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यादें- सुनील शेट्टी का इंटरव्यू जागरण में छपा तो अमर उजाला कानपुर में हंगामा हो गया था!

पंकज शुक्ला-

हली फ़ोटो साल 1993 की है। सुनील शेट्टी और निर्माता साजिद नाडियाडवाला फ़िल्म ‘वक़्त हमारा है’ के लिए कानपुर में थे, मुझे पता चला तो मैं सुनील शेट्टी का इंटरव्यू करने पहुंच गया।

उन दिनों ‘अमर उजाला’ का फ़िल्म परिशिष्ट रंगायन मेरठ से छपता था, मैंने इंटरव्यू कानपुर से मेरठ भेजा तो कुछ दिनों बाद वह ‘अस्वीकृत’ होकर वापस आ गया। पत्रकारिता के शुरुआती दिन थे, अंदरूनी सियासत तो ख़ैर अब भी समझ नहीं आती, उन दिनों मैं भी नादान ही था। मैंने वही इंटरव्यू हू ब हू ‘दैनिक जागरण’ को भेज दिया।

जागरण में मेरी फ़िल्म संबंधी रपटें ‘अमर उजाला’ में आने से पहले ही छपनी शुरू हो चुकी थीं। सुनील शेट्टी का इंटरव्यू जागरण में छपा तो हंगामा हो गया। कानपुर यूनिट के प्रबंधक कमलेश दीक्षित उनके पैर न छूने के चलते मुझसे ख़ार खाए रहते थे। उनको मौक़ा मिल गया।

मामला बहुत ऊपर तक गया। अतुल माहेश्वरी जी ने इसकी जांच राजुल माहेश्वरी जी को सौंपी। जांच बैठी तो मैंने ‘अस्वीकृत’ वाली चिट्ठी सामने रख दी। उनको समझ आ गया कि मैं ‘निशाने’ पर हूं।

एक अच्छा लीडर अपनी टीम के लोगों के आसपास की घास फूस ख़ुद साफ़ करता रहता है ताकि अच्छे पौधे ठीक से पनप सकें। बोले, ‘रामपुर’ जाओगे ब्यूरो इंचार्ज बनकर। बस, तब से जो घर से निकला तो अब तक मन गांव लौटने को छटपटाता ही रहता है।

सुनील शेट्टी से भी उसके बाद मुलाक़ातें तो तमाम हुईं लेकिन दो दिन पहले हमने ठीक कानपुर वाले पोज में फ़ोटो खिंचाने का तय किया। मुझे अपनी आंख़ें हल्की बंद रखनी थीं। उन्हें कैमरे के बाईं तरफ देखना था। जै जै..!!

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