अंबानी और मोदी भक्त पत्रकार उमेश उपाध्याय किसे बता रहे हैं पुश्तैनी पत्रकार और सुपर दरबारी पत्रकार!

उमेश उपाध्याय आईबीएन7 चैनल के संपादक हैं. मुकेश अंबानी ने जब नेटवर्क18, टीवी18, ईटीवी आदि को खरीदा तो उमेश उपाध्याय को अपनी पसंद के बतौर ले आए और अपने मीडिया वेंचर में सबसे उपर बिठा दिया. जाहिर है, जब अंबानी जी मोदी के भक्त हैं तो उनके जरिए लाए गए उमेश उपाध्याय भला कैसे मोदी के खिलाफ कलम चला सकते हैं. वैसे भी उमेश उपाध्याय के भाई सतीश उपाध्याय दिल्ली भाजपा के नेता हैं. इन दोनों भाइयों पर कई तरह के आरोप भी लगे हैं, अंबानी की बिजली कंपनियों को फायदा पहुंचाने और इनकी लाबिंग करने का.

कहा ये भी जाता है कि अंबानी ने जानबूझ कर एक भाई को मीडिया के हेड बनाया और दूसरे को दिल्ली भाजपा का नेता बनवाया. उमेश उपाध्याय के आने के बाद आईबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन किस तरह मोदी मय हो गया, यहां ठीकठाक काम करने वालों को निकाला जाने लगा, आम आदमी पार्टी की आवाज को बुरी तरह दबाया जाने लगा… ये सभी जानते हैं. तो इन्हीं उमेश उपाध्याय महोदय ने एक आर्टकिल लिख मारा है मोदी सरकार के एक साल होने पर. इनसे ये तो कतई उम्मीद नहीं की जा सकती कि ये पत्रकारीय पैमाने पर निष्पक्ष होकर समीक्षा करेंगे क्योंकि ये खुद अंबानी और मोदी के पैरोल पर हैं. इसीलिए इन्होंने खुलेआम मोदी के एक साल पर कलम तोड़कर जय जयकार की है. साथ ही पत्रकारों के बारे में भी अपने गंभीर विचार व्यक्त किए हैं. किसी को पुश्तैनी पत्रकार बताया है तो किसी को सुपर दरबारी पत्रकार. उमेश उपाध्याय ने यह नहीं बताया कि वे खुद किस कैटगरी में आते हैं, सुपारी पत्रकार या अंबानी पोषित पत्रकार! आइए, उपाध्याय जी का लिखा पढ़ें.

-एडिटर, भड़ास4मीडिया


दिल्ली के पुश्तैनी पैरोकार, सुपर दरबारी पत्रकार, क्षुब्ध बाबू और मोदी का एक साल

उमेश उपाध्‍याय

मोदी सरकार के एक साल की समालोचना एक टेढ़ी खीर है, इसलिए नहीं कि ऐसा करने में कोई बौद्धिक दिक्कत हो या फिर ये काम ही मुश्किल है। दिक्कत थोड़ी दूसरी किस्म की है। एक तरफ मोदी भक्तों या चंपुओं की जमात है, जो थोड़ी भी आलोचना पर आप पर टूट पड़ेंगे,  तो दूसरी तरफ है,  एक ऐसा वर्ग जो किसी भी तरह बस यही सिद्ध करने में लगा हुआ है कि 26 मई 2014 को मोदी की ताजपोशी के बाद से देश का लोकतंत्र और व्यवस्था खतरे में पड़ गई है। जैसे ही आप कुछ कहेंगे, इनमें से कोई न कोई आपके पीछे जरूर पड़ेगा। खैर, मोदी सरकार के एक साल का आकलन करने वालों को ये खतरा तो उठाना ही पड़ेगा।

पिछले दिनों एक मझोले दर्जे के सरकारी अफसर से बात हो रही थी। जनाब काफी नाराज थे। कहने लगे ‘देखिए भाई’ हमारे तो बुरे दिन आ गए हैं। सुबह अगर 9 बजकर दस मिनट तक दफ्तर नहीं पहुंचे तो आधे दिन की गैरहाजिरी लग जाती है’। ये जनाब काफी खेले खाए अफसर हैं। हमने जब पूछा कि ये बताइए कि ‘काम वाम’ हो रहे हैं कि नहीं?’ सो बोले कि अभी तो साहब लोग किनारे बैठकर देख ही रहे हैं। सो ‘धंधापानी’ भी ठप सा है। इन्हीं साहब ने हमें बताया कि सचिव स्तर के एक अधिकारी को एक सरकारी समारोह में न जाने पर आधे दिन की केजुअल लीव लेनी पड़ी थी। सो ‘अच्छे दिनों’ के आदी रहे सरकार के बाबू आमतौर से मोदी सरकार के मुरीद नहीं हैं।

दिल्ली में एक तबका है पुश्तैनी पैरोकारों का। इनका काम रहा है लोगों के काम कराना। ये एक ऐसी जमात है, जो आपको अंग्रेजी अखबार के तीसरे पन्ने पर अक्सर दिखाई देगी। दिल्ली के किसी भी महकमे में आपको कैसा भी काम हो,  चाहे वह लोकल थानेदार हो या पीएमओ,  इनकी लगातार जुगाड़ रही है। मंत्री कोई हो- सल्तनत किसी की रही हो, इस वर्ग के रुतबे और ओहदे में कमी नहीं आई। काम कराने की,  मिलने-मिलवाने की और ट्रांसफर/पोस्टिंग कराने की इनकी जबरदस्त क्षमता रही है। इसके बल पर इन्होंने एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया है। दिल्ली में सरकार किसी की रही हो ‘लुटियंस’ दिल्ली में चलती इन्हीं की रही है। ये पुश्तैनी पैरोकार आजकल बहुत ही परेशान हैं क्योंकि इन दिनों इनकी दाल कुछ कम गल रही है। अब तो आलम यह है कि इनमें से कई आपसे ही पूछते मिल जाएंगे कि ‘भाई आजकल किसकी चल रही है?’ इनकी तकलीफ समझी जा सकती है!

एक और असरदार तबका है, सुपर दरबारी पत्रकारों का। इनकी पैठ और पहुंच दिल्ली की हर सरकार में अबाध रही है। सरकारें और प्रधानमंत्री आए-गए, मगर इनका रसूख कभी कम नहीं हुआ। जनमानस से दूर रहने के बावजूद अपनी वाकपटुता और साधारण बातों को सैद्धांतिक बौद्धिकता की चाशनी चढ़ाने की इनकी कला के कारण ये हमेशा सत्ता वर्ग के करीब रहे हैं। इनमें से कई अकूत संपत्ति के मालिक हैं और विलासितापूर्ण जीवन बिताते हैं। मजेदार बात है कि यही लोग निष्पक्ष पत्रकारिता, पत्रकारीय मूल्यों और ईमानदारी के झंडाबरदार बने रहे हैं। इनमें से कई आजकल बहुत विक्षुब्ध हैं क्योंकि इनकी पहुंच एक साल में काफी कम हो गई है। काम करवाना तो दूर, मोदी सरकार में ताकतवर लोगों से इन्हें खुद भी मिलने में दिक्कत हो रही है। वैसे एक बात साफ करना जरूरी है, वो ये कि इनकी वाकपटुता और रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन को कम करके नहीं आंकना चाहिए और कोई आश्चर्य नहीं होगा कि फिर से इनमें से कई सुपर दरबारी हो जाएं, मगर फिलहाल ये रोष में हैं क्योंकि कई साल बाद ये सत्ता के केंद्र से दूर हैं।

आमतौर से भाजपा और संघ के समर्थक माने जाने वाले कई लोग भी आजकल पीड़ा के दौर से गुजर रहे हैं। उन्हें लगता है कि सरकार आने पर उन्हें कुछ नहीं मिला। इनमें से कई को उम्मीद थी कि नए निजाम में ये नए पैरोकार हो जाएंगे, मगर ऐसा अभी तक नहीं हुआ है सो इनकी बेचैनी काफी बढ़ गई है। इनमें से ज्यादातर आपको कहते मिल जाएंगे ‘ये सरकार तो कुछ कर ही नहीं रही।’ या फिर ‘ये तो वैसी ही सरकार है। इसमें नया कुछ नहीं है।’ सरकार का सबसे बड़ा आलोचक यही बेचैन वर्ग है।

