शशि शेखर-
वह विभोर- भोर, चालीस साल बाद.. वह अगस्त 1984 की पहली तारीख़ थी। सुबह साढ़े तीन बजे सिविल लाइंस चौराहे पर स्थित लक्ष्मी बुक हाउस के बंद शटर के बाहर खड़ा मैं बेचैनी से हॉकर्स का इंतज़ार कर रहा था। वे आते ही जब अख़बार देखेंगे तो उनकी प्रतिक्रिया कैसी होगी? वे उसे बेचना चाहेंगे या नहीं? पाठकों की क्या राय बनेगी?
पिछला दिन मशक़्क़त से भरा था। शाम न्यूरूजम और रात प्रेस में कटी थी पर थकन का जैसे उन लम्हों से नाता टूट गया था। अगर कुछ था तो सिर्फ़ एक आकुल उत्कंठा। तब से अब तक वक़्त के साथ बहुत कुछ बदल गया। सिविल लाइंस और लक्ष्मी बुक हाउस वही हैं पर शहर का नाम इलाहाबाद से प्रयागराज हो गया। मैं जिस अख़बार की बात कर रहा था, उसका साथ तो पिछली सदी के साथ छूट गया था लेकिन उस भोर की भीनी सी याद जस की तस क़ायम है।
क्यों?
चालीस साल पहले आज के ही दिन इलाहाबाद से ‘आज’ का संस्करण प्रकाशित हुआ था। उसकी प्रिंट लाइन में बतौर स्थानीय संपादक मेरा नाम दर्ज था। उस वक़्त तक मेरी उम्र ने सिर्फ़ 24 सीढ़ियाँ चढ़ी थीं। मेरा भविष्य उस अंक की सफलता-असफलता पर आश्रित था। पूरी विनम्रता से कह रहा हूँ, आज जो कुछ हूँ, उसी सवेरे की देन हूँ।
इसीलिए आज का दिन मेरे लिए कृतज्ञता से भरा होता है।
उस परवरदिगार का शुक्रिया, जिसने वह मौक़ा दिया और आज तक मेरे विश्वास की डोर थामे हुए है। ‘आज’ के संचालक आदरणीय शार्दूल विक्रम गुप्त का ह्रदय से आभार। उन्होंने यूनिवर्सिटी से निकले एक नौजवान पर इतना विश्वास किया। पुरानी सिसिलियन कहावत है- यह दुनिया बहुत ख़राब है। यहाँ हर इंसान को जीने के लिए दो पिताओं की ज़रूरत पड़ती है। पहला वह जो जन्म देता है और दूसरा जो आपको संरक्षण देता है। दूसरे को गॉडफ़ादर कहा जाता है। 1980 से जनवरी 2001 तक उन्होंने मुझे अख़बार विधा की जो शिक्षा दी, वह आज तक काम आ रही है। अगर मैं असफल रहता तो नुक़सान सिर्फ़ उनका होना था पर जोखिम उठाने की उनकी क्षमता अद्भुत थी।
वे मुझ जैसे कइयों के भैया थे, रहेंगे।
इसके साथ उस और इस दौर के सभी साथियों का शुक्रिया। वे न होते तो यह सफ़र यहाँ तक नहीं पहुँचता। मेरा तब भी मानना था कि सक्षम टीम के बिना कोई कप्तान सफल नहीं हो सकता। मैंने बस समूची सामर्थ्य के साथ उन्हें ख़ुद से ख़ुद को उनसे जोड़े रखने की कोशिश की। मुझे लगता है कि मैं असफल नहीं रहा। उनका प्यार बना रहे, यही अकेली पूँजी है, जो इन चालीस सालों में कमायी।
इस दौरान कुछ ऐसे भी थे जो साथ न चल सके। कारण कई थे पर कोई गिला नहीं, शिकवा नहीं। वे आबाद रहें। यह सुकून की बात है जिन लोगों ने साथ दिया, उनकी तादाद ऐसे ‘मित्रों’ से कहीं ज्यादा है। भैया के बाद मुझपर भरोसा कर अपने संस्थानों की बागडोर सौंपने वाले मीडिया मुग़लों का भी दिल की गहराइयों से आभार। वे न होते तो यह मुसलसल कहानी इलाहाबाद से चलकर आगरा में ख़त्म हो गयी होती।
आज बस इतना ही। फिर कभी धूप-छाँव की इस लंबी यात्रा पर लिखना चाहूँगा।

पुनश्च- साथ की तस्वीर उसी वर्ष की है। वक्त ने इस ख़ाकसार के चेहरे पर भी अपने निशान नक़्श कर दिए हैं|


