथ नहीं। फ्रांस के राष्ट्रपति ने भरी सभा में ट्रंप का हाथ पकड़कर रोक दिया और उनके कहे को काट दिया। ट्रंप देखते रह गए। बहुत कुछ एक साथ घट रहा है।

ट्रंप इस मुगालते में हैं कि वह दुनिया बदल देंगे। उनका खास सलाहकार है मस्क, जिसने ट्विटर खरीदते ही इसका ब्लू टिक बटन बेचना शुरू कर दिया था। अब वह अमेरिका की नागरिकता बेच रहा है। गोल्डन कार्ड और पता नहीं क्या क्या लेकर आ रहा है। ऐसा ना हो कि ये दोनों मिलकर अमेरिका को ही बेच दें। दोनों व्यापारी हैं। बड़े वाले। और व्यापारी हर देश में हैं। बड़े वाले।
धन्यवाद।


ये एक आशावादी विश्लेषण भी पढ़ें-

सुभाष सिंह सुमन-

2020 याद है? भारत में कोविड के केस मिले बाद में, शेयर पहले ही गिरने लगा था. इस समय तक हालत खराब होने लगी थी. अर्थव्यवस्था वाला चक्र भी लगभग अभी वाली स्थिति में था. दूसरी तिमाही में ग्रोथ रेट तब 5% से नीचे गिर गई थी, इस बार 6% से नीचे गिरी.

आज ही की तारीख में दिसंबर तिमाही का जीडीपी डेटा आया था और ग्रोथ रेट में रिकवरी आने लगी थी. इस बार भी आज जीडीपी डेटा आया है और ग्रोथ रेट रिकवर होकर 6.2% हो गई है. उस साल 28 फरवरी को मार्केट ढाई परसेंट के करीब गिरा था. आज डेढ़ फीसदी के आस पास. पिछली बार साइकिल के इसी स्टेज पर कोविड आया था.

इस बार ट्रंप चचा का टैरिफ वार है. कुछ अंतर भी है. जैसे इस बार मार्केट ज्यादा गिरा है, इकोनॉमी कम. पिछली बार कोविड यहां से चढ़ना शुरू हुआ था, इस बार टैरिफ वार का असर पीक पकड़ चुका है. मतलब इकोनॉमी में अब ज्यादा टेंशन की बात नहीं है. सितंबर क्वार्टर तक हमें जितना गिरना था, गिर चुके. अब साइकिल ऊपर की ओर है. इसके पीछे मार्केट बॉटम आउट होना शुरू हो जाएगा.

मतलब अब बॉटम बहुत दूर नहीं है. बाजार को जितना गिरना था, लगभग गिर चुका है. अब थोड़ा बहुत करेक्शन ही बाकी है. यहां से बाजार का भी साइकिल ऊपर की ओर जाएगा. बाजार की भविष्यवाणी नहीं की जाती, लेकिन सबसे कंजर्वेटिव कैलकुलेशन से भी अब बाजार में जल्दी रिकवरी आने की बात बताई जा सकती है.

अच्छी बात ये हुई कि 15% के इस करेक्शन ने फालतू निवेशकों को बाहर कर दिया, फालतू शेयरों को लेवल पर ला दिया. और करेक्शन जो है, वो अब भी हाय-तौबा मचाने वाला नहीं है. पिछले साल जून से सितंबर तक बाजार जितना चढ़ा, इधर अक्टूबर से फरवरी तक उतना गिरा है. मतलब साल भर का भी धैर्य रखने वाले घाटे में नहीं गए हैं.

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