अगर आप देखें तो ऊपर बताए लोग दिल्ली में सत्ता की धुरी के हमेशा पास रहे हैं। किसी के बारे में अच्छी या सही छवि बनाने में इनकी भूमिका अहम रही है। मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि सत्ता के गलियारों से ऊपर बताए ये बिचौलिए अब गायब हो गए हैं। शायद ये सबसे मुश्किल काम भी था। अब इन लोगों की सुनी जाए तो इस सरकार ने कुछ नहीं किया। ये मोदी के कुछ चुनावी जुमलों जैसे ‘अच्छे दिन’ वगैरह को अपने लेखों और टेलीविजन चर्चाओं में रबड़ की तरह खींचते हुए मिल जाएंगे।मगर सवाल है कि तो फिर असलियत क्या है? क्या पिछले साल में सब कुछ हरा-हरा ही रहा है? क्या मोदी ने चुनावी माहौल में जनमानस में अपेक्षाओं का जो ज्वार पैदा किया था,  उस पर वे खरे उतरे हैं?  सवाल कई हैं? और असलियत कहीं बीच में है।

अगर बगैर किसी चश्मे के देखा जाए तो विदेश नीति, अर्थव्यवस्था की मोटी-मोटी स्थिति, महंगाई, विकास की दर, भ्रष्टाचार मिटाने के लिए उठाए गए कदम, प्रशासनिक मुस्तैदी और देश में एक सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए मोदी सरकार ने बेहतरीन काम किया है। साथ ही कुछ नए संकल्पों, जैसे स्वच्छ भारत, जनधन योजना और जनसाधारण के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री बीमा योजनाओं के लिए मोदी सरकार की कल्पनाशीलता की सराहना की जानी चाहिए।मगर कुछ मोर्चों पर मोदी सरकार की गति धीमी रही है। इस देश को नौकरियां चाहिए। इसके लिए जरूरी है, देश के मझोले और लघु उद्योगों में नई जान फूंकना। अगर उद्योग नहीं बढ़ेंगे तो हमारी युवा पीढ़ी का क्या होगा? देश के किसी भी औद्योगिक शहर में चले जाइए छोटे से बड़ा कारखानेदार हैरान और परेशान ही मिलेगा। इस दिशा में जिस गति से फैसले होने चाहिए वैसा अभी दिखता नहीं है। सरकार भूमि अधिग्रहण का अध्यादेश लाई मगर फिर इसपर रक्षात्मक क्यों हो गई? बढ़ती हुई जनसंख्या और उसकी जरूरतों के लिए शहरीकरण और औद्योगीकरण आवश्यकता ही नहीं, बल्कि देश की अनिवार्यता है। लंबे समय बाद पूर्ण बहुमत से आई केंद्र सरकार अपने इस कर्तव्य से इसलिए नहीं डिग सकती क्योंकि कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं।

टैक्स कानून लागू करने की तरफ भी सरकार शायद इनकम टैक्स महकमे के बाबुओं के दबाव में आ गई, नहीं तो कोई कैसे रिटर्न भरने के लिए इतने जटिल फॉर्म की कल्पना भी कर सकता है, जो इनकम टैक्स विभाग ने प्रस्तावित किया था?  वो तो भला हो केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के सीधे दखल का कि विभाग अब एक नया फॉर्म बना रहा है। ये उदाहरण बताता है कि इस सरकार को बाबुओं के जाल से बचने की जरूरत है।

वैसे एक बात स्पष्ट कर देना ठीक रहेगा कि जनता ने मोदी को पांच साल के लिए प्रधानमंत्री चुना है इसलिए उनसे पूरा हिसाब-किताब आज ही मांगना उचित और तर्कसंगत नहीं है। आज अगर किसी बात का आकलन किया जा सकता है, तो वह है इस सरकार की दिशा, उसके द्वारा बनाई गई नीतियों से मिलने वाले संकेत और सरकार की नीयत के सबूत। दूसरी बात ये कि आजादी के बाद पहली बार दिल्ली में सरकार ही नहीं बदली बल्कि एक पूर्ण सत्ता परिवर्तन हुआ है, इसलिए पुराने मानकों और कसौटियों पर ही अगर आप इस एक साल को तौलेंगे तो शायद आप उतने सही न हों। वैसे इस सरकार ने एक साल में देश को अकर्मण्यता, निराशावाद और लचर प्रशासन के माहौल से बाहर तो निकाला है और इससे इसका बड़े से बड़ा आलोचक भी इनकार नहीं कर सकता।

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