मनोज अभिज्ञान-
वॉरेन बफेट की रणनीति ने एक बार फिर बाजार को झकझोर कर रख दिया है। जब दुनिया भर के निवेशक नए अवसरों की तलाश में दौड़ रहे हैं, तब बफेट अपनी संपत्ति को नकदी में परिवर्तित कर रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि मौजूदा बाजार परिस्थितियां उन्हें अनुकूल नहीं लग रही हैं।
बर्कशायर हैथवे लगातार नौ तिमाहियों से इक्विटी की शुद्ध विक्रेता बनी हुई है। यह संकेत देता है कि बफेट को बाजार में निवेश करने लायक मूल्य नहीं दिख रहा। ऐतिहासिक रूप से, जब भी बफेट इस तरह से नकदी जमा करते हैं, उसके बाद बाजार में बड़ी उथल-पुथल देखने को मिलती है। निवेशक घबराहट में हैं—अगर वॉरेन बफेट को यह बाजार आकर्षक नहीं लग रहा, तो क्या यह संकेत है कि भारी मंदी निकट है?
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान में स्टॉक के मूल्य इतने अधिक हो चुके हैं कि उनमें निवेश करना जोखिम भरा सौदा बन गया है। एसएंडपी 500 अपने रिकॉर्ड स्तर पर है और इसका मूल्य-आय अनुपात पिछले दस वर्षों के औसत से कहीं अधिक हो चुका है। इसका अर्थ यह है कि कंपनियों के मुनाफे की तुलना में उनके शेयरों की कीमतें अव्यावहारिक रूप से ऊंची हैं। बफेट इस समय ऐसे किसी भी निवेश से बच रहे हैं, जो अधिक जोखिम भरा हो और भविष्य में भारी गिरावट का शिकार हो सकता हो।
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब बर्कशायर ने एप्पल के शेयरों को भारी मात्रा में बेचना शुरू किया। एक समय पर, बफेट की कंपनी के पास एप्पल के 6% शेयर थे, लेकिन हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह हिस्सेदारी घटकर 2% रह गई है। एप्पल लंबे समय तक बर्कशायर के निवेश पोर्टफोलियो की रीढ़ रहा है, और इस कंपनी में बफेट की गहरी आस्था रही है। ऐसे में, एप्पल में अपनी स्थिति कम करना यह दर्शाता है कि या तो बफेट अब टेक्नोलॉजी सेक्टर से असहज महसूस कर रहे हैं या फिर वे अपनी विरासत को उनके उत्तराधिकारी ग्रेग एबेल के लिए व्यवस्थित कर रहे हैं।
शेयर बायबैक की नीति में भी बदलाव देखा गया है। बर्कशायर ने तीसरी तिमाही में कोई शेयर पुनर्खरीद नहीं की, जबकि पहले यह उनकी महत्वपूर्ण रणनीति हुआ करती थी। इसका मतलब साफ है—या तो कंपनी के आंतरिक मूल्यांकन के अनुसार उसके शेयर जरूरत से ज्यादा महंगे हो चुके हैं या फिर बफेट अपनी नकदी को बड़े अधिग्रहण के लिए बचा रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि बफेट इस नकदी का क्या करेंगे? क्या वे किसी बड़े अधिग्रहण की तैयारी कर रहे हैं, या फिर उन्हें भविष्य में बड़ी मंदी का अनुमान है? निवेशकों को याद रखना चाहिए कि बफेट केवल उन्हीं ‘गेंदों’ पर प्रहार करते हैं जो उन्हें पसंद आती हैं। और अभी, ऐसा लगता है कि उनके लिए बाजार में कोई आकर्षक अवसर नहीं बचा है।
लंबे समय से बफेट के प्रशंसक उनकी रणनीति पर भरोसा बनाए हुए हैं। वे जानते हैं कि जब सही समय आएगा, तो बर्कशायर इस नकदी का उपयोग करके कोई ऐतिहासिक सौदा करेगा। लेकिन तब तक, बाजार के अन्य खिलाड़ियों के लिए यह चिंता का विषय बना रहेगा कि आखिर वॉरेन बफेट को वह क्या दिख रहा है, जो बाकी दुनिया को नहीं दिख रहा?
