शेखर गुप्ता मज़ेदार निरर्थक शख़्सियत हैं!

Uday Prakash : शेखर गुप्ता मज़ेदार निरर्थक शख़्सियत हैं। अभी उन्होंने नोटबंदी की तुलना होमियोपैथी के साथ की। होमियोपैथी जिस रोग को ख़त्म करना चाहता है, पहले उसी रोग को बढ़ाता है। मरीज़ को इंतज़ार करना पड़ता है। 🙂 तो भाई साहेब! एलियोपैथी में क्या बुराई है ? आख़िर ‘सर्जिकल ऑपरेशन’ जैसा शब्द तो यहीं पाया जाता है। 🙂 पलट क्यों रहे हैं अब?

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कार्पोरेट सवर्ण मीडिया चाहता है कि प्रधानमंत्री संसद के बाहर-बाहर भीड़ और सभाओं में चुनावी भाषणों , विज्ञापनों, विदेश यात्राओं, धार्मिक संगठनों और अपनी पार्टी द्वारा आयोजित बैठकों में बेरोकटोक लगातार अपनी बात करते रहें, टीवी चैनल उनके भाषणों का लाइव प्रसारण करता रहे, वे देश को उत्तेजना और उन्माद के हालात में धकेलते रहें और राज्यसभा तथा लोकसभा में समूचा विपक्ष संसद का शीतकालीन सत्र चलाने की अकर्मण्य और बदनाम भूमिका निभाता रहे। समय की माँग है कि स्टार प्रधानमंत्री को फ़िलहाल कार्पोरेट और धार्मिक-व्यापारिक घरानों की सेवा के हवाले करते हुए श्री लालकृष्ण आडवाणी या मुरलीमनोहर जोशी या सुश्री सुषमा स्वराज को उप-प्रधानमंत्री बना कर संसद में निरंतर उपस्थित रहने का उत्तरदायित्व सौंप देना चाहिए। प्रतिमिनट ढाई लाख रुपये की बर्बादी बचेगी। यह ज़रूरी है। 🙂

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सोचना तो पड़ता है कि ज्यादा ख़तरनाक क्या था? चेन्नई के समुद्री तट से आने वाला १२० किलोमीटर प्रति घंटे रफ़्तार का ‘वरदा’ तूफ़ान जिसमें ४ जानें गयीं और अट्ठारह हज़ार लोग शरणार्थी बने और जो तूफ़ान ६ घंटों में उतर गया? या नोटबंदी, जिसमें अब तक १२० जानें गयीं और कई करोड़ लोग दिन-रात सड़कों पर भूख-प्यास भुलाकर सड़कों पर आ गये और जो ३५ दिन से हर रोज़ चढ़ान पर है। आने वाले १५ दिनों में इसकी जानलेवा रफ़्तार और बढ़ने वाली है।  इनमें से पहला एक क़ुदरती क़हर था, जिसके सामने हम सदा अवश और लाचार हैं। लेकिन दूसरा सियासी प्रोडक्ट था, ‘मैन मेड’….क्या हम इसके सामने भी अवस और निरुपाय हैं? लगता तो यही है। हम लाचार बातूनी संतोषी घोंघाबसंत हैं। आदर्श रियायत, जिसकी कामना हर शासक करता है। मीडिया मैनेज्ड पॉप्युलेशन। हाँ … हाँ … हां … में हिलते फलहीन लचीले सवा अरब भविष्यहीन पेड। 🙂

चर्चित साहित्यकार उदय प्रकाश की एफबी वॉल से.

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Comments on “शेखर गुप्ता मज़ेदार निरर्थक शख़्सियत हैं!

  • हरीश says:

    ये 70 साल की चुप्पी एव स्वयं को बुद्धिजीवी कहलाने वाले वर्ग की अकर्मण्यता का ही नतीजा है. 70 साल अगर तत्कालीन सत्ताधारियो द्वारा उपकृत नहीं रहते तो शायद ये नोबत नहीं आती. हो जाने दो जो हो जाना है, बाकि वैसे भी इस वर्ग से कोई उम्मीद नहीं रख रहा है, न पुतिन , न जिनपिंग और न ही शरीफ ब्रदर्स.

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