प्रवीण दुबे-
न्यूज़ चैनल इंडस्ट्री (जी हाँ..इंडस्ट्री ही है) की सबसे छोटी ईकाई होती है स्ट्रिंगर.. बेहद क़ाबिल लेकिन उतना ही निरीह प्राणी… वो भले ही कितना ही पढ़ा लिखा.. भावुक संवेदी… ख़बरों की चरम तक समझ रखने वाला हो मगर उसे डेस्क में बैठे नवोदित से लेकर केबिन में बैठने वाले बॉसनुमा लोग तक यही मानकर चलते हैं कि उसे ज्यादा कुछ नहीं आता.. हम ही परम ज्ञानी हैं…जबकि आप देखिए शोध करके न्यूज़ चैनल की शुरुआत से लेकर आज दिनांक तक जितनी भी बड़ी ख़बरें तहलका मचाने वाली.. मानवीय संवेदनाएं बढ़ाने वाली या मिलियंस में वीडियो व्यू लाने वाली रही होंगी, उनमें 90 फीसदी… बल्कि उससे भी अधिक स्ट्रिंगर्स की ही रही होंगी.
चाहे चैनल कोई भी हो.. उनकी सबसे बड़ी नाकामी यही है कि वे छोटे शहरों में रहते हैं.. राजधानियों में सत्ता साकेत के आस-पास मंडरा कर “सूत्र बता रहे हैं” वाली चीख-चीख कर करने वाली पत्रकारिता नहीं कर पाते… उनके इलाक़े में कुछ भी हुआ तो डेस्क का व्यक्ति उनके जिले की भौगोलिक स्थिति समझे बिना “तत्काल चाहिए…तत्काल चाहिए” टाइप हड़काता रहेगा… बेचारा सौ पचास किलोमीटर भागेगा.. स्टोरी करके लाएगा और तब तक डेस्क को कोई और मसाला मिल जाएगा तो उसकी स्टोरी किल हो जाएगी..
कुछ घटिया बॉस होते हैं, जो उनसे ढेरों गैर वाज़िब लाभ की फरमाइश करते हैं… गेंहू, चावल, आटा, दाल, घी से लेकर नक़द पैसे.. महंगा फोन या दारू की बोतलों के इंतज़ाम तक की फरमाइश करते रहते हैं.. ऐसा ऑर्डर करना वे अपना जन्मजात अधिकार समझते हैं..
यदि उनकी मांग की पूर्ती नहीं होती तो वे उसे निपटा देते हैं.. जब राजधानी से कोई गधा रिपोर्टर भी उनके इलाके में कवरेज करने पहुंचेगा तो ऐसे नक़्शे देगा.. गर्दन अकड़ कर चलेगा जैसे ब्रम्हज्ञानी वही है और स्ट्रिंगर को कुछ नहीं आता ही नहीं…
दिलचस्प ये है कि ख़बर के सारे महत्वपूर्ण इनपुट भी वो स्ट्रिंगर से ही लेगा और उसके जूठन को अपना भोजन बनाकर टीवी पर पेश कर देगा.. इलाके के जो बड़े नेता / अधिकारी होते हैं, वो चूँकि राजधानी में बॉसनुमा पत्रकारों के परिचित होते हैं, लिहाज़ा कुछ अच्छे नेता/ अधिकारियों को छोड़ दें तो बाकी के स्ट्रिंगर को कम भाव देते हैं.. बात बात में वे उसे बोध कराते रहेंगे कि तुम्हारे बॉस से मेरा गहरा दोस्ताना है, लिहाज़ा ज्यादा उड़ना मत… उसके बाद भी यदि स्ट्रिंगर के ज़रिए लगातार ऐसी ख़बरें आ रही हैं, जो चैनल को चर्चा में लाती हैं, तो ये स्ट्रिंगर की काबिलियत झलकाने के लिए पर्याप्त है..
नटनी की तरह रोज़ रस्सी पर चलता है वो.. रस्सी से गिरने की संभावना उसके साथ हर पल बनी रहती है.. कमोबेश ऐसी ही बात मैंने कुछ सालों पहले भी लिखी थी… आज फिर दोहरा रहा हूँ…
हालाँकि सभी स्ट्रिंगर्स पर ये एप्लीकेबल नहीं है.. कुछ बेहद कलाकार होते हैं.. उनका काम ही आईडी चमकाकर अड़ीबाज़ी करना होता है.. वे सुबह से शिकार की तलाश में ही रहते हैं.. फर्जीवाड़ा उनका मूल काम होता है.. मगर ऐसे लोगों की संख्या बहुत सीमित है…
मैं व्यक्तिगत तौर पर कस्बाई पत्रकारिता के इस सबसे मजबूत स्तंभ की बहुत इज्जत करता हूँ.. उनकी दिक्कतों को समझता हूँ…. उनसे सम्वाद के दौरान हमेशा आदरसूचक संबोधन का इस्तेमाल करता हूँ और यथासम्भव उनका छाता बनकर उन्हें धूप, सर्दी, गर्मी से बचाता भी हूँ लेकिन तब, जब मुझे इत्मीनान हो जाए कि अगला वाज़िब काम करने में परेशान हुआ है…
पत्रकारिता की इस बुनियाद को हड़काने वाले तो बहुत हैं लेकिन ज़रूरत है कि उनके अच्छे काम की सराहना की जाए.. उनकी दिक्कतों को समझा जाए (अगर वे वाकई मूल, शुद्ध कस्बाई पत्रकार हैं तो)



Raaj
August 29, 2025 at 3:57 pm
सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली….
अब न तुम्हारा पतन होना शुरू हो गया, तो ज्ञान पेल रहे। धिक्कार है तेरे पर
Kishor agrawal
September 1, 2025 at 10:44 am
आदरणीय सर नमस्कार।
मैं सहारा समय में स्टिगर था, लेकिन आप तो बड़े पद पर है। आपने स्ट्रिंगर की जो पीड़ा और डेस्क की तानाशाही व्यक्त की है, वह सौ फीसदी है, क्योंकि हमने इस भड़काने और जलील करने के बड़े तनाव में झेला है।
किशोर अग्रवाल इंदौर