सुधर भी जाओ हिंदी के संपादकों….

Dhiraj Kulshreshtha : घटिया तो हमेशा बाजार से अपने आप बाहर होते आए हैं… पत्रकार सब बनना चाहते हैं,कुछ ने तो पैसे लेकर पत्रकार बनाने की दुकानें भी खोल लीं हैं….पैसे देकर आईडी ले जाओ…मौहल्ले में रोब गांठो…घर के बाहर बोर्ड लगा लो। अच्छी रिपोर्ट सबको चाहिए…पर पैसे कोई नहीं खर्च करना चाहता….स्वनामधन्य बड़े प्रकाशनों का भी हाल बेहाल है…पिछले बीस साल में अखबार एक रुपए से बढ़कर तीन रुपए का हो गया…विज्ञापन की रेट दस गुनी बढ़ गई….

पर लेखक / पत्रकार को आलेख या रिपोर्ट के वही 500 रुपये मिलेंगे। नहीं तो टीपने के लिए अब इंटरनेट तो है ही। आजकल संपादकजी असाइन्मेंट देते समय ही स्टोरी ऐंगल भी बता देते हैं….यानि कि रिपोर्टर या लेखक की कलम पर पहले से बैठ जाते हैं। ज्यादा स्मार्ट संपादक… इंटरनेट से निकाले गए प्रिंट आउट पकड़ा कर कहते हैं कि इसे कंपाइल कर लाओ।गुंजाइश ही कहां है…मत वैभिन्न या अलग एंगल अथवा नई सूचना की। सुधर भी जाओ हिंदी के संपादकों…. इस पेशे को सम्मानजनक बनाए रखने की सबसे पहली और बड़ी जिम्मेदारी संस्थानों की ही है….घटिया तो हमेशा बाजार से अपने आप बाहर होते आए हैं.. (इस पोस्ट का मजीठिया से कोई लेना देना नहीं है)

राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार धीरज कुलश्रेष्ठ के फेसबुक वॉल से.



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