भारतीय बाजार पहले से ही ऐतिहासिक गिरावट की ओर बढ़ रहे हैं, और विदेशी निवेशकों (FII) की भारी बिकवाली ने इस गिरावट को और तेज कर दिया है। अमेरिकी बाजार में मंदी की आशंका के कारण पहले से ही अस्थिर माहौल में निवेशक जोखिम से बचने के लिए उभरते बाजारों से पूंजी निकाल रहे हैं। इसका सीधा असर निफ्टी 50 और सेंसेक्स पर देखने को मिल रहा है।
बाजार की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर अमेरिकी मंदी और तेज होती है, तो भारतीय बाजार में और अधिक गिरावट संभव है। FII लगातार अपने निवेश कम कर रहे हैं, जिससे लिक्विडिटी संकट पैदा हो सकता है। खासकर बैंकिंग, आईटी और मेटल सेक्टर पर सबसे ज्यादा दबाव रहेगा, क्योंकि ये सेक्टर वैश्विक बाजारों से गहराई से जुड़े हुए हैं। आईटी कंपनियों को अमेरिका में मंदी के चलते प्रोजेक्ट्स में कटौती का सामना करना पड़ सकता है, जबकि बैंकिंग सेक्टर में क्रेडिट ग्रोथ धीमी पड़ सकती है।
लेकिन जब तक वैश्विक बाजारों में स्थिरता नहीं आती और अमेरिकी मंदी की आशंका कम नहीं होती, तब तक भारतीय बाजारों में अस्थिरता बनी रहेगी। मौजूदा परिदृश्य में अल्पकालिक निवेशकों के लिए यह जोखिम भरा समय है, जबकि दीर्घकालिक निवेशकों के लिए यह अवसर भी हो सकता है, यदि वे सही स्तरों पर खरीदारी करें और धैर्य बनाए रखें।
यह सही है कि DII (घरेलू संस्थागत निवेशक) लगातार खरीदारी कर रहे हैं और FII (विदेशी संस्थागत निवेशक) की बिकवाली को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन बाजार में केवल खरीदारी और बिकवाली का गणित ही सब कुछ नहीं होता।
सबसे बड़ा अंतर यह है कि FII आमतौर पर लार्ज-कैप और ब्लू-चिप शेयरों में अधिक निवेश करते हैं, जबकि DII की खरीदारी मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों में भी फैलती है। जब FII बड़ी मात्रा में बिकवाली करते हैं, तो बाजार में एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनता है, जिससे गिरावट तेज हो सकती है, भले ही DII खरीदारी कर रहे हों।
इसके अलावा, विदेशी निवेशकों की बिकवाली का असर रुपये की विनिमय दर (exchange rate) पर भी पड़ता है। जब वे भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो रुपये पर दबाव बढ़ता है, जिससे आयात महंगा हो सकता है और महंगाई दर प्रभावित हो सकती है। इससे कंपनियों की लागत बढ़ती है और मुनाफे पर असर पड़ सकता है, जिससे बाजार में गिरावट का खतरा बना रहता है।
DII की खरीदारी बाजार के लिए एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन जब तक वैश्विक आर्थिक स्थितियां स्थिर नहीं होतीं और विदेशी निवेशकों की धारणा बेहतर नहीं होती, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी। इसलिए, केवल DII की खरीदारी को देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि बाजार पूरी तरह से सुरक्षित है, जल्दबाजी होगी।
भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का विश्लेषण जरूरी है, क्योंकि इसका संबंध सिर्फ वैश्विक संकेतकों से नहीं, बल्कि देश की आंतरिक आर्थिक नीतियों, ब्याज दरों, कॉर्पोरेट आय, और निवेशकों की मनोवैज्ञानिक धारणा से भी होता है। इसका विश्लेषण देश ही किया जाता रहा है, मैंने भी समय समय पर किया है। हाल ही में, विदेशी निवेशकों (FII) की भारी बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। इसलिए वैश्विक आर्थिक नीतियों या घटनाओं का विश्लेषण भी भारतीय बाजार के विश्लेषण से जुड़ा हुआ है।
जहाँ तक वॉरेन बफेट के पारिवारिक विवाद की बात है, तो इसका उनके निवेश निर्णयों या बर्कशायर हैथवे की रणनीतियों पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं दिखता। बफेट अपनी निवेश नीतियों में हमेशा मूल्य आधारित दृष्टिकोण अपनाते रहे हैं और उनकी मौजूदा नकदी संचित करने की रणनीति महंगे बाजार से बचने और सही अवसर की प्रतीक्षा करने का संकेत देती है। उनका व्यक्तिगत जीवन उनके पेशेवर फैसलों से अलग है और इस तरह की खबरों का बाजार की व्यापक दिशा पर कोई ठोस असर नहीं पड़ता।


