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श्वेता सिंह का चश्मा और चश्मे में संजय सिन्हा!

संजय सिन्हा-

ये तस्वीर मेरी आस्ट्रेलिया यात्रा की है। दस साल पहले जब मैं अपने ऑफिस (आजतक) की तरफ से सिडनी गया था। साथ में और भी कुछ साथी थे। उसी में श्वेता सिंह भी थीं। ये तस्वीर मुझे याद नहीं किसने खींची थी, लेकिन ये तस्वीर जिस कलात्मक अंदाज़ में खिंची गई थी, वो कमाल की थी। तस्वीर श्वेता की ली गई थी, लेकिन उनके चश्मे में मैं दिख रहा था।

सिडनी से लौटने के बाद मैंने उस यात्रा की बहुत-सी तस्वीरें फेसबुक पर साझा की थीं। लेकिन मेरे सामने फेसबुक ने आज ये तस्वीर परोसी। यहीं से शुरू हुआ यादों का सिलसिला। मैं आजतक में 16 साल रहा। बहुत से लोगों के साथ दोस्ती हुई। श्वेता उन खास दोस्तों में शामिल रहीं। साल 2014 में हम आस्ट्रेलिया साथ गए थे, उससे पहले से श्वेता से मेरी दोस्ती है। वो बहुत अधिक मेहनती, बहुत अनुशासित पत्रकार हैं और जिनसे उनकी दोस्ती है, उनके लिए बेहतरीन दोस्त भी। दोस्तों की दोस्त। वो शायद देश में सबसे लोकप्रिय एंकर हैं इस समय।

श्वेता जो चश्मा पहनीं हैं, उसके बिंब में मैं दिख रहा हूं। ये तस्वीर उन दिनों की है, जिन दिनों मैं ‘तेज़’ चैनल का हेड बना था। वो साल 2014 ही था, जब मैं आजतक में वरिष्ठ कार्यकारी संपादक पद पर रहते हुए तेज़ का हेड बनाया गया था।

हम लोग आस्ट्रेलिया गए थे। वहां की यादों की बहुत-सी कहानी मैंने साझा की हैं। लेकिन ये तस्वीर। कहते हैं एक तस्वीर हज़ार शब्दों को बयां करती है।

ये तस्वीर सामने आई तो याद आया कि जब सात साल बाद यानी 2021 में जब मैंने टाइम्स नाऊ ज्वाइन करने के लिए आजतक से इस्तीफा दिया तो इस बात की बहुत चर्चा थी कि संजय सिन्हा के जाने के बाद तेज़ का हेड कौन? बहुत से दावेदार थे।

बतौर तेज़ का हेड पद छोड़ते हुए मुझ पर प्रंधकों का अनुरोध था कि कम से कम तय अनुबंध के मुताबिक मुझे तीन महीने के नोटिस पीरियड तक वहीं रुकना चाहिए। ये एक सामान्य शिष्टाचार होता है कि वरिष्ठ पद से आप अचानक छोड़ कर नहीं जाएं, क्योंकि बहुत-सी व्यवस्थागत समस्या आ जाती हैं। सबसे बड़ी बात तो ये कि अचानक कौन हेड होगा? पूरी टीम बिखर जाती है।

ये समस्या तब भी आई थी। मैं तीन महीने के अनुबंध से बंधा था। लेकिन हर शर्त के साथ शर्त तोड़ने के लिए भी शर्त होती है, तो मुझ पर टाइम्स नाऊ नेटवर्क ने दबाव डाला कि मैं जल्दी से चैनल छोड़ दूं तो वो मेरे तीन महीने के नोटिस पीरियड का भुगतान आजतक को कर देंगे। वही हुआ।

मैंने बिना तीन महीने का नोटिस पीरियड पूरा किए हुआ आजतक से (तेज चैनल हेड से) इस्तीफा दे दिया। रातों रात चैनल हेड चुना जाना था। जिस दिन मुझे आजतक से रिलीव होना था, शाम को प्रबंधन का मेल आया। संजय सिन्हा की जगह श्वेता सिंह तेज़ चैनल की हेड होंगी। ये कमाल का फैसला था।

आज जब ये तस्वीर फेसबुक ने मेरे सामने प्रस्तुत की तो कई यादों ने मेरा पीछा किया। आजतक में गुजरे मेरे 16 साल। फिर अचानक मीडिया से मेरा गायब ही हो जाना। श्वेता की तस्वीर में मेरी तस्वीर का उभर आना। मेरे बाद श्वेता का चैनल हेड बनना।
ज़िंदगी यादों का पिटारा है। हर आदमी की ज़िंदगी सिवाय यादों के कुछ भी नहीं। यादें हैं तो ज़िंदगी है।

कई यादें संयोग भी होती है। जैसे श्वेता की इस तस्वीर में मेरा होना, जैसे मेरे तेज़ चैनल हेड से इस्तीफा देने के बाद श्वेता का वहां होना। ज़िंदगी के डॉट्स जोड़ेंगे तो कई कहानियां उभरेंगी। आज इतनी ही कहानी कि बहुत दिनों बाद फिर आजतक, तेज़ और श्वेता सिंह की याद आई। सारी यादें बहुत सुखद हैं। सुखद यादों को संजो कर रखना चाहिए। मुश्किल घड़ी में ये यादें बड़ा सहारा बन जाती हैं।

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