Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

टीवी

इंडिया टीवी, टाइम्स नाउ, HT, टीवी टुडे व PTI के खिलाफ मानहानि याचिका खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पूर्व जिला जज द्वारा विभिन्न मीडिया संस्थानों और पत्रकारों के खिलाफ खबरें छापने को लेकर दायर याचिका खारीज कर दी. ये याचिका साल 2017 में यूपी के पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति को जमानत मिलने के बाद न्यायिक प्रक्रिया में भ्रष्टाचार संबंधी आरोप लगाने वाली मीडिया रिपोर्ट्स को लेकर लगाई गई थी.

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए मीडिया संस्थाओं और पत्रकारों के खिलाफ मानहानि मामले की कार्यवाही रद्द कर दी.

पूरा मामला क्या है?
समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति पर 2017 में बलात्कार का आरोप लगाया गया था. गिरफ्तारी के बाद प्रजापति ने जमानत याचिका दायर की, जिसपर जांच लंबित रहने के दौरान एडिशनल सेशन जज ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था. जमानत मिलने के बाद न्यायिक अनियमितताओं की बातों को बल मिला. कुछ मीडिया संस्थानों में इस दौरान ऐसी खबरें प्रकाशित हुईं जिनमें आरोप लगाया गया कि प्रजापति को जमानत दिया जाना सीनियर जजों की गहरी साजिश का हिस्सा था. इसमें याचिकाकर्ता जस्टिस राजेंद्र सिंह (पूर्व जिला जज, लखनऊ) भी शामिल थे.

आरोपों के अनुसार, तीन वकील जो संबंधित बार एसोसिएशन के पदाधिकारी थे, उन्होंने याचिकाकर्ता जज के साथ सौदा किया कि जमानत देने वाले जज (राजेंद्र सिंह, जो तब तीन सप्ताह में रिटायर होने वाले थे) को प्रजापति को जमानत देने वाले न्यायालय में नियुक्त किया जाए. इसके बदले में 10 करोड़ रुपये (जिसमें 5 करोड़ रुपये वकीलों द्वारा और 5 करोड़ याचिकाकर्ता जज और जमानत देने वाले जज द्वारा साझा किए गए) लेन-देन का आरोप लगा था.

मीडिया प्लेटफॉर्म जिन्होंने ये खबरें चलाई थीं
इस तरह की खबरों से व्यथित होकर याचिकाकर्ता जज राजेंद्र सिंह ने आजतक.इन, अमर उजाला, इंडियाटीवीन्यूज.कॉम, मिरर नाउ की पूर्व कार्यकारी संपादक फेय डिसूजा, टीवी टुडे के अरुण पुरी, आज तक के मोहित ग्रेवर, एचटी मीडिया की शोभना भरतिया, हिंदुस्तान टाइम्स के प्रधान संपादक सुकुमार रंगनाथन, आज तक के न्यूज डायरेक्टर सुप्रिय प्रसाद, टाइम्स नाउ के राहुल शिवशंकर, पीटीआई के न्यूज एडिटर शशांक शांतनु और नेटवर्क18 के आदिल जैनुलभाई के खिलाफ मानहानि याचिका दायर की थी.

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि समाचारों ने याचिकाकर्ता जज की छवि को धूमिल किया, क्योंकि उनमें निहित था कि उन्होंने मौद्रिक वीचारों के बदले राजेंद्र सिंह को संवेदनशील पॉक्सो न्यायालय में कथित रूप से तैनात करके खुद को अनियमित कार्यों में संलग्न किया.

इसके अलावा उन्होंने कहा कि संबंधित समाचारों में न्यायिक प्रक्रिया में अनियमितता की ओर इशारा किया गया. उनमें कहा गया कि सिंह को उपरोक्त पद पर रखा गया था, इसलिए उन्होंने प्रजापति को जमानत दी थी. याचिकाकर्ता की यह भी शिकायत थी कि उक्त लेखों के प्रकाशन के परिणामस्वरूप उन्हें हाईकोर्ट जज नियुक्त करने की सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश वापस ले ली गई थी.

इस मामले में मीडिया संगठनों और पत्रकारों ने समन के आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी थी. तर्क था कि संबंधित समाचार बिना किसी मंशा सिर्फ प्रामाणिक जानकारी के आधार पर पब्लिश किए गए. इसमें उस पत्र का भी हवाला दिया गया जो 3 मई 2017 को हाईकोर्ट द्वारा सुप्रीम कोर्ट को भेजा गया था.

इस बात पर भी जोर दिया गया कि उपर्युक्त संचार के सार से संकेत मिलता है कि हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस के आदेश पर प्रजापति को जमानत देने और याचिकाकर्ता सहित सीनियर जजों की कथित संलिप्तता के संबंध में एक गुप्त जांच की गई.

दूसरी ओर, याचिकाकर्ता-न्यायाधीश ने तर्क दिया कि कथित पत्र दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच विशेषाधिकार प्राप्त संचार था और मीडियाकर्मियों पर अधिकारियों के बीच गोपनीय संचार प्रकाशित करने के लिए आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए.

यह भी तर्क दिया गया कि समाचार पोर्टलों और अन्य व्यक्तियों द्वारा समाचारों को बिना सत्यापन के प्रकाशित किया गया और ऐसा करते समय वे समाचार प्रसारकों और डिजिटल एसोसिएशन, नई दिल्ली द्वारा तैयार आचार संहिता और प्रसारण मानकों के मानदंडों का पालन करने में विफल रहे.

इस प्रावधान के तीसरे अपवाद में कहा गया कि किसी भी सार्वजनिक प्रश्न से संबंधित किसी भी व्यक्ति के आचरण के संबंध में तथा उसके चरित्र के संबंध में, जहां तक ​​उसका चरित्र उस आचरण में प्रकट होता है, सद्भावपूर्वक कोई भी राय व्यक्त करना मानहानि नहीं है.

अंततः, हाईकोर्ट का विचार था कि विचाराधीन शिकायतें कानूनी प्रावधानों का सरासर दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं थीं तथा जैसा कि आरोप लगाया गया, कोई भी अपराध नहीं कहा जा सकता. तदनुसार, मानहानि की कार्यवाही रद्द कर दी गई.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन