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क्या आध्यात्मिक ज्ञान को तर्क से नहीं समझा जा सकता?

दिनेश श्रीनेत-

प्रथम तर्क : आध्यात्मिक ज्ञान को तर्क से नहीं समझा जा सकता.

इस समूची सृष्टि में कुछ भी ऐसा नहीं है जो तर्क-कार्य-कारण से परे हो. सभ्यता के आरंभ में हम बहुत कुछ नहीं जानते थे. वही समझ पाते थे जो अनुभूत सत्य था. धरती पर रहते थे. आकाश में घन गरजते और बिजली चमकती थी. धरती के भीतर से पानी का सोता और लावा फूटता था. हमने उसके लिए परिकल्पनाएं गढ़ीं. सूर्य और बारिश का जल जीवन का स्रोत था, यानी आकाश में जो भी था वह भला था, देवताओं के आकाश में रहने की बात हर सभ्यता में है. धरती गोल है यह नहीं पता था तो भय था कि कोई ऐसी जगह होगी जहां दुनिया का अंत हो जाएगा. जहाजी समुद्र में बहुत दूर जाने से डरते थे कि कहीं वे नीचे पाताल लोक में न गिर जाएं.

सारा रहस्यवाद, ग्रंथों में वर्णित इस तरह की बातें क्या अब भी मानी जाएंगी? हमने ब्रह्मांड देखा, सौर मंडल देखा, जिस गोल धरती का पता लगाने के लिए आर्यभट्ट और अरस्तू को गणनाएं करनी पड़ी होंगी, उसे आज स्पेस से किसी फुटबॉल की तरह देखा जा सकता है. यानी प्रमाण के आगे परिकल्पनाएं ध्वस्त हो गईं. अभी भी हम उन बातों के लिए परिकल्पनाओं का सहारा ले रहे हैं, जिनके बारें में नहीं जान सके, मगर यह कैसे कहा जा सकता है कि भविष्य में भी नहीं जान पाएंगे, और वे परिकल्पनाएं ही अंतिम सत्य हैं?

दूसरा तर्क : जैसे भावनाओं को विज्ञान नहीं परख सकता वैसे ही आत्मा, पुनर्जन्म और आध्यात्म की वैज्ञानिक व्याख्या नहीं की जा सकती.

यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि दुनिया में जो कुछ भी है वह भौतिक है. भावनाओं की भी अपनी भौतिकी होती है, नहीं तो मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा जैसे विषयों का जन्म ही नहीं हुआ होता. हम जानते हैं कि हमारी भावनाओं को बहुत सारे हारमोन्स, केमिकल, बाहरी परिस्थितियां नियंत्रित करते हैं. भावनाओं से पूर्व की स्थिति को प्रयोगशाला में सिद्ध किया जा सकता है, जैसे रिफ्लेक्स ऐक्शन (गर्म बर्तन को छूने अपने आप हाथ हट जाना), अधिगम ( प्राणी में सीखने की प्रक्रिया), यौन तथा प्रजनन से जुड़ा व्यवहार – इन सबका वैज्ञानिक अध्ययन संभव है.

भावनाएं इसलिए अभेद लगती हैं क्योंकि वे जटिल हैं, भावनाएं बहुस्तरीय होती हैं. एक स्तर जेनेटिक होता है, दूसरा किसी समुदाय के सामूहिक अवचेतन से निर्धारित होता है, तीसरा उसके परिवेश से तय होता है, चौथा उसकी परवरिश, पाँचवां उसकी बायोलॉजी और इस तरह की अनंत संभावनाएं हैं. मगर यह सब विज्ञान का हिस्सा हैं. दवाओं के जरिए संवेगों और भावनाओं को उभारा या उनका शमन तक किया जा सकता है. अब उपरोक्त कोट किए गए वाक्य में एक अंतर्निहित पैराडॉक्स है. यदि भावनाओं को प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं किया जा सकता तो उसको मान्यता भी नहीं दी जा सकती. यानी भावनाओं का उदाहरण देकर किसी अन्य सिद्धांत (जैसे पुनर्जन्म) की पैरवी नहीं की जा सकती.

तीसरा तर्क : प्राचीन ग्रंथों में आत्मा, पुनर्जन्म, कर्मफल से संबंधित सारा ज्ञान है.

मान्यताएं अपनी जगह हैं स्थापनाएं अपनी जगह. दिक्कत तब होती है जब किसी मान्यता को जबरन स्थापना बना दिया जाता है. पुनर्जन्म एक मान्यता है, ठीक वैसे ही जैसे भारतीय पुराणों में हनुमान, ग्रीक मिथ में ज़ियुस और सुमेरियन सभ्यता में रम्मन का रिश्ता पवन और तूफान से है. स्थापना का अर्थ यह होता है कि हमारी मान्यता को एक पुख्ता प्रमाण मिल गया, वह हर स्थिति में अकाट्य है. जैसे आर्कमिडीज़ का सिद्धांत, जैसे न्यूटन का लॉ, जैसे आइंस्टीन की थ्योरी. यदि किसी वैज्ञानिक सत्य को खारिज़ भी क्या गया तो इसलिए क्योंकि उससे एक स्तर ऊपर जाकर सत्य का अन्वेषण किया गया. यानी अणु से आगे परमाणु और उससे आगे प्रोटान-न्यूट्रान.

मान्यताएं बदल सकती हैं मगर स्थापनाएं कभी बदलती नहीं हैं. पुनर्जन्म पर किताबें लिखी जा सकती हैं, मगर उन्हें विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में नहीं शामिल किया जा सकता, अस्पतालों में पुनर्जन्म वार्ड नहीं बनाए जा सकते. सरकारें पुनर्जन्म के लिए विशेष मंत्रालय का गठन नहीं करेंगी. क्योंकि वह सिद्ध नहीं है, अभी एक परिकल्पना है. पूनर्जन्म और प्रारब्ध जैसी चीजें मान्यताएं, इसलिए उन्हें मानना एक निजी आग्रह हो सकता है मगर उसे सत्य बताकर सबको अनुसरण करने के लिए नहीं कहा जा सकता.

चौथा तर्क : आध्यात्म और विज्ञान दो अलग धाराएं हैं. एक के जरिए दूसरे की व्याख्या नहीं हो सकती.

नहीं, आध्यात्म और विज्ञान उस तरह दो स्वतंत्र धाराएं नहीं जैसी की दिखती हैं, यह दोनों ही मनुष्य ज्ञान के क्रमिक विकास का हिस्सा हैं. यह दर्शन का एक आरंभिक स्तर है. जहां पर मनुष्य अपनी चेतना से जुड़ें सवालों से दो-चार होता है. जब हम विशुद्ध विचारों से एक तार्किक शृंखला की ओर बढ़ते हैं तो यह दर्शन का रुप ले लेता है. यहां पर गणित की गणनाएं भी शामिल हो जाती हैं. इससे एक कदम आगे हम उसको भौतिक रूप में धारण कर पाते हैं, वह विज्ञान बन जाता है. ज्ञान के क्षेत्र में यही ऐतिहासिक क्रम-विकास भी दिखता है.

इसे उदाहरण से समझिए. मनु्ष्य ने हवा में उड़ते पंक्षियों को देखा और उसके मन में इच्छा जगी कि वह भी उड़ सके. उसने आँखे बंद कीं और कहा कि लगातार विचार करने से हमें एक समय के बाद ऐसा लगेगा कि हम भी हवा में उड़ रहे हैं (यह आध्यात्म है), मनुष्य अपने कंधों पर पंख बांध ले या ऊंचाई से कोई हवा भरने वाली चीज लेकर कूद पड़े और बिना जान दिए उड़ सके (यह दर्शन और परिकल्पना है), हवा के दबाव और मनुष्य के वजन के बीच किस तरह से संतुलन बन सकता है, (यहां से गणित और विज्ञान शुरू होगा) और उसकी अंतिम परिणति ग्लाइडर जैसे भौतिक उपकरण में होगी. यदि कोई आध्यात्म जैसा ज्ञान वास्तव में इतने बड़े सत्य का उद्घाटन कर सकता है, पूर्वजन्म, नक्षत्रों की गणना कर सता है तो यह ज्ञान विज्ञान की तरह प्रमाण पर खरा क्यों नहीं उतरता है? क्यों यह कविताई और वाग्जाल का सहारा लेता है?

माना जाता है कि मनुष्य के अलावा बाकी जीव क्रमिक विकास के तहत आगे बढ़ते हुए मनुष्य योनि तक पहुँच रहे हैं और मनुष्य मोक्ष न पाकर उसी में पड़ा हुआ है. अर्थात पशु-पक्षी मनुष्य बनते जा रहे हैं? यानी जब सारे मनुष्यों क मोक्ष प्राप्त हो जाएगा तो वे समाप्त हो जाएंगे? बाकी प्रजातियों की तरह? जब इस धरती पर सिर्फ डायनासॉर रहते थे, तो उन्होंने ऐसे क्या कर्म किए थे कि उनको मोक्ष प्राप्त हो गया? इस ज्ञान का आधार क्या है? यह कैसे पता चला? किस प्रयोगशाला में सिद्ध किया गया? यदि इन सारी बातों का जवाब नहीं है तो इसे कपोल कल्पना क्यों न माना जाए?

पाँचवां तर्क : स्थूल शरीर, आत्मा, पुनर्जन्म आदि विज्ञान से परे है. इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है.

इसके विरोध में जो कुछ भी तर्क आता है वह इस सृष्टि में चीजों को हम कैसे समझते हैं, इस पर आधारित है. यह कहना कि स्थूल शरीर, आत्मा, पुनर्जन्म आदि विज्ञान से परे है. इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है. किंतु ज्ञान की सरल सी परिभाषा यह है कि वह सभी के लिए सभी स्थितियों में एक समान या परखने योग्य होना चाहिए. सफेद वस्तु क्या है- नमक है, चीनी है या सल्फास है, इसे हम भौतिक रूप से परख सकते हैं. पर इससे अहम यह है कि वह सब्जेक्टिव नहीं ऑब्जेक्टिव है, यानी उसे हर कोई परख सकता है. अब मेरे दो प्रश्न हैं, इन आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म, सूक्ष्म शरीर आदि का पता किसने और कैसे लगाया? सभ्यता में किसी वस्तु का पता कैसे लगा इसका तो एक इतिहास है. योग सूत्र में जिन बातों का उल्लेख है वे अनुभव आधारित परिकल्पनाएं हैं. उनकी अपनी एक सीमा है, कुछ प्रमाणों पर खरी उतरती हैं मगर कुछ आधुनिक विज्ञान और चिकित्सा विज्ञान के आधार पर नहीं भी उतरती हैं.

दिक्कत यह है कि भारतीय सभ्यता में प्राचीन और आधुनिक के बीच की कड़ी बाधित है. मगर पश्चिम में ऐसा नहीं है. इसलिए जब पुनर्जागरण काल आया तो प्राचीन स्थापनाओं (यूनानी दर्शन, गणित, साहित्य) पर लगातार काम किया गया और उसने आधुनिक सभ्यता की नींव रखी. अगला किसी भी ज्ञान को अंततः मनुष्य की चेतना ही ग्रहण कर सकती है, यदि योग से होने वाले अनुभव मनुष्य की चेतना का हिस्सा हैं तो फिर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की भारतीयों को क्या जरूरत थी? पश्चिम ने योग को एक जीवन शैली की तरह ग्रहण किया है, जैसे ज़ेन को एक जीवन शैली के रूप में ग्रहण किया है. यही उचित है.

बाकी ज्ञान को प्रमाण चाहिए. चलिए यदि मैं पदार्थ का उदाहरण दूंगा तो उसको तो आप भौतिक मानते हैं तो यह बताइए कि काल, दूरी, प्रकाश, ब्लैकहोल जैसी स्थापनाओं को जब आइंस्टीन और स्टीफेन हाकिंग ने सामने रखा तो क्या वे अभौतिक और सूक्ष्म नहीं थे, वे तो दार्शनिक चिंतन से भी कहीं आगे जाते हैं, मगर उन्हें परखा जा सकता है, कागज कलम लेकर. जबकि पुनर्जन्म के बारे में कहा जाता है कि इसे परखा नहीं जा सकता बल्कि इस यकीन करना होगा. यकीन करने का आधार क्या है? मेरा मानना है कि जिस ज्ञान को हम परख नहीं सकते, उसे ज्ञान का दर्जा नहीं देना चाहिए. वह एक सीमित सोच से पैदा हुई परिकल्पना है, उसको उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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