राकेश कायस्थ-
लोकसभा की यह तस्वीर बिना कुछ कहे भारतीय समाज और राजनीति के बारे में सबकुछ कहती है।

कभी इंदिरा गाँधी को गूँगी गुड़िया कहा गया था। वो बयान भी अतिश्योक्तिपूर्ण था। इंदिरा गाँधी इलीट थीं, मितभाषी थी लेकिन दृष्टि संपन्न थी और गूँगी गुड़िया कतई नहीं थीं। वक्त आने पर उन्होंने बताया कि वो किस हद तक आक्रामक हैं।
पिछले पचास साल में कांग्रेस की राजनीति सबसे समर्थ नेता सोनिया गाँधी की कहानी इससे एकदम अलग है। सोनिया गाँधी एक ऐसी स्त्री थी, जिसका संसार पति और बच्चों के इर्द-गिर्द घूमता था। एक ऐसी औरत जिसे राजनीति कतई पसंद नहीं थी और जिसने प्रधानमंत्री की शपथ ले रहे अपने पति को सार्वजनिक पर रोकने तक की कोशिश की थी। परिवार की कई त्रासद घटनाओं के बाद राजनीति में आने का फैसला लेने में सोनिया गाँधी ने कई साल लगाये।
जब पहला भाषण आया तो ऐसा लगा कि सोनिया गूँगी नहीं बल्कि चाबी से चलने वाली गुड़िया हैं। अँटक-अँटक कर पढ़ा जानेवाला भाषण, अँग्रेजी तक पर इतलावी का प्रभाव था तो फिर हिंदी का कहना ही क्या! मीम का जमाना नहीं था लेकिन टीवी पर आनेवाले तमाम कॉमेडी शोज़ में सोनिया गाँधी की मिमिक्री एक फेवरेट आइटम हुआ करती थी। लेकिन जल्द ही सबकुछ बदल दिया। राजनीतिक दूरंदेशी के मामले में सोनिया गाँधी ने तमाम समकालीनों को पीछे छोड़ दिया।
जो विपक्ष सोनिया गाँधी का मजाक उड़ाते नहीं थकता था, उसने इल्जाम लगाना शुरू किया कि `चाबी वाली ये गुड़िया’ रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाती है। अगर कोई ठीक से देखे तो समझ में आएगा कि सोनिया गाँधी ने नैतिकता की जो लकीर खींची है, आधुनिक भारतीय राजनीति में वैसी दूसरी कोई और मिसाल नहीं मिलती हैं।
दो बार प्रधानमंत्री बनने के मौके आये लेकिन सोनिया गाँधी ने ठुकराया। सोनिया गाँधी की रिमोट से चलने वाली सरकार आधुनिक भारत की सबसे पारदर्शी सरकारों में शामिल रही। वो सरकार जिसका प्रधानमंत्री आज की तरह कैमरा देखकर भागता नहीं था और ना ही पत्रकारों को धमकाता था, बल्कि हर सवाल का जवाब देता था। यू ट्यूब पर मनमोहन प्रेस काँफ्रेस टाइप करके देख लीजियेगा, पता चल जाएगा।
सोनिया गाँधी के रिमोट से चलने वाली सरकार में सबसे ज्यादा इस्तीफे लिये गये और ऐसा तब हुआ जब वो एक अल्पमत की सरकार थी। नटवर सिंह के खिलाफ 25 साल पहले इराक से तेल कूपन लेने का आरोप सामने आया तो सोनिया गाँधी ने इस्तीफा दिलवाया। मुंबई में आतंकवादी हमले के बाद जब गृहमंत्री शिवराज पाटील ने दिन में दो बार कपड़े बदले तो उन्हें बदल दिया गया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख के स्टार पुत्र जब अपने दोस्तों के साथ ताज होटल का मुआयना करने पहुंचे तो इसे असंवेदनशील माना गया और नतीजा ये हुआ कि देशमुख जैसे ताकतवर नेता को भी जाना पड़ा।
ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले में खुद लोकसभा की सदस्यता छोड़ी और दोबारा चुनाव लड़ा।क्या आज जमाने में ऐसा कुछ संभव है। यहाँ तो बेशर्मी से दाँत-निपोरकर कहा जाता है—हमारे यहाँ इस्तीफे नहीं होते हैं।
मनरेगा, फूड सिक्यूरिटी बिल और सूचना अधिकार जैसे क्रांतिकारी काम सोनिया गाँधी के यूपीए चीयरपर्सन रहते हुए। मोदी सरकार ने इनपर मिट्टी डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन कोविड के वक्त मनरेगा ही काम आया। फूड सिक्यूरिटी बिल ही पाँच किलो अनाज स्कीम का आधार बना।
2010 में यह पता चला कि सोनिया गाँधी को कैंसर है। उनका इलाज शुरू हुआ और वो सक्रिय राजनीति से लगभग बाहर होती चली गईं। काँग्रेस के पतन की कहानी यहीं से शुरु होती है। मनमोहन सिंह ने अपने बारे में कहा था कि इतिहास उनके प्रति ज्यादा उदार होगा, यही बात सोनिया गाँधी पर भी लागू होती है। आज उनका जन्म दिन है। बहुत-बहुत बधाई!
Vishwa Deepak- सोनिया गांधी के जीवन का नैतिक स्रोत उनके यूरोपियन होने में है. राजनीति में इतने ऊंचे आदर्श पालना भारतीय स्त्री के लिए संभव ही नहीं!
Rakesh Kayasth- ये ठीक ऑब्जर्वेशन है लेकिन ज्यादातर लोगों के गले नहीं उतरेगा।
Rajeev Singh Jadaun- सर, आप लोगों से मेरा अध्ययन और अनुभव बहुत कम है। सोनिया जी के ऊंचे नैतिक आदर्शों के लिए उनके यूरोपियन होने वाली बात से सहमत हूं। दूसरा मेरा मानना है कि गांधी परिवार भारत के पॉलिटिकल क्लास का सामंत (ठाकुर) है। सामंतों के कई ऐब के साथ कुछ खासियत होता है। सामंत/अभिजात्य परिवार की महिला का व्यवहार बहुत डिग्निटी से भरा होता है। यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं।
Rakesh Kayasth- अभिजात्य कोई भी अपने परिवेश से हो सकता है। लेकिन मानवीय होना आसान नहीं है, खासकर भारतीय स्त्री के लिए। सोनिया गाँधी का जो मानवीय पक्ष है, विश्व दीपक उसकी बुनियाद में यूरोपीय संस्कारों का होना मानते हैं, जहांँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और मानवाधिकार की लड़ाई भारत से बहुत पहले शुरु हुई थी।
Rajeev Singh Jadaun- सर इस तस्वीर पर थोड़ा और लिखते तो मेरी समझ थोड़ी और विकसित होती। सोनिया जी मौन हैं और अटल बिहारी वाजपेई, नरसिम्हा राव और चंद्रशेखर जी हंस रहे हैं। किसी प्रसंग की यह तस्वीर है यह भी एक कौतूहल का विषय है।
Rakesh Kayasth- इस तस्वीर को एक रूपक की तरह देखा जाना चाहिए। सोनिया गाँधी नई-नई संसद में आई थीं और पीछे तीन बुजुर्ग नेता बैठे थे। उनकी भाव-भंगिमा का क्या अभिप्राय था, इसकी पुष्टि कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है। लेकिन तस्वीर को उसी रूप में लिया गया, जो इसे देखते ही पहली नज़र में समझ में आता है। राजनीति चाहे पंचायत की हो या राष्ट्रीय किसी भी स्त्री के लिए निर्णायक भूमिका हासिल कर पाना आसान नहीं है।
Rajeev Singh Jadaun- सर, मैं चंद्रशेखर जी का बहुत सम्मान करता हूं। महिलाओं को लेकर उनके बहुत खुले विचार थे। जैसे इस तस्वीर को ही लीजिए। उड़ीसा की मुख्यमंत्री नंदनी सतपथी और चंद्रशेखर जी की कितनी सहज तस्वीर है। यह तस्वीर चुपके से ब्लैकमेल करने के लिहाज से किसी ने ली हो ऐसा नहीं लगता है। बल्कि किसी सार्वजनिक जगह की तस्वीर लगती है। चंद्रशेखर जी और नंदनी सतपथी दोनों लोग सार्वजनिक जीवन में थे। लेकिन तस्वीर के पब्लिक होने पर होने वाले गॉसिप की परवाह किए बगैर दोनों लोग कितने सहज हैं। सोचता हूं कि यह तस्वीर आज आई होती तो ट्रोल आर्मी दोनों लोगों का क्या करती। सोनिया गांधी की तस्वीर में अटल बिहारी वाजपेई और नरसिम्हा राव का तो नहीं लेकिन चंद्रशेखर जी का हंसना मुझे अखर गया।
ऐसी ही तस्वीर चंद्रशेखर जी की सुषमा स्वराज के साथ है जिसमें सुषमा स्वराज संसद में चंद्रशेखर जी के छाती से लगी हुई है, जैसे कोई बेटी अपने बाप के गले लगती है।
Rakesh kayasth- चंद्रशेखर जी एक गंभीर राजनेता थे और सार्वजनिक जीवन में उनका कोई ऐसा बयान नहीं मिलता जिससे उन्हें स्त्री विरोधी कहा जा सके। लेकिन सोनिया गाँधी वाली तस्वीर में जो उनकी भंगिमा है, वो तो है ही। इस बात का बहुत पोस्टमार्टम करके कोई फायदा नहीं है। इसीलिए मैंने कहा कि तस्वीर को सिर्फ एक प्रतीक या रूपक की तरह देखा जाना चाहिए।



अशोक वर्मा
December 10, 2024 at 5:31 pm
सोनिया गांधी सूचना का अधिकार, मनरेगा, भोजन का अधिकार जैसे साहसिक और परिवर्तनकारी इसलिए ले सकीं, क्यों कि वे यूरोपीय मूल की हैं। किसी भारतीय मूल के नेता में ऐसे फैसले लेने का माद्दा नहीं है।